जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है, बेईमानी, भ्रष्टाचार और पक्षपात भी बाक़ायदा सिर उठाने लगे हैं। खेलों से खेल-भावना कहीं ग़ायब होती जा रही है। किसी भी कीमत पर जीतने की चाहत, तथा कमज़ोर टीमों की तुलना में स्थापित टीमों और खिलाड़ियों को अनुचित संरक्षण देने की प्रवृत्ति साफ़ दिखाई देती है। खेलों की सेहत के लिए बेहतर होगा कि ट्रंप जैसे लोग इससे दूर ही रहें। खेल को खेल की तरह ही खेला जाए… वरना फ़ीफ़ा की किरकिरी तो होगी ही, ट्रंप की भी फ़ी…फ़ा हो जाएगी…!
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी कारगुज़ारियों से स्वयं को हास्य और आलोचना का पात्र बनाने का मानो ठेका ले रखा है। इस असंतुलित दिमाग़ वाले व्यक्ति को अपने जैसे लोग ही पसंद आते हैं। पाकिस्तान के तथाकथित फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ ख़ान उनके सबसे प्रिय नेताओं में हैं। भारत की अर्थव्यवस्था उन्हें बहुत कमज़ोर लगती है।
डॉनल्ड ट्रंप अब तक अमेरिका-ईरान युद्ध की समाप्ति की घोषणा 28 बार कर चुके हैं और 29वीं बार युद्ध शुरू कर चुके हैं। हर देश के मामलों में टांग अड़ाने की उन्हें आदत है। मगर इस बार ट्रंप ने ऐसे खेल में टांग अड़ाई है, जो टांगों से ही खेला जाता है- फ़ुटबॉल! डॉनल्ड ट्रंप ने कुछ ऐसा कर दिखाया, जो आज तक किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष ने कभी नहीं किया।
किस्सा कुछ इस तरह का है-1 जुलाई को अमेरिका और बोस्निया-हर्ज़ेगोविना के बीच खेले जा रहे मैच में अमेरिकी स्ट्राइकर फ़ोलरिन बालोगुन को एक फ़ाउल के कारण ‘रेड कार्ड’ दिखाया गया। जिस खिलाड़ी को रेड कार्ड दिखाया जाता है, वह सामान्यतः अपनी टीम के अगले मैच में खेलने के लिए अयोग्य हो जाता है। मगर फ़ोलरिन बालोगुन अमेरिका का सर्वाधिक गोल करने वाला खिलाड़ी है और टीम का अगला मैच बेल्जियम के साथ होना था।
यहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के भीतर का ‘खलनायक’ सक्रिय हो उठता है। वे सीधे-सीधे फ़ीफ़ा (फ़ेडरेशन इंटरनेशनेल दि फ़ुटबॉल एसोसिएशन), अर्थात् ‘अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल महासंघ’ के अध्यक्ष जियानी इन्फ़ैंटीनो को फ़ोन मिला देते हैं। दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी यदि किसी खेल महासंघ के अध्यक्ष को फ़ोन करे, तो उस बेचारे की टांगें कांपना स्वाभाविक ही है। क्या वह इतनी हिम्मत जुटा सकता था कि ट्रंप की सिफ़ारिश को ठुकरा देता?
ट्रंप पहले भी कई काम करवाने के दावे कर चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान युद्ध रुकवा दिया… रूस और यूक्रेन का युद्ध रुकवा दिया, वेनेज़ुएला को एक ‘ख़राब’ राष्ट्रपति से मुक्ति दिलवा दी और वहाँ के तेल पर कब्ज़ा कर लिया। अब वे ग्रीनलैंड पर अमेरिका के कब्ज़े की बात कर रहे हैं। इस बार उन्होंने अमेरिका के एक फ़ुटबॉल खिलाड़ी को मिले रेड कार्ड पर पुनर्विचार करने के लिए निजी तौर पर फ़ोन कर दिया।
कहा जाता है-“भूतो न भविष्यति।” बस, कुछ वैसी ही अनहोनी बात ट्रंप ने कर दिखाई। उन्होंने जियानी को मानो हिन्दी फ़िल्म अभिनेता राज कुमार की शैली में आदेशात्मक सिफ़ारिश की- “जानी, हमारे एक खिलाड़ी को तुमने लाल रंग का कार्ड दिखाने की जो हिमाकत की है, उसके लिए हम चाहें तो अमेरिका में तुम्हारी एंट्री बैन कर सकते हैं। फ़िलहाल तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा यही रहेगा कि तुम दोबारा जाँच करने का नाटक करके यह लाल कार्ड वापस ले लो और हमारे फ़ोलरिन बालोगुन को बेल्जियम के साथ होने वाले मैच में खेलने की इजाज़त दे दो। वरना तुम जानते हो कि हम आदमी ज़रा दूजे क़िस्म के हैं!”
