Sunday, July 12, 2026
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डॉ. रमेश यादव की लघुकथाएं- संवेदना और बेस्ट बडी

 संवेदना

 “कौन हो तुम?”

“संवेदना।”

“अरे! तुम अभी तक ज़िंदा हो?”

“ज़िंदा नहीं… बस साँसें चल रही हैं।”

“लेकिन तुम्हारा चेहरा इतना बुझा-बुझा क्यों है?”

“हर दिन किसी की पीड़ा पर हँसी, किसी की मजबूरी पर तमाशा, और किसी के आँसुओं पर सौदेबाज़ी देखती हूँ।”

“तो फिर चली क्यों नहीं जाती इस दुनिया से?”

“चाहती तो हूँ…”

“फिर रुकी क्यों हो?”

संवेदना ने दूर खेलते एक बच्चे को देखा, जो अपनी रोटी का आधा टुकड़ा एक भूखे कुत्ते को खिला रहा था।

संवेदना की बुझी आँखों में चमक लौट आई।

“क्योंकि जब तक इंसानियत की आख़िरी चिंगारी बाकी है, मुझे ज़िंदा रहना होगा।”

इतना कहकर वह भीड़ में खो गई।

 

बेस्ट साड़ी    

सोसाइटी क्लब में किटी पार्टी थी। आज ‘बेस्ट साड़ी’ का खिताब मिलना था।

रीमा 25 हजार की कांजीवरम लहराते हुए आईं। उन्हें देखते ही पुष्पा ने पड़ोसन के कान में कहा, “दिखावा है, पक्का EMI पर ली होगी।”

जब पुष्पा की 30 हजार की बनारसी साड़ी की तारीफ होने लगी तब रीमा बुदबुदाईं, “हम उम्र के साथ मैच नहीं कर रही।”

दोनों एक-दूसरे की साड़ी का धागा-धागा गिन रही थीं। तभी दरवाज़ा खुला।

सुधा मैडम अंदर आई। सफेद सूती साड़ी, ना जरी, ना किनारी, ना सिल्क। गले में बस काला धागा, हाथ और मांग में सूनापन।

क्लब में पिन ड्रॉप साइलेंस। रीमा ने जबरदस्ती हँसकर कहा,

“सुधा, ये क्या? आज की थीम तो ‘बेस्ट साड़ी’ थी ना !”

सुधा ने कुर्सी खींची और शांत आवाज़ में बोली, “पता है। आज मेरे पति की तेरहवीं थी। सुबह सारे धार्मिक विधि निपटाकर आई हूँ। सोचा, आप सबको बता दूँ कि कल मैं मायके जा रही हूँ। हमेशा के लिए।”

सीमा के हाथ की प्लेट छूट गई। रीमा की कांजीवरम का पल्लू अचानक गले का फंदा लगने लगा। पुष्पा की साड़ी अब उसे बोझ लगने लगी। सबका चेहरा फीका पड़ गया था।

सुधा ने दोनों की तरफ देखा। आँखें सूखी थीं, पर आवाज़ भीगी, “हम तीनों पिछले पाँच सालों से लगभग हर महीने मिलते हैं, पर तुम दोनों ने आज तक नहीं पूछा कि मेरी आंखों के नीचे ये काले गड्ढे क्यों हैं। तुम बस मेरी साड़ी का प्राइस टैग टटोलती रहीं।”

वो उठी, “काश हम औरतें एक-दूसरे की सिल्क गिनने से पहले, एक-दूसरे की सिलवटें गिनना सीख जाएं तो शायद हमारा क्लब ‘किटी’ से ‘घर’ बन जाए।”

सुधा चली गई।

उस दिन ‘बेस्ट साड़ी’ का ताज मेज़ पर ही पड़ा रह गया। रीमा और सीमा पहली बार एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चुपचाप रो रही थीं। लगभग सबकी साड़ियाँ ब्रांडेड थी, पर आज सारी औरतें पहली बार असली लग रही थीं।

डॉ. रमेश यादव, मुंबई

फोन – 9820759088

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