जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है, बेईमानी, भ्रष्टाचार और पक्षपात भी बाक़ायदा सिर उठाने लगे हैं। खेलों से खेल-भावना कहीं ग़ायब होती जा रही है। किसी भी कीमत पर जीतने की चाहत, तथा कमज़ोर टीमों की तुलना में स्थापित टीमों और खिलाड़ियों को अनुचित संरक्षण देने की प्रवृत्ति साफ़ दिखाई देती है। खेलों की सेहत के लिए बेहतर होगा कि ट्रंप जैसे लोग इससे दूर ही रहें। खेल को खेल की तरह ही खेला जाए… वरना फ़ीफ़ा की किरकिरी तो होगी ही, ट्रंप की भी फ़ी…फ़ा हो जाएगी…!
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी कारगुज़ारियों से स्वयं को हास्य और आलोचना का पात्र बनाने का मानो ठेका ले रखा है। इस असंतुलित दिमाग़ वाले व्यक्ति को अपने जैसे लोग ही पसंद आते हैं। पाकिस्तान के तथाकथित फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ ख़ान उनके सबसे प्रिय नेताओं में हैं। भारत की अर्थव्यवस्था उन्हें बहुत कमज़ोर लगती है।
डॉनल्ड ट्रंप अब तक अमेरिका-ईरान युद्ध की समाप्ति की घोषणा 28 बार कर चुके हैं और 29वीं बार युद्ध शुरू कर चुके हैं। हर देश के मामलों में टांग अड़ाने की उन्हें आदत है। मगर इस बार ट्रंप ने ऐसे खेल में टांग अड़ाई है, जो टांगों से ही खेला जाता है- फ़ुटबॉल! डॉनल्ड ट्रंप ने कुछ ऐसा कर दिखाया, जो आज तक किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष ने कभी नहीं किया।
किस्सा कुछ इस तरह का है-1 जुलाई को अमेरिका और बोस्निया-हर्ज़ेगोविना के बीच खेले जा रहे मैच में अमेरिकी स्ट्राइकर फ़ोलरिन बालोगुन को एक फ़ाउल के कारण ‘रेड कार्ड’ दिखाया गया। जिस खिलाड़ी को रेड कार्ड दिखाया जाता है, वह सामान्यतः अपनी टीम के अगले मैच में खेलने के लिए अयोग्य हो जाता है। मगर फ़ोलरिन बालोगुन अमेरिका का सर्वाधिक गोल करने वाला खिलाड़ी है और टीम का अगला मैच बेल्जियम के साथ होना था।
यहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के भीतर का ‘खलनायक’ सक्रिय हो उठता है। वे सीधे-सीधे फ़ीफ़ा (फ़ेडरेशन इंटरनेशनेल दि फ़ुटबॉल एसोसिएशन), अर्थात् ‘अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल महासंघ’ के अध्यक्ष जियानी इन्फ़ैंटीनो को फ़ोन मिला देते हैं। दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी यदि किसी खेल महासंघ के अध्यक्ष को फ़ोन करे, तो उस बेचारे की टांगें कांपना स्वाभाविक ही है। क्या वह इतनी हिम्मत जुटा सकता था कि ट्रंप की सिफ़ारिश को ठुकरा देता?
ट्रंप पहले भी कई काम करवाने के दावे कर चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान युद्ध रुकवा दिया… रूस और यूक्रेन का युद्ध रुकवा दिया, वेनेज़ुएला को एक ‘ख़राब’ राष्ट्रपति से मुक्ति दिलवा दी और वहाँ के तेल पर कब्ज़ा कर लिया। अब वे ग्रीनलैंड पर अमेरिका के कब्ज़े की बात कर रहे हैं। इस बार उन्होंने अमेरिका के एक फ़ुटबॉल खिलाड़ी को मिले रेड कार्ड पर पुनर्विचार करने के लिए निजी तौर पर फ़ोन कर दिया।
कहा जाता है-“भूतो न भविष्यति।” बस, कुछ वैसी ही अनहोनी बात ट्रंप ने कर दिखाई। उन्होंने जियानी को मानो हिन्दी फ़िल्म अभिनेता राज कुमार की शैली में आदेशात्मक सिफ़ारिश की- “जानी, हमारे एक खिलाड़ी को तुमने लाल रंग का कार्ड दिखाने की जो हिमाकत की है, उसके लिए हम चाहें तो अमेरिका में तुम्हारी एंट्री बैन कर सकते हैं। फ़िलहाल तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा यही रहेगा कि तुम दोबारा जाँच करने का नाटक करके यह लाल कार्ड वापस ले लो और हमारे फ़ोलरिन बालोगुन को बेल्जियम के साथ होने वाले मैच में खेलने की इजाज़त दे दो। वरना तुम जानते हो कि हम आदमी ज़रा दूजे क़िस्म के हैं!”
