‘पूरईन गाँव के वकील साहब… धन बहारने वाले साहब…. राम बहादूर वकील का पाँच सौ रूपइया, अपने जोबना पर रखकर सुकरियाssss अदा… सारा रारा रारा रारा रा ….’ 
‘अरे जोबना पर काहें… मुनिया पर रखो मुनिया पर’… पीछे चिल्लाती भीड़ से किसी की आवाज़ आई 
‘मुनिया पर रखने की औकात होनी चाहिए… पाँच सौ रूपइया में हमार नथूनियाँ भी नाहीं मिलेगा वकील साहब…’ नचनिया कमर हाथ नचाकर कहते हुए फिर से अपनी साड़ी का अँचरा मुँह में दबाकर जोबना हिला उठी, ‘नथुनियाँ पर गोली मार sss सँईया हमार हो नथुनियाँ पर गोली मारss’
‘औकात की बात कर दी साली अब दिखाते हैं औकात… चल ले दो हजार रूपया’ पूरे ठसक से सरपंच साहब उठ खड़े हुए और पीछे से नथुआ आकर रूपया थाम लिया, ‘मालिक आप कहाँ जायेंगे, हम जाकर दे आते हैं’
‘धत् सारे… औकात की बात करती है… हम खुद ही जायेंगे’
‘लेकिन मालिक आप ज्यादा ही…’ (पी रखें हैं) को मुँह में घोंट गया और जैसे ही संभालने के लिए तैयार हुआ वैसे ही सरपंच धम्म से वहीं गिर पड़े । नथुआ रूपया लेकर स्टेज पर चढ़ गया और नचनिया के कान में फुसफुसा कर नीचे उतर आया । नचनिया कमर मटका-मटका कर तीन बार घुमरी पार गई, ‘सरपंच भईया का दिल बड़ा हो गया… दो हजार रूपइया…. सर-माथे पर करती सोनपरी सुकरिया अदाss सुकरियाsss सुकरियाsss सुकरियाsss’
सुकरिया सुकरिया कहते हुए सोनपरी नचनिया तखत जोड़कर बनाए गए स्टेज के एक ओर धम्म से कूद कर फिर भाग कर दूसरी ओर दो बार कमर मटका कर धम्म से कूद गई । उसके कूदने के साथ ही ढ़ोलक पर ढ़म ढ़म की थाप से माहौल और गरम हो जाता । लेकिन इस बार बीरनवा ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया, ‘सरपंच को भईया कैसे बोल दी, भईया लगते हैं तुम्हारे’ ?
तभी पर्दे के पीछे से एनाउन्स हो जाता है, ‘कृपया स्टेज पर न चढ़ें, नचनिया का हाथ न पकड़ें, महफिल की गरिमा बनाये रखें, कोई बात हो तो दूर से कह दें… नेग लेने हमारा आदमी आप तक पहुँच जायेगा’
‘भईया नहीं सईयाँ कहो सईंयाँ’… भीड़ से आवाज़ आयी लेकिन उससे पहले ही सोनपरी अपना हाथ छुड़ा कर स्टेज के बीचो-बीच पहुँच चुकी थी, ‘नथुनिया पर गोली मारsss’
नाचते हुए उसकी नज़र बार-बार शहरी बाबू से टकरा जाती । इस पूरे सीज़न में सोनपरी जहाँ-जहाँ जाती वहाँ-वहाँ नज़र गड़ाए बैठे पाया जाता । 
सोनपरी है ही इतनी सुन्दर… कि कोई भी उसे देखते ही दिल के साथ-साथ अपनी जमा पूँजी हार जाए । उसे नाच में बुलाने के लिए बोली लगती और वह जिस नाच में जाने की हामी भरती वहाँ पहले से हो-हल्ला मच जाता कि इस बारात में सोनपरी आयेगी । अब तो सोनपरी के नाम पर बारात का स्टेटस तय होने लगा था । वैसे तो आज कल रंडी (नाच में औरतें भाग लेने लगीं तो उन्हें रंडी का नाम दे दिया गया) के नाच का प्रचलन बढ़ गया, लेकिन सोनपरी के आगे किसी का टिकना मुश्किल था ।  
दूर दूर तक फैले खेतों के बीचो-बीच तखत जोड़कर स्टेज बनाये जाते, स्टेज के ऊपर टेन्ट इस तरह से बाँधा जाता कि कम से कम तीन तरफ से नाच दिखाई दे । नाच शुरू होने से पहले बाकी नचनियाँ स्टेज के पर्दे के पीछे तैयार हो रही होतीं, लेकिन बेहद चमकीली रोशनी के केन्द्र में घूँघट निकाले सोनपरी को सजा-धजा कर सोने की मूर्ती की तरह पर्दे के सामने खड़ा कर दिया जाता और स्टेज के बगल से तीरछे करके टेबल फैन को इस तरह से रखा जाता कि सोनपरी का अँचरा पेट से उड़िया-उड़िया जाता, कभी जोबना से हटकर नुमाइश में लहरा उठता तो कभी घुँघटा के साथ मेल-जोल बढ़ा लोगों को और भी ललचाता फिरता । इतने में नाच से पहले ही लोगों में धुकधुकी उठ जाती कि एक बार घुँघट हटा दे तो पूरा दीदार हो जाये । पूरे नाच के दौरान उसकी एक गीत का सबको इंतज़ार रहता, ‘भरली जवानी में छोड़ गईन हो… बलम परदेसिया’ । इस गाने के पहले मुखड़े पर ही लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती । उसकी जवानी बरबाद होने से बचाने के लिए कुछ लोग उसे स्टेज पर ही कोरा (गोदी) में उठा लेते और खुद ही नाच उठते । गीतों के बीच-बीच में उसके ऊपर रूपया न्यौछावर करने वालों का ताँता (पंक्ति) लगा रहता और उसके सुकरिया अदा करने के स्टाइल पर अपने सीने पर हाथ रख रख कर लोग फिदा हो उठते । 
