- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
अर्चना पैन्यूली का उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ समकालीन हिंदी गद्य के उस रूखे और यांत्रिक दौर में एक ऐसी शीतल जलधारा की तरह फूटती है, जहाँ स्मृतियों के शैल-शिखर केवल अकादमिक विमर्श का विषय बनकर रह गए हैं। लेखिका ने डेनमार्क की सुदूर और बर्फीली वादियों में प्रवास में रहते हुए भी अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू को जिस तरह शब्दों में सहेजा गया है, वह ‘चिराग तले अँधेरा’ वाली कहावत को पूरी तरह झुठला देता है। सात समंदर पार रहकर भी अपनी संस्कृति का अलख जगाए रखना वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण और सराहनीय कार्य है। यह कृति एक साथ स्मृति-आख्यान, जीवनी और सामाजिक इतिहास का ऐसा अनुपम त्रिवेणी संगम है, जिसमें पाठक केवल काले अक्षरों को पढ़ता नहीं है, बल्कि उस बीते हुए कालखंड की धड़कनों और पहाड़ी ढलानों की पुकार को साक्षात अपने भीतर अनुभव करता है। अर्चना जी ने ‘अलकनंदा सुत’ के माध्यम से साधारण के भीतर छिपी उस असाधारणता को उद्घाटित किया है, जो अक्सर इतिहास के भारी-भरकम पन्नों के बीच कहीं दबकर रह जाती है।
इस पुस्तक का शिल्प विधान अत्यंत सुगठित और कलात्मक है, जो पाठक को पहले ही पृष्ठ से अपनी ओर खींच लेता है। अर्चना पैन्यूली ने एक मंझे हुए शिल्पकार की तरह कथा का ढांचा तैयार किया है, जहाँ कालक्रम की सीधी रेखा के बजाय स्मृतियों के बिखरे हुए सूत्रों को एक साथ पिरोया गया है। पुस्तक का नाटकीय आरंभ ही उस विरोधाभासी मानवीय मनःस्थिति को नग्न कर देता है, जहाँ एक ओर जीवन का ‘स्वर्ण जयंती’ वर्ष मनाया जा रहा है और दूसरी ओर एक नवजात कन्या का अत्यंत संघर्षपूर्ण और अनिश्चित आगमन होता है। वाराणसी के कबीरचौरा अस्पताल का वह दृश्य, जहाँ एक तरफ उत्सवधर्मी माहौल है और दूसरी तरफ एक नन्ही जान के अस्तित्व का संकट, लेखिका के कथा-कौशल का प्रमाण है। यहाँ लेखिका ने ‘फ्लैशबैक’ और ‘क्रॉस-कटिंग’ जैसी सिनेमाई तकनीकों का जो भाषाई उपयोग किया है, वह हिंदी गद्य में एक नवीन प्रयोग की तरह दिखाई देता है। यह शिल्प केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह उस कालखंड के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तनावों को व्यक्त करने का एक सशक्त औज़ार भी बन गया है। इस नाटकीयता के पीछे छिपा यथार्थवाद पाठक को झकझोरता है और उसे सोचने पर विवश करता है कि जीवन की खुशियाँ और त्रासदियाँ कैसे एक ही परिवार में साथ-साथ साँस लेती हैं।
कृति की भाषा और बिम्ब-विधान पर दृष्टि डालें तो इसमें वह ‘पहाड़ी खनक’ और ‘मैदानी स्पष्टता’ का अद्भुत समन्वय मिलता है, जो समकालीन साहित्य में दुर्लभ है। लेखिका ने उत्तराखंड के ‘सेवल’ गाँव की उन ऊँची ढलानों, बाँज-बुरांश के जंगलों और अलकनंदा के शोर को जिस सूक्ष्मता से चित्रित किया है, वह शब्दों के माध्यम से एक जीवंत दृश्य-बिम्ब निर्मित करता है। जब वह पहाड़ की कठोर जीवनचर्या का वर्णन करती हैं, तो पाठक के कानों में पत्थरों की रगड़ और घाटियों में गूँजती हवाओं का स्वर स्पष्ट सुनाई देने लगता है। उनकी भाषा में लोक-मुहावरों और आंचलिक शब्दावली का ऐसा सटीक प्रयोग हुआ है कि वह कृत्रिम न लगकर मिट्टी की उपज लगती है।
