गाइड इन मायनों में एक महत्वपूर्ण फिल्म है कि जिस समय में पुरुष वर्चस्व की फिल्में बन रही थीं उस वक्त में एक स्त्री के मनोभावों, उसकी रचनात्मकता और उसकी आजादी को लेकर भी कुछ सोचा जा रहा था। जबकि यह सोच और पहल फिल्म जगत के साथ-साथ आर के नारायण के उपन्यास गाइड से आती है।आर के नारायण का यह उपन्यास बहुत ही चर्चित हुआ। इसको देश और विदेशों में जबरदस्त सराहना मिली।1958 में प्रकाशित यह उपन्यास जीवन में प्रेम के उत्कर्ष के साथ-साथ जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को सामने लाता है। जीवन के बहुत सारे अर्थ आपके सामने खुलकर आते हैं। इस उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है। आर के नारायण आमतौर पर मानवीय संबंधों की विशेषताओं तथा भारतीय दैनिक जीवन की घटनाओं का चित्रण करते हैं जिनमें आधुनिक शहरी जीवन पुरानी परंपराओं के साथ टकराता रहता है। आर के नारायण ने एक काल्पनिक गांव मालगुडी पर आधारित अपनी रचनाएं लिखी है। गाइड फिल्म को जानने से पहले गाइड फिल्म कैसे बनी इसकी यात्रा को जानते हैं।
नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल एस बक ने जब आर के नारायण का उपन्यास गाइड पढ़ा तो वो विस्मृत रह गए। एक भारतीय लेखक का अपने समय से इतना पहले का विजन और एक स्त्री की जिजीविषा और उसके मनोविज्ञान को इतनी बारीकी से पहले किसी ने नहीं लिखा था। पर्ल एस बक और देवानंद ने मिलकर यह फिल्म बनाने का फैसला किया। फिल्मफेयर के संपादक बी के करंजिया ने ही देवआनंद को पर्ल एस बक से मिलवाया था। इनके साथ पॉलिश फिल्म निर्देशक टेड देनिएलेबिस्कि भी थे। यह दोनों एक भारतीय थीम पर फिल्म बनाना चाहते थे। उस समय यह मुलाकात किसी और फिल्म की थीम को लेकर थी। लेकिन देवानंद की तरफ से बात बनी नहीं और समय गुजर गया। बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में देवानंद अपनी फिल्म हम दोनों लेकर पहुंचे हुए थे।और निर्देशक टेड अपनी फिल्म नो एडिगर को लेकर आये हुए थे। इसे बेस्ट फ़िल्म गोल्डन बीयर अवार्ड के लिए नामित किया गया था। देवानंद की फिल्म हम दोनों को दुनिया भर के समीक्षकों की सराहना मिली इस बीच देवानंद और टेड की मुलाकात हुई और  इंडोयूस फिल्म बनाने पर विचार हुआ। आर के नारायण की इस किताब गाइड के बारे में किसी ने देव आनंद को बताया हुआ था। देवानंद ने लंदन में किताब खोजनी शुरू की।लेकिन किताब एक बुक हाउस द्वारा 24 घंटों में भारत से लंदन पहुंचाई गई। किताब पढ़ने के बाद देवानंद अपने टेडी से बात की तो टेडी ने वह किताब पहले से ही पढ़ रखी थी।अब टेडी और देव की अगली मुलाकात अमेरिका में हुई।अमेरिका पहुंचकर बेवरली हिल्स के होटल में रुकने पर देव आनंद ने आर के नारायण को फोन कर इस गाइड पर फिल्म बनाने की बात की।