आज शहरी बाबू की नज़र सोनपरी को भेद रही थी, जैसे ही सोनपरी की नज़र शहरी बाबू से टकराती वह काँप उठती, उसका ध्यान नाच पर से हट जाता और गाना भूलने लगती । उसका साथ देने के लिए कजरी को भेजा गया, सोनपरी के अधूरे गीतों को कजरी नचनिया पूरी करती लेकिन शहरी बाबू की नज़र हटती ही नहीं । ऐसे में ब्लाक परमुख बाबू उठ खड़े हुए, ‘का बात है सोनपरी रानी, आज हमारे अलावा दिल कहीं और लग गया है का ? हमारा फेबरेट गाना तो सुनाओ’  
‘रात भर होठलाली चाटेन…’ की शुरूआत होते ही नाच देखने वालों के कदम अपनी अपनी जगह पर ही थिरक उठे और संगीत के साथ सभी एक साथ नाच उठे । यह गाना पूरा हो ही नहीं पाया कि मुनिया पर रख कर सुकरिया अदा के लिए ब्लाक-परमुख का प्रस्ताव आ गया । ब्लाक-परमुख पचास-पचास रूपये की नत्थी की हुई पाँच हजार रूपये की गड्डी की नोट से सोनपरी के सर पर न्यौछ दिए और सोनपरी दोनों हाथों में नोटों की गड्डी लेकर लहरा उठी । अपने साड़ी का प्लेट लेकर घुटने तक उठाई और स्टेज के एक कोने से कूद कर ‘हमरे जान… (पीछे से आवाज़ आयी – ओय होय) हमरे माल (ओय होय) बलाक-परमुख बाबू की पाँच हजार रूपईया को… मुनिया पर रखकर सुकरियाsss अदाsss…’ कहते हुए दूसरे कोने पर भाग कर गई और नोट की गड्डी को अपनी साड़ी के प्लेट से छुआते हुए सुकरिया अदा की – सुकरियाsss अदाsss… सुकरियाsss अदाsss… । ब्लाक-परमुख बाबू प्रसन्नता से दो बार अपनी बन्दुक से ठाँय-ठाँय गोली छोड़ कर नाचना शुरू कर दिए और फिर गाना शुरू हुआ जिसका सबको इंतज़ार था, ‘भरली जवानी में छोड़ गईन हो… बलम परदेसिया’ इतने में सभी बाराती-घराती स्टेज पर चढ़कर नाचने लगें, सोनपरी स्टेज के पीछे भागने ही वाली थी कि शहरी बाबू सामने से बाँहें फैलाये खड़ा था । सोनपरी को एक मिनट के लिए वह डी.डी.एल.जी. का शाहरूख खान जैसा दिखा । वह उसके इतने करीब था कि उसकी गरम साँसों और देह की तपन को महसूस कर सकती थी । उसकी बाँहें जैसे ही उसे पूरी तरह आगोश में भरने वाली थीं कि कजरी ने सोनपरी को झटके से बैठा दिया और सरक कर दोनों पर्दे के पीछे हो गयीं । स्टेज पर नाचने वालों की भीड़ में शहरी बाबू ठगा सा रह गया ।  
यह नचनिया की बड़ी कामयाबी मानी जाती है जब उसकी थिरकन के साथ सब होश होकर थिरक उठें और बारात नचनिया में तबदील हो जाये । यह वही समय होता है जब नचनिया फूर्ति से स्टेज के पीछे भागकर चंद मिनटों के लिए आराम पा जाती है । आज सोनपरी भी बहुत थकान महसूस कर रही थी उसे बार-बार शहरी बाबू की नज़रें भेद रही थीं लेकिन उसे नहीं मालूम था कि पर्दे के पीछे भी एक और नज़र उसे अंदर से तोड़ देगी । 
स्टेज पर घराती-बारातियों का स्टेज-तोड़ डाँस शुरू हो चुका था । चकरोट पर बैठी हँसती-खिलखिलाती नाच देखती औरतों को ऊबन होने लगी । आखिर सोनपरी चली गयी तो इन लवँडों और बुढ़उँवों का नाच क्या देखना ? वे ही ही हा हा करते हुए उठकर कुछ अपने गाँव की ओर तो कुछ विवाह देखने जाने लगीं । सोनपरी को गर्मी फूँक रही थी इसलिए सीने से अपना अँचरा हटा हवा खाने खेतानी की ओर बढ़ गई । हल्की मद्धम चाँदनी और बिजली की रौशनी में अचानक से चाँद-सी दमकती पूर्णिमा का चेहरा खिलखिलाता हुआ सामने पड़ गया, दोनों की नज़रें आपस में टकरा गईं पूर्णिमा खुश होकर कूद पड़ी, ‘अरे सखि देखो… सोनपरी’ !! 
