डूबते हुये सूरज का धूप निस्तेज होता जा रहा था और मेरी सांसे भी। कुछ देर तक मैं गहरी साँसें लेता रहा, फिर आँखों से गिर आये कुछ बूँदों को पोंछ मैं मुस्कुरा दिया। जिंदगी करवट लेती है पर ऐसे लेती है, मैं कब समझ पाया! अपनी गलती पर मैं पश्चाताप भी नहीं कर पा रहा। गलती! मैं सोचने लगा कि क्या सचमुच मैं गलत था? प्यार में गलती की गुंजाइश कहाँ।
सितम्बर के आखिरी और अक्टूबर के शुरूआती दिन, सर्दियों का आगमन और गर्मियों के घर वापसी का दिन। यही तो मौसम होता है जब दिल के अंदर गुदगुदी का अहसास होता है। जिस दिन एक बेहद खूबसूरत लड़की को देख, मेरा दिल तेजी से धड़का था, वो एक अक्टूबर की सुनहरी सुबह थी।
मौसम में हल्की ठंडक की खुमारी और आँखों में उस लड़की को देखने का नशा। मुझे महसूस हो चुका था कि वो लड़की मेरा कुछ भी चुरा सकती है- मेरा चैन, मेरी साँसें और मेरा सपना भी।
काॅलेज के उसी खास अशोक के पेड़ के नीचे एक बंेच पर बैठ लेजर पीरियड में समय काटते हुये, मैं सुनहरे मौसम का आनंद ले रहा था कि तभी वो लड़की मेरे बगल में आकर बैठ गई। मेरी तो साँसें ही रुक गई। मुस्कुराते हुये वो मुझे गहरी नज़रों से देख रही थी। मैं थोड़ा हैरान हुआ। पूरे कैम्पस में सिर्फ यही बेंच उसने क्यों चुना? मैंने नजर आसमान की तरफ किया। दूर आसमान में सूरज मुस्कुराता हुआ दिखा।
मैंने बात करना चाहा, पर चाहने से क्या होता है! जब बहुत जरूरी हो तो आवाज भी साथ नहीं देती। सुना था कि ऐसे समय में मौन मुखर हो जाता है।
किस्मत!…. क्या हमें किस्मत मिलवाने की कोशिश कर रही थी। मैंने महसूस किया कि चारों तरफ सुरमई रंग बिखर रहा था।
मैं चक्रव्यूह भेदने की कोशिश करने की चाह ही रहा था, कि तभी एक प्यारी सी आवाज को मेरे कानों ने सुना।
‘‘हैलो अविनाश!’’
मेरे अन्दर अचानक इच्छा जागी कि मैं उसकी आँखों में आँखें डाल जवाब दूँ, पर इस बार फिर आवाज ने साथ नहीं दिया। होंठ थरथराये, पर कुछ अनगढ़ सा निकला।
‘‘हाँ, कहिये?’’
उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा, ‘‘अपने बारे में कुछ बताइये।’’
‘‘मेरे बारे में क्या जानना चाहतीं हैं आप?… मेरा नाम आपको मालूम ही है। उम्र का अंदाजा लग ही गया होगा, और तो कुछ नहीं बचा बताने लायक। हाँ, एक बात आपसे पूछना है…. इससे पहले आप मुझसे मिली नहीं तो फिर मेरा नाम आपको कैसे पता?’’
उसने अपनी आँखें बंद कर ली, शायद मेरे लिए ये सुख के क्षण थे क्योंकि मैं इत्मिनान से उसका चेहरा और थरथराते होंठ देख रहा था। तभी उसने आँखें खोली और मुस्कराते हुये कहा, ‘‘तीन दिन से मैं काॅलेज आ रही हूं, तुम दिखाई नहीं देते थे, पर तुम्हारी चर्चा हरेक के जुबां पर रहता है। तुम हमारे बैच के सबसे होनहार छात्र हो। आकर्षित होने के लिए क्या यह काफी नहीं है?’’