आर के नारायण उनसे बैंगलोर में मिलने को कहा और आर के नारायण ने गाइड के फ़िल्म मेकिंग राइट देवानंद को दे दिए। गाइड को देवानंद  हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बनाना चाहते थे। गाइड के अंग्रेजी संस्करण के लिए देवनंद पर्ल एस बक से मिले और स्क्रीनप्ले लिखने को कहा।डील तय हुई।हिंदी संस्करण के लिए गाइड का अनुवाद किया गया। हिंदी फिल्म की कहानी को भारतीय मानकों और भारतीय परंपराओं की कसौटी पर रखा गया। हिंदी संस्करण का निर्देशन विजय आनंद ने किया।पहले इस फिल्म का निर्देशन देवानंद के बड़े भाई चेतन आनंद करने वाले थे।

डॉ राजेश शर्मा का लेख - क्लासिक कल्ट का एक बेहतरीन शाहकार : गाइड 3

मजे की बात यह है कि इंटरनेशनल सर्किट में कदम रखने को जब देव साहब गाइड के बारे में सोच रहे थे तब मशहूर निर्देशक सत्यजीत रे अभिज्ञान नाम की फ़िल्म बना रहे थे। और उनकी फिल्म में नायिका वहीदा रहमान थीं सत्यजीत रे ने वहीदा जी को “द गाइड”पढ़ने को दी और कहा कि वो ये किताब पढ़े और इस पर वह फिल्म बनाएंगे तो वहीदा ही इस फिल्म की हीरोइन होंगी।बात आई गई हो गई। बाद में जब देवसाहब ने वहीदा जी से संपर्क किया और बताया कि गाइड वो बना रहे हैं तो वहीदाजी को आश्चर्य हुआ।मालूमात करने पर पता चला कि अब फिल्ममेकिंग के अधिकार देव आनंद साहब के पास है।
गाइड नवकेतन फ़िल्मज और देवानंद की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म का बजट और दायरा भी बढ़ा रखा गया था। यह एक बड़े बजट की फिल्म थी।सो हर कदम पर काम फूँक फूँककर हो रहा था। फिल्म को अंग्रेजी और हिंदी में साथ साथ शूट होना था। देव आनंद के बड़े भाई चेतन आनंद हिंदी में तो टेड अंग्रेजी में शूट करने वाले थे।लेकिन चेतन आनंद की टेड से अच्छी नहीं जम पा रही थी। किसी एक सीन के फ्रेम को लेकर चेतन की टेड से बहस हो गई।चेतन आनंद सुनते किसी की भी नहीं थे। वहीदा जी को लेकर भी चेतन बहुत आश्वस्त नहीं थे उनका कहना था कि वहीदा अच्छे से अंग्रेजी नहीं बोल पाती हैं। वह नृत्य में पारंगत लीला नायडू को फिल्म में लेना चाहते थे। लेकिन देवानंद रोजी के किरदार के लिए वहीदा जी पर अड़े हुए थे। इसी बीच इंडो चायना पर आधारित फिल्म के लिए चेतन आनंद का नाम गया हुआ था।फिल्म हकीकत के टाइटल से बन रही थी। इस फिल्म को लेकर भारत सरकार से तब तक परमिशन नहीं मिली थी। इसी बीच इंडियन आर्मी से चेतन को परमिशन मिल गई और गाइड में अपनी क्रिएटिविटी से कंप्रोमाइज के चलते उन्होंने यहाँ से हटने का फैसला कर लिया। चेतन आनंद के बाद निर्देशक के रूप में पहले राज खोसला का नामआया लेकिन बात नहीं बनी।फिर नवकेतन से ही जुड़े देवानंद के छोटे भाई विजय आनंद को ये जिम्मा सौंपा गया।