सोनपरी ने झट से सीने पर अँचरा डाल लिया और उसके ठिठके कदम पीछे की ओर भाग खड़े हुए । वह स्टेज के पीछे रखी कूर्सी पर बैठ कर हफर-हफर हाँफने लगी । कजरी दौड़कर पानी ले आयी, ‘क्या हो गया है तुझे’ ? 
सोनपरी घट घट पानी पीकर औंधे मुँह कूर्सी पर लेट गई, ‘बस तबीयत ठीक नहीं लग रही’ ।  
स्टेज पर कजरी, रनिया और रूपाली नाचने लगीं । घरातियों-बारातियों से सोनपरी के नाच की माँग उठने लगी । यह एनाउन्स करना भी मुश्किल था कि सोनपरी आज नहीं नाचेगी, उसकी तबीयत खराब हो गयी है । यदि घरातियों-बरातियों को इस बात का पता भी चल जाए तो हंगामा हो जायेगा, पैसे आधे भी नहीं मिलेंगे । आखिर सोनपरी के नाम से ही मुँहमाँगी क़ीमत पर सट्टा लिखवाया जाता है ! 
बहुत चिंतन-मनन के बाद एनाउन्सर को एक नई तरकीब सूझी और हर बार सोनपरी के नाच की माँग उठने पर एक एक वाक्य माईक से बाहर फेंक देता, ‘ब्लाक परमुख बाबू का रूपया देखकर सोनपरी चकरा गई है’… ‘अपने जान… अपने माल… से परेम कर बैठी है और उन्हीं की याद में खोयी बैठी है, बिल्कुल दुष्यंत की शकुन्तला बनकर’… ‘ब्लाक परमुख बाबू की याद से उसके पाँव भारी हो गये हैं’… ‘नौ महिने तो बीतने दो राजा, फिर आ जायेंगे महफिल में’… ‘थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लिजिए… थोड़ा इंतज़ार का…’
भिनसार होने से पहले भीड़ सम्भालना मुश्किल हो गया, ‘सोनपरी’ ‘सोनपरी’ की आवाज़ उठने लगी । तब कजरी आकर सोनपरी को हिलाई, ‘हिम्मत आ गई हो तो सम्भाल लो, वरना भीड़ भारी पड़ जायेगी’ ।
सोनपरी कुर्सी पर बल देकर उठी और स्टेज पर आ कर खड़ी हो गई । उसके खड़े होने मात्र से सीटियों की गूँज और नोटों की बौछार होने लगी । सोनपरी ने फिल्मी गाना शुरू किया, ‘मैंने प्यार तुम्हीं से किया है, मैंने दिल भी तुम्हीं को दिया है… अब चाहे जो हो जाये, मैं दुनिया से अब ना डरूँ, तुम्हीं से मैं प्यार करूँ’…   
उसके इतने ही गाकर कमर मटका देने से भीड़ बेकाबू हो गई और सोनपरी फिर से पर्दे के पीछे आकर हताश बैठ गई । उसके सामने पूर्णिमा का चेहरा फिर से आ गया, जिसकी याद से वह और हताश हो गयी ।
दूसरे दिन जब सोनपरी नाच के डेरे पर पहुँची तो उसका मुँह और भी लटक गया कि अब पूर्णिमा का सामना कैसे करूँगी । उसने साड़ी को तह किए बगैर ही फेंक दिया अपने ब्लाऊँज से गेंद निकाल कर हाथों से उछाल दिया और कायापलट करके बन गई राजन । राजन ने अपने कंधे तक लटकते बालों की पोनी बनाई और चेकदार शर्ट के ऊपर मफलर लपेट लिया ।  सामने एक लाइन से रखे ढोलक, झाल, तुर्रा, हारमोनियम पर हाथ फिराया और अपने पैरों से पाजेब खींच कर अलग कर दिया । पाजेब से उसका पैर खुनिया गया और वह बेढ़ाल गिर पड़ा । कजरी अब जोगी का रूप धारण कर चुका था और राजन को पीछे से पकड़ कर चुटकी लेते हुए बोला, ‘क्या हुआ यार… सब ठीक तो है ? कहीं शहरी बाबू पर दिल तो नहीं आ गया’ ? 
राजन मुँह पर मफलर डाल वहीं जमीन पर लेट गया । जोगी भी सर के पास बैठा रहा, जब राजन नहीं उठा तो उसके पेट पर अपना सर टिका लेट गया, ‘अब बोल भी, क्या बात है…’ ?
