“साले, तेरे दिमाग में ये ऊटपटांग बातें आती कहाँ से हैं? यहाँ तो दाल रोटी के जुगाड़ में हम दुबले हुए जा रहे हैं और एक तू है – “फिकर न फाका, अल्लाह मियां से नाता” वाला हाल है. अच्छा ये बता, ऐसा करने से होगा क्या? तुझे क्या मिल जाएगा? कोई पद्म श्री या पद्म विभूषण तो मिल नहीं जाएगा, रहेगा तो तू यही न, फिर क्यों हलकान हो रहा है?”
“यार पता नहीं इससे कुछ होगा या नहीं, लेकिन एक बार जानना चाहता हूँ, पता तो लगे अपने बारे में” कुर्सी पर पसरते हुए उसने कहा.
“तो उसके बाद होगा क्या?” असमंजस में दोस्त ने पूछा.
“पता नहीं” असमंजस में ही उसने जवाब दिया.
“फिर इतनी कवायद किसलिए?” परेशान स्वर में दोस्त ने कहा.
“वो भी पता नहीं”
जब तुझे कुछ पता ही नहीं फिर बेकार की रामायण क्यों बाँच रहा है?” झल्ला उठा दोस्त.
“बेकार की नहीं, कार की है”
“अच्छा कैसे?”
अरे, तू बाल की खाल मत खींच. बस मैंने तुझे बता दी अपने मन की बात. अब ज्यादा बहस मत कर” कह घर को चल दिया. जैसे सरकारी आज्ञा हो, माननी ही पड़ेगी. अजब मिजाज़ का मालिक था वो. जिसे जो चाहिए तो बस चाहिए. जो करना है तो करना है. न समय का ख्याल न उम्र का न किसी के जज्बातों का. ऐसे खब्ती भी कम ही होते हैं लेकिन जो होते हैं तो वो कुछ भी कर गुजरते हैं जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. उस पर ये जनाब तो आर पार की लड़ाई लड़ते हैं हमेशा.
***
“तुम एक नंबर के खडूस हो, तुम सिर्फ अपने लिए जीना जानते हो, तुमने कभी किसी की परवाह नहीं की, सिवाय खुद के” – पहली प्रतिक्रिया राघव की मिली तो पढ़कर मुस्कुराकर रह गया. ‘चलो उसके दिल की भड़ास तो निकली इसी बहाने’ सोच खुश हुआ
“तुम्हारे बारे में एक अच्छी बात है तुम निस्वार्थ भाव से सबके काम आते हो” जैसे ही मधुर ने कहा चेहरा गर्वीली मुस्कान से भर उठा और गर्दन थोड़ी और तन गयी.
“तुमने मेरी उस वक्त मदद की जब बिरादरी से मुझे निष्कासित कर दिया गया था” मनोहर ने कहा तो आँख के आगे वो समय आ गया जब गाँव में मनोहर के परिवार को छोटी सी बात पर बिरादरी से बाहर कर दिया था तब उसने ही सबको समझाया और उसके बारे में सही बात बतायी. सुनी सुनाई बातों पर भरोसा मत किया करो, पहले पता कर लिया करो. ये तो मनोहर से रोहन जलता है इसलिए उसके बारे में अफवाह उड़ा दी थी और मैंने ही उसे निर्दोष साबित किया था, सोच खुद के लिए फक्र महसूस हुआ.
“तुम एक जिंदादिल मित्र हो” पढ़ मुस्कान अब खिलखिलाहट में बदल गयी जब श्याम की प्रतिक्रिया मिली.
“तुम्हारा गुस्सा किसी तूफ़ान से कम नहीं, जिसकी जद में कोई आ जाए तो बचना असंभव है पापा, और अक्सर यही तो होता रहा हमारे साथ. बात बेबात गुस्सा करना आपकी आदत रही. नहीं जानता आपने कभी प्यार से हमारे बारे में बात की हो. आप तो जैसे हम सबकी शक्ल देखकर ही चिढ जाते थे जैसे हम आपके नहीं किसी दूसरे के बच्चे हों”  बेटे के शब्द तीर से सीने में घुसे और दर्द की एक लहर सी पूरे बदन से गुजर गयी. ये क्या कह दिया बेटे ने. उफ़! सच कितना तीखा होता है, ये आज पता चला सोचते हुए आगे हिम्मत कर बढ़ा.