विजय आनन्द ने जब ये कहानी सुनी तो वह शॉक रह गए।उनके हिसाब से भारतीय जनमानस अभी इस प्रकार की महिला की कहानी को पचाने के लिए तैयार नहीं था। विजय ने कहा कि वह हिंदी वर्जन का स्क्रीनप्ले खुद भारतीय जनमानस के हिसाब से लिखेंगे। स्क्रिप्ट और उस पर आधारित फिल्म लोगों को इतनी पसंद आई कि गाइड को बेस्ट स्क्रिप्ट और निर्देशन दोनों का अवार्ड मिला।विजय आनंद देवानंद के छोटे भाई थे और देव को पापा कहते थे। लेकिन देव से उनके रोल के लिए सही काम करवा लेना भी उनको आता था। फिल्म की आखिरी दृश्य में देव को मरना था और देव इस सीन के लिए कतई राजी नहीं थे।विजय उन्हें बार-बार समझा रहे थे कि वह सीन फिल्म का को बहुत ऊंचाई देगा। लेकिन देव साहब भी जिद्दी। वह नहीं माने। दोनों में अनबन हो गई। बाद में फिल्म के सिनेमेटोग्राफर फाली मिस्त्री ने विजय से कहा कि वह देव साहब से बात करके देखते हैं।फ़ाली मिस्त्री ने देव को जिस तरह से सीन की इंर्पोटेंस बताई तो वो मान गए। आज भी यह सीन फिल्मजगत की भव्यता का उदाहरण है। फाली मिस्त्री  को भी फिल्म के लिए छायांकन के लिए सर्वश्रेष्ठ छायांकन का पुरस्कार मिला है।
गाइड फ़िल्म के गीतों के लिए पहले हसरत जयपुरी को लिया गया था।हसरत के लिखे एक गाने के मुखड़े दिन ढल जाए हाय रात ना जाए इस मुखड़े पर देव साहब ने आपत्ति कर दी तो हसरत ने इसे अपना अपमान मानकर फ़िल्म ही छोड़ दी। तब शैलेन्द्र जी से बात की गई। तो वह दूसरी पसंद होने के कारण बहुत ज्यादा रुचि नहीं ले रहे थे। दबाव पड़ने पर उन्होंने नवकेतन से ज्यादा धनराशि की मांग कर ली। नवकेतन ने जब स्वीकार कर लिया लेकिन शैलेंद्र ने हसरत जयपुरी का सम्मान करते हुए उसी मुखड़े पर पूरा गाना लिखा फिर फिल्म के सारे गाने शैलेन्द्र ने हीं लिखे। शैलेंद्र के गीत और संगीतकार एसडी बर्मन के संगीत  की जुगलबंदी रही गाइड।  इसके गाने बहुत प्रसिद्ध हुए। लेकिन आश्चर्य यह कि उस वर्ष के अवार्ड सेरेमनी में कोई भी पुरस्कार संगीत की श्रेणी में गाइड को नहीं मिला। संगीत की श्रेणी के सारे पुरस्कार सूरज फिल्म को मिले जिसके गीत हसरत जयपुरी ने लिखे थे। इस फिल्म के गीत पर जब लता जी को कांटों से खींच के ये आंचल पर भी अवार्ड नहीं मिला और मोहम्मद रफी को बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है इसके लिए अवार्ड मिला तो रफी साहब ने पुरस्कार लेने से ही मना कर दिया। इस पुरस्कार को लेकर इतना बवाल मचा कि अगले साल से फिल्मफेयर को  पार्श्वगायन में महिला और पुरुष गायकों की श्रेणी पर अलग-अलग गायकों की श्रेणियां बनानी पड़ी।
गाइड में सचिन देव बर्मन के संगीत ने एक अद्भुत संसार का निर्माण किया था। यहां शास्त्रीयता भी थी और मेलोडी का माधुर्य भी।  अपनी शास्त्रीयता की जटिलताओं से बचाते हुए और सरसता से भरते हुए बर्मन साहब ने इस फिल्म के गीत रचे।तिलंग में पिया तोसे नैना लागे रे (लता) का जादू तो आज भी सर चढ़कर बोलता है।झिंझोटी धुन का परिष्कृत रूप लेकर दादा के टेरिस पर बैठकर दोपहर से शाम तक व्हिस्की  की बोतल के साथ अकेले बैठकर शैलेंद्र ने उन्हें अद्वितीय शाब्दिक अभिव्यक्ति दी। मोहे  छल किए जाए हाय रे हाय सैयां बेईमान।घुंघरू और तबले के साथ एक अविस्मरणीय रचना। पूरी फिल्म में तार शहनाई का क्या सूंदर उपयोग है।