डॉ. कमलेश द्विवेदी को याद करते हुए 3दिल की बातें दिल तक पहुँचें / यानी वो मंज़िल तक पहुँचें…
सच!… किंतु असमय, अप्रत्याशित, जीवन की विकट से विकट परिस्थितियों में कभी न हार मानने वाले मेरे अभिन्न पितातुल्य, सुहृदय, सौम्य, मेरे साहित्यिक जीवन के वटवृक्ष डॉ कमलेश द्विवेदी सर जीवन समर मे हार कर भी जीत गये। दिल की बातें दिल तक हँसते-हँसते पहुँचाने वाले ईश्वर के हृदय में ऐसे यूँ अचानक वास कर जायेंगे ये अकल्पनीय, अविश्वसनीय है साहित्य जगत के लिए।
कहते है दुख जितना गहरा हो, मन उतना ही भाव शून्य हो जाता है। इसीलिए शायद चाह कर भी कलम उठ नही पा रही थी। भावों के  झंझावात मे मन इतना उलझा रहा कि समझ ही नही पा रही थी कौन सा सिरा चुनूं स्मृतियों के गलियारे से गुजरते हुए भावों को बांधने के लिए।
सच तो ये है आभासी रिश्ते, आभासी से कब सच्चे रिश्तों में परिवर्तित हो जाते इसका आभास आज हो रहा सर के  जाने के बाद। डॉ कमलेश द्विवेदी सर से आभासी दुनिया से ही परिचय हुआ था, प्रथम परिचय अत्यंत आह्लादित करने वाला ही नही, प्रेरक भी था। मैने एक मुक्तक लिख कर अपनी वाल पर प्रेषित किया था, त्रुटि को सार्वजनिक न करते हुए उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर उसे ठीक भी किया और अच्छा लिखने की शुभकामना भी दी। यही से शुरू हुआ उनसे बातचीत का दौर। ये उनका अद्भुत गुण था, कि उनका साहित्यिक योगदान कितना वृहद है उसका आभास कराये  बिना, दूसरे के लेखन को ऐसे संवार देना जैसे कोई त्रुटि हुई ही नही हो। निसन्देह जब आज के युग मे लोग दूसरों को नीचा दिखाने का, उनकी त्रुटियों को सार्वजनिक करने का एक भी मौका नही छोड़ते ऐसे मे सिर्फ और सिर्फ निस्वार्थ प्रोत्साहन देने वाले विरले ही होते है। ऐसे विरले कवि थे डॉ कमलेश द्विवेदी सर।
मुझे स्मरण है जब उनकी पुस्तक ‘मेरे गीत समर्पित उसको’ के गीतों का पीडीएफ उन्होंने मुझे भेजा, तो उसे पढ़कर जाने क्यों सहज ही मन ने शब्दों की श्रृंखला बुन डाली थी। उसे समीक्षा नही कह सकती क्योंकि अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त हास्य- व्यंग्य  के प्रतिष्ठित कवि की कविताओं की, गीतों की समीक्षा करने का विचार आना भी धृष्टता था, हम नवांकुर साहित्यकारों के लिए। जब भावों के अवगुंठन को शब्दों से सजाकर 12 फरवरी, 2015 को उनकी शादी की वर्षगांठ पर भेंट किया तो सहज ही बाल सुलभ हर्षातिरेक से भरकर उन्होंने असीम आशीर्वाद दिया था। अत्यंत सादादिल व्यक्तिव थे वो।
उम्र में लोग बड़े हो या छोटे सबको स्नेह और मान कैसे देना ये उनसे बहुत सीखा मैंने।
भले अपरिचित शहर था दिखा न कोई मित्र।
मगर होर्डिंग पर दिखा मेरा पहला चित्र।
मेरा पहला चित्र देखकर मन हर्षाया।
मुझे कहां से कहां शारदे ने पहुंचाया।
कहते ‘कवि कमलेश’ कराती कविता परिचित।
बन जाते हैं मित्र भले हों लोग अपरिचित।
(डॉ.कमलेश द्विवेदी)
किसी भी चित्र पर, शब्द पर, भाव पर सेकेंड्स मे कविता, दोहा, मुक्तक, कुंडलनी रच देना तो इतना सहज उनके लिए कि कई बार जवाबी प्रतियोगिता का रूप ले लेता था हमारा वार्तालाप।
हास्य- व्यंग्य के साथ गीत, गज़ल, बाल गीत तो लिखा ही उन्होंने साथ ही साथ ऐसे ऐतिहासिक साहित्यिक कार्यक्रमों पर सार्थक तथ्यपूर्ण लेख वो अक्सर प्रेषित करते थे जो उनकी गहन अन्वेषण क्षमता का परिचायक थी। एक बार मैने पूछा हर लेख मे इतना परिश्रम कैसे कर पाते है सर तो बोले अपने बाबूजी से सीखा है आने वाली पीढ़ियों को सही सच्ची जानकारी देना साहित्यकार का सच्चा धर्म है।
‘चोरी लाल चुरेश’ उनकी अति लोकप्रिय कविता थी जो उन्होंने चोरी करके अपने नाम से कविता पोस्ट करने वालों पर कड़ा कटाक्ष करते हुए लिखी थी। कमाल ये था कि साक्ष्य के साथ प्रामाणित भी कर देते थे कि किसकी पंक्तियां है और कहां से चोरी की गई है। अद्भुत, अप्रतिम, विलक्षण प्रतिभा के धनी थे शायद इसी लिए ईश्वर के प्रिय भी।
पिछले 37 वर्षों से कवि मंचों पर हास्य व्यंग्य के चर्चित कवि, दूरदर्शन, आकाशवाणी और कई निजी चैनलों से लगातार प्रसारण 50 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन। 60 से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित। मेरे गीत समर्पित उसको… (2015), हास्य व्यंग्य सरताज डॉ. कमलेश द्विवेदी (2017) में प्रकाशित। अमेरिका के कई शहरों में एक्चुअल काव्य पाठ। कविताकोश में शताधिक गीत, ग़ज़लें और बालगीत शामिल करा चुके विलक्षण कमलेश सर का सबसे बड़ा गुण उनकी सरलता और माटी से अपनी संस्कृति से जुड़ाव था जो थाती के रूप मे वो अपने गीत के रूप मे अपने बेटे को, अपने शिष्यों को दे गए। पीड़ा है कि वो हमारे बीच आज नहीं है, पर उनका पुत्र रोज सुबह उंनकी ही तरह उनकी कविता को पोस्ट करके हम सब के जीवन मे मुस्कुराहट बिखेर रहा है। प्रयास रहेगा जीवन पर्यंत जो मुस्कुराहटें, जो शिक्षाएं उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से बिखेरी है वो ‘पुरवाई’ बनकर हम सब का सदैव मार्गदर्शन करती रहें।बहुत याद आते है सर।
कभी मेरी एक सुंदर से गीत पर सर ने दो पंक्तियों मुझे भेंट की थी आज अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें ही समर्पित कर रही हूँ।
पारस हूँ मैं या नही मुझे नही ये ज्ञात
आप सोना शुद्ध हैं यह है सच्ची बात।
विनम्र श्रद्धांजलि, सादर

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