“पापा, तुम सदा डिक्टेटर रहे. सब बस तुम्हारा हुक्म मानें, जो तुम चाहो वो ही करें. तुम्हारे में लोकतांत्रिकता का सदैव अभाव रहा. कभी हमें खुलकर जीने ही नहीं दिया. एक एक सांस हम डर डरकर लेते रहे. क्या हम इंसान नहीं? क्या हमारी अपनी कोई चाहतें नहीं? कभी आपने जानना ही नहीं चाहा आखिर हम क्या चाहते हैं, बस अपनी मर्ज़ी थोपते रहे जैसे हम इंसान न होकर पपेट हों” बेटी का कहा पढ़ा तो सहम गया, कितनी कटुता भरी है अपनी ही बेटी के मन में मेरे प्रति, जीना ही धिक्कार है मेरा. मैंने सबके भले के लिए सख्ती बरती तो क्या मैं डिक्टेटर हो गया? प्रश्न काँच सा चुभा. अन्दर कुछ तिड़क गया. आँख बंद कर बैठ गया. क्या अपने बच्चों के लिए थोड़ी सख्ती करना गलत है? क्या उन्हें सही राह पर चलाने के लिए यदि उनके मन का नहीं किया तो मैं बुरा हो गया? हिम्मत ही नहीं हो रही थी आगे बढ़ने की. ‘क्या इससे भी कड़वा कुछ और बचा है कहीं’ सोचने लगा. ‘क्या और प्रतिक्रिया मैं पढ़ सकूँगा?’ प्रश्न दस्तक देने लगे.
“तुम बहुत संवेदनशील व्यक्ति हो. किसी की भी तकलीफ में बहुत जल्दी दुखी हो जाते हो”, सीमा भाभी ने कहा तो अच्छा लगा. जैसे किसी ने दो बूँद ज़िन्दगी की दे दी हों. अपनों की चोट से उबरने के लिए जैसे भाभी ने शब्दों की मरहम लगा दी.
“तुम सब पर विश्वास कर लेते थे जिसके कारण अक्सर धोखे खाते थे” लख्ते जिगर यारों के यार विश्वास ने कहा तो जो थोड़ी देर पहले बेटे और बेटी ने कहा उस पर जैसे किसी ने गुलाबजल का ठंडा का फाया रख दिया हो.
“तुम में अहंकार कूट कूटकर भरा है. जब भी तुम्हारे अहंकार को ठेस लगी तुमने दूसरे पर हावी होने की कोशिश की” अमित ने कहा.
“तुम क्या चाहते हो ये तुम किसी को नहीं बताते. अन्दर ही अन्दर घुटना तुम्हारी आदत रही, जिसके कारण डिप्रेशन के शिकार हुए” अविनाश की बात सौ फ़ीसदी सच है. कितना अच्छे से जानता है मुझे. सच वो दोस्त ही क्या जो दोस्त के दिल की बात नहीं जान सके, ऐसे ही नहीं कहा गया’ सोच हलकी सी मुस्कान तैर गयी.
“रिश्तों में अपनापन रहे, यही चाहा मगर इसी से सदा वंचित रहे” ओह! रूबी, मेरी सेक्रेटरी, कैसे सब समझती है, जो शायद मेरे अपने बच्चे भी नहीं समझ पाए. शायद उनका बचपना है, नासमझी है तभी इतना कह गए. जीवन का अनुभव ही इंसान को मुकम्मल बनाता है. रूबी, उम्रदराज महिला है तभी सब समझती है और एक ही पंक्ति में कितनी गहरी और सच्ची बात कह दी.
“जो तुम्हें समझता हो ऐसा तुम्हें कभी कोई नहीं मिला जिसने तुम्हारे अन्दर एक निराशा को जन्म दिया जो अक्सर तुम्हारे लेखन में नज़र आता” विकास मेरा लिखा हमेशा पढता है, जानता हूँ, लेकिन ये तो जैसे लेखन के माध्यम से मुझे ही पढने लगा है. क्या सच में मैं अपने लेखन में अपनी निराशा या कुंठा जाहिर कर देता हूँ? लगता है अब सावधान रहना होगा. जो भी कहना होगा तटस्थ होकर कहना पड़ेगा.