“लड़की हुई है” की खबर पर पिता का मुँह लटक जाना – यह केवल एक वाक्य नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की उस पितृसत्तात्मक ग्रंथि का एक कड़वा बिम्ब है, जिसे लेखिका ने बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। अर्चना जी की गद्य शैली में एक ऐसी अंतर्धारा बहती है जो केवल अपनी मिट्टी से अगाध प्रेम करने वाले रचनाकार के पास ही संभव हो सकती है। उनकी भाषा कहीं ठिठकती नहीं, बल्कि अलकनंदा की तरह प्रवाहमान रहती है, जिसमें स्मृति की लहरें बार-बार पाठक के हृदय को भिगोती रहती हैं।
शिवानन्द का चरित्र अपनी जड़ों से अटूट जुड़ाव और भविष्य की असीम उड़ान के बीच के एक जीवंत और दुर्दम्य सेतु की तरह उभरता है। “मैं अपने गाँव का पहला दसवीं पास और पहला बी.ए. हूँ”, यह आत्मविश्वास से भरा वाक्य मात्र एक व्यक्तिगत उपलब्धि का बखान नहीं है, बल्कि एक पूरे अंचल की शिक्षा के प्रति छटपटाहट और संघर्ष का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। लेखिका ने शिवानन्द को किसी ‘पूज्य देवता’ या ‘आदर्श नायक’ की तरह पेश न करके एक हाड़-मांस के मनुष्य के रूप में गढ़ा है, जिसकी अपनी सीमाएं हैं, अपना क्रोध है और अपना अहम् भी है। देहरादून में अपनी कोठी बनाना और पहाड़ों की सीमाओं से बाहर निकलकर शहरी व्यवस्था में खुद को स्थापित करना एक ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ वाली चुनौती को स्वीकार करने जैसा साहसिक कृत्य था। शिवानन्द का संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई भी है, जहाँ वह अपनी पहाड़ी पहचान को खोए बिना आधुनिक दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहता है। उनका यह व्यक्तित्व आज के उस युवा वर्ग के लिए एक प्रेरक मिसाल है, जो अपनी जड़ों को आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं।
विशिष्टता के साथ-साथ यदि हम इस कृति के मनोवैज्ञानिक धरातल का विश्लेषण करें, तो यहाँ पिता और पुत्र के बीच का अनकहा संवाद, सात पत्र इस पुस्तक की आत्मा है। नायक शिवानंद के बच्चों ने अपने पिता को एक पात्र की तरह देखने का जोखिम उठाया है। बेटा अभय लिखता है : “पिता जी के मन की थाह कौन ले सकता है?”, और यही जिज्ञासा उन्हें पिता के व्यक्तित्व की उन परतों तक ले जाती है जहाँ अक्सर पहुँचना कठिन होता है। प्रसव के समय पिता का व्यवहार और परिवार में पुत्र की चाहत के प्रति उनका आग्रह, उनके चरित्र के उस ‘ग्रे शेड’ को उजागर करता है जिसे अक्सर जीवनी लेखक छिपा लेते हैं। यहाँ लेखिका ‘गाँठ का पूरा और आँख का अंधा’ वाली स्थिति के बजाय एक यथार्थपरक चित्रण करती हैं। यह मनोवैज्ञानिक गहराई ही इस पुस्तक को एक साधारण संस्मरण से ऊपर उठाकर एक गम्भीर साहित्यिक कृति का दर्जा देती है। घर के माहौल में एक तरफ ‘गहरी नींद’ में सोई बीमार नवजात बहन और दूसरी तरफ रसोई में काम करती बड़ी बहन गौरी का सूक्ष्म चित्रण, मध्यवर्गीय परिवार के उस कड़वे यथार्थ को दर्शाता है जहाँ पुरुष के अहम् और स्त्रियों के मौन संघर्ष के बीच एक पूरा जीवन बीत जाता है।