आज मेरे पसंदीदा प्रोफेसर का लेक्चर था और मैं उसे मिस नहीं करना चाहता था। पर दिल कह रहा था कुछ देर और उस लड़की के पास बैठने को, पर दिमाग सुनता कहाँ है दिल का। फिर मैंने अपना बैग उठाया और चुपचाप क्लास की ओर जाने लगा। तभी पीछे से आवाज आई।
‘‘अपना मोबाइल नम्बर तो देते जाइये।… और मेरा नाम अंतरा है।’’ मैंने मुस्कुराते हुये अपना नम्बर बता दिया।
रात ठंडी थी और वक्त ठहरा हुआ। तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज आया।
‘‘क्या कर रहे हो?’’ अंतरा का मैसेज! मेरा दिल खुशी से सराबोर हो गया।
मैंने सोचते हुये लिखा, ‘‘वक्त रुका हुआ है और साँसें चल रही हैं। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है, दिल धड़क रहा है और इस धड़कन में मैं किसी को तलाश रहा हूँ।’’
‘‘मेरा भी दिल धड़क रहा है, पर मेरी धड़कन की तलाश खत्म हो गई है, क्योंकि आज सुबह ही तो उससे मुलाकात हुई है।’’ मैसेज देख मैं मुस्करा उठा।
थोड़ी देर बाद एक और मैसेज-
‘‘नींद नहीं आ रही मुझे। आपको आ रही है क्या?’’
‘‘नहीं, मुझे भी नहीं आ रही।’’
“मुझे आपसे प्यार हो गया है।’’ उसने लिखा।
मेरी आँखें बंद हो गईं। आँखें खुली नहीं कि आँसू का एक कतरा कोने से बह गया। मैं यकीन करना चाह रहा था कि यह हकीकत है या फिर कोई ख्वाब। मैं एक सामान्य सा लड़का, क्या कोई मुझे भी प्यार कर सकता है?
थोड़ी देर बाद मैंने मैसेज टाइप किया-
‘‘अंतरा, पहले मेरे बारे में जान तो लो। शायद जानने के बाद तुम पीछे हट जाओगी। मैं एक बहुत गरीब परिवार से हूँ। पिता बचपन में ही गुजर गये। मेरी माँ जैसे-तैसे मेरा और मेरी बहन का पालन पोषण किया। मैं उन लोगों के लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हूँ।’’
उसने हँसते हुये कहा, ‘‘मुझे तुम्हारी कहानी अच्छी लगी। इस कहानी का हिस्सा मैं भी बनना चाहूँगी।’’
बात खत्म हो गई। सारी रात करवटें बदलते गुजर गया। सुबह आँखों में सुनहरे ख्वाब सजा काॅलेज के लिये निकला, तो मेरे गले में कई सुर एक साथ बज रहे थे। काॅलेज के गेट पर पहंुचते ही मैंने उसको वहाँ पाया।
आँखों में आये आँसुओं से दोनों के आस-पास की दुनिया गीली हो गई।
अब हम रोज मिलने लगे, प्रेम पनपने लगा। आपसी समझ और विश्वास हमारे प्यार को और गम्भीर बना देता।
वक्त बीतता गया- हमारा प्यार और गहरा होता गया। भविष्य के सुनहरे ख्वाब बुनते हुये हमारे काॅलेज की पढ़ाई भी खत्म हो गयी।
हमने एक-दूसरे से वादा किया था, कि नौकरी लगते ही शादी के लिए अपने-अपने परिवार को बता देंगे।
कम्पटीशन के दौर में हम जगह-जगह फेल होते रहे। उम्मीदें निराशा में बदलती जा रही थी।
एक दिन-
‘‘अवि!’’ अंतरा ने बेचैन होकर अविनाश से कहा- ‘‘हम कब तक यूं इंतजार करते रहेंगे? मेरे घर में मेरी शादी की बातें होने लगीं। समझ नहीं आ रहा क्या करू ँ! अवि, हम शादी कर लेते हैं। नौकरी तो हमें आज नहीं तो कल, मिल ही जाएगी।’’
‘‘कैसी बातें कर रही हो अंतरा? तुम्हारे घर वाले क्या देखकर मुझसे तुम्हारी शादी करेंगे।’’
‘‘तो फिर चलो कहीं भाग जाते हैं।’’ अंतरा रूआँसी हो गई।
‘‘समझने की कोशिश करो अंतरा। आखिर भागकर हम कहाँ जायेंगे!
