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निर्मल जसवाल की कहानी – अजनबी

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‘हाथ की गर्मी और उसके होल्ड करने से ही आदमी की शख्सियत और उसकी चाहत का पता चल जाता है…?’ शाईनी, शाईनी- ‘सुर्दशन धर’ उदासी से भरा, विस्थापित कश्मीरी युवक के, फोन पर बातचीत के शब्द थे। मुस्कुराई… शाईनी मेरा पीछा कर रहा है। हँसी। 
अलबानिया के सौन्दर्य को वह देखना चाहता था। सौन्दर्य बोध पर वह घण्टों बात कर सकता था। तरतीब से बने छोटे-छोटे गांवों में घर, वहाँ के पहाड़ और सबसे अधिक वहाँ की राजधानी ‘तिराणा’ में उसको अपने एक कश्मीरी दोस्त से मिलना था। वह विस्थापित कश्मीरी, उसी के गांव का करीबी था। शायद शाईनी अलबानिया में ही रहने का सोच रहा हो।
‘कश्मीर में क्या है, और जम्मू में भी क्या? केवल विस्थापितों का शहर-’ वह कहता।
…..
’डर-डर कर रहना भी कोई जीवन है। इश्क् भी ढंग से नहीं कर पाता (वह हँसने का यत्न करता है)। जॉब का भी रिस्क रहता है – रिस्क ही रिस्क है मेरी जान-’ उसका लटक-लटक कर बोलने वाला कश्मीरी लहजा उसे खिन्न् करता।
‘अरे… ज़ुबान बड़ी फिसल रही है… किस-किस से इश्क किया है आज तक?’
‘यह पूछो किस-किस से नहीं किया, छोड़ो कुछ और पूछो… लगभग दर्जनों इश्क के इम्तहान पास कर चुका हूँ…’
‘शट अप!’ वह कहती। वह बेतहाशा हंसता।
इस तरह श्रीनगर से जम्मू और जम्मू से नई दिल्ली कई बार उसका आना जाना हुआ। उसकी उत्सुकता बारिश के बुदबुदों जैसी छपाक् से उड़ती, जमीं पर गिरती और फूट जाती। सम्मोहन सा था उसकी बातों में परन्तु कभी ऐसी डोर न खिंची जो खिंचती चली जाती।
शाईनी से लगभग अब प्रतिदिन बातें होने लगी। उसे अलबानिया न आने का और न मिलने का अफसोस था। 
‘हम बादलों की छिटपुट टुकड़ियां हैं, इकट्ठी हो बरस पड़ने को तैयार’- वह कहता।
‘अच्छा यहाँ तो सूखा पड़ा है, बादल तो चाहिए ही-बरसने के लिए भी, तर करने के लिए भी।’
“…तर होने के लिए जमीं जहाँ तहाँ फट रही है… “ वह कहती। 
‘तो पुकार लो-कभी बैस्टरन ठण्डाई भी तो आ सकती है।’ वह ठठाकर हँसता।
‘अभी बच्चे हो तुम-लड़कपन है। मेरे से 5-6 वर्ष छोटे…’ डांटती है। ’तुम दर्शन के विद्यार्थी हो… कविता कब से?’
‘जब से तुम मिली…’
‘मिली? कब मिली? कहाँ मिली? पूरा या अधूरा भी नहीं जानती मैं तो तुम्हें?’