‘यार… कल पूर्णिमा नाच देखने आयी थी’ 
‘क्या’ ? जोगी चौंक गया  ‘भौजाई’ 
‘हाँ…’ चिंता से भर गया राजन
‘तो ! जरूरी तो नहीं कि वो तुम्हें पहचान ही जायें’?
‘पता नहीं यार… नाच देखने तक तो ठीक था, जब मैं खेतानी की ओर हवा खाने गया था उसी समय वह ठीक मेरे सामने खड़ी थी और उसने मुझे देख लिया । उसकी नज़रों से मुझे लगा कि वो मुझे पहचान गई है’?
‘क्या बात करता है… वो उधर कैसे’ ?
‘पता नहीं… पर उसके साथ उसकी सहेलियाँ भी थीं, अब सब उसका मज़ाक बनायेंगी, वो कितनी शर्मिन्दा हो रही होगी’…
‘हाँ, साली साहिबाएँ कह रही होंगी… हमारे जीजाSS जी बड़ा रसीले निकलें… रसप्रिया सोनपरी… अरे दीदी तू उन्हें सखी समझ कर प्यार करती है या पति समझ कर… हा..हा..हा’… जोगी आँखें मटका मटका कर चिढ़ाने लगा । राजन प्यार से उसके हाथों को झटकते हुए बोला,
‘चल हट… मुझे तो डर लग रहा है कि मैं उसका सामना कैसे करूँगा’ ?
‘अब सामना तो होगा ही… चलो इससे एक बात तो अच्छी रहेगी कि तुम्हारे दिल से बोझ उतर जायेगा’ दिलासा देते हुए
‘तू नहीं समझ रहा यार… पूर्णिमा को झूठ पसन्द नहीं, वो बड़े ही सिद्धांतों वाली औरत है’
‘लेकिन तुम्हें भी तो अपनी पसन्द का व्यवसाय चुनने का हक़ है’ ?
‘हाँ है, पर इस व्यवसाय को मैने झूठ के नकाब से ढँक रखा है । सात साल हो गए हमारी शादी को, अब राघव भी पाँच बरस का हो गया । पर पूर्णिमा से बताने की हिम्मत नहीं हुई’ 
‘तो चलो, इस बार डट कर सामना करना । उठ, चल मेरे जवान । क्या हुआ जो ये सब भौजाई को नहीं पता । जब उन्हें पता चलेगा कि इसी कमाई की रोटी वो खाती हैं, तब तुम्हें जरूर माफ़ कर देंगी’ ।
राजन मन की हलचलों को दबाये चुप रह गया । 
राजन घर पहुँचने को शाम में ही पहुँच गया था पर राघव के साथ खेलते-खेलते अन्धेरा होने का इंतज़ार करता रहा । पूर्णिमा खाना लगा कर इंतज़ार करती रही पर ढ़ीबरी का तेल खत्म होने से पहले पहुँचकर भभकते दीए के सामने जल्दी-जल्दी खा कर उठ गया । दीए की जितनी भभकती लौ थी उतनी ही मन में भी थी, पूर्णिमा तरकारी परोस कर इंतजार कर रही थी कि रोटी के बाद भात भी दे देंगे लेकिन आज तो राजन को भात सूझा ही नहीं । पूर्णिमा कहती रही कि तनिक दूध ले लीजिए, दूध में भात सान कर खा लीजिए लेकिन दूध-भात के स्वाद में ज़िन्दगी का स्वाद न बिगड़ जाये, वह हाथ धोकर उठ गया । 
उस रात राजन राघव को लेकर जोगी के छत पर सोने चला गया कि छत पर हवा अच्छी लगती है । पूर्णिमा समझ नहीं पा रही थी कि उससे कौन सी गलती हुई कि आज ये इतने नाराज़ हैं ? वह अकेली खटिया पर करवट बदलते बदलते रोती रही, उसके सामने सोनपरी नचनिया का चेहरा और उसकी घबराई आँखें ताकने लगीं । फिर वह उन घबराई आँखों को झटका देती, ‘हूँह… ऐसा नहीं हो सकता, हम भी न क्या क्या सोचते रहते हैं’?
दूसरे दिन नलका पर नहाते हुए पूर्णिमा ने राजन का छिछुराया-फटा एड़ी देख लिया और चिल्ला पड़ी, ‘इ कैसे कटा है जी’ ?
राजन पाजेब की बात बता नहीं सकता था, ‘उ पैर में तार फँस गया था निकालते समय थोड़ा लग गया’ 
‘हाय राम ! बताये भी नहीं, कल से आये हुए हैं, अब तक तो चार बार हम घी गरमा कर लगा चुके होते । घाव ठीक हो गया होता’
‘रहने दो इतना भी नहीं लगा है’
‘नहीं लगा है !… टिटनस-उटनस हो गया तो’ ?