“तुम्हारी कहानियों में तुम्हारे जीवन की कुंठा परिलक्षित होती है” ओह! यानि और लोग भी समझ रहे हैं, सोच पसीने पसीने होने लगा.
“स्त्रियों के प्रति तुम्हारा पितृ सत्तात्मक नजरिया तुम्हारी हर कहानी में झलकता है” हुंह! अब स्त्रियाँ हैं ही ऐसी तो झलकेगा ही न. इन्हें जब तक लताड़ा न जाए, कहाँ लाइन पर रहती हैं. कहने दो, परवाह नहीं, कह खुद को तसल्ली देता रहा.
“तुम पितृ सत्तात्मकता के पोषक हो” हाँ, हाँ, क्यों नहीं, ये आरोप लगाने का साले तुझे मौका जो मिल गया. मेरा प्रतिद्वंदी ठहरा तो आज मौका मिला है इसलिए बहती गंगा में हाथ धोने ये महाशय भी चले आये. तो क्या हुआ, जब पोस्ट सार्वजनिक है तो कोई भी कुछ भी कह सकता है.
तुमने किसी के भी जीवन के सत्य उघाड़ने में कभी परहेज या लिहाज नहीं किया तभी देखो कितने अकेले हो, ये तुम्हारी सफलता नहीं, हार है” कजिन कम दोस्त का लिखा जब पढ़ा तो जैसे दिलो दिमाग के तोते ही उड़ गए. ओह! कितनी कटुता सबके अन्दर भरी होती है लेकिन कोई किसी को कुछ कहता नहीं. यदि सच में कह दे तो रिश्ते तो शायद कहीं बचें ही नहीं. चलो आज पता तो चला. साला जलता है मुझसे तभी ऐसा कह रहा है.
“तुम स्वयं को शिखर पर देखते हो लेकिन कभी ध्यान से देखना लोगों की आँखों में, वहां तुम कहाँ हो, नज़र आ जायेगा. कोई मुंह पर सत्य नहीं कहता मगर पीठ पीछे सारे सत्य उघडे मिलते हैं” रघु की बातों ने रहा सहा दम भी निकाल दिया. निढाल होकर कुर्सी पर पीछे टेक लगाकर बैठ गया. आँखें बंद कर लीं और आत्मावलोकन करने लगा. थोड़ी देर बाद खुद को संयत किया और आगे बढ़ा.
“तुम अपने बारे में जानना चाहते हो, तो क्या माद्दा है सच सुनने का? चलो हो न हो, अब तुमने कहा है नाराज़ नहीं होओगे तो बताती हूँ तुम्हें. वैसे अब तुम नाराज़ भी हो जाओगे तो भी फर्क नहीं पड़ेगा. कम से कम जो सारी ज़िन्दगी न कह सकी, आज कहने का मौका तो मिला. सुनो, तुम्हारा मेरा सम्बन्ध सिर्फ तन का रहा, मन की सीढ़ी तो तुम कभी चढ़े ही नहीं. तुमने कभी जानना ही नहीं चाहा, आखिर तुम्हारी पत्नी चाहती क्या है? क्या तुमने कभी एक पल भी मेरी परवाह की? मैं बीमार पड़ी तो मायके भेज दिया ताकि तुम्हारी दिनचर्या पर फर्क न पड़े. बच्चों के लिए माँ और बाप दोनों मैं ही रही. तुम तो सिर्फ ऑफिस या अपने लेखन तक सीमित रहे. तुम्हें पता ही नहीं कैसे तुम्हारे बच्चे बड़े हुए, कैसे उनके विवाह हुए. तुमसे कोई यदि ये भी पूछे न, तुम्हारी पत्नी को कौन सा रंग पसंद है, या कौन सी मिठाई पसंद है या फिर कहाँ जाना वो पसंद करती है, यकीन से कह सकती हूँ तुम पूरी ज़िन्दगी बिताने के बाद भी आज नहीं बता सकते. तुम्हारे लिए मैं एक प्रायोगिक वस्तु से ज्यादा कुछ न रही. तुमने तो वहां भी अपनी ही चलाई. तुम मुझे न तन से तृप्त कर पाए न मन से – तो बताओ जरा, मैं क्यों तुम्हें याद करुँ? जिस दिन तुम मेरे जीवन से चले जाओगे न, उस दिन मैं आज़ाद हो जाऊँगी इस अनचाहे सम्बन्ध से. फिर मैं कुछ समय अपने लिए जीना चाहूँगी. खुली हवा में सांस लेना चाहूँगी. कुछ अपने मन का करना चाहूँगी जो तुम्हारी बंदिशों की वजह से कभी नहीं कर सकी. आखिर गृहणी हूँ न, तुम्हारी दी भीख पर जिंदा रहना मेरी नियति है, यही तुमने माना. मगर तब अपने दम पर जीयूँगी. अपने लिए सिर्फ अपने लिए…..सुन रहे हो न…..तुम तो जानते हो, अपने लिए जीना क्या होता है” सुरेखा ने इतना कड़वा सच कहा कि पैरों तले जमीन खिसक गयी. हाथ पाँव फूल गए. कुर्सी से खड़ा हुआ तो पैर लड़खड़ा गए और धम्म से फिर बैठ गया. साँसें धोंकनी के समान चलने लगीं जैसे अभी मीलों दौड़ कर आया हो. पसीने से तरबतर हो गया.
