सवाल वाजिब है कि आख़िर मॉडर्न क्यों? बात यह है कि इस क़िस्से के किरदार युवा हैं, ख़ालिस हिंदी से कोसों दूर। शुक्र मानो कि अंग्रेज़ी-हिंदी लफ़्ज़ों की खिचड़ी बनाकर बोल लेते हैं, जिसे आजकल कहा जाता है हिंग्लिश। एक बात और, सही हिंदी न जानते हुए भी गाली गलौच कर लेते हैं… ठेठ हिंदी में! और यह भी कि चर्चा करने को सदैव तत्पर रहते हैं लेकिन चाय पर नहीं, बल्कि करते हैं बीयर पर बहस और ड्रिंक्स पर डिस्कशन। ज़ाहिर है, जब इतना सबकुछ है तो यौन सम्बन्धों की बहस से भी परहेज़ नहीं है इन्हें। 
चलिए, शुरू करते हैं क़िस्सा। कालखंड है 2008-09 का।
लाबोनी और महक ने बारहवीं माने प्लस टू अच्छे नम्बरों से पास की है। वैसे बुरे नम्बर तो किसी के आते ही नहीं, क्योंकि सीबीएसई की नज़र में सभी छात्र होनहार हैं, इसलिए नम्बर उड़ेलता है। लेकिन ये दोनों हैं सुपर होनहार… अपने आप में अजूबे। ऐसे स्टूडेंट्स सेंटपर्सेंट मार्क्स हासिल करते हैं! 
ख़ैर, दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैम्पस के एल.एस.आर. कॉलेज में एड्मिशन की फ़ॉर्मैलिटीज़ करते हुए पहली मुलाक़ात हो जाती है। दोनों दिल्ली से बाहर की थीं। झट से दोस्ती ज़रूरत बन गईं। लाजपत नगर में दोनों पीजी भी एक ही मकान में हो गईं। खपती लैंड्लॉर्ड को बेवक़ूफ़ बनाना, क्लास में प्रॉक्सी अटेंडन्स, एग्ज़ाम डेज़ की फ़्रस्ट्रेशन और दिल्ली की सड़कों की ख़ाक छानते हुए फाकामस्ती में तीन साल कैसे बीते, पता ही नहीं चला। 
कैम्पस प्लेस्मेंट का दौर चला। इसे भी इत्तफ़ाक़ समझिए कि दोनों की प्लेस्मेंट भी हैदराबाद की एक टॉपनॉच एमएनसी में हो गयी। हाईटेक सिटी के नज़दीक गच्चीबौली इलाक़े में एक बार फिर फ़्लैटमेट हो गईं। शुरुआती दौर में तो पहली जॉब के प्रेशर के कारण दोनों की परवाज़ फ़्लैट और वर्क प्लेस तक रही, किंतु धीरे धीरे दायरा बढने लगा। इधर उधर आना जाना हुआ। नए दोस्त बने। इन्हीं दोस्तों में एक निहिर भी था। 
यहाँ आता है क़िस्से में ट्विस्ट! लाबोनी के साथ उसकी  मुलाक़ात का दौर इतना बढ़ा कि दोनों रिलेशनशिप में आ गए। जवान लोगों में रिलेशनशिप का मतलब है – इश्क़, मुहब्बत, प्रणय की पराकाष्ठा। निहिर की फ़्लैट पर आने की फ़्रीक्वेन्सी बढ़ने लगी। लेकिन इससे महक और लाबोनी की दोस्ती पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। 
उधर, महक पूरी तरह जॉब पर फ़ोकस्ड थी। फ़्रेंड सर्कल बाक़ायदा था, लेकिन बॉय फ़्रेंड का कोई लफड़ा नहीं पाला। एक वर्ष के बाद जहां कम्पनी ने महक को ऑस्ट्रेलिया भेजने का फ़ैसला किया तो दूसरी ओर लाबोनी को परफ़ॉरमेंस इम्प्रूव करने का नोटिस दे दिया। दरअसल, इन बड़ी कंपनियों को एम्प्लॉई की निजी ज़िंदगी से कोई लेना देना नहीं होता, जब तक कि कंपनी पर किसी तरह का असर न पड़ रहा हो। 
महक की विदाई की पूर्वसंध्या पर दोनों इमोशनल हो गए। चार साल दिन रात साथ रहने के बाद उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि ‘हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों है?’ फ़ैसला लिया कि उस शाम को सिर्फ़ वे दोनों बाल्कनी में मध्यम प्रकाश में बैठकर, केवल दो आइटम्ज़ – बीयर और हैदराबादी बिरयानी के साथ चिल करेंगे और बीते लम्हों को परत दर परत कुरेदेंगी। उस गुफ़्तगू के कुछ दिलचस्प संवाद:
“…तो कल निहिर यहाँ शिफ़्ट हो जाएगा… वी विल बी लिव-इन पार्ट्नर्ज़ या यूँ कह लो परमानेंट रूममेटस, फ़ॉर्मली।”
“ग्रेट… डिक्लेयर कर दिया?”
