Sunday, May 17, 2026
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सुधीर कुमार सोनी की कहानी-कुमुद

ऑफिस के काम से मुक्त होकर घर लौटा और आंगन में पैर रखा ही था कि पत्नी ने कहा, “सुनो कोई महिला आई थी आपसे मिलने, कह रही थी, “यही कोने वाले मकान में रहती थी, आकाश और उनके घर वाले जानते हैं।’’

“कौन थी ,तुमने नाम पूछा था उससे?’’ मैंने कहा और आँगन में रखे तख्त पर बैठ गया।

पानी का गिलास हाथ में थमाकर पत्नी ने कहा, “बताया तो था उसने याद नहीं आ रहा है; उसकी बिटिया जिद कर रही थी सो वह चली गयी।’’

रसोईघर से निकलते हुए विमला दीदी ने मुझे घूरकर देखा; जैसे मुझसे नाराजगी जाहिर कर रही हो। पानी पीते हुए ध्यान आया, हो सकता है वह महिला कुमुद हो, तभी दीदी मुझे घूरकर देख रही थी। दीदी को बिलकुल पसंद नहीं थी कुमुद ; वह हमारे जात-बिरादरी की भी नहीं थी। जात-बिरादरी के नहीं होने के कारण दीदी को पसंद नहीं थी ऐसा भी नहीं था। मुझसे दो साल बड़ी थी कुमुद और हम दोनों के प्रेम-प्रसंग को अंजाम देने की वजह भी वही थी। मुझे दीदी के घूरकर देखने से यह विश्वास हो गया कि वह कुमुद ही थी; जो मुझसे मिलने आई थी।

आँगन से उठकर मैं सीधे अपने कमरे में चला आया और बिना कपड़े बदले पलंग पर लेट गया। कुमुद अचानक कैसे चली आयी इतने सालों बाद, मेरे मष्तिक में बहुत से सवाल उठने लगे, मन उदास सा होने लगा। अपने शहर अपने मायके आयी होगी, तो चली आयी होगी, मैंने अपने आपसे कहा। मैंने महसूस किया जैसे किसी ठूँठ पर बहुत दिनों के बाद कोई चिड़िया आकर बैठी हो; और उसके पंजों के स्पर्श से भीतर से वह हरियाने लग रहा हो।

मुझे बहुत गुस्सा पत्नी के ऊपर आ रहा था कि आखिर उसने उससे पूछा क्यों नहीं कि वह कब तक रहेगी ,कब जायेगी। गुस्सा मैं जाहिर भी नहीं कर सकता था, क्योंकि अतीत की वजह से मेरे वर्तमान की गाड़ी का पटरी से उतरने का खतरा था। कुमुद किसी मुसीबत में तो नहीं; ऐसा तो नहीं पति के साथ वह सुखी नहीं है।

कोई परेशानी तो नहीं, जिसके कारण वह इतने वर्षों बाद किसी उम्मीद से आयी हो और मैं ही न मिल सका उसे। इतने सारे सवालों ने मुझे घेर रखा था; जिससे मैं मुक्त नहीं हो पा रहा था। यह प्रेम ही है, जो इतने वर्षों बाद फिर मुझे उसी रास्ते में लाकर खड़ा करना चाहता है; जहाँ असफलता आज भी मुझे ठेंगा दिखा कर चिढ़ा रही है। मन ने कहा कि असफल प्रेम की चर्चा ही दुनिया करती है। मैं बहुत ही असहज महसूस कर रहा था। आखिर इतने दिनों बाद भी कुमुद के लिए इतनी तड़प क्यों है। प्रेम की आग जो जलकर राख हो चुकी है, उसमें कोई चिंगारी अभी भी सुलग रही थी। मुझे लगा मेरे भीतर कोई तूफ़ान सा उठ रहा जो सब कुछ छिन्न-भिन्न कर देगा।

मेरी सोच में मैं धागों की तरह उलझा हुआ था और बीच में पत्नी ने विघ्न पैदा की और कहा, “सुनो मुझे लगता है मैं अच्छी तरह जानती हूँ उसे, वह प्रायमरी स्कूल में मुझसे आगे वाली कक्षा में थी। मैं अकसर देखा करती थी उसे, हाँ उसने अपना नाम कुमुद बताया था।” पत्नी नीचे चली गयी और मैं बीते दिनों के बाईस वर्ष पुराने समय के पलों में गुम हो गया।

