गांव में मेरी उम्र के सब लड़कों की शादी हो गई थी और लगभग दो-दो बच्चों के पिता बन गए थे। मेरे घरवाले भी मुझ पर दबाव बना रहे थे कि शादी करो फिर कब करोगे जब बूढ़े हो जाओगे । देख लो फिर हो, ना हो।’ ‘ठीक है, नहीं होगी तो न हो लेकिन जब तक मेरी नौकरी नहीं लगेगी। मैं शादी नहीं करूंगा यह फाइनल है।’ मैं भी अड़ गया था।
समय निकल रहा था। मेरी मेहनत में कोई कमी नहीं थी। मेहनत के नाम पर, रात-दिन में मेरे लिए कोई भी फर्क न था। मेहनत-परिश्रम रंग लाया और मेरी नौकरी लग गई। नौकरी भी ऐसी कि जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। मैंने तो की थी। भारत सरकार में सेक्शन ऑफिसर।
घर वालों ने खुशियां मनाईं और कहा भी, ‘चलो देर आए दुरुस्त आए।’ साथ में यह भी कहा, ‘अब तो शादी करनी पड़ेगी।’ अब मुझे भी कोई आपत्ति नहीं थी तो घर वालों ने एक खूब पढ़ी-लिखी लड़की से मेरी शादी कर दी।
करुणा। सच में प्रेम और ममत्व का सागर रही मेरे लिए, मेरे जीवन में। सही कहें तो करुणा ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी।
शादी के सातवें महीने में ही उसकी नौकरी लग गई दिल्ली सरकार में। स्नातक अध्यापिका, क्या कहते हैं, टीजीटी।
हम दोनों नौकरी कर रहे थे। उम्र तो ज्यादा थी ही सो दोनों ने निर्णय लिया कि एक बच्चा तो चाहिए ही। हुआ भी ऐसा ही। दो साल में ही करुणा गर्भवती हुई और निश्चित समय पर शुभ्रांशु पैदा हुआ। बिल्कुल चांद सा बेटा। हम दोनों की खुशी का कोई पारावार न था।
खुशियां तो ठीक थीं लेकिन अब समस्या थी कि उसकी देख-रेख कौन करे। परिवार, रिश्तेदार, सगे-सहोदर सब थे लेकिन साथ कौन दे। कुछ तो ऐसे भी थे जिन्हें जलन थी कि कल तक सड़क पर घूमने वाला लड़का, आज उसे सारी खुशियां कैसे मिल गईं। देखते हैं कैसे संभाल पता है इन खुशियों को।
जीवन में इतने दुखों को झेला था तो ये तो खुशियां थीं जिन्हें संभाल कर रखना कोई कठिन बात नहीं थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि अब तो मेरे साथ, मेरी करुणा थी- मेरी साथी…मेरी सारथी…मेरी भामाशाह….मेरी कामायनी।
एक दिन करुणा ने सलाह दी कि एक काम करते हैं साहब, करुणा आज भी साहब ही कहती है । ‘एक कामवाली रख लेते हैं जो घर में झाड़ू-पोछा करे। खाना भी बनाए और शुभ्रांशु को भी देखे। रही बात पैसों की तो जो वह मांगेगी। वही देंगे।’
बात ठीक थी और रास्ता सरल होना था सो मैंने हाँ कर दी। तब आई थी अलीमुननिशा। करुणा से उम्र में काफी छोटी थी लेकिन शरीर में बिल्कुल उसी की तरह। कई बार तो लगता कि वह करुणा की जुड़वां है।
‘जिज़्जी, हम करेंगे घर-परिवार की देखभाल और बाबू की भी।’ बोली थी अलीमुननिशा। बाबू अर्थात मेरे बेटे की देखभाल वह करेगी, उसने वादा दिया।
अब अलीमुननिशा पूरे घर के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति थी।
अलीमुननिशा की शादी बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। पति को टीबी थी सो उसकी दवा-दारू से लेकर देखभाल तक की सारी जिम्मेदारी उसकी ही थी। संतान उसके कोई हुई नहीं थी सो मेरे बेटे को ही अपना बेटा मानती थी।
मुझे ही नहीं, करुणा को भी उससे एक ही परेशानी थी और वह थी उसका नाम अलीमुननिशा। एक दिन अलीमुननिशा से मैंने पूछा, ‘आपको बुरा ना लगे तो एक बात कहूं।’ तब करुणा भी मेरे साथ थी।