रफी की धीमी नाजुक शैली में रुमानी गीत गवाकर उन्होंने एक नवीन पहलू प्रस्तुत किया। तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं के पीछे राग गारा के सुर थे। तो दिन ढल जाए हाय रात ना जाए का स्थाई बिलावल में और अंतरा यमन कल्याण में था।वहीं क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में (रफी) झिंझोटी का एक दूसरा रूप था। गाता रहे मेरा दिल (लता किशोर) के लिए पहाड़ी राग का उपयोग किया। एक नए अंदाज में बांग्ला की लोकधुन को अल्लाह मेघ दे के पीछू राग पीलू और वहां कौन है तेरा के पीछे पहाड़ी के सुर इस्तेमाल किए गए। गाइड का संगीत बर्मन साहब की कलात्मकता का उत्कर्ष था।
 गाइड की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें नायक और नायिका का अभिनय और अंदाज गाइड को देखने के बाद सिर्फ राजू गाइड ही जाता है।देव आनंद का स्टारडम इस कैरेक्टर पर हावी नहीं होता। देव साहब ने बहुत सारी फिल्मों में नायक की भूमिका में अनेक चरित्रों के द्वारा अलग अलग आयाम स्थापित किए लेकिन गाइड उन्हें अभिनेता के सारे गुणों को जैसे एक साथ सामने लेकर आती है।विजय आनंद ने जिस तरह इस फिल्म के साथ बड़ी गहराई से जुड़कर अपने चरित्रों से काम करवाया यही कारण है कि गाइड देखते वक्त इसके पात्र दिल को इतना मथते हैं कि दर्शक उन्हें अपना सा महसूस करने लगते हैं ल।रोजी हो या राजू दर्शक इनमें अपने आसपास के वास्तविक जीवन को ढूंढने लगते हैं। राजू और रोजी के बीच पैदा हुए प्रेम और आश्वस्ति के दृश्यों में जो उमँगऔर उड़ान है या फिर रोजी के लिए राजू के समाज से झगड़े हैं या फिर रोज़ी के नृत्य के प्रति रुझान के लिए राजू की मेहनत उसे परवान चढ़ाने की है वह दृश्य फ़िल्म के यादगार लम्हें बन गए हैं।जिस दिन से रोजी राजू की जिंदगी में आती है राजू अपनी जिंदगी अपना घर बार सब भूल जाता है।बस रोजी की खुशी और रोजी की चाहनाये यही उसका संसार बन जाता है। समाज के ताने, मामा के साथ संघर्ष, मां की मान मनोवल, कपूर के साथ सामंजस्य सब करता है। राजू लेकिन रोज़ी के आने से यह सब लोग उसकी जिंदगी से चले जाते हैं। और अंत में वह अपने आप को भी खो देता है। अपनी रेलवे की कैंटीन के लिए जहां राजू जान देने को भी तैयार रहता है उसको भी उससे छोड़ना पड़ता है। राजू कितना निर्मल है, कितना भोला, कितना सीधा।
विजय आनंद की चुस्त दुरुस्त पटकथा और नाटकीयता से अछूते मार्मिक संवाद इस फिल्म की जान है। एक-एक संवाद पर काम किया गया है और जिस तरह से देव साहब व वहीदा जी ने संवादों की अदायगी की है तो हावभाव, अभिनय के साथ संवादों की मार्मिकता छलक के आती है। फिल्म के हर दृश्य को जीवंत किया गया है। फ़ाली मिस्त्री ने जिस प्रकार के फ्रेमों और एंगल का इस्तेमाल किया है वह अद्भुत है। कांटों से खींच के ये आंचल गीत जो कि चित्तौड़ के खंडहरों में ही फिल्माया गया है का एक दृश्य में है जिसमें वहीदा थिरकते हुए नाचती हुई आगे बढ़ रही है।