दिल्ली के एक पॉश इलाके में खड़ी वह भव्य कोठी दूर से किसी चमकते हुए स्वप्न जैसी दिखाई देती थी, ऊँचे फाटक, संगमरमर की सीढ़ियाँ, काँच की दीवारों से झरती रोशनी और हर शाम दरवाज़े पर सजी महँगी गाड़ियों की क़तार। राह चलते लोग ठहरकर उसे देखते और धीमे स्वर में कहते यही है रमन मेहता का घर कितना परफेक्ट परिवार है। लेकिन उस चमक-दमक के भीतर एक ऐसा सन्नाटा पल रहा था,जो धीरे-धीरे हर रिश्ते को खा रहा था। वह सन्नाटा केवल खामोशी नहीं था,वह अनकहे शब्दों का बोझ था,अधूरी उम्मीदों की धूल थी,और उन भावनाओं की कब्रगाह थी, जिन्हें कभी जीने का मौका ही नहीं मिला।
आज के समय में समाज एक अजीब मोड़ पर खड़ा है,जहाँ “साइलेंट डाइवोर्स” एक अनकही सच्चाई बनता जा रहा है। लोग एक-दूसरे के साथ रहते हैं,पर उनके बीच का रिश्ता भीतर ही भीतर खत्म हो चुका होता है। बाहर से सब सामान्य दिखता है हँसी,तस्वीरें, समारोह पर भीतर संवाद मर चुका होता है। हर दूसरा घर जैसे इसी ख़ामोश दूरी का शिकार हो रहा है। रमन और नंदिता भी इसी बदलते समाज का हिस्सा थे जहाँ रिश्ते टूटते नहीं,बस धीरे-धीरे अपनी साँसें खो देते हैं,और लोग उस टूटन को भी एक आदत की तरह जीने लगते हैं।
रमन मेहता एक नाम जो अखबारों की सुर्खियों में रहता था,एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने दम पर सफलता की ऊँचाइयाँ छुई थीं। नंदिता एक संवेदनशील आत्मा, जिसकी पेंटिंग्स में जीवन के सबसे गहरे रंग उतरते थे। कभी दोनों एक-दूसरे की ताक़त थे,एक-दूसरे के सपनों का सहारा,पर धीरे-धीरे, बिना किसी बड़े तूफान के,उनका रिश्ता थमने लगा। जैसे किसी नदी का पानी अचानक सूखने लगे शोर के बिना,बस एक दिन पता चलता है कि बहाव खत्म हो गया,और पीछे रह जाती है केवल सूखी,फटी हुई धरती।
उनकी सुबहें एक अजीब तरह की औपचारिकता में बदल चुकी थीं। एक ही घर में रहते हुए भी वे अलग-अलग दुनिया में जागते थे। किचन में चाय बनती,पर वह दो ट्रे में बँटकर दो अलग कमरों में पहुँच जाती। कभी-कभी गलियारे में आमना-सामना हो जाता,तो दोनों एक हल्की-सी मुस्कान के साथ आगे बढ़ जाते जैसे कोई औपचारिकता निभा रहे हों।शब्द अब केवल ज़रूरतों तक सीमित थे,और भावनाएँ जैसे किसी पुराने संदूक में बंद कर दी गई थीं,जिनकी चाबी दोनों ने कहीं खो दी थी।
उनका बेटा आरुष,जो कभी उनके बीच की हँसी था,अब उनसे दूर हो चुका था। वह पढ़ाई के लिए बाहर चला गया था, पर सच यह था कि वह उस घर की ख़ामोशी से भागा था। उसने एक बार फोन पर कहा था “आप दोनों साथ होकर भी इतने दूर क्यों हो?” यह सवाल नंदिता के भीतर गूँजता रह गया,जैसे किसी ख़ाली कमरे में आवाज़ बार-बार टकराकर लौटती है, पर उसके पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि वह खुद भी उस दूरी को समझ नहीं पा रही थी,जो बिना किसी वजह के इतनी बड़ी हो गई थी।