तुम जिस ऐशो-आराम में पली हो, क्या तुम एडजस्ट कर पाओगी।’’ फिर एक गहरी साँस लेकर – ‘‘जब ख्वाब हकीकत बन जाएगा तो कठोर धरातल का तुम सामना नहीं कर पाओगी। फिर यही प्यार काँटों जैसा प्रतीत होगा। कुछ दिन और इंतजार कर लो। मैं कोशिश कर रहा हूँ, मंजिल जरूर मिलेगी।’’ आवाज थोड़ी तल्ख हो गई थी मेरी।
‘‘मैं रह लूँगी तुम्हारे साथ। कैसे भी, और कहीं भी।’’
अविनाश चुपचाप खड़ा रहा, अंतरा की आँखों से आँसू झर-झर कर बहते रहे।
कुछ महीने बाद-
‘‘अवि मेरी शादी लगभग तय हो गई है। अब मैं ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती। प्लीज अवि मुझे समझने की कोशिश करो।’’
अविनाश की नम आँखों को देखकर उसका बोलना रुका। लगा उसे कि जैसे उसने कोई गलत बात कह दिया हो।
‘‘साॅरी अवि, मैं समझ सकती हूँ तुम्हें बुरा लगा। पता नहीं क्यों मैं ऐसा कह गई, पर मेरा परिवार और इंतजार नहीं कर सकता।’’ उसकी आँखें भरी हुई थी। अविनाश अब भी चुपचाप था।
दो सप्ताह बाद-
‘‘तुम शादी कर लो अंतरा। अनिश्चितता में तुम कब तक डोलती रहोगी। हमें अब इस सुख की आशा छोड़ देनी चाहिए कि हम एक दूसरे के साथ जीवन बितायेंगे। हमारे हिस्से का नहीं है यह सुख।’’ मेरे स्वर में क्षोभ था और अपने आप पर गुस्सा भी।
अंतरा बिना कुछ कहे चली गई, हमेशा के लिए। अंधेरा गहरा हो रहा था- अंदर भी और बाहर भी। मैं पस्त सा उठ खड़ा हो गया। मैं स्वप्न से जाग गया था। बह रहे थे सारे दृश्य। रह-रहकर मन कचोट रहा था। यह कैसे हो गया?… क्यों हो गया?…..
दृश्य और स्थितियाँ बदल गईं थीं। भविष्य अनिश्चित था। दौड़ती हुई दिल की इच्छाएँ दम तोड़ चुकी थीं। आशंकाएं दिल पर हावी हो रहे थे।
वक्त कहाँ ठहरता है! दिन भर के भाग-दौड़ के बीच, अब मैं अपने आप को भूलता जा रहा था। पर जब अपनी उम्र के साल गिनता तो बेचैनी दिलो-दिमाग पर हावी हो जाता। अकेलापन कचोटता रहता। घर के लोगों के चेहरे सवाल बनते जा रहे थे…. आखिर कब तक?