परंतु उपन्यास के विशाल कलेवर में कुछ स्थलों पर विवरणात्मकता का अतिरेक मुख्य कथा-प्रवाह को बाधित करता है। लगभग 280 पृष्ठों के विस्तार में कई अध्यायों में घटनाओं और भावों की समान प्रवृत्ति पाठक के धैर्य की परीक्षा लेती है। लेखिका का स्मृति और अतीत के प्रति गहरा अनुराग कहीं-कहीं इतना प्रभावी हो उठता है कि वह रचनात्मक वस्तुनिष्ठता को सीमित कर देता है।
कुछ स्थानों पर सूक्ष्म विवरणों की अधिकता कथा के मुख्य तंतु को शिथिल कर देती है। यदि संपादन अधिक निर्मम और चुस्त होता, तो कृति की मारक क्षमता, प्रभावशीलता और सघनता बढ़ सकती थी। विवरणात्मक विस्तार कई बार मुख्य चरित्र के मनोवैज्ञानिक अन्वेषण को पृष्ठभूमि में ढकेल देता है, जिससे पाठक पात्र की आंतरिक उथल-पुथल से पूर्ण तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता।
इस कृति का एक और पक्ष जो ध्यातव्य है, वह है तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिवेश की सापेक्षता। यद्यपि लेखिका ने शिवानन्द के माध्यम से एक पूरे युग को पकड़ने की कोशिश की है, लेकिन उस कालखंड की वृहत्तर ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश उतना प्रखर होकर नहीं उभरा है जितना कि पारिवारिक परिवेश। इतने उत्कृष्ट चरित्र चित्रण के बावजूद भी कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ों का ज़िक्र लेखिका ने बहुत ही सरसरी तौर पर किया है। उदाहरण के तौर पर, 1940 के दशक का वह संक्रमण काल जब पूरा देश बदलाव की दहलीज पर था, शिवानन्द के मानसिक अंतर्द्वंद्व में उस बाहरी हलचल का प्रतिबिंब और अधिक सघन होना चाहिए था।
लेखिका की गद्य शैली में जो ‘पहाड़ी लहजा’ है, वह प्रशंसनीय तो है, लेकिन कहीं-कहीं वह तत्सम शब्दावली के साथ टकराता हुआ भी प्रतीत होता है। जहाँ एक तरफ आंचलिकता का सौंदर्य है, वहीं दूसरी ओर कुछ आधुनिक शब्दों का प्रयोग उस ऐतिहासिक वातावरण के साथ पूर्णतः ‘बेमेल’ और कृत्रिम लगता है। 1940 के परिवेश का वर्णन करते समय आधुनिक विमर्श की शब्दावली का उपयोग करना पाठक को उस कालखंड से काटकर वर्तमान में खींच लाता है, जिससे ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर सवाल उठ सकते हैं।
इन कमियों के बावजूद, ‘अलकनंदा सुत’ का ऐतिहासिक महत्व इस बात में निहित है कि यह उस पहाड़ी समाज का दस्तावेज़ है जो आज तेज़ी से विलुप्त होता जा रहा है। अर्चना पैन्यूली ने इस उपन्यास के माध्यम से उस पीढ़ी को एक भावभीनी श्रद्धांजलि दी है, जिसने ऊँचाइयों को छूने से पहले घाटियों के अँधेरों से जूझना सीखा था। शिवानन्द का गाँव से निकलना केवल भौतिक पलायन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता के विस्तार का प्रतीक है। लेखिका ने वाराणसी से लेकर पहाड़ी गाँव, देहरादून और फिर विदेश तक के भूगोल को जिस तरह एक सूत्र में पिरोया है, वह उनकी व्यापक दृष्टि को दर्शाता है। उनकी भाषा में ऐसा ताप है जो पाठक के हृदय को पिघला देता है और ऐसा प्रकाश भी, जो उसे अतीत के गौरव से साक्षात्कार कराता है।
