सर्द रातों में कंचन सा बदन जलता है
मन के भीतर दूर कहीं दर्द चलता है
मिटती नहीं प्यार की पहली इबारत दिल से
दर्द-ए-दिल आज भी तेरी यादों से बहलता है
माज़ी की तरफ़ नज़र न उठे नामुमकिन है
यह साया तो छांव में भी साथ चलता है
बेवफ़ाई तेरी आदत ही नहीं अदा भी है
मन को मालूम है मगर दीवाना कहां समझता है
आज की सुरमई शाम बड़ी बोझिल उदास है
तुझे गले से लगाने को मन मचलता है

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