समाज के सामने वे आज भी एक आदर्श दंपति थे। हर समारोह में साथ, हर फोटो में मुस्कान,हर इंटरव्यू में एक-दूसरे की तारीफ। लोग इन्हें देखकर कहते “ऐसे रिश्ते नसीब वालों को मिलते हैं।”और ये दोनों उस झूठ को जीते रहते। यह दिखावा ही इस नए दौर की सबसे बड़ी विडंबना है जहाँ रिश्ते सच्चाई से नहीं, प्रदर्शन से चल रहे थे और धीरे-धीरे अंदर से खोखले होते जा रहे थे।
नंदिता की पेंटिंग्स अब उसके भीतर के खालीपन का प्रतिबिंब बन चुकी थीं। उसके कैनवास पर बार-बार दो आकृतियाँ उभरतीं एक-दूसरे के बेहद क़रीब,पर फिर भी एक दूसरे को छू नहीं पातीं। रंग गहरे होते जा रहे थे जैसे हर स्ट्रोक में एक चीख छिपी हो। उसकी कला अब उसकी भाषा बन गई थी,क्योंकि शब्दों ने तो उसका साथ छोड़ दिया था,और दर्द ने रंगों में अपना घर बना लिया था।
रमन ने अपने भीतर की ख़ामोशी को काम में डूबो दिया था। वह देर रात तक ऑफिस में रहता,अनावश्यक मीटिंग्स करता ताकि घर से दूर रहने के बहाने मिलें क्योंकि घर अब उसे सुकून नहीं देता था वह उसे उसकी असलियत दिखाता था। एक खा़ली रिश्ता,एक अधूरा जीवन,और एक ऐसा सन्नाटा जिससे वह भागना चाहता था, पर जितना भागता, उतना ही वह सन्नाटा उसके भीतर घर करता जाता।
मदन काका, जो वर्षों से उस घर का हिस्सा थे, अक्सर सोचते “क्या यही वो घर है जहाँ कभी हँसी गूँजती थी?” एक दिन उन्होंने धीमे से कहा “बाबूजी, अब हर दूसरा घर ऐसा ही हो गया है लोग साथ हैं,पर साथ नहीं।” यह केवल एक वाक्य नहीं था, यह पूरे समाज की तस्वीर थी जहाँ रिश्ते टूट नहीं रहे, बस चुप हो रहे हैं, और लोग उस चुप्पी को अपनी किस्मत मानकर जी रहे हैं।
एक दिन नंदिता को एक पुराना लिफाफा मिला आरुष का लिखा हुआ,जो शायद कभी भेजा नहीं गया था। उसमें लिखा था मैं हॉस्टल इसलिए नहीं गया कि मुझे पढ़ना है मैं इसलिए गया क्योंकि आपके बीच की ख़ामोशी मुझे डराती थी। अगर आप खुश नहीं हैं, तो सच का सामना कीजिए पर ऐसे मत जीएँ। यह पत्र उस सन्नाटे पर पहली चोट था एक ऐसा सच, जिससे वे दोनों भागते फिर रहे थे,पर जो अब उनके सामने खड़ा था।
उसी रात रमन को सीने में अचानक तेज़ दर्द उठा इतना तीखा कि वह अपने ही कदमों पर टिक नहीं पाया और फर्श पर गिर पड़ा। उस क्षण घर की सारी चमक जैसे बुझ गई। नंदिता,जो वर्षों से उससे भावनात्मक रूप से दूर खड़ी थी,एक झटके में उसके पास दौड़ी ,उसकी साँसें तेज़ थीं, हाथ काँप रहे थे,और आँखों में एक भय था जिसे उसने सालों से महसूस नहीं किया था। उसने रमन का सिर अपनी गोद में लिया, बार-बार उसका नाम पुकारा,जैसे उस नाम के साथ अपना पुराना रिश्ता भी वापस बुला रही हो। उस एक क्षण में, वर्षों का सन्नाटा टूटने को छटपटा उठा जैसे भीतर दबा हुआ प्यार अचानक अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता हो।
अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम गया था। मशीनों की धीमी आवाज़, डॉक्टरों की गंभीर निगाहें,और बीच में बैठे दो लोग जो एक-दूसरे के इतने करीब होकर भी वर्षों से दूर थे। डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा “दिल पर ज़्यादा बोझ है इन्हें सिर्फ दवाइयों की नहीं,अपनेपन की ज़रूरत है।” यह सुनते ही दोनों के भीतर कुछ टूट गया। नंदिता ने पहली बार रमन का हाथ थामा वह हाथ जो कभी उसका सबसे सुरक्षित सहारा था। रमन ने भी हल्के से उसकी उँगलियाँ दबाईं जैसे कह रहा हो, “हम अभी भी खत्म नहीं हुए।” उस मौन स्पर्श में शब्दों से अधिक सच्चाई थी।
उस रात,अस्पताल के उसी कमरे में, उन्होंने सालों का जमा हुआ सन्नाटा खोला। बातचीत धीरे शुरू हुई हिचकिचाहट के साथ, अपराधबोध के साथ,और फिर धीरे-धीरे वह बहने लगी। नंदिता ने कहा ,॓हम अपने बेटे को बचाना चाहते थे, पर हमने उसे ही खो दिया। ॑रमन की आँखें भर आईं हमने कभी कोशिश ही नहीं की कि जो टूट रहा था, उसे पकड़ लें हम बस चुप रहे। उन्होंने पहली बार स्वीकार किया कि उनके बीच कोई बड़ा कारण नहीं था बस अनदेखी, अहंकार, और समय पर न बोल पाने की आदत थी और वही छोटी-छोटी चीज़ें एक दिन दीवार बन गईं।
घर लौटने के बाद उन्होंने एक कठिन, लेकिन सच्चा निर्णय लिया कि अब वे दिखावे का रिश्ता नहीं जिएँगे या तो वे सच में साथ जीना सीखेंगे, या फिर अलग रास्ते चुनेंगे, पर इस खामोशी को अब जगह नहीं देंगे। उन्होंने शुरुआत की छोटी-छोटी बातों से। साथ बैठकर चाय पीना, एक-दूसरे को सुनना,बिना टोके अपनी बात कहना। शुरुआत अजीब थी पर जैसे दो अजनबी फिर से परिचय कर रहे हों। पर धीरे-धीरे, उन छोटे-छोटे प्रयासों ने उनके बीच जमी बर्फ को पिघलाना शुरू किया। सन्नाटा अब उतना भारी नहीं था क्योंकि उसके बीच संवाद की एक नई धारा बहने लगी थी।
कुछ महीनों बाद,वही कोठी अब सच में घर लगने लगी। दीवारें अब केवल सजावट नहीं थीं, उनमें फिर से आवाज़ें गूँजने लगी थीं हल्की हँसी, छोटे-छोटे संवाद,और कभी-कभी पुरानी यादों की खिलखिलाहट। जब आरुष लौटा,उसने अपने माता-पिता को साथ बैठे, हँसते हुए देखा और वह कुछ पल वहीं ठहर गया। उसकी आँखों में राहत थी, जैसे उसने अपने घर को फिर से जीवित पाया हो।
नंदिता ने अपनी नई पेंटिंग में लिखा
“आज समाज का हर दूसरा घर साइलेंट डाइवोर्स की दहलीज पर खड़ा है,जहाँ रिश्ते टूटते नहीं, बस चुप हो जाते हैं पर सन्नाटा अंत नहीं है यह एक चेतावनी है।”
- मनोज कामदेव
कविता, कहानी, संपादन सहित विभिन्न विधाओं में लेखन, अनेक पुस्तकें प्रकाशित, कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित।
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