Monday, August 10, 2026
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डॉ. रमेश यादव की लघुकथाएं- संवेदना और बेस्ट बडी

 संवेदना

 “कौन हो तुम?”

“संवेदना।”

“अरे! तुम अभी तक ज़िंदा हो?”

“ज़िंदा नहीं… बस साँसें चल रही हैं।”

“लेकिन तुम्हारा चेहरा इतना बुझा-बुझा क्यों है?”

“हर दिन किसी की पीड़ा पर हँसी, किसी की मजबूरी पर तमाशा, और किसी के आँसुओं पर सौदेबाज़ी देखती हूँ।”

“तो फिर चली क्यों नहीं जाती इस दुनिया से?”

“चाहती तो हूँ…”

“फिर रुकी क्यों हो?”

संवेदना ने दूर खेलते एक बच्चे को देखा, जो अपनी रोटी का आधा टुकड़ा एक भूखे कुत्ते को खिला रहा था।

संवेदना की बुझी आँखों में चमक लौट आई।

“क्योंकि जब तक इंसानियत की आख़िरी चिंगारी बाकी है, मुझे ज़िंदा रहना होगा।”

इतना कहकर वह भीड़ में खो गई।

 

बेस्ट साड़ी    

सोसाइटी क्लब में किटी पार्टी थी। आज ‘बेस्ट साड़ी’ का खिताब मिलना था।

रीमा 25 हजार की कांजीवरम लहराते हुए आईं। उन्हें देखते ही पुष्पा ने पड़ोसन के कान में कहा, “दिखावा है, पक्का EMI पर ली होगी।”

जब पुष्पा की 30 हजार की बनारसी साड़ी की तारीफ होने लगी तब रीमा बुदबुदाईं, “हम उम्र के साथ मैच नहीं कर रही।”

दोनों एक-दूसरे की साड़ी का धागा-धागा गिन रही थीं। तभी दरवाज़ा खुला।

सुधा मैडम अंदर आई। सफेद सूती साड़ी, ना जरी, ना किनारी, ना सिल्क। गले में बस काला धागा, हाथ और मांग में सूनापन।

क्लब में पिन ड्रॉप साइलेंस। रीमा ने जबरदस्ती हँसकर कहा,

“सुधा, ये क्या? आज की थीम तो ‘बेस्ट साड़ी’ थी ना !”

सुधा ने कुर्सी खींची और शांत आवाज़ में बोली, “पता है। आज मेरे पति की तेरहवीं थी। सुबह सारे धार्मिक विधि निपटाकर आई हूँ। सोचा, आप सबको बता दूँ कि कल मैं मायके जा रही हूँ। हमेशा के लिए।”

सीमा के हाथ की प्लेट छूट गई। रीमा की कांजीवरम का पल्लू अचानक गले का फंदा लगने लगा। पुष्पा की साड़ी अब उसे बोझ लगने लगी। सबका चेहरा फीका पड़ गया था।

सुधा ने दोनों की तरफ देखा। आँखें सूखी थीं, पर आवाज़ भीगी, “हम तीनों पिछले पाँच सालों से लगभग हर महीने मिलते हैं, पर तुम दोनों ने आज तक नहीं पूछा कि मेरी आंखों के नीचे ये काले गड्ढे क्यों हैं। तुम बस मेरी साड़ी का प्राइस टैग टटोलती रहीं।”

वो उठी, “काश हम औरतें एक-दूसरे की सिल्क गिनने से पहले, एक-दूसरे की सिलवटें गिनना सीख जाएं तो शायद हमारा क्लब ‘किटी’ से ‘घर’ बन जाए।”

सुधा चली गई।

उस दिन ‘बेस्ट साड़ी’ का ताज मेज़ पर ही पड़ा रह गया। रीमा और सीमा पहली बार एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चुपचाप रो रही थीं। लगभग सबकी साड़ियाँ ब्रांडेड थी, पर आज सारी औरतें पहली बार असली लग रही थीं।