फ़ोन पर दो ऐसे व्यक्ति बातचीत कर रहे थे, जिन पर समय-समय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। फ़ीफ़ा भी समय-समय पर विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण बदनाम रहा है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर भी दुनिया भर में तरह-तरह के आरोप और विवाद जुड़े रहे हैं। ऐसा व्यक्ति सदियों में कभी-कभार ही अवतरित होता है। जियानी इन्फ़ैंटीनो शायद इस बात पर हैरान रहे होंगे कि एक ओर ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव चरम पर है, वहीं दूसरी ओर ट्रंप को एक फ़ुटबॉल मैच में दिखाए गए रेड कार्ड के बारे में फ़ोन करने का समय भी मिल गया। एक तरफ़ ट्रंप कहते हैं कि वे ईरान के निशाने पर हैं और उनकी हत्या हो सकती है, दूसरी तरफ़ वे फ़ुटबॉल जैसे खेल की निष्पक्षता की हत्या करने पर आमादा दिखाई देते हैं।
किस्से-कहानियों में कहा जाता है कि अंततः जीत सच्चाई की होती है… कुछ ऐसा यहाँ हुआ भी और नहीं भी। हुआ यह कि फ़ोलरिन बालोगुन का निलंबन हटा दिया गया और उसे बेल्जियम के विरुद्ध खेलने की अनुमति दे दी गई। यह उलटफेर बेहद असामान्य है। कहा जा रहा है कि 1962 के बाद यह पहली बार है जब फ़ीफ़ा ने किसी ऐसे खिलाड़ी को मैच में खेलने की अनुमति दी है, जिसे विश्व कप में रेड कार्ड मिलने के बाद निलंबित कर दिया गया था। श्री इन्फ़ैंटीनो ने श्री ट्रंप का समर्थन हासिल करने के लिए वर्षों तक प्रयास किए हैं। पिछले वर्ष फ़ीफ़ा ने राष्ट्रपति के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने के असफल अभियान के दौरान ‘फ़ीफ़ा शांति पुरस्कार’ की स्थापना की और उसे श्री ट्रंप को प्रदान किया। अब यह तो हम सब समझ सकते हैं कि कितना “शांतिपूर्ण” तरीक़े से सारा घोटाला किया गया।

बालोगुन को रेड कार्ड मिलने के कुछ ही समय बाद ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने अमेरिकी फ़ुटबॉल महासंघ की अपील तैयार कराने के लिए वकीलों को नियुक्त किया। याद रहे कि फ़ीफ़ा के नियमों के अनुसार ऐसी अपीलें प्रतिबंधित हैं, जैसा कि इस मामले से परिचित दो लोगों ने बताया। अधिकारियों के इस दल में वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक और विश्व कप पर व्हाइट हाउस टास्क फ़ोर्स के कार्यकारी निदेशक एंड्रयू गिउलियानी भी शामिल थे।
ज़ाहिर है कि बेल्जियम और विश्व की अन्य टीमों को यह कारगुज़ारी नागवार गुज़री। अपील भी की गई, मगर बेल्जियम की टीम ने तय कर लिया कि वे इस कथित षड़यंत्र का जवाब अपने खेल से देंगे। उन्होंने अमेरिका की टीम को 4-1 से शिकस्त दे दी। मैच के बाद बेल्जियम के खिलाड़ियों ने ‘ट्रंप डांस’ करके डॉनल्ड ट्रंप का वैश्विक स्तर पर मज़ाक उड़ाया।