‘जानने के लिए… नाम ही काफी नहीं-’ उसका आशय ‘धर’ प्रति जाति कश्मीरी नाम से था।
‘तुम कश्मीरी को जानने के लिए पूरा भूगोल खंगालना पड़ेगा…’
‘वैसे मेरी कोई दिलचस्पी नहीं तुम में…’ वह भी झूठा आक्रोश दिखाती।
वह झट से फोन बन्द कर देता।
और 5-7 दिन पश्चात् मैसेज कर पूछता… कितनी जानकारी हुई? अगले दिन फोन करके अपना पता, घर वालों की हिस्ट्री, अपने कालेज का पता दुहराता… सारे खानदान की फोटो भेज देता।
श्री नगर से जम्मू और जम्मू से फिर ट्रेन में कभी-कभी वह ह्मूमन रिसोर्ज विभाग दिल्ली जाता, रास्ते में चण्डीगड़-पंचकुला पड़ता है… कहती तो टाल जाता और हंसता ‘अभी इश्क् के इम्तहान हैं न जाने कैसे-कैसे?’ और रहस्य की कालिमा छितरा देता। कुरेदने पर कहता-मिलते हैं न कभी जल्दी ही।
और एक वर्ष यूं ही बीत गया।
वह उसे कहां मिला कैसे मिला। दिमाग के इधर उधर बिखरे खानों में वह ढूंढती। 
दरअसल शाईनी ने इस अन्तरराष्ट्रीय कवियों के समूह अलबानिया में प्रथम बार ही इत्तेफाकन हिस्सा लेना था। उस सभी में से एक इटली की कवियत्री और एक युवा कवि जो कश्मीर से हिस्सा लेने वाला था ने आकर्षित किया। टेलिफोन से बात हो गई। बड़ा ही दिलफेंक, दिलकश और जादुई बातों के व्यक्तित्व वाला लगा वह… 
वह था शाईनी – पूरा नाम सुदर्शन धर।
’अरे मेरा नाम सुदर्शन, यू नो… गुड लुकिंग… तो शाईनी हो गया न …………..’
उसका नाम उसने पूछा ही नहीं।  उसी ने नाम बताया मैं ‘सोहणी’‘ वह हँसा।
‘तो मैं दिल्ली एयरपोर्ट पर मिलूंगी वहाँ से अपने गन्तव्य स्थान पर। वो लियोनी भी यू. एस. से पहले ही दिल्ली आई हुई है… वह भी हमें एयरपोर्ट पर ज्वाईन करेगी…….’
‘ओ.के टेक इट इजी। हम अपने मुल्क के हैं, मैं तो आपके साथ ही रहूंगा… लियोनी के साथ उसका दोस्त भी है….’
अरे उसे तो इतनी जानकारी ही नहीं थी, न जानने का प्रयत्न किया। बड़ा तेज लगता है, चलो उसके विचार भी सुनेंगे। कहता है मैंने अरविन्दो की फिलासफी पर काम किया है।
इटली वाली को इंगलिश नहीं आती थी, एक लद्दाखी था। बाद में बड़ी दिलचस्प बात यह रही कि वे दोनों बातचीत का जरिया-इंगलिश अनुवाद से फोन पर टाइप करके दिखाते।
निश्चित दिन, समय पर वह दिल्ली एयरपोर्ट पहुँच गई। यू.एस. वाली ने अपने नाम की तख्ती पकड़ी हुई थी… लियोनी। उसकी आँखें उसके ब्वाय फ्रैंड को तलाश रही थी।
दूर किसी कोने में गोरा सा, लम्बा, बेतरतीब कपड़ों में, घुटनों पर कहीं-कहीं फटी जीन्स, पहने एक युवक मोबाइल से चिपका हुआ था। वह उसे देख उधर लपकी… शायद वह सुदर्शन हो कश्मीरी युवक सा आभास दिया उसने।
तभी लियोनी ने उसे आवाज़ दी ‘निक्क’… वह ठिठर गई।
लियोनी से उसने परिचय दे हाथ मिलाया, उसने उसी वक्त मोबाइल में इंग्लिश से कुछ लिख कर पढ़वाया।
‘सो वी आल गोईंग टू अलबानिया-’
वह मुस्करायी।
हवाई जहाज एक घण्टा लेट था।
तभी उसकी रिंग-टोन बजी। सुदर्शन था… मेरी फ्लाईट मिस हो गई… किसी कारणवश श्रीनगर से अब दो दिन कोई फ्लाईट नहीं… सॉरी… सॉरी… अलबानिया नहीं जा सकूँगा……’
लो आरम्भ होने से पहले ही कहानी खत्म हो गई। श्री अरविन्दो को अपने साथ ही वह ले गया। कोई बात नहीं वहाँ कोई न कोई तो ऐसे चिन्तक होंगे ही। परन्तु क्या सचमुच ही कहानी आरम्भ नहीं हुई-?