डॉ. रमेश यादव, मुंबई

फोन – 9820759088

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4 टिप्पणी

  1. आज के परिदृश्य में सामाजिक सत्य के दर्शाती दोनों लघुकथाएँ मन को छू गईं। बधाई

  2. साहित्य में संवेदना का अर्थ व्यापक है। यहाँ संवेदना से अर्थ दूसरों के सुख-दुख, पीड़ा और भावनाओं को समझकर उनसे जुड़ना और सहानुभूति से है।
    आपकी पहली कविता संवेदना में संवेदना का मानवीकरण किया गया है। यहां संवेदना का आत्मा लाप है। वह स्वयं से ही प्रश्न -उत्तर करती है जिस प्रकार वर्तमान में संबंधों के बीच से संवेदनाएँ टूट रही हैं।मानवीयता गुम हो रही है उससे संवेदनाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
    एक छोटे से बच्चे को अपनी रोटी में से भूखे पिल्ले को रोटी खिलाने देख संवेदना की आंखों में चमक आ जाती है।
    लघुकथा संदेश देती है कि जब तक मनुष्य में करुणा और दया की एक भी चिंगारी जीवित है, तब तक मानवता समाप्त नहीं हो सकती। संवेदना खत्म नहीं हो सकती।

    2. ‘बेस्ट साड़ी’

    यह लघुकथा आधुनिक जीवन में बढ़ती दिखावे की प्रवृत्ति और रिश्तों में घटती आत्मीयता पर तीखा व्यंग्य करती है।
    किटी पार्टी में महिलाओं का ध्यान केवल महंगी साड़ियों और उनकी कीमत पर रहता है, जबकि उनकी अपनी सहेली सुधा के जीवन में चल रहे गहरे दुःख को कोई नहीं देखता। सुधा कहती है-“काश हम औरतें एक-दूसरे की सिल्क गिनने से पहले, एक-दूसरे की सिलवटें गिनना सीख जाएँ”—यह लघुकथा की पंच लाइन है।
    विशेषताएँ:
    कथानक यथार्थपरक और अत्यंत प्रासंगिक है।

    मँहगी साड़ियाँ बाहरी आडंबर का और सफेद सूती साड़ी जीवन के कठोर यथार्थ का प्रतीक है।

    वास्तव में मनुष्य का मूल्य उसके वस्त्रों या बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसके दुःख-सुख को समझने वाली संवेदनशीलता से तय होता है।
    बेहतरीन लघु कथाओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

  3. इस टिप्पणी को सही समझकर पढ़ा जाए। ऊपर वाली गलती से गई।

    आदरणीय रमेश जी!

    साहित्य में संवेदना का अर्थ व्यापक है। यहाँ संवेदना से अर्थ दूसरों के सुख-दुख, पीड़ा और भावनाओं को समझकर उनसे जुड़ना और सहानुभूति से है।

    आपकी पहली कविता ‘संवेदना’ में संवेदना का मानवीकरण किया गया है।यहाँ संवेदना का आत्मालाप है। वह स्वयं से ही प्रश्न -उत्तर करती है, जिस प्रकार वर्तमान में संबंधों के बीच से संवेदनाएँ टूट रही हैं,मानवीयता गुम हो रही है उससे संवेदनाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
    एक छोटे से बच्चे को अपनी रोटी में से भूखे पिल्ले को रोटी खिलाते देख संवेदना की आँखों में चमक आ जाती है।
    लघुकथा संदेश देती है कि जब तक मनुष्य में करुणा और दया की एक भी चिंगारी जीवित है, तब तक मानवता समाप्त नहीं हो सकती। संवेदना खत्म नहीं हो सकती।

    2. ‘बेस्ट साड़ी’

    यह लघुकथा आधुनिक जीवन में बढ़ती दिखावे की प्रवृत्ति और रिश्तों में घटती आत्मीयता पर तीखा व्यंग्य करती है।
    किटी पार्टी में महिलाओं का ध्यान केवल महंगी साड़ियों और उनकी कीमत पर रहता है, जबकि उनकी अपनी सहेली सुधा के जीवन में चल रहे गहरे दुःख को कोई नहीं देखता। सुधा कहती है-“काश हम औरतें एक-दूसरे की सिल्क गिनने से पहले, एक-दूसरे की सिलवटें गिनना सीख जाएँ”—यह लघुकथा की पंच लाइन है।

    कथानक यथार्थपरक और अत्यंत प्रासंगिक है। आजकल किटी पार्टियों में या इस तरह के कार्यक्रमों में यह दिखावा आम है।

    लघुकथा में मँहगी साड़ियाँ बाहरी आडंबर का और सफेद सूती साड़ी जीवन की कठोर
    सच्चाई का प्रतीक है।

    वास्तव में मनुष्य का मूल्य उसके वस्त्रों या बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसके दुःख-सुख को समझने वाली संवेदनशीलता से तय होता है।
    बेहतरीन लघु कथाओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
    पुरवाई के संपादक मंडल का आभार।

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