डॉनल्ड ट्रंप हर बात का सेहरा अपने सिर बाँधने के लिए आतुर रहते हैं। इस मामले में भी उन्होंने स्वयं ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए डींग मारी कि यह कारनामा उन्होंने ही कर दिखाया है। इसलिए किसी को यह जासूसी करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि ऐसा हुआ भी था या नहीं।
एक मानवाधिकार समूह ने जियानी इन्फ़ैंटीनो की शिकायत ओलंपिक नैतिकता जाँचकर्ता से की है, जिसमें राजनीतिक तटस्थता का मुद्दा उठाया गया है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक आंदोलन खेल निकायों के लिए, जिनमें फ़ीफ़ा भी शामिल है, राजनीतिक तटस्थता को खेल के मूलभूत सिद्धांतों में मान्यता देता है।
अभी यह विवाद थमा भी नहीं था कि अर्जेंटीना और मिस्र के बीच अंतिम-16 चरण के मैच में एक और विवाद खड़ा हो गया। इस विवाद के चलते फ़्रांसीसी रेफ़री फ़्राँस्वा लेटेक्सियर पर पक्षपात के आरोप लगाए जा रहे हैं। अर्जेंटीना के हाथों विवादास्पद हार के बाद मिस्र ने फ़ीफ़ा में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराकर रेफ़री को विश्व कप से “बाहर करने” की माँग की है। मिस्र के कोच होसाम हसन ने संकेत दिया कि फ़ीफ़ा ने अर्जेंटीना के प्रति पक्षपात दिखाया है। उन्होंने कहा, “शायद वे विश्व चैंपियन को प्रतियोगिता में बनाए रखना चाहते थे।”
मौजूदा चैंपियन अर्जेंटीना ने अंतिम-16 में चमत्कारिक वापसी करते हुए 2-0 से पिछड़ने के बाद 3-2 से जीत हासिल की। अर्जेंटीना का एक गोल विवादास्पद ढंग से रद्द कर दिया गया था और एंज़ो फ़र्नांडीज़ के विजयी गोल से पहले कथित फ़ाउल को लेकर मिस्र ने जमकर विरोध जताया। मिस्र के 1-0 से आगे होने पर मुस्तफ़ा ज़िको का गोल भी अमान्य कर दिया गया, जबकि मोहम्मद सलाह ने पेनल्टी की माँग की थी। इसके बाद मैच ने नाटकीय मोड़ लिया और स्टॉपेज टाइम में एंज़ो फ़र्नांडीज़ ने हेडर से विजयी गोल दाग दिया।
जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है, बेईमानी, भ्रष्टाचार और पक्षपात भी बाक़ायदा सिर उठाने लगे हैं। खेलों से खेल-भावना कहीं ग़ायब होती जा रही है। किसी भी कीमत पर जीतने की चाहत, तथा कमज़ोर टीमों की तुलना में स्थापित टीमों और खिलाड़ियों को अनुचित संरक्षण देने की प्रवृत्ति साफ़ दिखाई देती है। खेलों की सेहत के लिए बेहतर होगा कि ट्रंप जैसे लोग इससे दूर ही रहें। खेल को खेल की तरह ही खेला जाए… वरना फ़ीफ़ा की किरकिरी तो होगी ही, ट्रंप की भी फ़ी…फ़ा हो जाएगी…!

बड़े ही शर्म की बात है राष्ट्रपति कहलाने के लायक ही नहीं है पहली दूसरी के बच्चे जैसे लड़ते थे ऐसी बातें करते हैं!