कुमुद का गेहुंए रंग का सुंदर सा चेहरे वाला शरीर फिर से मेरे सामने था। घर के पास ही धोबी की दुकान और अनाज की दुकान में उससे हफ्ते में दो-तीन बार मिलना हो जाता था। मैं ग्यारहवीं कक्षा में था और वह कालेज के सेकण्ड ईयर की छात्रा थी। दोनों के परिवार में संयोग की बात यह थी कि दोनों के बड़े भाई महाविद्यालय में प्राध्यापक थे। मेरे बड़े भाई साहब प्रताप जी की महाविद्यालय की नौकरी कुमुद के बड़े भाई के पांच वर्ष पहले की थी।

धोबी की दुकान और अनाज की दुकान में आने-जाने से भी प्रेम हो जाता है, हमारे पूरे मोहल्ले वालों के लिए चर्चा का विषय हो गया था, क्योंकि शहर बहुत छोटा था, आधुनिकता ने अपनी जगह नहीं बनायीं थी कि कोई भी लड़की शहर में किसी से खुले आम बात कर सके, लेकिन मोहल्ले की कुछ महिलाएं और लड़कियाँ चाहती थी कि हम दोनों मिले और यह प्रेम अपने अंजाम तक पहुँचे। यह बात मैं मुझे अच्छी तरह से जान चूका था। मेरे और उसके घर वालों को इस बात की जानकारी न हो इसके लिए कुमुद ने एक रास्ता और ढूंढ लिया था। हम जिस गली में रहते हैं; उसके आखरी मकान में कुमुद अपने बड़े भाई और माँ के साथ रहती थी। उसके आलावा गली को जोड़ने वाली सडक में आगे कुमुद का पारिवारिक मकान था, जिसे किरायदारों ने कब्ज़ा कर रखा था, उसी के ऊपरी हिस्से में एक कमरा कुमुद के घरवालों के पास था। शाम को दिन ढलने के बाद कुमुद पूजा करने नियमित जाती थी। हम दोनों में यह बात तय हुई थी कि अगर कमरे और बाल्कनी की बत्ती जल रही है तो मैं मिलने सीधे ऊपर आ जाऊं; यह ,बात भी आखिर मोहल्ले में जाहिर हो ही गयी।

एक दिन मैं स्कूल जाने के लिए घर से निकला था कि स्कूल के पहले ही मुझे कुमुद सामने से आते दिखी। मुझे देख मुस्कराई, एकदम नजदीक आकर बोली, “आज स्कूल को छोड़ो, कहीं चलते हैं, सुकून से बैठकर बाते करेंगे।”

“अभी” मैंने कहा और आसपास नजर दौड़ाई कि कहीं इसके और मेरे घरवाले आसपास तो नहीं है। मैंने कहा, “कहाँ चलेंगें? ”

“दूर शहर से थोड़ी दूर” कुमुद बोली।

“शहर से दूर सिर्फ सड़क ही होगी, क्या करेंगे उतनी दूर जाकर?…’’ मेरे कहने पर उसके चेहरे पर नाराजगी देख मैंने कहा, “अच्छा चलो।”

उसने मेरा हाथ अपने हाथ में थाम लिया। मैंने पहली बार किसी लड़की के नर्म हाथों का स्पर्श महसूस किया था, पूरे शरीर में जैसे करेंट सा दौड़ रहा हो।

चलते-चलते हम शहर से लगभग तीन किलोमीटर दूर निकल गये; सड़क किनारे लगे पत्थर में शहर की दूरी यही बयाँ कर रही थी।

अचानक एक छोटी सी बस्ती दिखायी दी, हम दोनों उसी की तरफ बढ़ चले, मार्च का बीतता महीना था, धूप में गर्माहट बढ़ रही थी। थोड़ी दूर आगे गये ही थे कि एक घर का चबूतरा दिखायी दिया, घर का उसका दरवाजा अंदर से बंद था, हम दोनों चबूतरे पर बैठ गये। थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। “कुछ कहो ना, चुपचाप बैठने के लिए इतनी दूर नहीं आयें हैं हम।” कुमुद बोली।