नींद में भी बुरे-बुरे सपने आते रहते। अवसाद गहराते जा रहे थे।
तीन दिन लगातार बारिश होने के कारण मैं घर से बिल्कुल नहीं निकला था। आज सूरज की हल्की धूप मन को भी हल्का कर रहा था।
आज एक कम्पनी का इंटरव्यू भी था। मन क्षुब्ध था, आशा बिल्कुल नहीं होने के बावजूद इंटरव्यू देने के लिए निकल पड़ा।
आशा के विपरीत इंटरव्यू बहुत अच्छा गया। दो घंटे के बाद मेरे सेलेक्शन की खबर भी आ गयी। मैं खुशी से भाव-विभोर हो घर पहँुचा। खुशखबरी सुन माँ और बहन दोनों खुश हुईं, पर दिल का एक कोना उदास ही रहा। बहुत देर हो गया, वरना आज जिंदगी कुछ और होती।
‘कभी वहा की तरह तुम भी आ जाया करो
कि घर का दरवाजा खुला रखता हूँ’
दिन, मास और वर्ष बीतते गये। समय का चक्र चलता रहा।?
बहन की शादी होने के बाद मेरी भी शादी के लिए दबाव बनने लगा। माँ की जिद के आगे घुटने टेकने पड़े। रूपा से शादी होने के बाद जिंदगी सामान्य गति से चलती रही।
दो साल बाद पुत्ररत्न की प्राप्ति मेरी अंधेरी भरी जिंदगी में थोड़ी-सी रोशनी भर दी। मैं खुश था- छोटे से परिवार के साथ, पर एक तड़प दिल के कोने में हमेशा रहता- काश!
लगभग दस साल बाद वक्त ने करवट बदला। मेरा प्रमोशन और तबादला दिल्ली जैसे शहर में- बहुत खुश था मैं। घर पहुँचने की जल्दी और रूपा के चेहरे पर खुशी देखने की चाह मेरे पैरों में जैसे पंख लगा दिया।
आज जब रूपा ने दरवाजा खोला तो मैं अनायास ही उससे लिपट गया। अप्रत्यक्ष खुशी ऐसी ही उल्टी-सीधी हरकत करवा देती है।
‘‘यह क्या कर रहे हैं? सब देख रहे हैं।’’ उसने हँसते हुये कहा।
मैं झेंप गया, पर अतिरेक उत्साह को रोक नहीं पाया। उसे गोद में उठाकर अंदर ले आया।
‘‘रूपा, मेरी मेहनत रंग लाई। आज मैं वाइस प्रेसीडेंट बन गया- वाइस प्रेसीडंेट। जिसका सपना मैं दस सालों से देख रहा था, आज साकार हो गया। रूपा, हम दिल्ली जैसे बड़े शहर में रहेंगे। हमारा बच्चा हमारी किस्मत बनकर आया है।’’
खुशी रूपा के चेहरे पर भी चमक ले आई और आँखों में आँसू।
सुबह का नीला रंग बहुत सुखद था और हमारा दिल्ली में होना।
मकान ऊँची चहारदीवारी और देवदार के वृक्षों से घिरा हुआ था। चारों तरफ हरियाली देख मन प्रफुल्लित हो गया।
मैंने कैलेंडर देखा- सितम्बर का आखिरी दिन, दिल धड़क गया। आज के दिल ही तो मेरी मुलाकात अंतरा से हुई थी। क्यों नहीं भूल पाता हूँ उसे?… खुशी हो या कोई तकलीफ, अंतरा तुम क्यों मेरे दिल पर दस्तक दे जाती हो।
‘अपनी तन्हाई को ताले में बंद कर आया हूँ।
तेरी यादों को फिर अपने साथ लाया हूँ।’
आँखों से आँसू पोंछ मैं काम में व्यस्त हो गया। घर को व्यवस्थित करने लगा।
मैं ऑफिस जाने के रास्ते में था। गाड़ी के किनारे वाली सीट, सिर टिकाकर सोचने लगा। काश! आज अंतरा मेरे साथ होती। मेरा प्रेम मुझे इतना सताता है, क्या अंतरा को भी सताता होगा?
