Friday, April 17, 2026
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“प्रौद्योगिकी बैंकिंग और हिंदी” पुस्तक का लोकार्पण एवं चर्चा सत्र का आयोजन

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश यादव की नई पुस्तक “प्रौद्योगिकी बैंकिंग और हिंदी” का लोकार्पण समारोह हाल ही में केंद्रीय हिंदी संस्थान, विश्व हिंदी सचिवालय ( मॉरीशस) तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा आयोजित वेब संगोष्ठी के माध्यम से बड़े ही गरिमामय ढंग से सम्पन्न हुआ. 25 से अधिक देशों के हिंदी से जुड़े विचारकों, साहित्यकारों और भाषाकर्मियों के समूह द्वारा आयोजित इस समारोह में देश-विदेश से काफी लोग जुड़े थे. 
“बैंकिंग जो कि आज जीवन का अविभाज्य घटक बन चुका है और आम से लेकर खास तक के लोगों का इससे सीधा संबंध है इसलिए इसकी गतिविधियों और इस व्यवस्था में हो रहे लगातार बदलावों को लेकर नागरिकों का सरोकार होना चाहिए. इसके अस्तित्व को लेकर सभी को जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाने की जरूरत है.” लोकार्पण के बाद ‘बैंकिंग सेवाएं, प्रौद्योगिकी और हिंदी’ विषय पर आयोजित चर्चा सत्र में डॉ. रमेश यादव ने अपनी भूमिका रखी. चर्चा सत्र काफी रोचक एवं ज्ञानवर्धक था. डॉ.यादव ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बदलते बैंकिंग परिवेश में प्रौद्योगिकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है मगर राष्ट्रीयकृत बैंकों को अंधानुकरण और टारगेट की अंधी रेस से बचते हुए जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता तथा साख को बचाए रखने की कोशिश करनी चाहिए, जो कि इन बैंकों की मूल पहचान तथा संस्कृति रही है. साथ ही ग्राहकों के अधिकार, कर्तव्य और बैंक कर्मचारियों के दुख-दर्द को लेकर भी अपनी बात रखी. 
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए तकनीकी विशेषज्ञ, विशिष्ट वक्ता बालेन्दु शर्मा ‘दाधीच’ (निदेशक- स्थानीयकरण व सुगम्यता, माइक्रोसॉफ्ट- भारत),  एवं के.वी. शीतल, (महाप्रबंधक एवं प्रमुख, डिजिटल परिचालन समूह, बैंक ऑफ बडौदा) ने बैंकों में तकनीकी की मौजूदा स्थिति तथा अन्य उद्योगों में मौजूद प्रौद्योगिकी से तुलना करते हुए अपने महत्त्वपूर्ण विचार रखें. बालेन्दु शर्मा ने एटम, एनटीएम से अब पेटीएम तक के बैंकिंग सफर का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि क्रिप्टो करेंसी एक नई चुनौती के रूप में सामने खड़ी है, उसका मुकाबला करने के लिए हमें तैयार रहना होगा. बैंकिंग जैसे आर्थिक एवं तकनीकी विषय पर हिंदी में आई इस पुस्तक का उन्होंने स्वागत किया. 
रमाकांत शर्मा (पूर्व महाप्रबंधक, भारतीय रिजर्व बैंक) ने विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, बैंक कर्मियों तथा राजभाषा अधिकारियों की दृष्टि से उपयोगी इस पुस्तक की चर्चा करते हुए हिंदी कार्यान्वयन को लेकर अपनी बात रखी. सरकारी बैंक हमेशा से ग्राहकों की भाषा में अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी से निभाते रहे हैं. मगर आज यह व्यवस्था कई तरह के बदलावों व तनावों के दौर से गुजर रही है इस बात पर जोर दिया. 
वरिष्ठ पत्रकार और भाषाकर्मी राहुल देव ने राष्ट्रीयकृत बैंकों में हिंदी की स्थिति को लेकर कहा कि प्रगत टेक्नोलॉजी के इस दौर में भी बैंकों ने भारतीय भाषाओं को लेकर जितना काम करना चाहिए था, वह अभी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है. सरकारी क्षेत्र के साथ निजी सेक्टर को भी हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने का निर्देश दिए जाने की बात पर उन्होंने जोर दिया. साथ ही बताया कि मुझ जैसे सामान्य लोगों को बैकिंग से परिचय कराने की दृष्टि से यह पुस्तक उपयोगी है. 
समारोह के अध्यक्ष अनिल जोशी, (उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) ने कहा कि ये किताब अपने आप में में तीन किताबों के विषय को समेटे हुए है इसलिए संदर्भ की दृष्टि से संग्रहणीय है. बैंकिंग जैसे आर्थिक एवं तकनीकी विषय पर मूल रूप से हिंदी में आई इस पुस्तक का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि अन्य तकनीकी विषयों पर भी मूल रूप से हिंदी में पुस्तकें लिखी जानी चाहिए यह समय की मांग है. तब हमारी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं समृद्ध होंगी. विदेशों में बैंकिंग व्यवस्था और भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की कार्यपद्धति तथा आम सोच को समझाते हुए उन्होंने आगे कहा कि बैंकों ने व्यापार की दृष्टि से भले ही खूब तरक्की कर ली हो मगर आम जनता की भाषा में कामकाज को लेकर अभी भी अपने लक्ष्य से काफी पीछे चल रहे हैं. 
कार्यक्रम का सटीक संचालन जवाहर कर्नावट (पूर्व वरिष्ठ बैंकिंग कार्यपालक) ने किया. वरिष्ठ राजभाषा प्रबंधक, राजेंद्र श्रीवास्तव, साकेत सहाय, हरिराम पंसारी और नारायण कुमार ने भी इस विषय पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं. अमेरिका से अनूप भार्गव, जापान से तोमियो मिजोकामी ने पुस्तक को रोचक बताया. 
देश-विदेश से कई मान्यवर साहित्यकार, बैंककर्मी, राजभाषा अधिकारी, रंगकर्मी एवं सैकड़ों कलमकारों ने अपनी मजबूत उपस्थिति से समारोह को सफल बनाया. कार्यक्रम के आयोजन, नियोजन एवं संयोजन में बीना शर्मा, राजीव कुमार रावत, डॉ. जे.एस. यादव, विजय नगरकर, वानोडे, विजय मिश्र आदि ने महती भूमिका निभाई. मोहन बहुगुणा ने बड़े ही स्नेहिल शब्दों में आभार व्यक्त किया.
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