“मेरी फ़ैमिली में कोई इशू नहीं है… निहिर की मदर ने मुँह फ़ुला रखा है… ही इज़ मदरज़ बॉय… मैंने कई बार बोला यार, मम्मी की अम्बिलिकल कॉर्ड से डिटैच हो जाओ…”
“बट अदरवाइज़ ही अपीयर्ज़ टू बी वेरी कूल… है ना?”
“सुपर डुपर कूल… इतना ठंडा है कि आप टच भी नहीं कर सकते!”
“ओह! मैंने कहीं पढ़ा है… ठंड़ा गोश्त बस फ़्रीज़र में ही सेफ़ रहता है… देट ठू फोर ए ड्यूरेशन… एक बार गर्म करके टेस्ट कर लेना चाहिए!”
“ब्रिलियंट आईडिया…”
दोनों दोस्तों की दिशा और दशा नए सिरे से शुरू हो चुकी थीं। लाबोनी को संकेत मिल रहे थे कि कम्पनी उसे बस झेल रही है। इससे पहले कि कम्पनी उसे एग्ज़िट डोर दिखा दे, उसने नई जॉब ढूँढ ली। 
अब वह पहुँच गयी निहिर की कम्पनी में। ज़ाहिर है नए रोल को हथियाने में निहिर की अहम भूमिका थी। उनके रिश्ते और प्रगाढ़ हो गए। किंतु लाबोनी के विवाह प्रस्ताव के प्रति निहिर की ना-नुकुर जारी थी, क्योंकि उसकी माँ पुरज़ोर विरोध कर रही थी। वजह लाबोनी तो थी ही, साथ में अभी वह निहिर को बालक समझती थी। 
कई मर्तबा तो लाबोनी को भी ऐसा ही महसूस होता था। अंतरंग दैहिक सम्बंध के प्रारम्भिक क्षणों में ही वह दूरी बनाकर सदैव यही कहता था…आफ़्टर मैरिज! शुरू में लाबोनी इस जेस्चर से न केवल प्रभावित हुई, बल्कि उसे नेक नीयत इंसान समझा। चूँकि फ़्रेंड सर्कल इसे वर्जना नहीं मानता था, इसलिए अकसर उनको यही कहते सुना गया कि ‘वाय इट शुड बी ए टेबू… भाई, गुड्ज़ ट्राई करने को माँगता बिफोर बाइंग!’ इस बैक्ग्राउंड में यह इशू इतना हॉट था कि दोनों में गर्मा गर्मी का दौर एक दिन अपने शिखर पर पहुँच गया और लाबोनी ने निहिर को नपुंसक कह डाला। 
इससे बड़ी तौहीन नहीं हो सकती एक पुरुष के लिए। मर्दानगी को ललकार! हो गया ब्रेकअप। अगले ही दिन वह अपने घर कोलकाता आ गई। थोड़े दिन बाद उसने कम्पनी से ई-सेपेरेशन ले लिया। यह पहली मर्तबा था कि उसको टालीगंज इलाक़ा उबाऊ लगने लगा। निहिर और जॉब को तो मिस कर ही रही थी। एक और वजह भी थी ‘जेनरेशन गैप’। यह थियोरी हमने आपने नहीं, बल्कि समाज शास्त्रियों ने बनाई है। इसी के चलते लाबोनी को चंद दिनों के बाद अपने ही घर में घुटन होने लगी। 
लाबोनी का वर्क-एक्सपीरियंस दो वर्ष का था, वह भी टॉप कम्पनियों का। जॉब फटाफट मिल गई,मानो वह नहीं बल्कि जॉब उसे तलाश कर रही थी। इस बार उसका वर्क प्लेस था गुरुग्राम। सबकुछ ख़ुशनुमा था। रिलेक्स्ड माहौल। जॉब प्रेशर ज़ीरो। एक नया बॉय फ़्रेंड भी – शुभम्। 
डेटिंग के सिलसिले में नया अनुभव भी मिल गया, जिसकी पिछले रिश्ते में दरकार थी – फ़िज़िकल रिलेशन माने दैहिक सुख। आज के दौर में रिलेशनशिप को अधूरा समझा जाता है इस अनुभव के बग़ैर। ख़ैर, दो वर्ष तक सब बढ़िया चला,किंतु अचानक एक दिन लाबोनी को अप्रत्याशित आघात पहुँचा। शुभम् के शब्द नसों में झनझनाहट पैदा कर रहे थे। नाम शुभम् ज़रूर था, लेकिन नीयत अशुभम। दरअसल शुभम् के साथ एक रिलेशनशिप मुकम्मल था, लेकिन लिव इन या फ्रेंडशिप के बाद क्या, जैसे विषयों को या तो वह युक्तिपूर्वक टाल देता था या फिर डिप्लोमैटिक जवाब दे देता था। आख़िरकार लाबोनी ने सीधा सवाल किया:
“…इफ़ आई प्रपोज़..” शुभम् ने वाक्य पूरा नहीं होने दिया।
“ओह नो! वी आर जस्ट गुड फ़्रेंड्स…नथिंग मोर, नथिंग लेस!”  