शरीर शान्त था, पर मन में ऐसी उथल-पुथल कि कोई संयोग हो, और एक झलक मैं उसको देख पाता।
ऑफिस में पहुँचते ही मेरा भव्य स्वागत हुआ। सभी से परिचय कराया गया।
केबिन का दरवाजा खोलते ही -‘‘वेलकम सर!’’ एक मधुर आवाज मेरे कानों में -‘‘ओह! अंतरा!! मेरी पर्सनल सेक्रेटरी।’’ अजीब संयोग -क्या आज भगवान मेरे साथ है? क्या आज मैं जो माँगू वो मिल जाएगा? ऐसा अनुपम उपहार, अब मैं क्या माँगू -मुँहमांगी मुराद अंतरा के रूप में।
मेरा दिल धड़क रहा था, यानी कि अभी मौत नहीं आई थी। आँसुओं से आँखें धुंधलाई। मेरे होठों से अस्पष्ट शब्द निकला- ‘‘अंतरा, मेरा प्यार, कैसी हो?… मैं इन गुजरे सालों में तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं भूल पाया। तुम्हारे जाने के बाद अपने आपसे अजनबी हो गया था अंतरा। वक्त समुद्र की तरह बड़ा होता जा रहा था। कहीं ठहराव नहीं था।’’
‘‘सर हम आॅफिस में हैं, शाम को बात करते हैं। कहीं बाहर चलकर।’’ अंतरा में गज़ब का धैर्य दिखा। मैं निढ़ाल कुर्सी पर बैठ गया। खुशी और दुख एक साथ दिल में समा गया।
हम शान्ति से काम निबटाते रहे लेकिन आँखें घड़ी पर ही टिकी थी, कि कब शाम हो और मैं अंतरा के साथ कुछ पल गुजार सकुँ।
सूर्य विदा हो चले थे। आकाश में लाली शेष थी। लाल साड़ी में अंतरा मेरे साथ। मन की उड़ान को रोकना सम्भव नहीं लग रहा था। गजब खूबसूरती इन बाद के दिनों में आ गई थी।
हम एक रेस्टोरेंट में थे। आस-पास की टेबल भरने लगी थी। पर हमें परवाह कहाँ किसी की। मैंने चारों तरफ नज़र घुमाया।
‘‘इतनी खुशी इतने वर्षों में कभी नहीं मिली मुझे अंतरा।’’ मैंने कहा तो मुस्कुराते हुए उसने मेरा हाथ धीरे से दबाया।
‘तू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है।’
हल्की आवाज में यह गाना पूरे वातावरण को रोमांटिक कर रहा था।
‘‘सुखद संयोग है न अवि।’’ अंतरा ने कहा। मैं मुस्कुराया। मेरी आँखों में उड़ते भाव ही सबकुछ कह रहे थे।
‘उग आये जैसे गुलाब हमारे दरम्यान
कि खुशबू ने घर बनाया मेरे दिल में।’
‘‘अंतरा बहुत सुन्दर लग रही हो तुम। बाद के दिनों से भी ज्यादा। तुम्हारी आँखों में एक समन्दर है जिसमें मैं डूब जाना चाहता हूँ?’’