फ़ोन पर दो ऐसे व्यक्ति बातचीत कर रहे थे, जिन पर समय-समय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। फ़ीफ़ा भी समय-समय पर विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण बदनाम रहा है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर भी दुनिया भर में तरह-तरह के आरोप और विवाद जुड़े रहे हैं। ऐसा व्यक्ति सदियों में कभी-कभार ही अवतरित होता है। जियानी इन्फ़ैंटीनो शायद इस बात पर हैरान रहे होंगे कि एक ओर ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव चरम पर है, वहीं दूसरी ओर ट्रंप को एक फ़ुटबॉल मैच में दिखाए गए रेड कार्ड के बारे में फ़ोन करने का समय भी मिल गया। एक तरफ़ ट्रंप कहते हैं कि वे ईरान के निशाने पर हैं और उनकी हत्या हो सकती है, दूसरी तरफ़ वे फ़ुटबॉल जैसे खेल की निष्पक्षता की हत्या करने पर आमादा दिखाई देते हैं।
किस्से-कहानियों में कहा जाता है कि अंततः जीत सच्चाई की होती है… कुछ ऐसा यहाँ हुआ भी और नहीं भी। हुआ यह कि फ़ोलरिन बालोगुन का निलंबन हटा दिया गया और उसे बेल्जियम के विरुद्ध खेलने की अनुमति दे दी गई। यह उलटफेर बेहद असामान्य है। कहा जा रहा है कि 1962 के बाद यह पहली बार है जब फ़ीफ़ा ने किसी ऐसे खिलाड़ी को मैच में खेलने की अनुमति दी है, जिसे विश्व कप में रेड कार्ड मिलने के बाद निलंबित कर दिया गया था। श्री इन्फ़ैंटीनो ने श्री ट्रंप का समर्थन हासिल करने के लिए वर्षों तक प्रयास किए हैं। पिछले वर्ष फ़ीफ़ा ने राष्ट्रपति के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने के असफल अभियान के दौरान ‘फ़ीफ़ा शांति पुरस्कार’ की स्थापना की और उसे श्री ट्रंप को प्रदान किया। अब यह तो हम सब समझ सकते हैं कि कितना “शांतिपूर्ण” तरीक़े से सारा घोटाला किया गया।

बालोगुन को रेड कार्ड मिलने के कुछ ही समय बाद ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने अमेरिकी फ़ुटबॉल महासंघ की अपील तैयार कराने के लिए वकीलों को नियुक्त किया। याद रहे कि फ़ीफ़ा के नियमों के अनुसार ऐसी अपीलें प्रतिबंधित हैं, जैसा कि इस मामले से परिचित दो लोगों ने बताया। अधिकारियों के इस दल में वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक और विश्व कप पर व्हाइट हाउस टास्क फ़ोर्स के कार्यकारी निदेशक एंड्रयू गिउलियानी भी शामिल थे।
ज़ाहिर है कि बेल्जियम और विश्व की अन्य टीमों को यह कारगुज़ारी नागवार गुज़री। अपील भी की गई, मगर बेल्जियम की टीम ने तय कर लिया कि वे इस कथित षड़यंत्र का जवाब अपने खेल से देंगे। उन्होंने अमेरिका की टीम को 4-1 से शिकस्त दे दी। मैच के बाद बेल्जियम के खिलाड़ियों ने ‘ट्रंप डांस’ करके डॉनल्ड ट्रंप का वैश्विक स्तर पर मज़ाक उड़ाया।