एक एक कर सबने अपने मन की बात कह दी. आज तो मौका मिला था फिर कौन नहीं चाहता बहती गंगा में हाथ धो ले, इतने समय से जो अन्दर ही अन्दर उफन रहा था. आज उसने स्वयं मौका दे दिया था तो कैसे न संभव होता कोई इस मौके को हाथ से जाने देता. सभी पृथ्वी राज चौहान बन निशाना लगा रहे थे. पढ़कर निढाल हो गया वो. एक आंतरिक बोझ महसूस होने लगा. अपना विश्लेषण करने लगा.
‘मैं कितना स्वार्थी रहा ये आज पता चला. किसी के लिए मेरा होना मायने नहीं रखता. ऐसे जीवन का फिर क्या औचित्य? जो इंसान अपने घर परिवार को खुश न रख सके, उसके लेखन का भी आखिर क्या औचित्य? जो जीवनरेखा को ही नहीं साध पाया वो किसी को क्या दिशा दे सकता है. बेकार है मेरा लेखन. इतना लिखा, शीर्ष पर पहुँचा मगर अपनों के दिलों में ही मेरे लिए जरा सी जगह नहीं, फिर इस ऊंचाई का आखिर क्या औचित्य? किसे धोखा दे रहा हूँ? ज़माने को या खुद को? हाँ, शायद खुद को ही उम्रभर धोखा देता रहा और अपनी पीठ आप थपथपाता रहा. काश! आत्ममुग्धता से बाहर आया होता तो आज दिल से सभी मुझे चाहते. मैंने ही अनचाहे अपने और उनके मध्य एक अनजानी लकीर खींच रखी थी जिसके उस पार कभी मैं न गया और इस पार भी किसी को आने नहीं दिया’ सोचते सोचते पूरा शरीर पसीना पसीना हो गया. एक थरथराहट सी महसूस करने लगा. घबराहट का दौरा सा पड़ गया और एक अजीब सी  बेचैनी ने धावा बोल दिया. उठने की असफल कोशिश में हाथ पाँव मारने लगा लेकिन जैसे कुर्सी ने उसे अपनी ओक्टोपसी भुजाओं में जकड लिया हो. वो कोई मच्छर हो जो मकड़ी के जाले में फंसकर फडफडा रहा हो.
इधर वो अपने आप से लड़ रहा था तो उधर एक चर्चा का विषय बन गया. एक तरफ सभी अपनी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे दूसरी तरफ सबको जैसे एक खेल भी मिल गया था. अब सब ने सोचा ये तो बहुत आसान तरीका है सबके मन की बात जानने का. यदि वो जान सकता है तो हम क्यों नहीं?
सब अपने अपने दोस्तों, शुभचिंतकों, रिश्तेदारों और कुलीग से यही पूछने लगे. सबको उत्तर भी मिलने शुरू तो हुए मगर उसमें भी जरूरी नहीं सभी ने सही उत्तर दिए हों. कुछ नज़ारे तो बहुत ही अजीब देखने को मिले.