उसके दिलो-दिमाग पर वह छाया रहा।
वह अलबानिया में वक़्त-बेवक़्त व्हट्सअप पर उसे तलाश करता रहा या यूं कह लो तंग करता रहा। अब क्या हो रहा है? आप कैसी दिखती हैं… उम्र कितनी है… फोटो में यंग तो नहीं लगती?
‘ऐसा करते हैं… मेरे आने पर आप पंचकुला आना… फिर फिलासफी झाड़ना-’ 
‘अरे…! आप पंचकुला यानि चण्डीगढ़ से हैं। श्रीनगर तो बहुत दूर है। मेरी तो तनख़्वाह भी कम है…’ फिर शरारत से हंसा।  ‘अच्छा इश्क् हो गया तो आऊंगा… आना ही पड़ेगा।’ वह खिलखिला कर बहुत देर तक हंसता रहा। वह भी उसकी हंसी देर तक सुनती रही।
‘बड़ा बेवकूफ है। शतरंज सजी नहीं और घोड़े दौड़ने लगे। देखते हैं इस ‘प्यादे’ को जो ‘बादशाह’ होने का भ्रम पाल बैठा है।
……
चार दिन बाद पांचवे दिन सभी दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरे। अपने-अपने गन्तव्य स्थल जाने के लिए।
इटली वाली और वह लद्दाखी आपस में एक दूसरे को फोन पर पढ़ा पढ़ा कर या इशारों में, हाथ से फिगर बता कर बात करते, वक्त बिता रहे थे। 
लद्दाखी अचम्भित मेमने सा उसे देखने लगता। उसकी ड्रेस ही उसकी मूक भाषा थी। बॉडी लैंग्वेज से ही वे एक दूसरे के कई पहलुओं को छू रहे थे।
फोन की सारी बैटरी नदारद थी… टैक्सी के आने का समय तय था। 
बाहर टैक्सी के नम्बर से पंचकुला के लिए प्रीपेड टैक्सी ड्राईवर को ढूंढ लिया। सभी को हाथ हिलाकर और मुस्कुरा कर बाय किया।
ड्राईवर ने टैक्सी में ही फोन चार्ज के लिए लगा दिया। 
थकान उड़ी हुई थी… नींद भी कहां थी।
अलबानिया के छोटे से गाँव की पहाड़ियों में वह कार में बैठते ही घूम रही थी।
फोन चार्ज होते ही उसे ऑन किया।
उछला फोन टन्न् टन्न् करके कम से कम पचास मिस काल थीं और वह भी श्रीनगर से शाईनी की, कुछ व्हट्सअप पर….. ‘हेलो व्हेयर यू…..’ मैसेंजर में भी……
‘क्या हो गया… यह कहीं मैंटल या किसी मानसिकता का शिकार तो नहीं…?’ डर गई शाईनी को फोन नहीं किया। इस बीच उसका फोन नहीं आया। घर इत्तेलाह कर दी ‘पहुँच रही हूँ’।
…..
घर भी क्या था ‘बसेरा’…। पति नामक पुरुष को आलोप हुए लगभग छह वर्ष हो गए थे। ढूंढते हुए जब थक गई थी तो एक वर्ष पश्चात् बिन डाक पते के एक खत आया था… नीले रंग के कागज़ पर बारीक अक्षरों में लिखा हुआ
‘तलाश न करो— नहीं मिलूंगा-’
अन्तिम विदा-
‘कभी तुम्हारा’
सकपकाई, फिर हँसी फूट गई। एक वर्ष पहले ही कह देता। उसे पता है वह गोरी उसे निकाल कर ले गई है। गज़ब का चिन्तक था उसके पति नाम का पुरुष… ओशो का अनुयायी। यहाँ करनाल में ओशो के वक्तव्य के दौरान उसे वह गोरी मिली थी। सोहणी का तो मोह भंग हो गया था या वह बार-बार जाकर थक गई थी, लेकिन उस ‘पति’ ने वहाँ जाना न छोड़ा था।
ओशो के वक्तव्य ने ही उसे सुझाया- ‘जो व्यक्ति तुम्हें बार बार मिलता है-उसका कर्ज निपटाना है तो जो वह कहता है- सुन लो। जो वह करता है करने दो- थप्पड़ भी मारना चाहे खा लो। उसको जवाब न दो, पलट के फिर कर्जदार न हो जाओ… वह छूट जाएगा तुमसे।’
और यह पति नाम का पुरुष छूट गया उससे। वह चिन्तक तो न बन पाई, लेकिन अपना समय बखूबी व्यतीत करती है। पार्ट-टाईम नौकरी है, खर्च चलता है। अचल सम्पति है… पति-पुरुष के नाम का बड़ा सा फ्लैट। खुश है वह-लोग फ़्लर्ट करते हैं। वह भी जानबूझ कर फ़्लर्ट हो जाती है और फ्लर्ट करने से भी नहीं झिझकती। उसे पता है, शाईनी भी फ्लर्ट करना चाहता है। स्वयं हँस पड़ती है। शाईनी छाया हुआ है।………………
…..