एक बार फिर ब्रेक अप। सदमा गहरा ज़रूर था लेकिन अपने को टूटने नहीं दिया लाबोनी ने। एक महासत्य यह है कि अगर आप खुद अपनी मज़बूती बनाए रखें तो कुदरत आपको नए अवसर देती है। लाबोनी को नया अवसर चार दिन बाद ही मिल गया, यूँ कहिए कि ‘ओल्ड वाइन इन न्यू बॉटल!’ 
निहिर की कॉल थी। जितना अप्रत्याशित झटका शुभम ने दिया था उतना ही अप्रत्याशित सुखद अहसास निहिर की कॉल ने दिया। निहिर ने शुरुआत ही सॉरी शब्द से की। लाबोनी भी पिघल गई। शायद ऐसा होता है कि एक बेहद घटिया इंसान के अनुभव से दूसरे घटिया इंसानों का दर्जा खुद बख़ुद ऊँचा हो जाता है। लाबोनी दार्शनिक हो उठी, निहिर को अलबत्ता ध्यानमग्न होकर सुन रही थी, किंतु दिमाग़ के एक कोने में एक तर्कमंथन चल रहा था: ‘कुल मिलाकर निहिर के सानिध्य में केवल एक कमी रही थी, जो वास्तव में भावनात्मक संबंध को शारीरिक बनाकर उसकी निर्मलता को नष्ट करती। वह ठीक था, मैं ग़लत।’ इस मोड़ पर लाबोनी ने भी सुबकी लेते हुए सॉरी बोला। निहिर ने प्रपोज़ यानि विवाह प्रस्ताव देकर इन आंसूओं को ख़ुशी के आंसू बना डाला। लाबोनी का परिवार मानता था कि उन्हें उसकी पसंद को नापसंद करने का कोई हक़ नहीं है। कहीं कुछ कमी भी तो नहीं थी- निहिर का पेकेज और उसका फ़िज़ीक एकदम पर्फ़ेक्ट। रही बात फ़ैमिली की – धीरे धीरे एडजस्टमेंट हो जाती है। सो, जो दो साल पहले होना था, अब हुआ। शादी तय हो गई। महक को भी आमंत्रित किया गया।
यहाँ हम लेते हैं महक की खबर। ज़िंदगी में नपे तुले कदम उठाना और सोच विचार कर निर्णय लेना उसकी फ़ितरत में था। ऐसे लोगों की लाइफ़ में थ्रिल या रोमांच नहीं होता। उतार चढ़ाव के बग़ैर ज़ाहिर है ज़िंदगी समतल रहती है। ऑस्ट्रेलिया में सिडनी पहुँचने के बाद नई दुनिया, नए सिस्टम को समझा। आदतन ऑफ़िस के नज़दीक अकोमोडेशन ले लिया। ज़िंदगी की उड़ान थी वर्क-प्लेस और घर। हाँ, इंडिया में पेरेंट्स से टच में बाक़ायदा रही। 
ऐसे भारतीयों का एकमात्र मक़सद डॉलर कमाना होता है। इसके अलावा पार्ट्नर की तलाश भी बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के शुरू हो जाती है। वही हुआ। महक को इंडियन पार्ट्नर, वो भी ऑस्ट्रेलियन पी आर होल्डर, प्रांजल मिल गया। कोई डेटिंग का लफड़ा नहीं पाला। हाँ, ठोक बजा कर उसके सारे पैरामीटर्स जाँच परख लिए। वहीं दोनों ने अपने पेरेंट्स को बुला लिया और मैरिज सम्पन्न। बस एक तबदीली – महक को सिडनी से नब्बे किलोमीटर दूर वोल्लोंकोंग शहर जाना पड़ा, क्योंकि प्रांजल का अपना छोटा सा बिज़नेस वहाँ था। सोने पर सुहागा यह कि वहाँ उसे नया रोल मिल गया वह भी मैनेजर का यानि एक स्तर ऊपर। 
