1. अमावस की रात
सफेद साड़ी में लिपटा
यौवन उसका
ऑंखे चमकीले नीले रंग की
बदन गोरा जैसे दूध में नहाकर
आया हो
हाथ में दीया लिए हुए
कुछ फीट ऊपर हवा में
जा रही है
लगभग सौलह साल के
आस पास आयु होगी उसकी
अभी तो पूर्ण रूप से
जवान नही हुआ
उसका देह ,
पूर्ण रूप से नही उभरी
उसकी छाती ,
अभी तो पीठ तक भी
नही पहुंचे उसके सर के बाल
अमावस की अंधेरी रात में
एक तालाब के तट के चारों
ओर चक्कर लगती है वह
इतना साहस कहाॅं से
आया उसमें
एक पल के लिए भी
वह रूकी नही
लगातार चलती रही
उसकी देह,
उसके पाॅंव तक थके नही ,
एक पल के लिए भी थरथराया
नही उसका कच्चा बदन
2. बढ़ती है लड़कियां
लड़कियां उम्र से पहले
ही बढ़ने लगती है
कपड़े छोटे पड़ जाते है
चुड़ियां चिपक जाती है
हाथों में
जिन हाथों में कभी चोकलेट, आइस्क्रीम
और टाॅफिया हुआ करती थी
आज उन हाथों में आई फोन
रहता है डेढ़ लाख रुपए का
और दूसरे हाथ में
बैग होता है नई डिजाइन वाला
ऊपर तक जींस पेंट से
भरा हुआ
चलती फटफटी पर रील्स
बनाती फिरती है
खुले बालों में
3. साड़ी बेचने वाला
एक दुबला पतला सा आदमी
लम्बी डाढ़ी वाला
धोती कुर्ता पहने हुए
मोटर साइकिल पर सवार
पीछे मोटा सा साड़ियों का गट्ठा
बांधकर आता है मोहल्ले में
देखने में हूबहू रेलवे स्टेशन
के कूलियों जैसी शक्ल
लगती है
जैसे पोस्टर से निकलकर आया हो
अभी अमिताभ बच्चन का
साथी कूली फिल्म वाला
मरियल सा बूड्ढा आदमी
हर इतवार के दिन आता है वह
पूछने पर बताता है
उज्जैन के निकट एक छोटा सा
गांव है उसका
बाल बच्चें और पत्नी
वही रहते है
आते ही एक कप चाय
की फरमाइश करता है वह
चाहे किसी भी इतवार को आए
बहन जी एक कप चाय
बनाकर लाना
कहने में संकोच नही करता
वह कभी
4. वह टुकड़ी खेत की
बेटे की नौकरी के वास्ते
जमींदार को बेचने पड़ी
टुकड़ी खेत की
वह टुकड़ी खेत की
जिसमें उगते थे
मक्के के बूट्टे ,
चने का सांग,
बथुएं की हरी पत्तियां,
सरसों के पीले फूल
जिसपर उड़ती थी तितलियां,
खेलते थे पागल भॅंवरे
वह टुकड़ी खेत की
जिसे देखकर हॅंसती थी
किसान की ऑंखें,
फैल जाती थी उसकी दो बाहें
वह सांझ को घर लौटते समय
अपने माथे पर पड़ी चिंताओं
की लकीरों को
छोड़ आता था खेत की मेड़ पर
जो रातभर जागकर नीलगायों से
रखवाली करती थी फसल की
5. किसान परिवार की झौपड़ियां
किसान परिवार की झौपड़ियां
बनी होती है खेत
की मेड़ पर
उसके चारों ओर उगे
रहते हैं
सरसों के पीले फूल ,
गेहूं की हरी बालियां
बथुएं की पत्तियां,
मक्के के बूट्टे
देखने में दूर से ही
मनमोहक लगती है वह
किसान परिवार की औरतें
सर पर पराती रखकर
लाती है गोलाकार माटी
जिसमें भिगोया जाता है
पानी में
फिर बनाई जाती है दीवारें
उसके ऊपर बिछाई जाती है
घास की छत
खिड़कियां बबूल की लकड़ी
की बनी होती है
जिसमे हवा आती है
बिना रोक-टोक
- निहाल सिंह, झुंझुनूं, राजस्थान
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