उसके हालात ऐेसे थे कि वह दो नावों का शिकार था। श्री नगर के रैणावाड़ी में रहते, श्रीनगर के कालेज में अस्सिटैंट प्रोफेसरी थी। माँ बाप जम्मू में दहशतगर्दी के शिकार होने से बच कर अपने बीमार ‘‘डाऊन सिंन्ड्रोम’’ ग्रस्त छोटे बेटे सहित रह रहे थे।
शाईनी अपने वर्ग के लोगों के लिए लम्बी लड़ाई में जुटा-कश्मीर नहीं छोड़ना चाहता था। विस्थापित लोग देश-विदेश में बिखर गए थे।
शाईनी जितना भावुक, उतना ही संघर्षशील व अपने हक के लिए अंगद की मानिंद पैर टिकाए हुए।
‘मेरे मित्र कश्मीरी पंडित ही नहीं, दूसरे डोगरी और मुस्लिम भाईचारे के मित्र भी जान की बाज़ी लगा कर भी मुहिम को चला रहे हैं… देखना हम दुबारा स्थापित होंगे। उजड़े को फिर से हरा-भरा बना देंगे।’
‘तुम जम्मू क्यों नहीं आ जाते…?’
‘अरे जम्मू और श्रीनगर युनिवर्सिटी के हालात का पता है तुम्हें। 370 और35 ए हट जाए तो समझें कि कश्मीर हमारा है… सब साजिश है… जम्मू और कश्मीर का अलग-अलग स्टेटस हो तब ठीक।
उसके लहजे से दर्द टपकता, फिर झटके से हँसता कहता, ‘अरे छोड़ो-जम्मू आ गया तो कश्मीर के नज़ारे… डल झील के पानी में तैरते खेत, कोयलें, मयूर, बतखें न छूटेंगे…? तुम आओ तो तुम्हें बादामी केसरी कहवे से लबालब कर दूं या गुलाबी चाय ही पिलाऊं, तिलवड़ों के साथ या वारी मोठ या होगाड़े…’
‘अरे अरे रहने दो…’
‘जन्नत-ए-कश्मीर, कश्यप ऋषि की तप भूमि, कल्हण की गज तरंगिणी, कालीदास का मेघदूत, मुगलों की आरामगाह, शंकराचार्य का साधना पीठ और और केसर, टेसू, गुलाना… क्या-क्या गिनाऊं… नहीं छूटता यह सब सोहणी…’ उसने पहली बार उसे नाम से पुकारा अन्दर तक बेसुध हो गई वह।
‘तुम्हें पता आज भी जब झील के पानी में शिकारा उतारा जाता है तो तमाम ऋषियों-मुनियों की स्तुति की जाती है।’ इसी तरह कभी वह बदहवास, कभी हँसता, बेइन्तहा अपनी फर्राटेदार इंग्लिश से कश्मीर के इतिहास की बातें बताने लगा।
सोहणी उससे मिलने के लिए उत्साहित और लालायित होती गई।
सोहणी सोचती… ‘वह कैसा होगा…’ जो जन्नत की बातें करता, धरती पर रहता है। सोहणी ने तो बता दिया था ‘मैं इस धरती पर रेंगती मानवीय कृति हूँ बस… जी रही हूँ-प्रसन्न हूँ… बंजर धरती में बीज रोपने वाला भाग गया इसलिए कोई फूल न खिला…’ वह भी खिलखिला कर हँसती उसे हवा देती है।
‘बीज रोपने वाला क्यों नहीं ढूंढा… चलो साथी ही ले लेती’- वह कहता। तभी सोहणी एक सन्नाटा बुन देती है।
……
दस-पन्द्रह दिन बाद शाईनी का फिर फोन आता है। उसने समय देखा रात का अंतिम पहर था… दो तीन बार फिर रिंग बजती है। हार के वह फोन उठाती है – ‘क्या है शाईनी, मैं सो रही हूँ…’