डॉनल्ड ट्रंप हर बात का सेहरा अपने सिर बाँधने के लिए आतुर रहते हैं। इस मामले में भी उन्होंने स्वयं ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए डींग मारी कि यह कारनामा उन्होंने ही कर दिखाया है। इसलिए किसी को यह जासूसी करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि ऐसा हुआ भी था या नहीं।
एक मानवाधिकार समूह ने जियानी इन्फ़ैंटीनो की शिकायत ओलंपिक नैतिकता जाँचकर्ता से की है, जिसमें राजनीतिक तटस्थता का मुद्दा उठाया गया है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक आंदोलन खेल निकायों के लिए, जिनमें फ़ीफ़ा भी शामिल है, राजनीतिक तटस्थता को खेल के मूलभूत सिद्धांतों में मान्यता देता है।
अभी यह विवाद थमा भी नहीं था कि अर्जेंटीना और मिस्र के बीच अंतिम-16 चरण के मैच में एक और विवाद खड़ा हो गया। इस विवाद के चलते फ़्रांसीसी रेफ़री फ़्राँस्वा लेटेक्सियर पर पक्षपात के आरोप लगाए जा रहे हैं। अर्जेंटीना के हाथों विवादास्पद हार के बाद मिस्र ने फ़ीफ़ा में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराकर रेफ़री को विश्व कप से “बाहर करने” की माँग की है। मिस्र के कोच होसाम हसन ने संकेत दिया कि फ़ीफ़ा ने अर्जेंटीना के प्रति पक्षपात दिखाया है। उन्होंने कहा, “शायद वे विश्व चैंपियन को प्रतियोगिता में बनाए रखना चाहते थे।”
मौजूदा चैंपियन अर्जेंटीना ने अंतिम-16 में चमत्कारिक वापसी करते हुए 2-0 से पिछड़ने के बाद 3-2 से जीत हासिल की। अर्जेंटीना का एक गोल विवादास्पद ढंग से रद्द कर दिया गया था और एंज़ो फ़र्नांडीज़ के विजयी गोल से पहले कथित फ़ाउल को लेकर मिस्र ने जमकर विरोध जताया। मिस्र के 1-0 से आगे होने पर मुस्तफ़ा ज़िको का गोल भी अमान्य कर दिया गया, जबकि मोहम्मद सलाह ने पेनल्टी की माँग की थी। इसके बाद मैच ने नाटकीय मोड़ लिया और स्टॉपेज टाइम में एंज़ो फ़र्नांडीज़ ने हेडर से विजयी गोल दाग दिया।
जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है, बेईमानी, भ्रष्टाचार और पक्षपात भी बाक़ायदा सिर उठाने लगे हैं। खेलों से खेल-भावना कहीं ग़ायब होती जा रही है। किसी भी कीमत पर जीतने की चाहत, तथा कमज़ोर टीमों की तुलना में स्थापित टीमों और खिलाड़ियों को अनुचित संरक्षण देने की प्रवृत्ति साफ़ दिखाई देती है। खेलों की सेहत के लिए बेहतर होगा कि ट्रंप जैसे लोग इससे दूर ही रहें। खेल को खेल की तरह ही खेला जाए… वरना फ़ीफ़ा की किरकिरी तो होगी ही, ट्रंप की भी फ़ी…फ़ा हो जाएगी…!

बड़े ही शर्म की बात है राष्ट्रपति कहलाने के लायक ही नहीं है पहली दूसरी के बच्चे जैसे लड़ते थे ऐसी बातें करते हैं!
