दुख और स्त्रियाँ
दुख, बेघर रहा हमेशा से
अधिकतर स्त्रियों की तरह
जहाँ कहीं भी ठहरना चाहता
प्रयास करने लगते लोग, हर संभव उसे हटाने का
दिन तो, ऐसे ही गुजार लेता वह जहाँ- तहाँ
रातें भी, गुजर ही जातीं उसकी कहीं भी जैसे- तैसे
कभी, कहीं घुसा चला जाता किसी के घर अचानक
कभी, किसी रिश्ते के बीच खड़ा हो जाता
कभी, किसी की चेतना में घुस
बैठ जाता चुपचाप
दुख सर्वव्यापी रहा
नजर आता रहा दूर से सभी को
कल ही मिला था मुझे, उदास
प्रेम दिवस के दिन, अकेला बैठा हुआ
आखिर दुख से कौन करे प्रेम
कौन दे दुख का साथ
जिसका न कोई निश्चित घर, न घाट
कब, कहाँ मिलेगा, नहीं मिलेगा
मालूम नहीं किसी को ठीक ठाक
पर जानती हैं कुछ स्त्रियाँ
कि दुख होता है एक सच्चा प्रेमी
नहीं जाता छोड़ कर कभी
दुख बहुआयामी रहा
पर रंग मात्र- धूसर, स्याह
जहाँ भी रहता, फैला देता है उदासी का रंग
जैसे दिल्ली दुखी है इन दिनों
तो धूसर हो गया है उसके आसमान का रंग
जलती रहती हैं आंखें वहाँ, सांसों में भर रहा है जहर
दुनिया भर की स्त्रियों के चेहरे पर भी आजकल
देखा जा सकता है एक स्याह रंग
दुख, देश का पर्यायवाची लगता है
जहाँ जाओ, वहीं मिल जाता है मुँह बनाए
हर चौक- चौराहे, रास्ते, ऑफिस, स्कूल, हॉस्पिटल
सभी कोर्ट, कचहरी, थाने की फाइलों में
जहाँ कहीं भी बंद हैं, लोगों के हक और दर्द की दास्तां
दुख खड़ा रहता है, उन सबकी लड़ाई में उनके साथ
हर किसी की संवेदना से जुड़ा रहता है गहरे
चाहे कोई उसे कितना भी दुत्कारे
बनाए रहता है, हर हाल में अपनी जगह
कुछ मजबूर स्त्रियों की तरह
दुख से दुनिया भी है बेहाल
दिख रहा आजकल युद्धरत देशों में बेहिसाब
जहाँ विस्फोटकों की आवाज से दहले हुए हैं लोग
टूटे हुए घर, बेवा औरतें, भूख से बिलबिलाते हैं बच्चे
दुख दे रहा है ढाढस उन्हें
सिखा रहा ऐसे हालात में भी जीना, संभलना, संभालना
धुप्प अंधेरे में भी जुगनुओं की तरह जगमगाना
दिखाना चाह रहा उन्हें शांति का रास्ता
कि बुद्ध ने भी जब महसूस किया था दुख
तभी तो बदली थी उनकी मनःस्थिति
और मिल गया था निर्वाण
द्रुतगामी रहा दुख
पहुँच जाता है क्षण भर में
कहीं भी, किसी भी रूप में
कोई फर्क नहीं पड़ता उसे अमीर से, गरीब से
फर्क पड़ता है भूख, बेरोजगारी, अन्याय, असमानता से
बना रहता है वह वहाँ उनके साथ लगातार
कमजोर, अस्वस्थ, असमर्थ, अवांछित लोगों के पास
लगाए रहता है उन्हें गले, प्रेमवश
पर लोग होते हैं नासमझ, नहीं चाहते हैं दुख को
कामना करते हैं हमेशा सुख की
कहते हैं, सुख भाई है दुख का
पर वह भी कतराता है उससे मिलने से
जबकि सुख जहाँ भी होता है, दुख मिलता है जरूर
लेकिन उसे देख भाग खड़ा होता है सुख
सुना है, सुख के पास होती हैं ढेरों खुशियाँ
पर बाँटना नहीं चाहता वह दुख के साथ थोड़ा भी
जैसे दुर्योधन ने नहीं देना चाहा था
पांडवों को कुछ भी और हो गया था महाभारत
पर दुख प्रेम करता है सुख से, लड़ना नहीं चाहता
दोहराना नहीं चाहता इतिहास
ऐसा नहीं कि दुख कमजोर रहा
वह खूब जानता है अपनी ताकत
अच्छे अच्छों को मिटा सकता है पल भर में
दुख हँसता है सुख की बेवकूफियों पर
लेकिन वह समझता ही नहीं
कि बिना दुख के उसका कोई वजूद नहीं
जैसे भूल जाते हैं कई बार, कई पुरुष
बिना स्त्री के अपने अस्तित्व के बारे में
दुख, स्त्रियों का जन्मना साथी रहा
वह समझता है स्त्रियों के दुख को
स्त्रियाँ भी समझती हैं दुख के दुख को
तभी नहीं छोड़ते वे कभी एक दूसरे का साथ
जैसे स्त्रियों के बिना कोई घर, घर नहीं लगता
वैसे ही दुख से भी कोई घर अछूता नहीं होता
दुख रहता है स्त्रियों के साथ ईश्वर की तरह
अदृश्य पर हिम्मत बंधाता हुआ !!
सुषमा सिन्हा