‘मेरी नींद उड़ा कर कैसे सो सकती हो जानम… इन दिनों तुम्हारे ख़्यालों में ही खोया रहा… तुम अकेली हो… मैं भी तो तलाश में हूँ… वह बोझिल नींद के झोंकों से झांका।
‘क्या बक रहे हो, हम दोस्त हैं… मैं 5-6 वर्ष बड़ी हूँ तुमसे…’ उसका पति पुरुष उससे तीन वर्ष छोटा था। उसकी जुबां लड़खड़ा उठती है।
‘फिर क्या हुआ… मुझे तुमसे लगाव सा हो गया है। तुमसे बातें न करूं तो चैन नहीं आता। वान्ट टू टेल… सिरियसली… मेरे जीवन में नो बाडी नाऊ…’ वह स्पष्ट करता है।
‘यह लगाव नहीं इटस क्रेजीनैस… एक्च्यूली यू वान्ट वाडी…? यू सर्च इन यूअर कालेज और एनीवेयर एल्स…’ सोहणी को कुछ नहीं सूझता…’ खाली है खेलना चाहता है… स्टुपिड…!
‘सोहणी – जस्ट ओपन यूअर हार्ट- दिमाग का दीया न जलाओ… दिल में रोशनी करो… हमें एक दूसरे की जरुरत है… आओ, प्लान करो तुम्हें शिकारे में लेकर घुमाऊं कभी… वी बोथ नीड कम्पनी।
‘तुम क्यों नहीं आते… यह उतावलापन क्यों। सभी वर्जनाओं को लांघ कर उड़ रहे हो।’
शाईनी ने अपनी असमर्थता दिखाई… ’क्या है जो वह जम्मू आकर श्रीनगर वापिस चला जाता है…’ सोहणी को अजीब लगा। वह गहरी नींद में सो जाती है।
…..
दो तीन दिन पश्चात् रात के दो बजे मोबाईल झनझनाता है… शाईनी था… आवाज़ में घबराहट थी
‘प्लीज तुम्हें अम्बरसर में कोई जानता है-?’
‘मतलब…?’
‘कोई आई स्पेश्लिस्ट-? मेरा छोटा भाई है न, ही इज़ सफरिंग फराम डाउन सिन्ड्रोम… अब अचानक उसकी पूरी रोशनी जैसे गायब हो गई है। माई पुअर चाईल्ड……..’ और वह फूट-फूट के रोने लगा।
सोहणी को सूझ नहीं रहा था वह क्या कहे। जम्मू डाक्टरों को दिखा कर पस्त हो चुका था। उसे किसी ने डा. दलजीत के अस्पताल में दिखाने को कहा था।
‘अच्छा कल सुबह पूछ के बताती हूँ… जानकार तो है… सुबह तो होने दो…।’
सोहणी को लगा जैसे बड़ा सा पत्थर सटाक् से छाती पर पड़ा हो। शाईनी ने कभी भी ऐसा कुछ न बताया था, न ही कभी उदास सी आवाज थी। उसने एक हिचकी में ही बता दिया कि-
‘सोहणी मेरे चारों और घुप्प अन्धेरा है… अलगाव वादियों से डर कर मेरे मां-बाप जम्मू रोशनी की तलाश में रह रहे हैं। मैं सन्नाटे में तारों को गिनता रात-दिन अकेले सफर में हूं। इन ब्रह्मांड के दार्शनिकों का क्या करूं… मैं तो जी जाता हूँ, परन्तु मेरे इर्द-गिर्द के इन टिमटिमाते दीयों को कैसे बचाऊं जो बुझने की कगार पर है।’
उसका एकमात्र परिवार संकट में था। उसके छोटे भाई के डाउन सिन्ड्रोम के कारण नहीं, बल्कि अचानक उसकी आंखों के आगे अन्धेरा छाने के कारण, वह अन्धकार में चला गया था।