आभार भाग्यम जी
जब से विभिन्न खेलों में मोटी रकमों की भागीदारी होने लगी हैं, बेइमानी, भ्रष्टाचार और पक्षपात का बोलबाला होने लगा है। खेलों से खेल भावना लुप्त प्राय होने लगी है।
1962 के बाद पहली बार रेड कार्ड प्राप्त निलंबन का सामना करते किसी खिलाड़ी को खेलने की अनुमति प्रदान की गई जो खेल भावना की धज्जियां उड़ाती प्रतीत होती है।
आदरणीय तेजेन्द्र जी का यह विचारोत्तेजक संपादकीय खेलों के वर्तमान त्रासद परिदृश्य का खाका खींचने में सफल रहा है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
हार्दिक धन्यवाद रेणु जी। खेलों में से खेल भावना सच में ग़ायब होती जा रही है।
‘ट्रंप के लाल कार्ड की फीफा’… संपादकीय अपने अनियमित आचरण के कारण दुनिया भर में सुर्खियां बटोरने वाले डोनाल्ड ट्रम्प और फीफा फुटबॉल विश्व कप पर केंद्रित है। इस विश्व कप में भी ट्रम्प महोदय कारनामा किए बिना न रह सके। फीफा विश्वकप फुटबॉल में भी उन्होंने एक गोल मार ही दिया। उन्होंने गोल किया तो… पर वह सेल्फ गोल कर बैठे।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके लिए गोल महत्वपूर्ण है , दुनिया कहे तो कहे, उनकी बला से। वे न तो किसी नियम को मानते हैं और न उन्हें किसी आलोचना, समालोचना की परवाह है। एकदम मस्तमौला आदमी तरह।
आपने उनके व्यक्तित्व को सही रेखांकित किया है कि दुनिया में ऐसा व्यक्तित्व ‘भूतो न भविष्यति'(विश्व कप फुटबॉल के संदर्भ में भी)। उन्होंने अमेरिका सहित पूरी दुनिया की नाक में दम करके रख दिया है।
ट्रंप साहब को लगता है कि वे जो सोच रहे हैं और जो कर रहे हैं, वही सही है। उनके इस चमत्कारिक कांफिडेंस पर लोग आगे चलकर पीएचडी लिखेंगे।
ये सच है कि जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है तब से भ्रष्टाचार, बेईमानी और पक्षपात खुलकर सामने आने लगा है। ताकत और दबदबे से किसी भी तरह के, किसी भी संस्था के नियमों को तोड़ना उसके अंत की शुरुआत हो जाती है।
फीफा जैसी खेल संस्था के नियमों में हस्तक्षेप करके उन्होंने उस संस्था का बड़ा नुक़सान कर दिया है।
हो सकता है कि अगले फुटबॉल विश्वकप में इसे सुधार लिया जाए। फिर भी दाग तो लग ही गया है। यह दाग पीढ़ियों तक छुटाए न छूटेगा।
विश्वकप में जैसा हुआ सो हुआ। डर तो इस बात का लग रहा है कि कहीं वे विश्व को किसी युद्ध में न उलझा दें। क्योंकि उसकी भरपाई विश्व को बहुत भारी पड़ जाएगी।
अब तो आशा ही कर सकते हैं कि उन्हें सद्बुद्धि आ जाए, ताकि अमेरिका सहित पूरा विश्व उनकी जिद का शिकार न बने।
वैसे माननीय डोनाल्ड ट्रम्प महोदय जी मेरे प्रिय विषयों में से एक थे। लेकिन उनके कार्य ऐसे हो गए कि अब हमारी लेखनी उनके स्तर तक पहुंच ही नहीं पा रही है। सुबह कुछ…शाम को कुछ… फिर कुछ..कुछ …कुछ ….की निरंतरता कलम को स्थिर नहीं रहने देती हैं।
संपादकीय विषय को आपने बहुत मजबूती के साथ पाठकों के समक्ष रखा हैं। कहीं कोई चीज छूटी नहीं है। इस संपादकीय का अंदाज बड़ा लुभावना लगा मुझे।
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी इस संपादकीय में संतुलन बनाए रखने के लिए मुझे भी फ़ुटबॉली करतब दिखाने पड़े।
इस बार सम्पादकीय के माध्यम से आपने खेलों में होने वाली धाँधलियों को उजागर किया है, जो चिंता का विषय है। इतने ऊँचे पद पर बैठे नौटंकीबाज़ डोनाल्ड ट्रंप ने फ़ीफ़ा फ़ुटबॉल खेल के नियमों में हस्तक्षेप करके अपनी जगहँसाई तो करवाई ही है, खेल संस्था को भी हानि पहुँचाई है। ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि प्रदान करें अन्यथा विश्व युद्ध की सम्भावना को नहीं नकारा जा सकता।
आपके सम्पादकीय से विश्व भर की विश्वसनीय जानकारी मिलती है। भूतों न भविष्यति का तो पता नहीं पर वर्तमान में आपका कोई सानी नहीं।साधुवाद
सुदर्शन जी आपने लिखा है कि – “आपके संपादकीय से विश्व भर की विश्वसनीय जानकारी मिलती है।” हमारा प्रयास रहता है कि हर बार किसी नये विषय को आपके अनुभव क्षेत्र में लाया जा सके।
सादर नमस्कार सर….