यह पुस्तक प्रवासी साहित्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल विरह की कथा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से शक्ति लेकर नए संसार के निर्माण की कहानी है। ऐसी कथाएँ केवल लिखी नहीं जातीं, बल्कि स्मृतियों की आँच पर तपकर कुंदन की तरह निखरती हैं।
‘अलकनंदा सुत’ की रचना प्रक्रिया स्वयं में एक गाथा है। लेखिका ने पुत्र अभय के माध्यम से मनुष्य के ‘नर्वस’ क्षणों को रचनात्मक ऊर्जा में रूपांतरित किया है। जब वह अपने ‘ऑफिसनुमा कमरे’ में बैठकर टाइपराइटर की खटखट के साथ अतीत से संवाद करता है, तब लेखिका एक ऐसे युगद्रष्टा की तरह दिखाई देती हैं जो समय के कठोर प्रहारों पर शब्दों का मरहम रख रही हों। यह कृति हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का मार्ग भी दिखाती है। शिवानन्द का व्यक्तित्व यह सिखाता है कि प्रगति का अर्थ अपनी संस्कृति का त्याग नहीं, बल्कि उसे सहेजते हुए नई चुनौतियों का सामना करना है।
अर्चना पैन्यूली ने जिस ईमानदारी से पिता शिवानन्द के गुणों और दोषों का चित्रण किया है, वह उल्लेखनीय है। यह पुस्तक न केवल उत्तराखंडियों के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा बनेगी जो अपनी पहचान की तलाश में भटक रहा है। इस दृष्टि से ‘अलकनंदा सुत’ हिंदी साहित्य के विशाल सागर में एक ऐसी अनमोल मणि है जिसकी चमक समय के साथ और भी प्रखर होती जाएगी।
लेखिका ने इस कृति में कालक्रमानुसार विवरण देने के बजाय स्मृतियों के प्रवाह को अपनाया है, जो उनके रचनात्मक साहस का परिचायक है। 30 अध्यायों में विस्तृत यह कथानक एक लंबी पहाड़ी पगडंडी की तरह है, जहाँ हर मोड़ पर नया अनुभव और नया संघर्ष सामने आता है। “भाग्य अपना निर्णय सुनाएगा” – यह वाक्य पूरी पुस्तक में एक रहस्यमय संगीत की तरह गूँजता रहता है। छोटी बहन के जीवन-मरण संघर्ष को पिता के पचासवें जन्मदिन से जोड़ने का प्रसंग जीवन के गहरे सत्य और उसकी विडंबना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।
शिवानन्द का व्यक्तित्व केवल एक व्यक्ति का चित्रण नहीं, बल्कि पहाड़ी अस्मिता का बिंब है। लेखिका ने पहाड़ को मात्र पृष्ठभूमि नहीं बनाया, बल्कि एक जीवित पात्र की तरह प्रस्तुत किया है – कठोर भी और ममतामयी भी। पहाड़ की पगडंडियों से गुजरती शिवानन्द की यात्रा दरअसल एक सभ्यता के आधुनिकता की ओर प्रस्थान का रूपक बन जाती है।
कृति में प्रतीकात्मकता भी उल्लेखनीय है। टाइपराइटर की ‘खटखट’ केवल ध्वनि नहीं, बल्कि अभय के मन की बेचैनी और पिता के अनकहे इतिहास को शब्द देने की छटपटाहट का प्रतीक है। देहरादून में कोठी का निर्माण उपलब्धि का बिंब बनता है, वहीं गाँव की धूल भरी गलियों का मोह एक स्थायी टीस की तरह बना रहता है।