एक उदास हँसी अंतरा के होठों पर तैर गयी। वह बात को बदलती हुई-
‘‘बहुत सारे रिश्ते बन गये होंगे आपके! मैं उनमें अब कहाँ हूँ अवि। हम वक्त से बहुत आगे निकल गये हैं, जहाँ से लौटना अब मुमकिन नहीं।
एक सप्ताह बाद-
मैंने मुस्कुराते हुये उसकी आँखों में देखा- उसकी आँखों में आसमान उतर रहा था और उसकी होठों की हँसी पर बिखरे लाखों टिमटिमाते तारे दिखाई दे रहे थे, और मेेरे दिल की गलियों में गुनगुनाते नज्म अपने जलवे बिखेर रहे थे।
मैंने धीरे से फुसफुसाते हुये कहा, ‘‘तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला हो।’’ उसने बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखा और मैंने अपने दिल का दरवाजा खोल दिया।
हमारी मुलाकातें होने लगी।
एक रात मैं अंतरा से मिलकर अपने घर वापस आया, दरवाजा खोलती हुई रूपा की आँखों में एक चिंगारी दिखाई दी। आस-पास का सन्नाटा तिनका-तिनका उड़ रहा था। मैंने सुना, रूपा चिल्लाकर कह रही थी, ‘‘कई दिनों से तुम्हारे में आये बदलाव को मैं महसूस कर रही थी। पर सोचा कि काम की अधिकता तुम्हें, मुझसे दूर कर रहा है। बेटे की फिक्र नहीं रहती है तुम्हें। रात के खाने पर इंतजार करते हुये सो जाता है और तुम बाहर रंगरेलियां मनाते हो।
मुझे क्या पता था कि यहाँ तुम्हारी एक रखैल भी है। आज पड़ोस की नन्दा अगर तुम्हारी और उसकी (‘दो टके की औरत’ धीरे से कहती है) तस्वीर न दिखाई होती तो मैं जान ही नहीं पाती। कैसी-कैसी तस्वीरें वो भी पब्लिक प्लेस पर… इस तरह की तस्वीर तो एक वेश्या ही खिंचवा सकती है।’’ उसका चेहरा सा गया।
मैं शान्त भाव से कमरे में चला आया। मुझे लगा अगर इस शब्दातीत, नारकीय यातना से मुझे मुक्ति नहीं मिली तो इसमें मेरा दम घुट जाएगा।
रोज रात की तरह आज रात भी मैं अपनी पत्नी के बगल में सोया था कि मोबाइल की घंटी से मेरी नींद खुली। इतनी रात को कौन काॅल कर सकता है?
अंतरा का काॅल! हैरानी से मैंने पूछा- ‘‘इतनी रात को? क्या बात है?’’
‘‘अभी आ जाओ, मुझे तुम्हारी जरूरत है, मैं बिल्कुल अकेली हूँ।’’ अंतरा की आवाज़ अलसाई सी थी।
मैं भी अपने आप को रोक न सका, ‘आॅफिस में एक जरूरी काम है’ पत्नी को कहकर निकल पड़ा।
रात एक बजे मैं उसके घर पहुँचा। दूर आसमान में चाँद मुस्कुरा रहा था।
उसने दरवाजा खोला। मुस्कुराते हुये उसने कहा, ‘‘तूुम आ गये! मेरी खुशी, मेरी चाहत, मेरे हमसफर।’’
‘‘माय प्रिंसेस।’’ कहते हुये मैंने उसे गले लगा लिया।
हवाएं अचानक जोर से चलीं। आसमान सुरमई लाल, वह मेरे चेहरे को अपनी हाथों में लेते हुये धीरे से बोली, ‘‘मैं जब भी तुम्हारे अक्स को हथेली में समेटना चाहती थी, तुम मेरी हथेली से फिसल जाते थे। आज तुम्हें फिसलने नहीं दूँगी। आज सम्पूर्णता की हद तक तुम्हें अपने अंदर महसूस करूँगी। आँखें बंद करके नहीं, आँखें खोलकर। अवि तुम नहीं जानते, विरह की वेदना कितनी कठिन होती है। एक-एक दिन बरसों की तरह।