उसने अमृतसर अपने जान पहचान के डाक्टर से बात की, तारीख दिन तय किया। शाईनी ने कहा ‘भाई तो नहीं आ सकता लेकिन उसकी मैडीकल रिपोर्टस फोटो कापी सहित लेते आऊंगा… भाई तो बहुत सेंस्टिव है… कैसे जम्मू से अमृतसर का सफर तय करेगा…’ वह रुआंसा हो गया लगा।
वह जैसे उसके सारे दर्द को समेट लेना चाहती थी। चाहती थी देखे उसका कैसा दगदग करता चेहरा होगा जो इतने सारे दुःखों सहित रोमांस में जीवित सांसे ले रहा है- उसकी नब्ज जैसे दूसरों को जीवन प्रदान कर रही है। उसके प्रति जो भी नैगेटिव विचार थे सारे के सारे आसमान से गिरते छींटों से धुल गए… उससे मिलने की तीव्र इच्छा जागृत हो गई।
प्रातः 6 बजे वह जम्मू से वोल्वो में अमृतसर के लिए रवाना हुआ। वह भी प्रातः 6 बजे चन्डीगढ़ वोल्वो से अमृतसर के लिए चली। एक ही आगे पीछे का समय… कुछ-कुछ समय के अंतराल पर दोनों एक दूसरे को फोन पर पूछते रहे कि कहाँ-कहाँ पहुँचे हैं? वह बेहद थका हुआ था और सो गया। नींद तो तभी उचट गई थी जब उसने मासूमियत से अपने भाई और माता पिता के दर्द को अपने कंधों पर समेटने की बात कही थी। आज का श्रवण था वह। 
एक कश्मीरी युवक… स्वप्न-विहीन, बस ठोकर खाता, आगे ही आगे बढ़ रहा था। अस्थाई नौकरी, अरविन्दो, विवेकानन्द और ढेर सारे चिन्तकों को अपने माथे के तीसरे नेत्र में समेटे स्थायी… अस्थायी, न्याय-अन्याय में झूलता, अपने प्रान्त की खुशहाली के लिए लम्बी लड़ाई से जूझ रहा था… ‘370, 35ए हटे तो हम समझें हम भी भारतवासी हैं… गर्व से कह सकूं… हां मैं कश्मीरी हूं।’ वह उदासी और परेशानी को हंसी में उड़ाता कहता था।
…..
अमृतसर का बस स्टैण्ड… माई गॉड। अकेली औरत और इन्तजार… आगे पीछे आवारा कुतों से सूंघते अच्छे खासे दिखते युवक। आवाक्- वह क्षण् किसी तरह बीत जाए और वह आए- शाईनी। यहीं तो आना था- एक दुबला-पतला, लम्बी कद काठी वाला युवक दो-तीन बार सामने से गुजरा- प्रथम बार ही साक्षात्कार होना था। कुछ कुछ शाईनी ही लगा कि उसने मुझे पीछे से आवाज़ दी-
‘कितनी देर से इन्तजार है?’ पलट कर देखा। वही युवक था, उसने भी सोहणी की फोटो ही देखी थी।
तो आज फोटो से फोटो का साक्षात्कार हो रहा था। हँसी… वह भी कुछ सोच कर हंसा।
वह आम कश्मीरियों से हट कर था। लम्बी तीखी नाक, रंग हल्का सांवला, दांत झक सफेद, होंठ पतले, बाल लगभग कटे हुए, सचेत कान, आंखों में एक विशेष चमक।
‘तुम तो मेरे बराबर की लगती हो… टिपीकल पंजाबी’, शाईनी ने उसकी आंखों में झांक कर देखा।
‘और तुम तो मिक्स्ड ब्रीड लगते हो…’ वह चौंका।
‘मतलब…?’
