अपनी दो-परती खिड़की की ओर
देखती हूं और निहारती हूं
महंगे सिल्क के पर्दों को…
उन पर्दों में से आती चमकते सूर्य की धूप
कमरे के भीतर चमक पैदा कर रही है।
आँखें लगभग चकाचौंध!
खिड़की की दूसरी ओर
कुछ जवान लड़के
अपने मज़बूत बाज़ुओं से खींच रहे
हमारी कचरे से भरी बिन!
खींच कर ले जाते
कचरे के ट्रक की ओर!
मुंह पर कपड़ा नहीं
दुर्गंध की परवाह नहीं
आँखों में हौसला
और बिन में कचरा!
पूरे मोहल्ले के घरों का कचरा
ट्रक में मिल कर एक दूसरे
की चुगली कर रहा है!
सलाम है उस ट्रक को
सलाम ट्रक चलाने वाले को
सलाम उन नौजवान बांहों को
जो कचरे के बिन खींच रही हैं।
बस उनके कारण ही तो हम
स्वच्छ जीवन जी पा रहे हैं!
- ज़किया ज़ुबैरी