अवि आज नदियों के बहने का दिन है, हवाओं के चलने का दिन है, पर्वतों के दरकने के दिन हैं, बारिश में भीगने के दिन हैं, आज दिन हैं जिस्म और आत्मा के एक होने का। आज कायनात साक्षी होगा हमारे अंतरंग क्षणों का।’’
मैंने एक गहरी सांस लिया, और उसको सीने से लगाकर कहा, ‘‘मेरी जान, तुम अनमोल हो। पर तुम जो कह रही हो, वहाँ घनघोर अंधेरा है। उसे भेद पाना कठिन है हमारे लिए। प्यार तुमसे किया हूँ, तुम्हारे शरीर से नहीं।’’
‘‘तो क्या हम यँू ही अधूरे रहकर इस दुनिया से चले जायेंगे अवि?’’ उसने कांपते हाथों से मेरे चेहरे को टटोला।
नीली रोशनी में मैंने देखा- अंतरा की आँखों में आँसू थे। मैंने हाथ बढ़ाया और उसके चेहरे को थाम उसके होठों पर मैंने अपना होंठ रख दिया। वह चैंक गई- ‘ओह! जिन्दगी यहीं थम जाती तो कितना अच्छा होता’
अब वह पूरी तरह मेरे गोद में थी। मैं खुश था कि कोई मेरे इतने करीब है कि उसकी साँसों की गरमाहट को महसूस कर सकूँ।
बढ़ते वक्त के साथ मैं भी बढ़ रहा था। इंतजार कई बरसों का खत्म हो रहा था। अब हमारा देह माध्यम बन रहा था, प्रेम में मंजिल को पाने के लिए। मैं उसकी देह में सराबोर था, कि तभी उसकी हल्की चीख पूर्ण संतुष्ट होने का गवाह बनी। उसने आँखें खोली और फिर बंद कर ली। पूर्णता को पाने की संतुष्टि उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। एक अहसास प्यारा सा मेरी जिंदगी में अभी भी शामिल है वो। एक अनसुलझा रहस्य जिसे मैंने सुलझा लिया था। यहीं तो सुख का क्षण था।
सुबह की रोशनी हमारे रिश्तों को एक नया नाम दे दिया।
उसने धीरे से कहा, ‘‘अवि! अब मैं नहीं रह सकती तुम्हारे बगैर! इतना सुख मैंने अपने जीवन में कभी नहीं पाया। तुम्हारा प्यार, बस अब और मुझे कुछ नहीं चाहिए।
मैं जानती हूँ यह मुश्किल है, पर मैं चाहती हूँ कि तुम अपनी पत्नी और मैं अपने पति को डिवोर्स दे दें। तुम्हारे बेटे को हम अपने साथ रखेंगे। मैं उसे अच्छी माँ का प्यार दूँगी।’’
मैं अवाक् उसकी बातें सुनता रहा। उसके बगैर रहना मेरे लिए भी मूश्किल था, पर डिवोर्स, इतना बड़ा फैसला…. आखिर रूपा की गलती क्या है? समर्पित है वो मेरे लिए, इतना कुछ जानने के बाद भी मेरा ख्याल अब भी रखती है। थोड़ी शिकायत के बाद फिर शान्त हो जाना उसकी आदत बन गई है। मेरी सोच की गति बढ़ती जा रही थी और दिल की धड़कनें भी। भावनाएं तूफान की तरह उठने लगी थीं और आँखें नमीं लिये हुये। गल में आवाज फंस गई और जवाब कुछ नहीं सूझ रहा था।
उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर रोते हुये कहा, ‘‘सपने हम दोनों ने देखे हैं अवि, -साथ रहने का, एक-दूसरे को चाहने का। अवि! तुम्हारे बगैर अब कैसा जीना? हम इतने करीब आ चुके कि अब दूर नहीं हो सकते।’’ कमरे में अंतरा की सिसकियाँ भर गईं।