बहुत ही उत्कृष्ट व्यंगात्मक शैली में सत्य का उजागर करते हुए इस संपादकीय को रोचक बनाया है आपने… वास्तवमें ट्रम्प एलियन की तरह काम करते हैं…. और सबको लिए निडर होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं… जो जब मन में आए कर डालो… कल रहें न रहें………
खेल में वैसे भी छोटे बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार तो कबसे आ ही चुका है…. सम्मान की चिंता क्यों करें…
साधुवाद सर
आदरणीय अनिमा जी, आपकी सार्थक टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। आपको व्यंग्यात्मक शैली पसंद आई, इसके लिए विशेष धन्यवाद।
खेल भी अब सियासत वाले निजामी हो गए हैं।ठीक डोनाल्ड ट्रंप की फितरत की मानिंद!? आख़िर अमेरिका को महान बनाना है!?!? युद्ध में न सही ,,,खेलों में ही सही।भारतीय फिल्म अभिनेता राजकुमार की संवाद अदायगी की नज़ीर पेश कर संपादक ने व्यंग्य या तंज का तड़का सही लगाया है।
पड़ोस में सेनाध्यक्ष तो मोगली कहानी में वर्णित शेरखान यानी ट्रंप के तबाकी यानी सियार यार तो हैं ही। शक्ति के उन्माद में खब्तीपन की सीमा तक उड़े ट्रंप कहाँ जाकर ट्रंप होंगे ईरान में या चीन में ईश्वर जानें।
बढ़िया मनोरंजक पर विश्व व्यवस्था को सावधान करता बोल्ड संपादकीय।
भाई सूर्यकांत जी, आपने ट्रंप के सही बखिये उधेड़े हैं…
आदरणीय तेजेन्द्र जी।
ट्रंप पर लिखा गया आपका संपादकीय
उनके एक और हास्यास्पद कर्मों की गिनती बढ़ा गया और पद की गरिमा के प्रतिकूल आचरण को व्यक्त कर गया।
वैसे तो आज से नहीं, एक लंबा वक्त हो गया कि हर खेल बिक रहा है, जिसमें पैसे की बरसात है। और उस पर सट्टा अलग से लगता है। कई बार यह भी सुना कि मैच फिक्स है, किसको हारना और किसको जीतना है। खेल-भावना का अस्तित्व ही तब है जब भावना हो । जब भावनाएँ ही बिक जाती हैं तो खेल,नियम और निर्णय अर्थहीन हो जाते हैं।
यह नया दौर है। बेईमानी,भ्रष्टाचार, स्वार्थ ,और पक्षपात का दौर। सच्चाई और अच्छाई वाले गुण कोयले की खदान में हीरे की तरह तलाश करने की तरह
है।
अनुचित संरक्षण के समय ईमानदारी तो खिलाड़ी भी दिखा सकते हैं पर स्वार्थ सबके सिर पर हावी है।
ट्रंप को समझाना बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की तरह है। एक भी सेहरा सर पर फिट नहीं बैठ रहा इसी चक्कर में सेहरे की दीवानगी बढ़ी हुई है।
इस बात पर संपादकीय से सहमति बनती है और यह बात सौ प्रतिशत सही भी है कि खेल को खेल भावना से ही खेला जाना चाहिये, फिर चाहे वह कोई सा भी, कितना ही महत्वपूर्ण खेल , खिलाड़ी और टीम हो।
फ़ीफ़ा चलता रहे।
ट्रंप का कोई कुछ इलाज कर सके ऐसा काश हो सके। उसकी फ़ी…फ़ा न जाने कब हो!