‘जी भैया, बताओ आपकी बात का क्या बुरा मानना।’ वह अपना दुपट्टा ठीक करते हुए बोली।
‘हम दोनों को, मेरा मतलब है, मुझे और करुणा को आपका नाम लेने में बड़ी परेशानी होती है। अगर आप बुरा ना माने तो हम आपको अलीमुननिशा न कहकर निशा कहा करें।’ मैंने बड़ी हिम्मत करके पूछा था। सोचा था, कहीं उसे बुरा ना लगे। कोई मेरा नाम बदले तो मुझे भी बुरा लग सकता है। फिर यहां तो निशा कहने का सीधा अर्थ था कि धर्म ही बदल जा रहा था। निशा अर्थात हिंदू स्त्री।
‘ना भैया बुरा बिल्कुल नहीं लगेगा। आप निशा कहो। मुझे तो अच्छा लगेगा।’ उसके ऐसा कहने पर हमारी प्रॉब्लम आसान हो गई थी और लगने भी लगा था कि कोई अपना ही है। खैर……
अब अलीमुननिशा, निशा थी।घर की महत्वपूर्ण सदस्य।
उसने घर को बहुत अच्छी तरह संभाल लिया था। घर क्या, एक कमरे का घर था। निशा उसे होटल के कमरे की तरह सजा कर रखती। खाना बनाने में तो उसका कोई जवाब ही ना था। वह नॉनवेज बनाती तो लगता है खाते ही चले जाओ।
करुणा बहुत खुश थी उससे। कामवाली स्त्री से घर की गृहणी का खुश होना नितांत आवश्यक है। निशा की सबसे अच्छी बात यह थी कि वह शुभ्रांशु का बहुत ध्यान रखती थी।
करुणा की ड्यूटी सेकिन्ड शिफ्ट की थी। वह फर्स्ट हाफ में बेटे का ध्यान रखती तब तक निशा घर के सारे काम संभाल लेती और जब करुणा स्कूल जाती तो निशा फ्री होकर शुभ्रांशु का माँ की तरह ध्यान रखती।
करुणा का ममत्व, निशा का प्यार, स्नेह, देखभाल और समर्पण शुभ्रांशु बड़ा हुआ और स्कूल जाने लगा। हमें अपनी बातें भी बताने लगा था। विपरीत स्थिति में कुछ समय के लिए अकेला भी रह सकता था हालांकि निशा उसका बहुत ध्यान रखती थी।
आश्चर्य तब हुआ जब करुणा शुभांशु से, निशा को आंटी न कहकर, मौसी कहलवाने लगी और जिस दिन पहलीबार शुभ्रांशु ने करुणा के कहने पर निशा को मौसी कहा था, निशा के फल् ल से आंसू निकल आए थे। यह आंसू ख़ुशी के थे….रिश्ता जोड़ने के थे या फिर निशा के निसंतान होने के दुख के, कोई नहीं जान पाया था।
अब निशा शुभ्रांशु की मौसी थी। मौसी अर्थात माँ जैसी।
तभी एक दिन
मैं ऑफिस से जल्दी घर आ गया था। करुणा स्कूल चली गई थी। घर का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था। मैंने धीरे से हाथ लगाया तो खुलता चला गया। अंदर…अंदर निशा सो रही थी। शुभ्रांशु भी सो रहा था और निशा की गर्दन में अपने छोटे-छोटे हाथ डाले था मानो गुइयाँ-गुइयाँ खेल रहा हो। वह ऐसे ही करुणा के साथ सोता था।
उस दिन मैंने शुभ्रांशु और निशा को देखा तो मन खुशी से भाव-विह्वल हो उठा। मैं बड़ी देर तक दोनों को देखता रहा और न जाने क्यों आंखों की कोरें गीली होने लगी थीं। वहां हिंदू-मुसलमान नहीं था, वहां एक मां की अपने बेटे के लिए अथाह ममता थी… स्नेह था…वात्सल्य था।
जब मेरा मन भर गया उस असीम प्यार को देखकर तब धीरे से कहा था मैंने, ‘निशा।’
निशा हड़बड़ाकर उठी तो शुभ्रांशु परेशान हुआ और उसने निशा को मम्मा कहा। उसने भी उसे ‘बाबू, मेरा राजा, सो जाओ’ कहा और बड़ी देर तक उसे पुचकारती रही थी। काश, यह दृश्य हिंदू-मुसलमान करनेवालों ने भी देखा होता।