अब यह तो क़तई नज़र आ रहा है कि लाबोनी और महक अपनी अपनी दुनिया में इतनी मस्त हो गईं थी कि भुला दिया एक दूसरे को। सामान्यतः जवान लोग आपस में टच में रहते हैं। इसे एक अपवाद समझिए। ख़ैर, अब महक की दुविधा थी कि प्रांजल के साथ जाए या अकेले? यह एक सुलझा हुआ जोड़ा था… यहाँ समस्या की गुत्थी उलझने ही नहीं दी जाती। देखने को कम मिलता है ऐसा। प्रांजल की पेशकश ऐसे झटपट मान ली गई, जैसे संसद में सांसदों का वेतन वृद्धि का विधेयक बिना बहस के पलक झपकते ही पारित हो जाता है। 
तय यह हुआ कि महक अकेली इंडिया जाएगी। प्रांजल के साथ नहीं जाने के कारण खोजना आप पर छोड़ दिया है। वैसे इतना बता दें कि प्रांजल खामोशी पसंद होने के नाते शोर शराबे से दूर रहने वाला व्यक्ति है। 
महक दो दिन पहले कोलकाता पहुँच गई। गर्मजोशी से लाबोनी ने उसे गले लगा लिया। रात होते ही उन्होंने पुराने दिनों की यादों पर पड़ी धूल को झाड़कर एक बार फिर बाँचा। पेश है उनके वार्तालाप का वह हिस्सा जिससे यह क़िस्सा ताल्लुक़ रखता है:
“शुभम्? शुभम् चौधरी…आई आई टी प्रोडक्ट?”
“येस… ओह, यू नो हिम!”
“मैं तो बस उसका नाम जानती हूँ… कुछ और बताओ उसके…”
“छोड़ो यार… ही इज़ सन ऑफ़ ए बिच…” 
“बंगाली ब्राह्मण और मारवाड़ी परिवार… कैसे करोगी एडजस्ट?”
“यू आर राइट… फ़ैमिली में इशूज़ तो हैं… माई मिल (मदर इन लॉ) इज़ हॉरिबल… हमने कौनसा साथ रहना है?”
“…व्हट अबाउट ठंडा गोश्त इशू…”
“नॉट रिज़ॉल्व्ड… टाइम कहाँ मिला? अब मुझे एक्स्पीरियन्स है… मैनेज हो जाएगा।”
“गुड लक…”
सब गुड न हो तो लक भी कभी कभार कन्नी काट लेता है। शादी मारवाड़ी रीति रिवाजों से हुई। मिल की दबंगई छाई रही। एक बार नहीं कई मर्तबा लाबोनी ने टोका टुकाई की, किंतु हर बार उसके परिवार ने उसे चुप करवा दिया। महक एक मूकदर्शक बनी रही, लेकिन लाबोनी के फ़ैसले पर तरस आ रहा था, साथ ही निहिर पर ग़ुस्सा। ऑस्ट्रेलिया लौटने के बाद एक लम्बे अरसे तक वह लाबोनी की मैरिज के अप्रिय दृश्य दिमाग़ में अटके रहे। लेकिन धीरे धीरे इसलिए धूमिल हो गए क्यूँकि लाबोनी एक बार फिर अदृश्य हो गई। महक के व्हटसएप्प और ईमेल का जवाब नहीं आ रहा था, इसलिए उसने भी पीछा नहीं किया। 
अचानक दो साल बाद इंस्टाग्राम पर लाबोनी को सैर सपाटा करते देखा तो महक को हैरानी हुई,साथ में पीड़ा भी। सोचने लगी वह सिंगापुर कैसे पहुँच गई? चलो जैसे भी पहुँची, लेकिन थोड़ा तो संवेदनशील होना ही चाहिए। पूरे मुल्क में कोरोना की दूसरी लहर के क़हर से लाशों की तस्वीरों से इंस्टाग्राम लबालब है। एक लोबानी है कि सिंगापुर की सुंदरता बिखेरती अपने पिक्स और वह भी विभिन्न पोज़ों में दनादन अपलोड कर रही है। क्रेज़ी!! महक ने अपनी कम्प्यूटर नोट्बुक एक झटके से बंद कर दी। लेकिन झट से दिमाग़ के कम्प्यूटर की मेमोरी के कपाट खुल गए। तीन प्रश्न मस्तिष्क पटल पर प्रकट हो गए। सिंगापुर विज़िट की न्यूज़ शेयर क्यों नहीं की? टूरीज़म है या नई जॉब? पिक में निहिर नज़र क्यों नहीं आ रहा? इन सवालों के बीच उसने एक सवाल अपने से भी किया कि वह पिछले एक डेढ़ साल से लाबोनी से टच में क्यों नहीं थी?