“क्या कहूँ? मुझसे कुछ भी कहा नहीं जा रहा है।” कहकर मैंने अपने दोनों आँखे बंद ली।

“ कुछ तो कहो” कुमुद बोली।

“तुम्हें क्या पसंद? ” मैंने कहा।

“मुझे फूल पसंद हैं।” वह बोली।

“मुझे भी कांटे पसंद नहीं।” मैंने कहा।

“मुझे कोयल के मीठे बोल पसंद है।” वह बोली।

“मुझे भी कौव्वे का कांव-कांव पसंद नहीं।” मैंने कहा।

“मुझे चाँद की शीतलता पसंद है।” वह बोली।

“मुझे भी सूरज की तपिश पसंद नहीं।” मैंने कहा।

“मुझे पहाड़ पसंद है।”

“पहाड़ों पर झुकते बादल पसंद हैं।”

“पहाड़ों का संगीत पसंद है।”

“पहाड़ों की ठंडी-ठंडी हवा पसंद है।” इतना कहकर वह चुप हो गयी, मैं भी चुप हो गया।

हमें शांत बैठे दस मिनट हो गये थे, अचानक घर का दरवाजा खुला जिसके चबूतरे पर हम बैठे थे, एक लड़की कुमुद की उम्र की रही होगी हाथ में ट्रे लिए निकली, ट्रे में दो गिलास पानी था। “ये लो पानी” कहकर कुमुद के हाथ में थमाकर जोर से दरवाजा बंद कर दी। हम दोनों समझ ही नहीं पाए की आखिर उसने जोर से दरवाजा क्यों बंद किया, मुझे लगा दरवाजे की जोर से आवाज प्रेम के प्रति सहमति ही है। “गर्मी का महीना है, इसीलिए बेचारी ने पानी दिया होगा”  कुमुद बोली।

हमने पानी पिया, कुमुद मुझे देखकर हल्के से मुस्कराई बोली, “तुम्हारी परीक्षा कब है? ”

“एक महीने बाकी है,में री तय्यारी भी नहीं हुई है, मुझे डर लग रहा है कि भाई साहब नाराज न हो जाए” मैंने अनमने ढंग से जवाब दिया।

“एक महीने बहुत होते हैं, ढंग से पढ़ोगे तो पास तो जरूर हो जाओगे” उसने मुझे विश्वास दिलाते हुए कहा।

हम फिर करीब बीस मिनट तक चुपचाप बैठे रहे। मैंने बात शुरू करते हुए कहा, “कुमुद शायद हम गलत कर रहे हैं, हमें इस तरह से नहीं मिलना चाहिए, हमारे रास्ते अलग-अलग हैं, वैसे भी पांच-सात वर्ष, हो सकता है दस वर्ष मैं अपने और तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं सोच सकता।”

उसने अपने बैग से एक कापी निकाली,पेन निकाला बोली” सुनो इसमें एक शब्द लिखो ‘ह’ मैंने कापी में लिख दिया “ह“

“दूसरा शब्द मैं लिखती हूँ ‘म’ पढ़ो क्या लिखा है।” कुमुद ने कहा।

“हम” मैंने पढ़कर कहा।

“अब हम शब्दों में एक हो गये, जीवन में हो सकता हैं न भी हो।’’ इतना कहकर वह चुप हो गयी।

मुझे उसके किसी कवि की तरह के विचार से बहुत आश्चर्य हुआ, न जाने उसने मुझमें क्या देख लिया, जो मुझ पर मुग्ध हो उठी, मैं परिपक्व भी नहीं हुआ था, छह महीने बाकी थे मेरे बालिग होने में। हम चुप बैठे थे।

“अब चलते हैं, काफी समय हो गया है।” मैंने कहा उसने भी सिर हिलाकर हामी भर दी। मैंने घर के दरवाजे की कुण्डी खटखटायी, उसी लडकी ने दरवाजा खोला। “धन्यवाद आपका, हमें बहुत प्यास लगी थी।” कुमुद ने ट्रे उसके हाथ में दे दिया। लड़की ने दरवाजा बंद कर दिया। हम दोनों ने अपनी कापी-किताब हाथ में लिये और घर की तरफ चल पड़े।

दोपहर के तीन बज रहे थे; बिना बातचीत किये हम शहर की तरफ वापस हो रहे थे। घर से लगभग एक किलोमीटर पहले सायकल से जाते हुए कोई व्यक्ति हमारे बिलकुल करीब रुका, हम दोनों के सामने उसने सायकल खड़ी कर दी और घूरते हुए कुमुद को कहा, “तुम इतने दूर इसके साथ, कहाँ से आ रही हो, कौन है यह? ” उस व्यक्ति का एक हाथ कमर पर था, मैं भी नहीं जानता था उस व्यक्ति को।