करुणा के स्नेह, वात्सल्य और प्यार की छांव में शुभ्रांशु बड़ा हुआ। दो-दो मांओं का प्यार कि शुभ्रांशु स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से एम बी ए तक पहुंच गया था। एम बी ए पूरी की और मदरलैंड कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर बन नौकरी करने लगा था।
हम तीनों अर्थात निशा, करुणा और मैं अधेड़ावस्था से बुढ़ापे की ओर अग्रसर थे।
शुभांशु ने अपने ही साथ काम करने वाली लड़की सुप्रिया शांडिल्य से लव-कम-इंटरकास्ट मैरिज कर ली।
घर में खूब खुशी थी। आश्चर्य यह था कि इस खुशी में सबसे ज्यादा निशा खुश थी।
शुभ्रांशु भी बहुत खुश था और जब उसकी पत्नी अर्थात सुप्रिया पहली बार बहू बनकर घर आई तो शुभ्रांशु ने निशा का इंट्रोडक्शन कराया था, ‘सुप्रिया यह निशा हैं….मेरी खाला…मेरी प्यारी मौसी’ और उनके खुद तो पैर छुए ही थे सुप्रिया से भी कहा था, ‘टच हर फीट।’
और जब सुप्रिया ने निशा के पैर छुए तो निशा की आंखों से बहते गंगा-जमुना के बहाव को रोक पाना मुश्किल था। करुणा ने निशा को प्यार किया था और उस दिन निशा ने अपने गले में पहना हुआ ताबीज शुभ्रांशु के गले में डाल दिया था और न जाने कब तक उसके लिए दुआएं मांगती रही थी।
शुभांशु मॉडर्न लड़का है लेकिन उसने उस ताबीज को गले में डाल लिया था।
निशा की खुशी का ठिकाना न था।
अब घर में आर्थिक विपन्नता तो नहीं थी। बेटा-बहू दोनों कमाते थे। करुणा और मैं रिटायर हो गए थे। खूब सारी पेंशन थी हम दोनों की। तभी एक दिन बेटा-बहू ने हम दोनों से कहा, ‘पापा एक बड़ा सा फ्लैट खरीद लेते हैं किसी अच्छी सी सोसाइटी में।’
मुझे थोड़ा सा ठीक नहीं लगा था। जिन लोगों के साथ पूरा जीवन अर्थात जीवन के बत्तीस साल निकाल दिए, ‘अब कहां उन दड़बों में जाकर बंद हो जाऊं’ फिर करुणा ने समझाया था, ‘कोई बात नहीं जिसमें बच्चों की खुशी उसी में हमारी भी। मान जाओ, साहब।’
मेरे लिए करुणा की बात से बड़ी बात तो कोई हो ही नहीं सकती थी। मैंने हां कर दी और बेटा-बहू ने मिलकर नमः शिवाय सोसाइटी में पोने चार करोड़ का बहुत सुंदर सा फ्लैट ले लिया था।
निशा हमारे साथ यहां भी रहने लगी अर्थात काम करने लगी थी।
समय और अच्छा गुजर रहा था ।
एक दिन बेटे ने कहा, ‘पापा मुझे कंपनी के काम से दो साल के लिए ब्रिटेन जाना होगा। आप चिंता ना करें। आप दोनों की देखभाल के लिए सुप्रिया यहां रहेगी। आप कहें तो मैं उसकी नौकरी छुड़वा देता हूं।’
सुप्रिया की नौकरी छोड़ने के लिए हम दोनों ने मना कर दिया था।
‘सुप्रिया नौकरी क्यों छोड़ देगी। निशा है तो देखभाल के लिए और वैसे भी सुप्रिया घर में रहेगी तो बोर हो जाएगी। चाहो तो तुम अपने साथ ले जाओ उसे।’ करुणा ने कहा था।
‘नहीं पापा, वह आप दोनों की देखभाल के लिए है और दो साल का समय भी कुछ होता है। मैंने सुप्रिया से बात कर ली है।’ आज के समय में शुभ्रांशु जैसा बेटा मिलना मतलब दुनिया की सारी दौलत मिलना है।
निश्चित समय पर बेटा ब्रिटेन चला गया।
बहू अपनी ड्यूटी देखने लगी थी।
करुणा का शरीर भारी है सो उसे अर्थराइटिस हो गया। अब वह पूरी तरह निशा पर आश्रित हो गई थी। निशा, उसका पूरा-पूरा ध्यान रखती। उसकी मालिश करती। मालिशवाला तेल भी निशा का चाचाजाद भाई अफरोज लेकर आया था।
