Sunday, May 17, 2026
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अरूणा सब्बरवाल की तीन कविताएं

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1. कुछ तो है

कुछ तो है जीवन मैं ऐसा
पीर मगर अनजानी है
चंचल मन अब पूछ रहा है
क्यूँ इतनी हैरानी है?

क्यूँ कुछ भी न कहते-कहते
आँखें सब कुछ कह जातीं हैं
अल्हड़पन का मौन समर्पण
कहता नयी कहानी है ।

चोरी -चोरी आकर किसने
खटकाया फिर द्वार ह्रदय का
शर्माने की मन ही मन में
आदत बहुत पुरानी है ।

नव कुसुमों के आकर्षण से
जीवन को क्यूँ महकाते हो
ढूँढा तुमको कहाँ-कहाँ तक
भँवरे सी नादानी है ।

भय बिन प्रेम कहाँ होता है
जल बिन मछली तड़पे जैसे
पहुँचे जब तक नहीं तले तक
गहरायी अनजानी है ।

नहीं पूँछती प्रशन , कहो पर
कैसे दिन और रात कटी
दर्पण कितने टूट चुके हैं
कहता आँख का पानी है ।

2. अन्याय

आज नहीं करता दिल मेरा
अपने ही घर जाने को
यह कैसा अन्याय हुआ है ……

झूल रही कुर्सी आँगन में
अख़बारों के उड़ते पन्ने
सुनी सहमी खड़ी दीवारें
सब पूछेंगे पता तुम्हारा
कैसे कह दूँ ? मैं इन सब से
तुमने यह घर छोड़ दिया है ।
यह कैसा अन्याय हुआ है ……

मूक पड़ा यह चूल्हा चौंका
आँगन भी है सहमा -सहमा
घर में सब कुछ फीका -फीका
बर्तन भी अब नहीं झगड़ते
चूहे तक भी नहीं फुदकते
बिल्ली ने आना छोड़ दिया है ।
यह कैसा अन्याय हुआ है ……

रातों को जब चोरी -चोरी
आते लुक छिप चाँद सितारे
बिस्तर जोहे राह तुम्हारी
वो क्या जाने व्यथा हमारी
केवल तेरे ही जाने से
इस घर ने जीना छोड़ दिया है ।
यह कैसा अन्याय हुआ है ….

3. आधुनिकता

वह अक्सर सोचती है
कि वह उसे प्यार करता है
केवल प्यार ही नहीं
बेशुमार प्यार करता है
क्या कभी उसने देखा है
उस भँवरे को उपवन में
वह हर कली का
खिलने का इंतज़ार करता है
हर फ़ूल का रस पीता है
न,..न…न…वह
जानना भी नहीं चाहती
भ्रम में रहना चाहती है
यह तो भँवरे की प्रवृत्ति है
शायद यही सोच कर
उसे सुख मिलता है
कि वह उसे प्यार करता है
जब वह नई-नई कलियों
का रस चूसता है
उसे देख वह अनदेखा कर देती है
क्यूँकि वह उसे बातों में
उलझाये रखता है
विश्वास दिलाता है
की वह उसी से प्रेम करता है
वह डरी-डरी सहमी – सहमी
बिना तर्क के मान लेती है
आँख मींच लेती है
क्यूँकि शाम को वह
उसी के पास घर आता है
उसके सब छोटे – छोटे काम करता है
उसने दास ख़रीद रखा है
जो उसके पैरों पर पड़ा रहता है
इसी लालच में दबो रखा है उसने
दोनों ही एक दूसरे के
भविष्य की सीढ़ी हैं
यही दोनों का लक्ष्य है
दोनों ही अपने – अपने
भ्रम में जी रहे हैं
अपना -अपना उल्लू
सीधा कर रहे हैं ।
दोनो ने ही लाभ – हानि का सौदा किया है
अपने – अपने लक्ष्य के लिये
शायद यही आधुनिकता की माँग है
इसे ही आधुनिकता कहते हैं।

  • अरूणा सब्बरवाल
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