मैं जीवन-दीप जला न सकी…
मैं जीवन-दीप जला ना सकी…
यूं समय गुज़रता जाता है
हर दिवस निराशा लाता है
सौ बार आत्म-मंथन कर भी
आशा का संबल पा न सकी।
मैं जीवन-दीप जला न सकी…
जीवन वीणा के तार हिले
दो क्षण कांपे फिर टूट गये
उर में ही अटकी रही व्यथा
मैं गीत प्रीत के गा ना सकी।
मैं जीवन-दीप जला ना सकी…
निष्प्राण खिन्ना सा है जीवन
उस पर आहों का आन्दोलन
आंसू ही सानी शेष रहे
चाहा भी तो मुस्का न सकी।
मैं जीवन दीप जला ना सकी…
पाती…
आज तुम्हारी पाती आई।
बरसों से नयनों में थमा हुआ
सावन कुछ ऐसे बरसा
जैसे गँगा तोड़ किनारे
सब कुछ जल थल कर देने को आतुर
इधर उधर लहरा जाती है।
जैसे गर्म गर्म सांसों से लिपटी आहें
पीड़ा भरे हृदय को भीतर तक
तड़पा जाती हैं।
कहां गये वो बीते पल ?
कहां ख गया मीठा स्वर्णिम कल ?
जिस कल में हर सपना भी
अपना लगता था।
पास नहीं तुम अब मेरे तो
हर अपना भी सपना लगता है…
सुनो…
आज तुम्हारी पाती आई !
1.
वर्ष सात गुज़र गये, इक दूसरे से बिछुड़े हुए
आभास होता है कि साथ हो, आस-पास हो।
छू नहीं सकती, अन्तर्मन की आँखों से चूमती हूं
तुम कल भी ख़ास थे आज भी ख़ास हो।
2.
तुम जो चुपचाप उधर सिर झुकाए बैठे हो
किसकी यादों को सीने से लगाए बैठे हो।
शिकवे शिकायतों का वक्त कहां दुश्मनों के पास
दोस्तों की मेहरबानी से चोट खाए बैठे हो।
3.
गुमसुम उदास हो के जो रो देती हो तुम
गुलाबी गालों में मोती दमकने लगते हैं।
ज़रा सी बात पे जब खिलखिला के हंसती हो
अंधेरी वादियों में जुगनू चमकने लगते हैं।
- तोषी अमृता, लन्दन
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