‘तो क्या घी लगाने से टिटनस नहीं होगा’ राजन झल्ला उठा ।
पूर्णिमा चुप हो गई ।
राजन दोपहर का खाना घर में ही खाया । एक तरफ वह कवर उठा कर अपने मुँह में डाल रहा था दूसरी ओर पूर्णिमा उसके पैरों में गरम घी चभोर रही थी, ‘इतना छिछुराया हुआ है और कह रहे हैं कि कम ही लगी है’
राजन खामोश रहा । फिर चुप्पी को तोड़ते हुए पूर्णिमा ही बोली, ‘अजी जानते हैं, मैं न परसों वाली रात में नाच देखने गई थी’
‘कहाँ’ ?
‘उ न माई बोला ली थी कि गाँव में सोनपरिया की नाच आ रही है, आओ देख जाओ’
‘मुझसे पूछे बिना चली गई’ ?
‘फोन किए थे आपको, लेकिन आपने फोनव नहीं उठाया, फिर अम्मा जी ने कहा कि जाओ देख आओ, नजदीक में नईहर का यही तो फायदा है । वैसे भी माई जब तक जीये तब तक ही नईहर है, उसके बाद कौन पूछता है’ ?
‘अब छोड़ो भी न नाच-वाच की बात’
‘अरे कइसे छोड़ दें… हमके तो सोनपरी भूल ही नहीं रही । और पता है हम आपका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे कि कब आप आयें तो हम आपको बतायें’…
‘क्या बताना ? हम आराम करने जा रहे हैं’ तीखे स्वर में राजन बोल पड़ा ।
‘सुन तो लीजिए हमारे चीन्नी बालम… सोनपरी को हम नज़दीक से देखे थे, बिल्कुल वो आपकी तर…’
‘छोड़ो न तुम औरतें भी’… 
पूर्णिमा का मुँह मुरझा गया । राजन बाहर निकल गया । पूर्णिमा समझ नहीं पा रही थी कि राजन को क्या हो गया है ? भगवान शिव की तरह तीसरी आँख भी खुली हो तो चीन्नी बालम कहने पर वे आँख बंद कर लेते हैं और कामदेव में बदल जाते हैं । लेकिन आज ऐसा क्या हो गया है कि मेरी ओर ठीक से देख भी नहीं रहे । सात सालों में राजन ने बड़ी से बड़ी लड़ाई के बाद भी इस तरह की अनदेखी न की थी, फिर इस समय तो कुछ हुआ भी न था !
पूर्णिमा को शादी से पहले से पता है कि राजन ब्यूटी प्रोडक्ट का सेल्समैन है । उसे कभी कभी बालों को सिल्की, सॉफ्ट और कलरफुल दिखाने के लिए बाल बढ़ा कर रखना पड़ता है, क्रीम बेचने से पहले अपने चेहरे पर डेमो देने के लिए पार्लर में जाकर फेसियल करवा कर चिकना-मुकना रखना पड़ता है और टीप-टाप कपड़े पहन कर दूल्हे राजा की तरह दिखना पड़ता है ताकि उसे देखते ही खरीदार सामान खरीदने के लिए आकर्षित हो जायें । बाकी भगवान ने बनाया बड़े फुर्सत से है, इतना सुन्नर-मुन्नर मुँह और इतनी नाजुक देह तो औरतों की भी नहीं होती । कोमल कोमल नाज़ुक नाज़ुक स्किन पर से नज़रें बिछला जाती हैं ।     
कभी कभी सामान बेचने और खरीदने के लिए उन्हें बाहर दूसरे शहर जाना पड़ता है इसलिए अक्सर वे दो चार दिन के लिए घर से बाहर रहते हैं । लेकिन बाकी दिन, दिन में सामान बेच-बाचकर घर पर ही रहते हैं । एक खुशहाल परिवार के लिए आखिर क्या चाहिए, दिन कहीं भी गुजरे रात घर पर गुजरनी चाहिए ।  
राघव रोते रोते निहाल हो गया, पूर्णिमा धूप में पापड़ का सुखवन डालना छोड़ राघव को चुपवाने में लगी, ‘क्या हो गया मेरे लाल, क्यों इतना रो रहे हो ? किसी ने मारा… किसी ने गाली दी ? क्या हुआ, बताओ तो सही ?
‘पापा… पापा’? 
‘क्या हो गया पापा को…’ ? वह घबरा गई
‘पापा नचनिया हैं’
‘भाग अधिकवा… कुछ भी बोलता है, किसी ने तुमको चिढ़ाया है’ उसे थोड़ी राहत मिली
‘नहीं अम्मा… सच कह रहा हूँ, आज जोगी चाचा के घर कोई नाच लिखवाने आया था, तभी पता चला’ 
‘होगी कोई जान-पहचान… (चिंता में डूबते हुए बोली, फिर थोड़ा सम्भलते हुए) तुम क्यों इतना परेशान हो… अच्छा चलो रोना बंद करो’
‘सब हमको चिढ़ा रहे हैं, तुम्हारा बाप मेहरारू बनकर नाचता है, नचनिया है । सोनपरी है’ और अधिक रोने लगा।
‘सोनपरी है’..! सोनपरी का नाम सुनते ही पूर्णिमा का दिल धक्क से हो उठा । वह आव देखी न ताव, पहुँच गई जोगी देवरूआ के घर । दुआरे से ही चिल्लाने लगी, ‘का हो जोगी बाबू, अब यही सुनना बाकी था क्या ? क्यों आपके लइके हमारे राघव को परेशान कर रहे हैं’ ?