अमेरिका ईरान युद्ध समाप्ति की घोषणा 28 बार भी और 29वीं बार युद्ध शुरू करने का रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज रहेगा ट्रंप के नाम।आने वाली पीढ़ी को याद रहेगा की ऐसा भी मूर्ख और कार्टून शासक अमेरिका के नाम है।
आपने ट्रंप के लिये ‘खलनायक’ शब्द बहुत सही प्रयोग किया। यह उनके चरित्र की विशेषता है। वैसे टाँग अड़ाने की कला में ट्रंप पहले से ही माहिर हैं। फिर फ़ीफा तो टांगों का ही खेल हैं तो उपस्थिति दर्ज करना तो जरूरी ही था, कारण चाहे जो हो ।दावे करना व टाँग अड़ाना उनके फितरत में है।
खेल भावना के महत्व को दर्शाता बेहतरीन संपादकीय।
ट्रंप जैसी शख्सियत पर आपके बेबाक संपादकीय के लिये आपके हौसले को सलाम
आदरणीय नीलिमा जी, आपने बहुत सलीके से ट्रंप की शख़स्यित को उधेड़ा है… मन प्रसन्न हुआ।
फीफा में जिस तरह से सारे वाकये को आपने स्पष्ट किया है साथ ही अन्य विश्वस्तरीय खेलों में होने वाले तथाकथित भ्रष्टाचार को उजागर किया है वह एक जागरूक संपादक की गहन और निर्भीक दृष्टि को व्यक्त करता है।
आपका संपादकीय कई स्तरों पर होने वाले कारनामों की पोल खोल देता है। धन्यवाद
प्रिय पद्मा, आपने लिखा है – आपका संपादकीय कई स्तरों पर होने वाले कारनामों की पोल खोल देता है। – दरअसल मेरा प्रयास रहता है कि सच आप सबके सामने रख दूं। यदि उसके माध्यम से पोल खुल जाती है तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाता है।
समीक्षात्मक टिप्पणी
— डॉ. प्रीति समकित सुराना
तेजेंद्र शर्मा जी का यह संपादकीय केवल डॉनल्ड ट्रंप की कार्यशैली पर व्यंग्य नहीं है, बल्कि खेलों की बदलती आत्मा पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। लेखक ने एक कथित घटना के माध्यम से यह रेखांकित करने का प्रयास किया है कि जब राजनीति, सत्ता और प्रभाव खेलों के निष्पक्ष मैदान में प्रवेश कर जाते हैं, तब खेल-भावना सबसे पहले घायल होती है।
लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यंग्यात्मक भाषा है। तीखे कटाक्ष, चुटीले वाक्य और प्रवाहपूर्ण शैली पाठक को अंत तक बाँधे रखते हैं। शीर्षक से लेकर अंतिम पंक्ति तक लेखक का व्यंग्य कहीं भी बोझिल नहीं होता, बल्कि विचारोत्तेजक बनकर उभरता है। विशेष रूप से “फ़ीफ़ा की किरकिरी” और “ट्रंप की फ़ी…फ़ा” जैसे शब्द-प्रयोग संपादकीय को प्रभावशाली बनाते हैं।
संपादकीय का मूल संदेश केवल एक व्यक्ति की आलोचना नहीं, बल्कि उस मानसिकता का विरोध है जिसमें प्रभाव और शक्ति को नियमों से ऊपर मान लिया जाता है। खेल की गरिमा निष्पक्षता, समान अवसर और खेल-भावना में निहित है। यदि निर्णय योग्यता के स्थान पर राजनीतिक दबाव से प्रभावित होने लगें, तो खेल प्रतियोगिता नहीं, प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाएगा।
लेख पढ़ते हुए यह भी अनुभव होता है कि लेखक खेल जगत में बढ़ते व्यावसायीकरण, पक्षपात और सत्ता के हस्तक्षेप को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं। आज जब खेल वैश्विक उद्योग का स्वरूप ले चुके हैं, तब निष्पक्ष संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।
हाँ, एक पाठक के रूप में इतना अवश्य कहना चाहूँगी कि ऐसे विषयों में तथ्यात्मक आधार और अधिक स्पष्ट एवं पुष्ट हो तो लेख की विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों और सुदृढ़ हो जाते हैं। व्यंग्य की धार तब और प्रभावी बनती है जब उसके साथ तथ्य निर्विवाद रूप से खड़े हों।