जिन्होंने कडवे सत्य बोले वो रिश्तों, दोस्ती और शुभचिंतकों की लिस्ट से निष्कासित हो गए. फिर शुरू हो गयी वर्ल्ड वार थ्री. जहाँ खुलेआम आरोपों प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया. किसने क्या घोटाले किये, किस ने कैसे सफलता के पायदान पर कदम रखा, किसने किसकी चप्पलें उठायीं, किसके पाँव पूजे, किसकी  जेब गरम की और किसके लिए क्या अपशब्द बोले, सबने खुलेआम कहना शुरू कर दिया. एक अराजकता का माहौल उत्पन्न हो गया. जो जगह अभी तक सौहार्द के नाम थी अब राम मंदिर और बाबरी मस्जिद सी बन गयी थी. सबने अपने अपने  हथियार निकाल लिए और करने लगे संबंधों का क़त्ल. जब खूब कत्लोगारत मच गया तब जिसने ये शुरू किया था उसकी पेशी हुई और पूछा गया – आखिर तुमने ये ऐसा मुद्दा क्यों उछाला जिसने यहाँ का अमन चैन लूट लिया? तब अपनी सफाई में वो बोला,
“मैं यूँ तो एक आम नौकरीपेशा इंसान हूँ जिसने घिस घिस कर जीवन गुजारा. कभी किसी का बुरा नहीं चाहा. वहीँ दूसरी ओर मैंने स्वयं को अपने लेखन में जिंदा रखा. बस वो ही ऐसी जगह थी जहाँ मैं खुलकर सांस ले सकता था. जहाँ मुझे आन्तरिक शांति मिलती थी, जहाँ मैं हर तरह का जीवन जी लेता था वर्ना ज़िन्दगी तो सदा दुश्वारियों का दूसरा नाम रही. ऐसे में आज जिस दौर से पूरी दुनिया गुजर रही है उसमें जीवन का क्या भरोसा. एक छींक के आप शिकार हो सकते हैं और आपका काम तमाम. स्पर्श की अनुभूतियाँ जो जीवनदायी होती थीं आज वो ही मृत्युबोध का कारक बनी हैं. दवाई या वैक्सीन कोई बनी नहीं. जिसके कारण आज संसार के हर गली कूचे सूने पड़े हैं, यहाँ तक कि अब तो मन के भी. एक घर में रहते हुए भी एक निश्चित दूरी बनाए रखना यानि संबंधों को भी संदिग्ध बना दिया इसने. एक अदृश्य युद्ध के साक्षी बने हम जीवन का वो युद्ध लड़ रहे हैं जिसमें पता नहीं जीत होगी या हार. सब संदिग्ध नज़र आते हैं यहाँ तक कि अपने भी. ऐसे में क्या बचेगा और क्या मिटेगा कौन कह सकता है. आप अपने घर में ही नज़रबंद हैं. एक ऐसी कैद जिसमें मुक्ति मौत है और कैद जीवन. शायद जीवन का ये दौर भी देखना लिखा था.
वैसे भी आज तो इंसान जीते जी संबंधों से निष्कासित हो रहा है. और निष्कासित भी मर्ज़ी से नहीं, मजबूरी से. पूरे संसार में फैली अफरा तफरी ने आज जीवन पर से भरोसा ही उठा दिया है. सीमायें देश विदेश की हों या राज्यों की सब सील हैं. आप कहीं आ जा नहीं सकते. जो जहाँ फंस गया तो फंस गया फिर उसके पास जीवन जीने के संसाधन हों या नहीं. इस दौर में आप अपनों से मिलना तो दूर उन्हें देखने तक को तरस जाते हैं. अब के बिछड़े कभी मिल भी सकेंगे या नहीं, किसी को नहीं पता. आप का पत्ता कटा तो फिर कटा. शक्ल तक नहीं देख पाओगे. बाकी बातें तो कोई मायने ही