Wednesday, July 15, 2026
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ज़किया ज़ुबैरी की कविता कचरा उठाने वाले…

अपनी दो-परती खिड़की की ओर
देखती हूं और निहारती हूं
महंगे सिल्क के पर्दों को…

उन पर्दों में से आती चमकते सूर्य की धूप
कमरे के भीतर चमक पैदा कर रही है।
आँखें लगभग चकाचौंध!

खिड़की की दूसरी ओर
कुछ जवान लड़के
अपने मज़बूत बाज़ुओं से खींच रहे
हमारी कचरे से भरी बिन!
खींच कर ले जाते
कचरे के ट्रक की ओर!

मुंह पर कपड़ा नहीं
दुर्गंध की परवाह नहीं
आँखों में हौसला
और बिन में कचरा!
पूरे मोहल्ले के घरों का कचरा
ट्रक में मिल कर एक दूसरे
की चुगली कर रहा है!

सलाम है उस ट्रक को
सलाम ट्रक चलाने वाले को
सलाम उन नौजवान बांहों को
जो कचरे के बिन खींच रही हैं।
बस उनके कारण ही तो हम
स्वच्छ जीवन जी पा रहे हैं!

  • ज़किया ज़ुबैरी

 

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3 टिप्पणी

  1. कचरा उठानेवाले हैं ; तभी हम सुकून और खुशनुमा ज़िंदगी जी पा रहे हैं। वो गंद, वो कबाड़ जो चारों ओर मैला , बदबू फैलाती है ; कचरे की गाड़ी उन्हें ले जाकर रेशमी पर्दे के पीछे एक खुशनुमा माहौल बनाती है।
    रेशमी ताने बाने के पीछे एक शख़्स का साक्ष्य मौजूद है , जो कचरे की गाड़ी से निकल रही है ।
    ज़किया जी का अंदाज़ तारीफ़ के लायक़ है

  2. सुंदर , एक कड़वे सच को उजागर करती कविता , हम उन्हें हेय समझते है जबकि हमारे जीवन का अभिजात्य उन्हीं का मोहताज़ है ।

  3. आदरणीय ज़किया जी!
    आपकी कविता ‘कचरा उठाने वाली’ पढ़ी। आपकी सोच और आपकी भावनाओं ने उस ओर दृष्टि डाली है,जो लोग समाज के लिये अपेक्षित रहते हैं क्योंकि इनके बिना हमारा गुजारा नहीं, इनके बिना हम लोगों का काम नहीं चलता।इनकी एक दिन की भी अनुपस्थिति हमारी ही नहीं, बल्कि शहर भर के लिये परेशानी का सबब बन जाती है, किंतु ये ही सबसे अधिक उपेक्षित वह अनदेखे रह जाते हैं।
    वास्तव में ये हैं इसीलिए हम लोग निश्चिंत हैं।
    बधाई आपको इस सर्जन के लिये।

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