समग्रतः यह संपादकीय केवल एक समसामयिक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि खेल, सत्ता और नैतिकता के त्रिकोण पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है। विचारोत्तेजक शैली, सशक्त भाषा और तीखे व्यंग्य के कारण यह पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए भी विवश करता है।
— डॉ. प्रीति समकित सुराना
प्रीति जी आपने पहले ही वाक्य में कहा है कि – तेजेंद्र शर्मा जी का यह संपादकीय केवल डॉनल्ड ट्रंप की कार्यशैली पर व्यंग्य नहीं है, बल्कि खेलों की बदलती आत्मा पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। लेखक ने एक कथित घटना के माध्यम से यह रेखांकित करने का प्रयास किया है कि जब राजनीति, सत्ता और प्रभाव खेलों के निष्पक्ष मैदान में प्रवेश कर जाते हैं, तब खेल-भावना सबसे पहले घायल होती है। – आपकी टिप्पणी पूरे मामले को समझने के लिये एक नई दृष्टि प्रदान करती है।
खेलों के भ्रष्टाचार और पक्षपात पक्षपात पर आपकी सजग दृष्टि ने पुन: संपादकीय को, सम सामयिक, महत्वपूर्ण, पठनीय और विचारणीय बनाया है।.विविथ दृष्टिकोण से अच्छन विश्लेषण।
अब एक पुस्तक में संजो लें।
प्रिय अनिता, अपनी बात शीर्षक से पुरवाई के संपादकीयों की 5 पुस्तकें अद्विक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हो चुकी हैं। छटी प्रकाशन की प्रक्रिया में है।
ट्रंप के अजीबोगरीब कारनामों की खबरें प्राय मिलती रहती हैं। सही कहा आपने हर देश के मामलों में टांग अड़ाने की उनकी आदत है। विश्व में कोई भी युद्ध हो स्वघोषित मध्यस्थता के लिए वह तत्पर दिखाइ देते हैं। वह यहीं नहीं रुकते देशों के आंतरिक मामलों में भी दखल देते हैं। यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि सन् 1962 के बाद पहली बार फ़ीफ़ा ने ऐसे खिलाड़ी को मैच में खेलने की अनुमति दी है, जिसे विश्व कप में रेड कार्ड मिलने के बाद निष्कासित कर दिया गया था। इसका श्रेय भी ट्रंप को ही जाता है किंतु जिस खेल को जीतने के लिए ट्रंप ने अवैध तरीका अपनाया, उसी में वह मैच हार गए; यह एक और शर्मनाक बात है। आपने मिस्र और अर्जेंटीना के बीच होने वाले मैच के द्वारा यह दिखाया कि फ़ीफ़ा ताकतवर देशों के प्रति पक्षपात करता है।
आपका आकलन है, जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है बेईमानी भ्रष्टाचार और पक्षपात भी बाकायदा सर उठाने लगे हैं। कमजोर टीमों की तुलना में स्थापित टीमों के खिलाड़ियों को अनुचित संरक्षण देने की प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है। यह निंदनीय है। खेल को खेल ही रहने देना चाहिए, उसे अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
आदरणीय विद्या जी, आपने लिखा है कि – आपका आकलन है, जब से खेलों में पैसा बरसने लगा है बेईमानी भ्रष्टाचार और पक्षपात भी बाकायदा सर उठाने लगे हैं। कमजोर टीमों की तुलना में स्थापित टीमों के खिलाड़ियों को अनुचित संरक्षण देने की प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है। यह निंदनीय है। – अब विश्व में खेल को भी युद्ध की तरह संचालित किया जा रहा है।
ट्रंप का विचित्र और विचलित चरित्र वैश्विक स्तर पर निरंतर उपहास का पात्र बना हुआ है। अपने हस्तक्षेप स्वभाव और उपद्रवी मानसिकता के चलते वह दूर दराज के दूसरे देशों के आंतरिक मामलों को खेल का मैदान समझ वहाँ अपनी तूती बजाने के लिए कूद पड़ते हैं और किसी खेल के मैदान को रणभूमि ही समझ वहाँ अपना डंका।
बिमल भाई… मज़ा आ गया…
हर जगह जोकर मिल जाते हैं जो कुछ उल्टे सीधे काम न करें तो तमगा कहाँ जाएगा?
