Sunday, May 17, 2026
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नीलमणि की लघुकथा – कॉफ़ी कैफ़े

लगभग बीस साल बाद पुरानी तीन सहेलियाँ— नीलू, रेखा और कविता कॉफ़ी कैफ़े में मिलीं। कॉलेज के दिनों की मस्ती याद करते-करते बात अचानक पतियों पर आ गई।

नीलू हँसते हुए बोली, “मैंने अपने पति को शादी से पहले आठ साल तक जाना, सोचा अब सब समझ लिया। लेकिन शादी के बाद पता चला कि मैं तो इनको दाल में नमक जितना ही जानती थी।”

रेखा ने भी ठंडी साँस भरते हुए कहा, “अरे! मेरी तो सिर्फ़ दो साल की जान-पहचान थी। तब लगा बहुत कुछ जान लिया है, लेकिन शादी के बाद समझ आया, असल में, मैं उन्हें चाय में शक्कर जितना ही समझ पाई थी।”

दोनों हँसते-हँसते कविता की ओर देखने लगीं। कविता शांति से कॉफ़ी का घूँट भरते हुए बोली, “तुम दोनों भाग्यशाली हो, कम-से-कम प्रेम  का स्वाद तो चखा। मैंने तो अब तक वो स्वाद भी नहीं चखा। हाँ, पति की रोज़-रोज़ एक जैसी आदतों का ‘धैर्य-रस’ ज़रूर पी रही हूँ। सालों से एक ही स्वाद— बिना शक्कर की कॉफ़ी जैसा।”

नीलू ने कहा, “हाँ कविता, जिंदगी का स्वाद बिल्कुल कॉफ़ी जैसा सतरंगी ही है— किसी को यह कड़वी ब्लैक कॉफ़ी की तरह मिलता है, किसी को इसमें दूध और चीनी घुली नसीब होती है, तो किसी की प्याली में क्रीम, केक और बिस्किट भी साथ चले आते हैं।”

तीनों ज़ोर से हँस पड़ीं।

  • नीलमणि
    कम्प्यूटर प्रोग्रामर हैं। डायरी, साहित्य और कार्टूंस रचना।
    मेरठ, उत्तर प्रदेश, मोबाइल नंबर -9412708345

 

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