नहीं रखतीं. ऐसे माहौल में लेखक तो एक ऐसा प्राणी होता है जो आगे की सोचता है. वो अनदेखा सत्य जानना ही नहीं उसे जीना भी चाहता है. जानना चाहता है आखिर जब वो नहीं रहेगा तब लोग उसे कैसे याद करेंगे. क्या ऐसे दौर में इन ख्यालों से बचना आसान है? आज जो अस्पताल गया तो मुड़कर आएगा या नहीं, आप नहीं जानते, आपने उसे जीते जी ही विदा कर दिया, सोच, दिल दिमाग कई बार शून्य की स्थिति में पहुँच जाते. एक डिप्रेशन सा हावी हो जाता. कितना ही स्वयं को समझाओ लेकिन कभी तो आप के जेहन पर भी समय अपनी इबारत लिखता ही है. ऐसा ही मेरे साथ हुआ. एक दिन स्वयं को हल्का करने के उद्देश्य से सोचते सोचते जाने किस झोंक में ये ख्याल आया और मैंने फेसबुक पर कुछ पंक्तियाँ लिख दीं:
मेरे प्यारे मित्रों, मेरे अजीजों और रिश्तेदारों
मैं अपनी मौत जीना चाहता हूँ यानि मरने के बाद वाली. अभी मुझे मेरी मौत जीनी है इसलिए निसंकोच आप मेरे बारे में क्या सोचते हैं वो चाहे तो इनबॉक्स कर सूचित कर दें या फिर कमेंट में कहना चाहें तो उसका भी स्वागत है. यकीन मानिये, मैं किसी से नाराज़ नहीं होऊँगा और न किसी से दोस्ती या सम्बन्ध तोडूंगा. बस जो आप मेरे मरने के बाद कहना चाहते हैं जीते जी कह दीजिये. बस यही मेरे प्रति आपकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
मैं कहीं भी उनकी सोच किसी के भी सामने कभी भी उजागर नहीं करूँगा और न ही कभी उससे जब तक जिंदा रहूँगा कोई गिला शिकवा करूँगा.
बस यही मेरी अंतिम ख्वाहिश है और कानून भी मरने वाले की आखिरी इच्छा पूरी करने को मान्यता देता है. बेशक मैं अभी मर नहीं रहा लेकिन अंतिम इच्छा ही ऐसी है जो जीते जी ही पूरी हो सकती है तो उसके लिए इतना करने में कोई बुराई नहीं. वैसे भी किसे पता मरने के बाद कौन क्या कहना चाहता था. तो आज मौका है मुझे मेरे जीते जी विनम्र श्रद्धांजलि देने का. वैसे भी हम सभी एक ही कश्ती में सवार हैं. कल का आज भरोसा नहीं रहा. कौन जाने कब किसकी बारी आ जाए फिर कितनी ही आप सावधानियां बरतें” कह वो चुप हो गया मगर उन्होंने कहा, “इसका मतलब तुम यहाँ चुपचाप सबको लडवाकर तमाशा देखते रहे सिर्फ अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए”
“माई बाप, मैंने कब सबको कहा ये सब पता करने को. ये तो मेरी अपने बारे में जानने की इच्छा थी”
“मगर तुम्हारी इच्छा ने तो देखो यहाँ का माहौल बिगाड़ दिया जिनकी ५००० की लिस्ट थी घटकर ५०० रह गयी है. क्या तुम इस सबके दोषी नहीं?”
“हुजूर, इसमें मेरा क्या दोष? यहाँ भेडचाल है जो एक करे वो ही सब करने चल देते हैं बिना सोचे विचारे आखिर उसका अंजाम क्या होगा. जब बर्दाश्त का माद्दा ही नहीं तो ऐसे कडवे सत्यों के झोले में हाथ डालना ही क्यों?”