शिवानन्द के चरित्र में उपस्थित अंतर्द्वंद्व – एक ओर जातीय गौरव और दूसरी ओर संकीर्ण सामाजिक संस्कार – को लेखिका ने अत्यंत संतुलन के साथ चित्रित किया है। यहाँ उनकी संतानों का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है, जो पिता को कठघरे में खड़ा करने के बजाय उन्हें अपने समय की सीमाओं का बंदी मानते हैं। यही तटस्थता इस जीवनी को विशेष बनाती है।
भाषाई स्तर पर इस कृति में पहाड़ी बोलियों का रस और परिनिष्ठित हिंदी का गांभीर्य साथ-साथ प्रवाहित होता है। आंचलिक शब्द परिवेश को जीवंत बनाते हैं, जबकि दार्शनिक प्रसंगों में भाषा गंभीर और तत्समप्रधान हो जाती है। यद्यपि कहीं-कहीं अलंकरण की अधिकता से भाषा यथार्थ के खुरदरे धरातल से थोड़ी दूर जाती प्रतीत होती है, फिर भी गद्य का प्रवाह पाठक को बाँधे रखता है।
समय की बुनावट भी इस कृति का महत्वपूर्ण पक्ष है। 1940 के दशक से लेकर समकालीन समय तक की यात्रा केवल शिवानन्द की आयु का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि बदलते भारत के सामाजिक इतिहास का दस्तावेज़ है। गाँव से शहर और फिर विदेश तक का यह विस्थापन स्मृति-बिम्बों के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरता है।
हालाँकि मुख्य पात्र शिवानन्द का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरता है, परंतु परिवार के अन्य पात्र, विशेषकर बड़ी बहन गौरी और छोटी बहनें मिहिका तथा दिव्या, अपेक्षाकृत कम विकसित रह जाती हैं और प्रायः पार्श्व में ही बनी रहती हैं। ‘एक हाथ से ताली नहीं बजती’ – किसी भी महान चरित्र के निर्माण में उसके आसपास के लोगों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि इन पात्रों को थोड़ा अधिक विस्तार मिलता, तो यह जीवनी न केवल अधिक संतुलित और बहुआयामी बनती, बल्कि एक समृद्ध सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में भी और अधिक प्रभावशाली सिद्ध होती।
इसके बावजूद, इस कृति का सांस्कृतिक महत्व अत्यंत बड़ा है। डेनमार्क जैसी दूरस्थ भूमि पर बैठकर स्मृतियों की आँच से रचा गया यह कथा-संसार भाषा और संस्कृति के प्रति लेखिका की गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उनकी भाषा में मिट्टी का वही सोंधापन सुरक्षित है, जो प्रवास में अक्सर धुँधला पड़ जाता है।
‘अलकनंदा सुत’ केवल शिवानन्द गैरोला की जीवनी नहीं, बल्कि हर उस पहाड़ी पुत्र की कहानी है जो सपनों और संघर्षों के साथ जीवन की राह पर निकला है। यद्यपि कहीं-कहीं विवरणों की अधिकता खटकती है, पर लेखिका की ईमानदारी और संवेदनशीलता इन कमियों को ढँक लेती है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि यह कृति अपने समय के यथार्थ को निर्भीकता से अभिव्यक्त करती है। अर्चना पैन्यूली ने अपनी जड़ों का ऋण शब्दों के माध्यम से चुकाने का जो प्रयास किया है, वह सराहनीय है। वाणी प्रकाशन का यह प्रकाशन हिंदी साहित्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। अलकनंदा की ये लहरें हिंदी पाठकों के मन को लंबे समय तक स्पर्श करती रहेंगी और उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देती रहेंगी।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
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