लाबोनी ने कॉल उठा ली। यह कॉल क़िस्से का अहम भाग है, इसलिए पूरी बातचीत सुनते हैं।
“…लो तुम्हारे हर सवाल का जवाब। निहिर और मेरा डिवॉर्स हो गया है…शुक्र है जल्दी हो गया… माई मिल वाज़ ए बिच… यार हमारे यहाँ साथ रहने लगी। बस निहिर की चिंता… उसने क्या खाया, क्या पिया, क्या पहना…दिन रात बस निहिर…निहिर…निहिर। नहीं रहा गया मुझसे.. .एक दिन सुना दिया कि निहिर केन नॉट परफोर्म… यह चिंता करो बुढ़िया। तहलका मच गया… भूकम्प भाई, भूकम्प! मर्दानगी पर हमला जो हो गया था! रेस्ट इज़ हिस्ट्री… तुम ठीक कहती थी… ठंडे गोश्त को गर्म करके देख लेना चाहिए।”
“थोड़ा बहुत तुम एफ़र्ट करती…इट इज़ रिलेटेड टू माइंड… सब ठीक हो जाता है.. .टेन्शन या स्ट्रेस में हर कपल के साथ ऐसा हो जाता है… इट हैपेंस…”
“यार पिच पर टिक ही नहीं पाता था… पहली बॉल से पहले ही हिट विकेट हो जाता था…”
“किसी एक्स्पर्ट की काउन्सलिंग…”
“ईगो… भाई ईगो… माँ बेटे की एक रट… ऑल इज़ वेल।”
“सिंगापुर में…”
“…मैं खुश हूँ… जॉब कूल है..। कंट्री कूल है…एंड सही मायनों में अब है ऑल इज़ वेल…”
अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके हैं हम। क़िस्से के सभी पात्रों से पूर्ण परिचय हो चुका है। किंतु एक किरदार है शुभम्, जिसकी थी  ‘गेस्ट अपीयरेन्स’। चलिए उसके मौजूदा हालत पर एक नज़र। शुभम् है सॉफ़्ट्वेर इंजीनियर, वह भी आई आईटीयन। विदेशों में ये लोग भारी डिमांड में रहते हैं। उसका चयन भी लगभग हो चुका था, लेकिन फ़ोर्मल ऑफ़र लेटर अभी ईमेल नहीं किया गया था। ताज्जुब होगा आपको यह जानकर कि उसे ऑस्ट्रेलिया की जिस कम्पनी ने सलेक्ट किया था, उसकी एच. आर. हेड थी महक। उसे ऑफ़र की जगह गया रिग्रेट लेटर। इसे कहते हैं कर्मा!
कर्मा शुभम् का था तो निसंदेह अन्य पात्रों का भी होना चाहिए। इसका अनुमान आप पर छोड़ते हैं। अरे हाँ, लाबोनी शब्द का अर्थ तो आपको बताना भूल ही गए। लाबोनी माने लावण्यमयी – ए ग्रेस्फ़ुल वुमन। इसी के साथ क़िस्सा – एक मॉडर्न क़िस्सा ख़त्म।
कवि, कहानीकार, विज्ञान विषयों के लेखक, समाचारवाचक, ब्रॉडकास्टर, थियेटर आर्टिस्ट और प्रशासक. आकाशवाणी में 1991 से 1995 तक प्रोग्राम इग्ज़ेक्युटिव के पद रहते हुए साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े रहे. मो:9968312359 ईमेल:gandhiak58@gmail com

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