आभार भाग्यम जी
जब से विभिन्न खेलों में मोटी रकमों की भागीदारी होने लगी हैं, बेइमानी, भ्रष्टाचार और पक्षपात का बोलबाला होने लगा है। खेलों से खेल भावना लुप्त प्राय होने लगी है।
1962 के बाद पहली बार रेड कार्ड प्राप्त निलंबन का सामना करते किसी खिलाड़ी को खेलने की अनुमति प्रदान की गई जो खेल भावना की धज्जियां उड़ाती प्रतीत होती है।
आदरणीय तेजेन्द्र जी का यह विचारोत्तेजक संपादकीय खेलों के वर्तमान त्रासद परिदृश्य का खाका खींचने में सफल रहा है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
‘ट्रंप के लाल कार्ड की फीफा’… संपादकीय अपने अनियमित आचरण के कारण दुनिया भर में सुर्खियां बटोरने वाले डोनाल्ड ट्रम्प और फीफा फुटबॉल विश्व कप पर केंद्रित है। इस विश्व कप में भी ट्रम्प महोदय कारनामा किए बिना न रह सके। फीफा विश्वकप फुटबॉल में भी उन्होंने एक गोल मार ही दिया। उन्होंने गोल किया तो… पर वह सेल्फ गोल कर बैठे।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके लिए गोल महत्वपूर्ण है , दुनिया कहे तो कहे, उनकी बला से। वे न तो किसी नियम को मानते हैं और न उन्हें किसी आलोचना, समालोचना की परवाह है। एकदम मस्तमौला आदमी तरह।
आपने उनके व्यक्तित्व को सही रेखांकित किया है कि दुनिया में ऐसा व्यक्तित्व ‘भूतो न भविष्यति'(विश्व कप फुटबॉल के संदर्भ में भी)। उन्होंने अमेरिका सहित पूरी दुनिया की नाक में दम करके रख दिया है।
ट्रंप साहब को लगता है कि वे जो सोच रहे हैं और जो कर रहे हैं, वही सही है। उनके इस चमत्कारिक कांफिडेंस पर लोग आगे चलकर पीएचडी लिखेंगे।
ये सच है कि जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है तब से भ्रष्टाचार, बेईमानी और पक्षपात खुलकर सामने आने लगा है। ताकत और दबदबे से किसी भी तरह के, किसी भी संस्था के नियमों को तोड़ना उसके अंत की शुरुआत हो जाती है।
फीफा जैसी खेल संस्था के नियमों में हस्तक्षेप करके उन्होंने उस संस्था का बड़ा नुक़सान कर दिया है।
हो सकता है कि अगले फुटबॉल विश्वकप में इसे सुधार लिया जाए। फिर भी दाग तो लग ही गया है। यह दाग पीढ़ियों तक छुटाए न छूटेगा।
विश्वकप में जैसा हुआ सो हुआ। डर तो इस बात का लग रहा है कि कहीं वे विश्व को किसी युद्ध में न उलझा दें। क्योंकि उसकी भरपाई विश्व को बहुत भारी पड़ जाएगी।
अब तो आशा ही कर सकते हैं कि उन्हें सद्बुद्धि आ जाए, ताकि अमेरिका सहित पूरा विश्व उनकी जिद का शिकार न बने।
वैसे माननीय डोनाल्ड ट्रम्प महोदय जी मेरे प्रिय विषयों में से एक थे। लेकिन उनके कार्य ऐसे हो गए कि अब हमारी लेखनी उनके स्तर तक पहुंच ही नहीं पा रही है। सुबह कुछ…शाम को कुछ… फिर कुछ..कुछ …कुछ ….की निरंतरता कलम को स्थिर नहीं रहने देती हैं।
संपादकीय विषय को आपने बहुत मजबूती के साथ पाठकों के समक्ष रखा हैं। कहीं कोई चीज छूटी नहीं है। इस संपादकीय का अंदाज बड़ा लुभावना लगा मुझे।
इस बार सम्पादकीय के माध्यम से आपने खेलों में होने वाली धाँधलियों को उजागर किया है, जो चिंता का विषय है। इतने ऊँचे पद पर बैठे नौटंकीबाज़ डोनाल्ड ट्रंप ने फ़ीफ़ा फ़ुटबॉल खेल के नियमों में हस्तक्षेप करके अपनी जगहँसाई तो करवाई ही है, खेल संस्था को भी हानि पहुँचाई है। ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि प्रदान करें अन्यथा विश्व युद्ध की सम्भावना को नहीं नकारा जा सकता।
आपके सम्पादकीय से विश्व भर की विश्वसनीय जानकारी मिलती है। भूतों न भविष्यति का तो पता नहीं पर वर्तमान में आपका कोई सानी नहीं।साधुवाद