“ये हमारे घर के ही पास रहता है, मैं सहेली से मिलने गयी थी, वापस आ रही थी, ये भी कहीं से वापस आ रहा था मिल गया।’’

“मामा को बेवकूफ बना रही हो कुमुद” उस व्यक्ति ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा। मुझे घूरकर देखा और  बोला, “जाओ तुम चले जाओ।”

मैं आगे की तरफ बढ़ चला। मुझे लगा, जरूर सगा मामा होगा तभी अधिकार से उसने कुमुद को डांट रहा है। मेरे शरीर में कंपन और घबराहट सी होने लगी। मुझे लगा अब हम दोनों की खैर नहीं। डरते-डरते मैं घर पहुँचा। कमरे में जाकर लेट गया। बहुत देर लेटा रहा ,शाम ढल रही थी।

“आकाश ….कहाँ हो …आकाश” पिताजी के पुकारने से मैं कमरे से बाहर निकला।

“जी” मैंने आँखे मलते हुए कहा।

“क्या हुआ, तबियत ठीक नहीं है क्या?’’ पिताजी ने पूछा।

“नहीं ठीक है” मैंने जवाब दिया।

“जाओ मेरा पान ले आओ।”  उन्होंने मेरे हाथ में पैसे देते हुए कहा।

“जी अभी लाया।” मैंने चेहरे पर पानी छिड़कर पोंछा और पान लेने चला गया।

मैं पान लेने दुकान की तरफ बढ़ रहा था कि कुमुद के घर के दरवाजे पर उसके भाई साहब दिखे बोले, “आकाश इधर आओ।” मैं डरा-डरा सा घर के अंदर चला गया।

वे सोफे पर बैठे हुए थे, बोले, “देखो आकाश तुम मेरे बड़े भाई और गुरु के ही परिवार से हो, इसीलिए मैं कहे देता हूँ कि तुम कुमुद से मिलना बंद कर दो, मुझे यह भी मालूम है कि अकेले तुम्हारी गलती नहीं है, वह भी तुम्हें पसंद करती होगी, तभी बात यहाँ तक पहुँची है। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है ?… तुम बालिग नहीं हुए हो, इस प्रेम-व्रेम के चक्कर में मत पड़ो, मैं तुम्हारे बड़े भाई साहब का बहुत सम्मान करता हूँ, इसीलिए छोटे भाई की तरह समझा रहा हूँ, नहीं तो दूसरे तरीके से भी समझाना मुझे आता है।” इतना कहकर वे चुप हो गये।

कुछ पल रुककर बोले, “मैं जानता हूँ वह भी तुमसे प्रेम करती है, इससे मुझे  कोई तकलीफ नहीं, कोई एतराज, नहीं।”

“वो तुमसे दो साल बड़ी है, इससे भी मुझे कोई एतराज नहीं।”

“तुम हमारे जात-बिरादरी के नहीं हो, मुझे कोई एतराज नहीं, लेकिन मैं क्या करूं?… मेरी माँ को एतराज है, वो इस रिश्ते को पसंद नहीं करती, मेरी माँ मेरे लिए सब कुछ है, मैं उनका कहा नहीं टाल सकता।” वे इतना कहकर रुक गये।

“सुनो, तुम उससे मिलना बंद कर दो।” इतना कहकर उन्होंने मुझे वापस चले जाने का इशारा किया।

देश में आपातकाल की घोषणा हुए डेढ़ वर्ष से भी ज्यादा का समय हो चुका था, मुझे लगा उसकी जानकारी मुझे आज ही हुई है।

मैं कुमुद के घर से निकलकर पान लेने चला गया, पान लेकर घर लौटा पिताजी ने नाराजगी से कहा “कहाँ चले गये थे ?… इतनी  देर लगा दी।”

“ऐसे ही स्कूल का एक दोस्त मिल गया था, उससे बात करने लग गया था।” मैंने पिताजी को पान दिया और कमरे में चला गया।

सन्नाटे को तोड़ती हुई आवाज कमरे में दाखिल हुई और मैं सपने से लड़खड़ाते हुए बाहर निकला,  “मामा अरे आप अभी तक सोये हुए हो, आधे घंटे पहले मैं चाय रखकर गयी थी, आपने पिया नहीं। यह कहते हुए भांजी सामने खड़ी थी, वह अपने नवजात बच्ची को लेकर आई थी, साथ में विमला दीदी और पत्नी भी थी। तीनों पलंग पर बैठ गये।

“मामा कुछ दिन बाद ही इसका नामकरण है।” भांजी बोली।

“क्या नाम रखा जा रहा है?’’