दरअसल, अफरोज बहुत ही नेक दिल इंसान है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह घर के सारे काम जानता है मसलन प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर से लेकर सब्जीलाने और गाड़ी चलाने तक।
करुणा तो उससे बहुत खुश थी।
मैं भी लगभग उस पर आश्रित था ।
शुभांशु के ब्रिटेन चले जाने के बाद सुप्रिया अकेलापन महसूस करने लगी थी सो उसने नमः शिवाय सोसाइटी में किटी पार्टी ज्वाइन कर ली।
वह ड्यूटी से फ्री होती तो वहीं से किटी पार्टी चली जाती। हम दोनों को क्या आपत्ति होती बल्कि हम तो खुश भी थे कि चलो उसका मन लगा रहेगा। हम दोनों का तो पूरा ध्यान रखती ही है।
एक दिन एक अमेजन वाले ने डोरबेल बजाई। मैं बाहर आया।
‘सर आपका पैकेट है सुप्रिया मैडम के नाम से।’ डिलीवरी बॉय बोला।
‘ क्या है इसमें।’
‘मंदिर। ’
’मतलब । ’
‘मतलब यह सर, इसमें सब चीजें हैं। उन्हें असेंबल करना है। तरीका एक बुकलेट में है और पेच-पाच भी इसी में रखे हैं।’ डिलीवरी बॉय ने कहा। एक जगह साइन कराया और चला गया।
मैंने पैकेट अंदर रख लिया
‘मंदिर तो है घर में फिर यह क्यों। ’ मैंने अपने आप से ही कहा।
अभी मैं ढंग से बैठ भी नहीं पाया था कि दूसरा डिलीवरी बॉय आ गया। घंटी बजी। मैं गेट पर।
‘सर ये पैकेट है। ’ वह बोला।
‘अब इसमें क्या है। ’
‘इसमें राम दरबार है।’ डिलीवरी बॉय बोला।
‘ राम दरबार। क्या मतलब।’
‘ मतलब भगवान हैं इसमें।’ और उसने सुप्रिया को फोन लगाया, ‘ओटीपी बताना मेडम।’
सुप्रिया ऑफिस में थी तब। उसने शायद वहीं से ओटीपी बताया होगा। डिलीवरी बॉय जब चलने लगा तो मैंने उससे पूछा, ‘सुनो, भगवान अब पैकेट में भी आया करेंगे।’ मेरे ऐसा कहने पर डिलीवरी बॉय ने सिर्फ इतना ही कहा था, ‘क्या अंकल’ और मुझे चिढ़ाता हुआ चला गया था।
शाम को सुप्रिया ने आकर मंदिर जोड़ लिया जैसा उस बुकलेट में था और बहुत सुंदर सी मूर्तियां सजा लीं। मूर्तियां भगवान श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की थीं।
समय निकलने लगा था……
बहू का ड्यूटी जाना जरूरी होता तो उससे भी ज्यादा किटी पार्टी में जाना जरूरी होने लगा था। किटी पार्टी में क्या होता था, कुछ-कुछ मेरी समझ में आने लगा था।
एक दिन बहू ने एक साड़ी मंगवाई। बहू तो घर पर नहीं थी। डिलीवरी बॉय आया और मुझसे साइन करवा कर, डिब्बा मुझे थाम कर, भाग गया।
शाम को बहू ने आकर साड़ी अपनी सास को दिखाई। मैं भी था करुणा के साथ।
केसरिया रंग की साड़ी। उसी से जुड़ा हुआ ब्लाउज और साथ में एक स्कार्फ। उस केसरिया रंग की पूरी साड़ी पर गायत्री मंत्र छपा था-
ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒
भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥
‘ये कैसी साड़ी है।’ करुणा ने पूछा।
‘मम्मी जी संडे को भगवान राम की विजययात्रा निकलेगी समिति की ओर से। उसी के लिए लाई हूं। जाना होगा। आप ठीक होती तो आपको भी ले चलती।’ बहू इठलाती हुई अपने कमरे में चली गई थी।
मेरा माथा सनक गया या यह कहो कि सही सोच गया। बहू किटी पार्टी में शायद यही सब सीखने जाती है। खैर। कोई बात नहीं। हम हिंदू हैं, तो हैं। कोई बात नहीं, हालांकि करुणा को यह सब ठीक नहीं लगा।