‘क्या हो गया बहन जी ? अंदर आइए । ऊ तो कहीं दो दिन के लिए बाहर गए हुए हैं’ जोगी की पत्नी रेखा अंदर से ही आवाज़ लगाई ।
‘गए हुए हैं… कब’ ?    
‘कल भिनसारे निकल गए थे’। 
यह सुनकर पूर्णिमा को हदासा समा गया । कल भिनसारे तो राघव के पापा भी ब्यूटी-प्रोडक्ट की खरीदारी के लिए शहर निकल गए थे और बोले थे कि दो दिन बाद आयेंगे । अबकी बार बहुत मालदार काम मिला है । पूर्णिमा की शंका गहराती जा रही थी, वह भी रेखा के अंधेरे भरे कमरे में घुस गई जिसमें एक भी खिड़की या रोशनदान नहीं था, दिन में भी दीया जला कर उजियार करना पड़ता है । पूर्णिमा को लगा कि उसके भी जीवन में कोई गहरा अंधेरा छाया हुआ है, जिसके लिए दीए की जरूरत है, ‘कहाँ गए हैं’?
‘इस बार बड़ा मालदार पार्टी के वहाँ नाच का सट्टा है’ बोलते समय खुशी के मारे दाँत में दबाया घुँघट का कोना दाँत से छूट गया । 
‘नाच’ ! आश्चर्य से देखते हुए
‘हाँ नाच ! ऐतना काहे चिहुँक रही हैं, आपको नाहीं पता का बहन जी’ ?
‘कौन-सा नाच’ !
‘जिसमें ये और भाई जी नचनियाँ हैं…हमको भी कुछ दिन पहले ही पता चला है’
‘नचनियाँ’ ! पूर्णिमा घस्स से वहीं बैठ गयी । उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं । उसके आँखों के सामने हवा खाते हुए सोनपरी नचनियाँ की घबराई आँखें घूम गईं । उस समय रेखा की एक-एक बातें दीए की रोशनी तरह लगने लगीं । उसे याद आने लगा राजन का सोनपरी के विषय में कुछ न सुनना । उसका बाल बढ़ाना, ब्यूटी-प्रोडक्ट यूज़ करना और इसे भी करने की सलाह देना, रात को लिपस्टिक लगा कर इसे चूमना, कभी-कभी लहँगे और साड़ी की बात फोन पर करना और खुद पहन कर कहना कि ‘पूर्णिमा रानी… स्त्री रूप धारण करके हम तुमको अच्छे से समझ सकते हैं’ । ज्यादा कुछ पूछने पर चुप्पी साध लेना । पूर्णिमा को नाच न देखने जाने देना, कभी गलती से चली जाये तो इतनी डाँट लगाना कि वो दूबारा जाने से पहले दस बार सोचे । ये पहली बार था जब राजन ने पूर्णिमा को नहीं डाँटा था ।  
पूर्णिमा अंदर ही अंदर टूटने लगी । सात साल विवाह के हो गए और पता ही नहीं कि उसका पति नचनिया है । इतने सलीके से उसके सामने रहता है कि शहर के लोग फेल हो जायें । कभी लगा भी नहीं कि वह झूठ बोल रहा है, ये पहली बार था जब वह सोनपरी को नज़दीक से देखी थी और देखते ही सोनपरी में राजन का चेहरा नज़र आया था लेकिन खुद को समझा ली थी, ‘मैं भी क्या-क्या सोचती हूँ । सोनपरी तो पूरी की पूरी रंडी लगती है, मर्द लगती नहीं । राजन का सिर्फ आभास हुआ । हो सकता है उसकी याद आ रही हो इसलिए । वैसे भी जहाँ भी वह जाती है उसे हर किसी में वही नज़र आता है’ । 
बहुत मुश्किल से दो दिन कटा और तीसरी शाम राजन घर लौटा । पूर्णिमा ने सोच रखा था कि घर आते ही पहले ख़बर लेगी, घर में घुसने नहीं देगी लेकिन राजन का मुरझाया मुँह देखकर रात के एकांत के लिए मन का हाहाकर दबा गई । बिस्तर पर राजन पहले से ही खर्राटे ले रहा था, पूर्णिमा ने जगाकर कई बार पूछना चाहा पर जैसे कि वह जागना ही न चाहता हो । कुंभकरण की नींद देखकर पूर्णिमा अपने अंदर की ज्वाला दबाने लगी पर दबा न पायी । इसलिए आंगन में जाकर रात भर बैठी रह गई । 
सुबह खाना बनाने से पहले नहा-धोकर आईने के सामने मेकप करती पूर्णिमा को राजन ने पीछे से अँकवारी में भर लिया, ‘क्या हुआ ? आज बड़ा सजने-सँवरने का मन कर रहा है ?… चलो अच्छा है गवना के दिन फिर से लौट आयें… याद है तुम दिन तो दिन, रात में भी सज-सँवर कर सोया करती थी… मैं तो पूरी तरह से फिदा हो गया था तुम्हारी खूबसूरती पर’ 
‘अच्छा !… आज मैं ही नहीं, आपको भी सजाऊँगी…’ खिलखिलाते हुए हँस पड़ी और मेकप-किट लेकर उठ खड़ी हुई 
‘धत्त… तुम मुझे क्यों सजाना चाहती हो, मर्द भी कहीं ये सब यूज़ करते हैं’ ?