इसमें फ्रेम नीचे से वहीदा को कवर करता है। जब मैं स्वयं चित्तौड़ गया और उस जगह को देखा जहां उस खास एंगेल से फ्रेम को लगाया गया था तो वह एक दीवार की मुंडेर का पतला सा हिस्सा था। जिस पर खड़ा होना भी मुश्किल है। उस पतली सी डगर पर वहीदा ने क्या शानदार एक्सप्रेशन के साथ नृत्य की थिरकन को संभाला है ।क्या गजब का फ्रेम,क्या नायिका का अभिनय और नृत्य ,निर्देशक की सूझ और निर्णय।मैं वहाँ खड़ा खुद बहुत देर तक सोचता रहा। साधारण से अ
साधारण होने के कई आयाम यह फ़िल्म दिखाती है।नायिका जो परम्परा वादी कैद में छटपटा रही है।और बेहद साधारण है।वो राजू जैसे साधारण क्षमताओं वाले व्यक्ति के साथ मिलकर असाधारण तरीके से अपनी उड़ान को बिखेरती है। जहां मार्को की परंपरा बेबस कर देने वाली और कठोर है वही राजू का प्रेम उद्दात है, सरल है ,दीवाना है। रोज़ी एक बड़ी नायिका और अभिनेत्री बन जाती है।चारो तरफ उसके नृत्य की धूम है।और राजू गाइड वो अपनी चपल सुलभ प्रेम प्रक्रियाओं के होते हुए भी एक अय्याश और मादकता के घेरे में गुम हो जाता है।रोज़ी और राजू के झगड़े और मार्गों का इनके प्रेम में ईर्ष्या का बीज फेंक देने से सारी कहानी बदल जाती है। और एक छोटी सी घटना हरियाती हुई बेल को सुखा देती है। राजू को कैद हो जाती है। और वहां से वह छूटता है तो दुनिया उसके लिए खाली होती है।और वह खालीपन उसे आध्यात्मिकता के फलक तक पहुंचा देता है। एक सहारे की तलाश और दुखियों के दुख में दुखी राजू अपने को उन सबको सौंप देता है। जो उसके अंदर उस असाधारण को तलाश कर रहे होते हैं।जिस तरह से राजू रोज़ी के विश्वास को कायम रखने का काम करता है उसी प्रकार राजू गांव वालों के विश्वास को भी कायम रखने के लिए उस अलौकिकता से भी लड़ जाता है और बारिश हो जाती है। यह बारिश दूसरों के जीवन में तो होती है लेकिन राजू का मन अंतस खाली है।
   इस फ़िल्म में जो कैरेक्टर वहीदा जी को मिला उसे पाने के लिए बरसों बरस तक टॉप की हिरोइन्स हाथ पैर मारती रहीं।फिल्मी लेखकों ने न जाने औरत के कितने किरदार रच दिए।लेकिन रोज़ी जैसा कोई न बन पाया।सपेरों की बस्ती में जा कर जो नृत्य वहीदा जी ने किया है वह भी हिंदी सिनेमा का अविस्मरणीय नृत्य है।अपने से बाहर निकलने की,अपने को पहचानने की,अपनी केंचुली उतार फेंकने की प्रक्रिया।वहाँ वो नृत्य इतनी ऊँचाई पर पहुंच गया कि उसके आसपास जाने से भी लोग डरने लगे।
गाइड हिंदी सिनेमा की विरासत है।6 फरवरी   1965 को रिलीज़ हुई इस फ़िल्म ने अपनी सफलता की धूम मचा दी थी।आज 57 साल बाद भी इसके गीत उतनी ही बेकरारी से सुने जाते हैं।होली और दीवाली पर  आधारित गीत भी संगीत और नृत्य का बेजोड़ संगम है।फिल्मों की अपनी एक कुंडली होती है।और कुछ तो इतने ऊँचे मयार पर पहुंच जाती हैं कि उसे बनाने वाले भी उसे सर उठा के देखते रह जाते हैं।

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