एक दिन बहू ने व्हाट्सएप पर मुझे एक मैसेज भेजा जिसमें कुछ नाम लिखे थे- रामखेलावन, दीपक, छदामी, रमेश शर्मा, रघुवीर और नरोत्तम। नीचे लिखा था, ‘पापा ये नाम सेव कर लो और इनके मोबाइल नंबर भी।’
शाम को बहू घर आई तो मैंने पूछा, ‘बहू इन नामों का क्या मतलब है।’
‘अरे पापा यह हमारे प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, पंडित जी आदि के नंबर हैं। जब भी जरूरत पड़े, इन्हीं से काम करवाना। मैं घर में होगी तो मैं ध्यान रखूंगी ही और इनमें ड्राइवर का नंबर भी है, कभी मैं घर नहीं होती हूं और आपको अचानक कहीं जाना पड़ता है।’ सुप्रिया ने पूरी थीसिस मुझे समझा दी थी।
‘लेकिन बेटा हमें इन सभी की क्या जरूरत। हमारे पास तो अफ़रोज़ है जो ऑल-इन-वन है। हमारा लखटकिया।’ मैंने इतराकर कहा तो बहू ने बड़े तल्ख लहजे में कहा, ‘नो नीड सच टाइप ऑफ़ कटिल्ला।’
मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं आया।
तब तक संडे आ गया। बहू ने जो साड़ी मंगवाई थी उसके साथ का ब्लाउज उसने सिलवा लिया था। बड़े सलीके से वही केसरिया रंग की साड़ी बांधी जिस पर गायत्री मंत्र छपा था और वैसा ही स्कार्फ जो उसके साथ आया था, उसे भी गले में डाल लिया। और सोसाइटी की किटी पार्टी में चली गई थी। बाद में पता चला कि श्री राम की विजययात्रा, नमः शिवाय सोसाइटी से एक किलोमीटर दूर स्थित मस्जिद तक गई और अपना शक्ति प्रदर्शन करके लौट आई। यात्रा में नारे भी लगाए गए थे- हर हर महादेव, जय श्री राम, हिंदुस्तान में रहना है तो जय श्री राम कहना है, आदि आदि।
मैं जब किशोर था तभी से जीसस अर्थात यीशु मसीह से प्यार था। कैसे हुआ। क्यों हुआ। मुझे नहीं पता। यह बात अलग है कि मैं चर्च नहीं जाता और कोई ढोंग-ढकोसला भी नहीं करता। हां, इतना जरूर है, जहां मेरा बेड है, वहीं बेड के सिरहाने मां-पिता की फोटो दीवार पर टंगी हुई है और ठीक सामने वाली दीवार पर सलीब पर जीसस क्राइस्ट की बहुत प्यारी सी मूर्ति है। बेटा जब घर पर था तब उसने इसे नए घर में आने पर मंगवा दी थी। इसके पहले पुराने, एक कमरे वाले घर में करुणा के मंदिर में ही यीशु की बहुत छोटी सी तस्वीर थी। उसी में करुणा के देवी-देवता भी रखे थे। करुणा पूजा करती और मैं ऑफिस जाते समय हाथ जोड़ लेता था। मैंने देखा था जीसस में और करुणा के देवी-देवताओं में कभी लड़ाई नहीं हुई। सब एक ही मंदिर में रहे। मुझमें और करुणा में भी भगवानों को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।
एक दिन बहू शाम को लौटी तो उसके हाथ में एक बड़ा सा पैकेट था। वह मेरे ,कमरे में आई और पैकेट खोलकर दिखाया। बहुत प्यारी सी मूर्ति थी। उड़ते हुए, हाथ में गदा लिए महाबली हनुमान जी की। ‘देखो पापा।’ कहते हुए उसने मेरे हाथों में उसे थमा दिया।
‘रियली मार्वलस।’ मैं बोला।
‘अब यह जो सूली पर लटके हुए हैं, इन्हें उतरो और एक तरफ फेंको। इनकी जगह, इन्हें लगा लो।’ फिर थोड़ी रुकी, फिर बोली, ‘अरे आप रहने दो। मैं रघुवीर को फोन कर दूंगी। वह प्लंबर है। वह लगा देगा।’
मेरा धैर्य चुक गया था। न जाने कहां से मुझ में ताकत आ गई। ‘दिमाग खराब है तुम्हारा। गोबर भरा है इसमें। वहां ,उस किटी पार्टी में यही सब सीखती हो ।अगर मेरे यीशु को किसी ने हाथ लगाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’ मैं थरथर कांप पर रहा था