‘अच्छा, बिजनेस के लिए यूज़ करेंगे और मैं कहूँगी तो नहीं करेंगे…’
‘कर सकता हूँ, पर अभी दिन है’
‘तो क्या हुआ… ? हमारा मन रखने के लिए इतना तो कर सकते हैं’ जबरदस्ती राजन को टेबल पर बैठा दी, थोड़ी देर ना-नुकूर के बाद राजन मान गया । पूर्णिमा को बहुत अच्छा मेकप नहीं आता लेकिन उसने मेकप के पीछे का चेहरा पहचान लिया, ‘सोनपरीSSS’ ! 
राजन की आँखें झटके से खुल गईं । अब सफाई देने के लिए कुछ न बचा था । पूर्णिमा जैसे टूट गई हो । इस बात से कम कि उसका पति नचनिया था बल्कि इस बात से कि उसने इतने सालों तक इस सच को छुपाये रखा । पूर्णिमा के पेट में छोटी से छोटी बात भी नहीं पचती, फिर राजन कैसे..? उसने आँखें बंद करके उस पर भरोसा किया था लेकिन आज भरोसा भरभरा कर गिर गया कि कोई अपनी पहचान कैसे छुपा सकता है ? वह जिस कमाई की रोटी खाता है क्या वह उसके प्रति गर्व महसूस नहीं करता ? यदि वह अपनी पहचान छुपा सकता है तो और भी न जाने क्या क्या छुपाया होगा ? वह अपने पति को जानती भी है अथवा नहीं उसे खुद पर संदेह होने लगा… ।      
प्रायः छोटी-मोटी गलतियों पर ज्वालामुखी बन जाने वाली पूर्णिमा खामोश हो गई, बोलना-बतियाना बंद कर दिया । राजन की आँखें हमेशा झुकी-झुकी रहने लगीं, पर उसने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन पूर्णिमा जैसे काठ बन गई हो । राजन ने सट्टा पर जाने से एक दिन पहले उसे झकझोरा, ‘बात करो मुझसे, मेरी तरफ देखो’
‘मैं या नाच’ ? पूर्णिमा ने पूरी दृढ़ता के साथ आँखों में आँखें डालते हुए पूछा ।  
राजन सहम गया, वह पूर्णिमा के भाव को समझ गया । वह यह भी समझ रहा है कि दोनों में से किसी एक का चयन उसे अपंग बना देगा । उसने पूर्णिमा को कसकर बाँहों में भींच लिया लेकिन पूर्णिमा ने फिर से दुहराया, ‘मैं या नाच’ ?   
राजन के हाथ ढ़ीले पड़ गये । वह अपना सामान बैग में भरने लगा । पूर्णिमा का जवाब मिल चुका था, उसके आँसू राघव के आँसू की तरह बेतहासा निकलने के लिए तड़प उठे । वह राघव को गोद में भरी और मायके की ओर चल पड़ी ।
राजन जब बी.ए. में पढ़ रहा था उसी समय उसे एक्टिंग का चस्का लग गया । हीरो बनने का सपना लिए कुछ दिनों वह इधर उधर भटकता रहा लेकिन किसी भी थियेटर वालों ने उसे चांस नहीं दिया । बी.ए. फाइनल ईयर के एनुअल फंक्शन में परफॉर्म करते समय भरत नाट्य-ग्रुप की उस पर नज़र पड़ी और राजन को पहला चांस मिल गया । पर भरत नाट्य ग्रुप के कर्ता-धर्ता गुरू विश्वेश्वरनाथ जी के निधन के बाद ग्रुप चौपट हो गया । तब ग्रुप के बड़े भईया आनंद ने कहा कि नाट्य ग्रुप से कोई खास आमदनी नहीं होती, इसलिए कुछ ऐसा काम किया जाए जिससे पैसे भी आये और हमारा शौक भी पूरा हो जाए ।
अपनी इच्छा को तोड़-मोड़ कर मनवांछित रास्ते पर चल निकलना कोई ग़लत तो नहीं । ग्लास आधा खाली है या आधा भरा हुआ, ये हमें डिसाइड करना चाहिए । राजन ने आधे भरे ग्लास को ही भाग्य मान लिया और पूरे तन-मन से जुड़ गया । लेकिन उसे पता था कि नाच गाना के विरोधी परिवार में यदि किसी को भनक भी लगी तो परिवार में जीना मुश्किल हो जायेगा । बहुत दिनों तक छुप-छुप कर सट्टे में जाता रहा, एक बार पिता जी को भनक लग गई उस दिन उन्होंने सटहा से मार-मार कर पीठ लाल कर दी । उसके बाद सीधे ब्यूटी-प्रोडक्ट की कंपनी में जॉब मिलने का बहाना ढूँढ लिया । विवाह के बाद पूर्णिमा से बात बात में नचनिया के विषय में बात करने की कोशिश की, पर उसे नाच देखना पसंद है लेकिन अपने पति को नचनिया बनते देखना नहीं । राजन को नाच के बिना अपना अस्तित्व अधूरा लगता और घर में छिपाने के अलावा और कोई चारा नहीं था । उसके चाह राह तथा परिवार के बीच एक रहस्यमयी दीवार सदैव खड़ी रही लेकिन हरदम दिल में धुकधुकी समाई रहती और आज वही हुआ जिसका उसे डर था ।