“इसके पापा तीन नाम कह रहे थे; आप भी सुन लीजिये। पहला मीनल, श्रुति और कुमुद। “बच्ची को सम्हालते हुए वह बोली, “मामा कुमुद सुंदर नाम है ना?”

“नहीं, शुरू के दोनों नाम में नवीनता है।” दीदी ने अपनी असहमति जतायी।

“मामा आपको अच्छा लगा ना, बस अब कुमुद नाम इसके पापा भी कह रहे थे।’’ दीदी कमरे से बाहर चली गयी, कुमुद नाम के प्रति दीदी के चेहरे में नाराजगी आज भी बाईस वर्ष बाद वैसी ही थी।

कमरे से निकलकर मैं घर की बालकनी में आकर खड़ा हो गया। नीचे गली में झाँका तो आवाजाही नहीं थी। मैंने गली की सड़क के एक छोर को देखा जो बायीं तरफ जाकर मुख्य सड़क से जाकर मिल जाती थी, और दायीं तरफ वाली सड़क भी दूसरे मुख्य सड़क से जाकर मिल जाती थी। दोनों के सिरे कभी एक नहीं हो सकते थे। मुझे कुमुद के साथ मुलाकात में कही उस बात का स्मरण हो आया, जब उसने अपनी कापी में मुझे ‘ह’ शब्द लिखने कहा था और ‘म’ शब्द उसने लिखा था, फिर कहा था, “जीवन में हम एक हो न हो, शब्दों में हम एक हो गये हैं।”

मुझे गली में एक रिक्शा आता दिखाई दिया, रिक्शे में भाभी और दोनों भतीजे बैठे दिखे, भाभी किसी पारिवारिक काम से मायके गयी थी। रिक्शा घर के सामने आकर रुका, मैं भाभी से मिलने नीचे आ गया।

“और घर में सब ठीक है भाभी?’’ मैंने पूछा।

“हाँ सब ठीक है भैया।” इतना कहकर भाभी अपना सामान लेकर कमरे में चली गयी और बच्चे पिताजी के पास, “दादाजी हम आ गये।” कहकर उनसे लिपट गये।

मैं ऊपर अपने कमरे में वापस लौटा तो देखा भाभी और पत्नी में बातचीत हो रही थी। “भाभी मैं चाय बनाकर लाती हूँ।” इतना कहकर पत्नी नीचे रसोईघर चली गयी।

भाभी मेरे पास आयी बोली “आकाश जानते हो मुझे कौन मिला था? ”

“नहीं, मुझे कैसे पता।” मैंने कहा।

“कुमुद मिली थी, किसी एक रेलवे स्टेशन में, ट्रेन की खिड़की से ही उसने मेरे पाँव छुए, तुम्हें पूछ रही थी।” मैंने कहा, “सब ठीक है?”

“घर आयी थी वो मुझसे मिलने, मैं घर में नहीं था।” मैंने कहा।

“ईश्वर उन्हें सुखी रखे, कभी किसी मुसीबत का सामना न हो।” कुमुद ने कहा। उसके सर पर हाथ रखकर मैंने भी कहा, “कुमुद अपने परिवार के साथ सुखी रहो, ईश्वर से यही विनती करती हूँ। मुझसे मिलकर जाते समय उसकी आँखों में आंसू थे।”

इतना कहकर भाभी चुप हो गयी। कुछ ही पल बाद पत्नी चाय लेकर आयी। भाभी,पत्नी और मैं चाय पीने लगे। चाय गर्म थी, उसमें से भाप निकल रही थी और धीरे-धीरे हवा में विलीन हो गयी। कुमुद का जिक्र भी भाप की तरह हवा में विलीन हो चूका था।

  • सुधीर कुमार सोनी      
  • अंकिता लिटिल क्राफ्ट, सत्ती बाजार ,रायपुर,छत्तीसगढ़ पिन 492001
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