मेरी तेज आवाज सुनकर करुणा भी मेरे कमरे में आ गई थी और बोली, ‘क्या हुआ, साहब।’
‘पूछो अपनी बहू से।’ मैं लगभग चीखा था।
बहू के हाथ में महावीर हनुमान जी की प्यारी सी मूर्ति थी।
करुणा समझ गई थी। पैंतीस साल का साथ था हमारा। दुख-सुख के साथी रहे थे हम। मेरे मन में क्या है, यह तक तो वह जान लेती थी। उसने सिर्फ ‘बहू’ कहा था जिसका सीधा अर्थ था कि अभी के अभी यहां से चली जाओ।
सुप्रिया चली गई थी।
दो दिन तक घर में मातम सा छाया रहा। मुझे अपनी बेबसी पर रंज हुआ। जिस घर में मेरे बिना कभी पत्ता तक न हिला हो, आज वहाँ बहू मनमानी कर रही थी। हमारी भावनाओं से खेलने की कोशिश की थी उसने, आज।
एक सप्ताह में कुछ थोड़ा सा ठीक हुआ।
मैं और करुणा बैठे चाय पी रहे थे। निशा करुणा के घुटने पर तेल मल रही थी कि सुप्रिया आई, ‘निशा’ न आंटी. न कुछ और सीधा निशा ही बोली थी।
निशा ने उसकी तरफ देखा।
करुणा के तन बदन में आग लग गई, ‘ निशा का क्या मतलब। यह क्या भाषा है। निशा आंटी बोलो या फिर मुझे मम्मी बोलना बंद करो और करुणा कहकर बुलाया करो।’
‘ओह मम्मी। आएम सॉरी।’ और निशा की ओर देखकर बोली थी, ’अब आपका यहां काम करना बंद। कल से आप यहां काम करने नहीं आएंगी। मैंने सरला से कह दिया है। आगे से वही काम करेगी। लिसिन हे यू आंटी अलीमुननिशा।’
मेरा और करुणा का चेहरा फक्क।
निशा रोने लगी, ‘बहूरानी, मुझे मत निकालो। पूरा जीवन साहब और जिज़्जी के पैरोंतले निकला है। इस उम्र में अब कहां जाऊंगी।’ फिर लगभग गिड़गिड़ाने लगी थी, ‘बहूरानी, चाहो तो पगार कम कर लो। तुम्हारे ससुर की तबीयत ठीक नहीं रहती न जाने कब…..।’
‘ व्हाट रबिश, कौन ससुर। मेरे ससुर तो ये मेरे पापा हैं। आप कौन से ससुर की बात कर रही हो, अपने खाबिन्द की। आई मीन टु से इज् योर हज्बैंड। हाउ कैन योर हसबैंड बी माय फादर इन लॉ, अ मुसलमान कांट बी माय ससुर। फक ऑफ।’
निशा अंग्रेजी नहीं समझती थी लेकिन जान रही थी बहूरानी ने क्या बोला है। उसने कातर निगाहों से मेरी और करुणा की ओर देखा।
बिलख रही थी निशा।
बिलख रही थी करुणा।
मैं मर्द हूं। रो नहीं रहा था लेकिन खुद को संभाले था और सिर्फ इतना ही बोला था, ‘अगर निशा इस घर से गई तो सुप्रिया जान लो, तुम अच्छी तरह से, इसके साथ, इस घर से दो लोग और भी जाएंगे फिर रहना अकेली।’
निशा ने करुणा की दोनों हथेलियां चूम ली थीं। बिलख तो अभी भी रही थी वह।
करुणा ने निशा को अपने आंचल में छिपा लिया था।
बहू अर्थात सुप्रिया अर्थात सुप्रिया शांडिल्य पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई थी।
- डॉ. पूरन सिंह
जन्म : 10 जुलाई, 1964 को मैनपुरी. उत्तर प्रदेश में, हिंदी और अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर तथा ‘सत्तरोत्तरी हिन्दी कहानियों में नारी’ विषय पर पी.एच.डी, 9 कहानी संग्रह, 11 लघुकथा एवं 3 कविता संग्रह प्रकाशित। दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली ई पत्रिका बेग़मपुरा में मुख्य संपादक
संप्रति : भारत सरकार में संयुक्त निदेशक के पद से सेवानिवृत, अब स्वतंत्र लेखन।
संपर्क : 240 एवं 935डी बाबा फरीदपुरी, वेस्ट पटेल नगर,नई दिल्ली-110008
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