“नहीं, नहीं, ऐसा कहकर तुम बच नहीं सकते. इसकी सजा तो तुम्हें भुगतनी ही पड़ेगी. तुमने जानते हो, करोड़ों लोगों के मध्य मनमुटाव पैदा कर दिया. तुम्हारी यहाँ उपस्थिति इस समाज के लिए घातक है. तुम्हारे कारण हमारा कितने बिलियन का नुक्सान हुआ है तुम जान भी नहीं सकते. वैसे ही आज का दौर कितना भयावह है उसमें तुमने कितनी अराजकता उत्पन्न कर दी जबकि लेखक का कर्तव्य होता है सबके मध्य आपसदारी, धैर्य और संयम का बांध बनाए रखना लेकिन तुमने तो बिलकुल उसका उल्टा किया है. इसलिए ये फेसबुक तुम्हें हमेशा के लिए प्रतिबंधित करता है. यहाँ तुम किसी भी रूप में अपनी उपस्थिति कभी दर्ज नहीं कर सकोगे. कभी भी कहीं से भी कोई नया अकाउंट नहीं बना सकोगे. तुम्हारे ऊपर हमारी कड़ी निगाह रहेगी….आजीवन” जज ने सजा सुना जैसे निब तोड़ दी थी. इसे सुन पसीना पसीना हो उठा और घबराहट में हाथ पैर पटकने लगा और उसे दिल का दौरा पड़ गया. पत्नी ने घबराकर उसी दोस्त मंजीत को फ़ोन कर बुलाया जिससे एक दिन पहले यही बात वो करने की कह रहा था. सुनकर वो स्तब्ध रह गया. दौड़ा दौड़ा आया, आखिर ये एकाएक कैसे हो गया. कल तो ठीकठाक था, अचानक कैसे हुआ? बच्चे भी सुनकर दौड़े चले आये.
“अबे साले उठ, तुझे कहा था पंगा मत ले लेकिन तू नहीं माना, मैं मना करता रहा, कुछ नहीं होने वाला, इन बातों में कुछ नहीं रखा मगर तू है कि कान पर जूँ भी नहीं रेंगी. किसी का क्या गया, तेरी ही जान चली गयी. अरे कौन यहाँ अपनी मौत को जी पाया है? मौत तो अचानक बिना किसी निमंत्रण के आती है. उसे कोई नहीं जी सकता. कल यही समझाता रहा लेकिन तुझे समझ नहीं आया. ये नया अविष्कार करेंगे, कर लिया अविष्कार, क्या मिला? खुद ही कूच कर गया. नहीं झेल पाया न सत्य? कुछ सत्य बेहद कटु होते हैं जिन्हें उघाडा न ही जाए तभी इंसान जी पाता है मगर तूने मेरी एक नहीं सुनी. फिर इस दौर में, जब पता है तुम्हें, यदि कोई भी लक्षण मिला और तुम सबसे दूर हुए. फिर किस्मत ही साथ दे तो ही कोई लौट रहा है वर्ना सभी को ये दुनिया छोड़ने पड़ रही है. कितना समझाया था तुझे लेकिन रहा सदा का जिद्दी ही. जो हुआ नहीं उसके बारे में सोचता रहा और देख आज तू बिना उसका शिकार हुए भी शिकार हो गया सिर्फ एक भय के कारण” कह बिलख उठा.
“पापा, उठो, क्या हुआ है? ऐसे एक्टिंग मत करो. हमें पता है, हमें परेशान करने के लिए आपने ये स्वांग रचा है. जैसे हम आपको परेशान करते थे बिल्कुल वैसे ही. है न…पापा” कहते कहते फफक पड़ी बेटी.
इधर उसकी पत्नी जोर जोर से आवाज़ देने लगी, “सुनो, उठो न, ये कोई तरीका नहीं होता. मेरी आवाज़ क्यों नहीं सुन रहे. इतनी देर से आवाज़ दे रही हूँ और तुम उठ ही नहीं रहे. उठो न, जल्दी उठो” कहते कहते जोर जोर से झंझोड़ने लगी और उसकी छाती पर सर पटकने लगी, तभी हाँफते हुए वो उठा तो पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ था. अजनबियों की तरह अपने चारों तरफ देखने लगा, जैसे किसी अजनबी जगह पहुँच गया हो. दायीं तरफ देखा तो मंजीत दिखाई ही नहीं दिया. सामने देखा तो बच्चे भी नहीं थे. फिर अचंभित सा खुद को हाथ लगाया, जांचा परखा, आस पास देखा तो पाया वो तो अपने घर पर है और जिंदा है. तब जाकर राहत की सांस ली और स्थिति को समझते हुए बोला – “ओह! कितना भयानक स्वप्न था”
कुछ पल कुछ को संयत करने में लगे. फिर उसके दिमाग में एक फितूर ने जन्म लिया और स्वप्न को कहानी का रूप देने लगा…आखिर लेखक जो ठहरा.
वंदना गुप्ता
चर्चित लेखिका हैं. कविता, उपन्यास, कहानी, समीक्षा, लेख प्रकाशित. संपर्क - rosered8flower@gmail.com

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