सही कहा आपने प्रणव जी।
ट्रम्प की लाल कार्ड की फीफा…संपादकीय में आपने ट्रम्प के अनिश्चित तथा अड़ियल व्यवहार के साथ हर बात में टांग अड़ाने पर की प्रवृति पर इंगित करते हुए ठीक ही कहा है कि खेल जगत में ऐसा करने पर खिलाड़ियों के मनोबल पर प्रभाव पर पड़ेगा जो किसी प्रकार उचित नहीं है।
समसामयिक विषय पर लेखनी चलाने के लिए साधुवाद।
हार्दिक धन्यवाद सुधा जी।
जितेन्द्र भाई: आपके सम्पादकीय से साफ़ ज़ाहिर है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने, अपने ही हाथों से, ट्रंप का पुतला बहुत फ़ुर्सत से बनाया होगा। बात यहीं समाप्त नहीं हुई होगी; धर्ती पर कभी और ऐसा मानस जन्म न ले, इसलिए पुतले में जान ड़ालने के बाद स्वयं, अपने ही हाथों से, उस सांचे को भी तोड़ दिया होगा। ब्रह्मा जी ने यह नया प्रयोग क्यों किया इसका जवाब तो वो ही दे सकते हैं। इस प्रश्न के उत्तर के लिए ब्रह्मा जी तक हमारी पहुंच तो नहीं है लेकिन उस के आंजाम आंखों के सामने अवश्य हैं।
अमरीका और बैल्जियम के फ़ुटबाल मैच के शुरू होने से पहले ट्रंप ने फ़ीफ़ा के अध्यक्ष जियानी इन्फ़ैंटिनो को अमरीकी सॉकर टीम के ख़िलाड़ी फ़ौलरन बालोगुन को पहले मैच में मिले रैड कार्ड को रद्द करने को कहा और जियानी नें बिना कोई विरोध किए बड़े साहब के हुकम की तामील की। इस फ़ैसले को बैल्जियम और विश्व की अन्य टीमों ने केवल नागवार करार ही नहीं किय़ा बल्कि अपने बल बूते पर अमरीकी टीम को 4-1गोलों से शिकस्त देकर साबित कर दिया कि आमतौर पर नागवार सिफ़ारिश काम नहीं आती।। मुझे पूरी उमीद हे कि मैच के बाद बैल्जियम के ख़िलाड़ियों ने जो “ट्रंप डांस”करके ट्रंप का मज़ाक उड़ाया, उस से शायद मॉडर्न डांस के चाहने वालों को एक और नया ठुमका लगाने का राज़ मिल गया होगा।
हर बात का सेहरा अपने सिर बांधने की बात जब छिड़ी तो कहीं यह attention deficit syndrome के लक्षण तो नहीं हैं। आजकल के मौजूदा हालात को देखते हुए यह तो एक never ending topic है। आज तो आपने फ़ीफ़ा को लेकर बात छेड़ी है। हो सकता है, इसी टौपिक को लेकर, कल कोई और मज़मून लिखने का मौका मिले।
विजय भाई आपने मज़े लेते हुए टिप्पणी लिखी है। एक एक शब्द व्यंग्य रस से भरपूर है।
जितेन्द्र भाई: आपके इतने बढ़िया उत्तर को पढ़कर अचानक यह लफ़्ज़ मुँह से निकल पड़े: ——–मेरा सजदा अदा हो गया