‘मतलब… मैं समझी थी, तुम गोरे चिटटे होगे? पर तुम ब्राह्मण होकर भी बनिए लगते हो… क्या बात है? खिलखिलाई वह…  वह सोचते आगे बढ़ा। समय कम था… उन दोनों को वापिस भी जाना था और तीन-चार आँखों के  अस्पतालों में सारी रिपोर्ट्स दिखानी थी। आटो लेकर पहले डा. दलजीत के अस्पताल गए। बाजार सुनसान सा था। वह चौंकी अमृतसर की रौनक कहाँ गई? पता चला आज ‘घल्लूघारा दिवस’ है। ओह! वे दोनों डर गए। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस।?
वे दोनों एक दूसरे से उचित दूरी बनाए, अपने अदृश्य औरा के बंधन में बंधे, यहाँ से वहाँ, कभी आटो, कभी रिक्शा में जाते और अस्पताल से ठीक तीन बजे फ़ारिग़ हो गए।
कहीं कोई रेस्तरां, माल खुला न था। आज बन्द था। दोनों ने कुछ न खाया पिया था। एक दूसरे को देखने की लालसा में, एक दूसरे से आंखें चुरा रहे थे। शाईनी बेहद चुप और रहस्यमयी लग रहा था… वह भी भूली भटकी हँस पड़ती, कोई न कोई चुहलबाजी करती। 
‘कितनी ढेर सारी बाते करनी हैं…’ वह सोचकर आई थी। लेकिन सुबह की किरणें धीरे-धीरे निस्तेज हो गईं। उसे पता था अजनबी, अजनबी राहों पर ही मिलते हैं, एक सन्नाटा बुनने के लिए, कुछ क्षणों के लिए, और चले जाते हैं, एक दूसरे के लिए अजनबी बन कर… अजनबी राहों पर।
विदाई का समय आ गया। शाईनी ने 4.30 बजे एयर-कंडीशन बस पकड़नी थी। उसकी 4.30 बजे अंतिम बस वोल्वो निकलनी थी। हड़बड़ाहट में थे दोनों। उन दोनों को समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या बात की जाए…, यही पल था– निर्णय का पल… क्या हैं वे एक दूसरे के…? शिकारा, कश्मीर की वादियों की बर्फीली चमकती सूर्य लौ या जम्मू की झुलसती, तपती सूर्य की कटार सी भभकती अग्नि—?
अचानक शाईनी ने कहा ‘चलो मैं तुम्हें बस तक छोड़ आऊं –’
‘अरे यहीं शेरां वाले गेट से ही तो दोनों बसें निकलनी हैं–’
‘तो पहले तुम अपनी बस में बैठ जाओ—’
अब वे और भी अजनबी हो गए। उन दोनों ने एक दूसरे को एकदम से चौंक कर देखा। फोन पर बातें करते कई बार फलाईंग किस, मुहब्बत की रहस्यमयी बातें, एकान्त की, तन्हाई के दर्द को बांटा था… लेकिन जब वे एक दूसरे के सम्मुख हैं तो… तो… आने पर ही उन्होंने एक दूसरे का आलिंगन तो क्या, हाथ तक नहीं छुआ था। कल्पना के शिकारे में वे दोनों कश्मीर और देश की राजनीतिक-सामाजिक उलझनों को, समस्याओं को अपने-अपने ढंग से.. बातों में उलझाते और सुलझाते रहे थे। एक सकुचाहट थी… वे एक दूसरे का स्पर्श भी न कर पाए।
सोहणी बस में बैठी खिड़की से शाईनी को धीरे धीरे कदम रखते, दूर जाते देखती रही, वह भी उसे रुक-रुक मुड़-मुड़ देखते रुक जाता।
अचानक सोहणी बस से एकदम से उतरी ’शाईनी‘… वह चिल्लाई।
वह एकदम पलटा… लगभग दौड़ता हांफता आया… ‘क्या हुआ-कुछ रह गया।’
‘हां…! तुम्हें छूकर नहीं देखा… ठहरो तुम्हें छू तो लूं…’
और वे दोनों एक दूसरे से कभी न छूटने के लिए आलिंगनबद्ध हो कर लिपट गए। अलग होते ही अपनी-अपनी बस की ओर अग्रसर होने लगे। फोन करना… वे दोनों एक साथ बोले और मुसकुरा दिए। अनंत तृप्ति और तुष्टि की सुगन्ध से ओत-प्रोत उनके चेहरे दमक रहे थे।

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