आज स्टेज पर राजन सोनपरी नहीं, नटराज बन गया । सब हाय-हाय कर रहे थे कि कहीं आज स्टेज टूट न जाये । पीछे से कई बार एनाउन्स भी हुआ । रूपयों की बौछार हो रही थी । स्टेज के किनारे किनारे ग्राम प्रधान ने कुछ लवँडों को खड़ा दिया कि कोई स्टेज पर न चढ़े, सब दूर से ही मंत्रमुग्ध हो लें । शहरी बाबू आगे की सीट पर स्टेज के सामने बैठ कर आँखें गड़ाये देख रहा था और पहचान रहा था सोनपरी के अंदर की धधकती आग को, जिसकी लौ स्टेज पर लपलपा रही थी । सोनपरी उस लपलपाती लौ में मूर्त है या अमूर्त, आज समझ से परे था । उसका मन कर रहा था कि सोनपरी के अंदर की धधकती लौ को अपने अंदर समेट ले और खुद भी उसके साथ अमूर्त हो जाए । 
कई सारे गीतों के बाद जब सोनपरी ने गीत शुरू किया, 
‘नचनिया जान के रजऊँ… नचनिया जान के रजऊँ, छोड़ न दिह हमके 
छोड़ न दिह, दिल तोड़ न दिह… नचनिया जान के रजऊँ…’
भीड़ सारे व्यवधानों को पार करके स्टेज पर चढ़ गई, स्टेज-तोड़ डाँस शुरू हो गया । सोनपरी आज मान में नहीं थी । आज उसकी नाच कजरी के रोकने से भी नहीं रूक रही । ऐसे में मौका पाकर शहरी बाबू सोनपरी को बाँहों में भींचकर जबरदस्ती स्टेज के पीछे अंधेरे में धकेल कर ले गया, जहाँ परदे से छन छन कर हल्की रोशनी आ रही थी, ‘क्या बात है सोना, मेरी जान… क्यों परेशान हो ? आज तुम्हारा अलग ही रूप देख रहा हूँ । तुम्हें कौन सा ग़म खाये जा रहा है ?…  मुझे बताओ मैं सारा दुःख दूर कर दूँगा… मैं तुम्हें बहुत प्यार करूँगा, कभी नहीं छोडूँगा… मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम नचनिया हो… मैं तुम्हारे साथ अपनी ज़िन्दगी गुजारना चाहता हूँ… मेरे साथ चलो… मेरी सोन…परी…’ 
सोनपरी उसकी बाँहों की कसाव से पूरी तरह छटपटाने लगी । जलते रेगिस्तान में आँसूओं की बारीश से मन और भी छनछना गया । दोनों के आँसू अपनी-अपनी बेवशी में एक हो कर निकलने लगे । अँधड़ बरसात दोनों तरफ थी लेकिन अपने अपने मौसम के लिए । शहरी बाबू ने बेकाबू होते हुए फिर से दुहराया, “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ सोनपरी…”
‘सोनपरी’… नाम ने राजन को झटका दिया और वह एकाएक शहरी बाबू से अलग हो गया । शहरी बाबू चौंक गया और उसके आँसू पोछने के लिए आगे बढ़ा पर राजन ने हाथ से रूकने का ईशारा करते हुए अपने आँसू खुद पोंछे । अपने सीने से आँचल हटाकर ब्लाऊँज से सॉफ्ट गेंद निकाल उसके हाथ में थमा दी । शहरी बाबू बिल्कुल भौचक्क हो कर जड़ बना अपनी सोनपरी देखता रह गया । आँसूओं से मेकप के धुलने के बाद सोनपरी के चेहरे से कोई मर्द झाँकता हुआ-सा लगा । अब विवशता शहरी बाबू के आँखों में थी और उसके कदम स्वतः ही पीछे की ओर हटने लगें… 
डॉ. रेनू यादव
भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग (हिन्दी), गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में फैकल्टी एसोसिएट हैं. कविता, आलोचना आदि की पुस्तकें व कई शोध-पत्र प्रकाशित. स्त्री-विमर्श पर केन्द्रित कहानियाँ, कविताएँ एवं शोधात्मक आलेख आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क - renuyadav0584@gmail.com

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