उस शाम मैंने रूपा से कानूनन अलग होने की बात को बहुत शान्त लहजे में कही। कारण तो वो भी जानती थी। मैंने उससे कहा कि उसे कोई परेशानी नहीं होगी, आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रहेगी। बेटे को मैं अपने पास रखँूगा। मुझे लगा कि वो बेआवाज रो रही है। मैं चुप कराने के लिए उठा पर वो अचानक से उठी और जोर से चिल्लाकर बोली, ‘‘मुझे तुम्हारी भीख नहीं चाहिए, और हाँ बेटा सिर्फ मेरा है… उसे मैं तुम्हें किसी कीमत पर नहीं दूँगी। तुम सोच रहे होगे कि मैं तुम्हारे सामने रोऊँगी, गिड़गिड़ाऊँगी…. तो इतना समझ लो, औरत कमजोर नहीं होती। हमारी अपनी कमजोरी ही हमारी शक्ति बन जाती है…. मैंने सुना था मर्द कमीने होते हैं, पर इतने ज्यादा….. यह आज पहली बार देखा। वैसे भी मैं तुम्हारे लिए पत्नी नहीं थी। मुफ्त का काम करने वाली बाई, धोबी, रसोईन और जब भी मन किया सेक्स सर्वर बना लिया तुमने।’’ गुस्से में उसकी आँखें कठोर हो गई।
उसके शब्दों की दहकती चिंगारियाँ पूरे कमरे को गर्म कर रही थी। मैं कहीं न कहीं से खुद को हीन महसूस कर रहा था।
डिवोर्स मिल गया। कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी रूपा को दे दिया। थोड़ा सा झटका लगा मेरे दिल को, पर उस सुख के आगे यह दुख कम था।
सोचा मेरे सुख के दिन आ गये। मैंन अपने बदन को मोड़कर अंगड़ाई ली। गहरी-गहरी साँसों के साथ मैं चल दिया अंतरा से मिलने।
उसके घर पहुँच मैंने जोर से आवाज लगाया-
‘‘अंतरा, जल्दी से तैयार हो जाओ। चलो आज हम चलते हैं। आज बहुत बड़ा दिन है सेलिबे्रशन का। आज हम आजाद हैं- समाज से, बेमतलब के रिश्तों से। जिन्दगी की सबसे उदास कहानी का अंत हो गया अंतरा।’’
अंतरा कुछ देर मुझे अजीब नजरों से देखती रही… उसकी आँखें मेरे अजनबी होने का अहसास करा रहे थे।
उसने हँसते हुये कहा, ‘‘अवि! क्या मैं तुम्हारी मनचाही किताब हूँ, जिसे जब चाहा पढ़ा और जब चाहा किनारे रख दिया। रूपा, जिसने इतने वर्ष दिये तुमको, जो तुम्हारे बेटे की माँ है- वह असफल है, इसलिए क्योंकि तुम पुरूष होने का दम्भ भरते हो, कि जब जिसको चाहोगे अपनी जिंदगी में ला सकते हो और जब चाहो अपनी जिंदगी से निकाल सकते। क्या हम स्त्रियाँ मिट्टी जैसी हैं…… कि तुम जैसे पुरूष जब चाहे उसे कैसा भी आकार दे दे। नहीं अविनाश, ऐसा हर्गिज नहीं होगा। मुझे रूपा से सहानुभूति नहीं बल्कि उस पर गर्व है कि वो तुम जैसे इंसान की जिंदगी से हमेशा के लिए चली गई और मैं….. मैं तो उसी दिन से तुमसे नफरत करने लगी थी, जिस दिन तुम मुझे आगे बढ़ गये थे। नफरत इस कदर बढ़ गई थी कि मैं तुम्हें हर हाल में बर्बाद कर देना चाहती थी।’’ इतना कह वो मुस्कुराई -एक जहरीली मुस्कान।
हाथ मेरे सीने पर कस रहा था। ऐसा लगा जैसे कोई सीसा मेरे सीने को लहूलुहान कर रहा है।
तभी मोबाइल की घंटी बजी। आॅफिस से फोन था-
‘‘अविनाश, आपने कम्पनी के निजी अकाउन्ट से लगभग ढाई करोड़ रूपये की हेरा-फेरी की है। आपको तुरंत सस्पेंड किया जाता है। जांच के लिए हमारी टीम बैठ गई है, आप शहर छोड़कर नहीं जा सकते।’’ बाॅस की आवाज़ मेरे कानों में गर्म पिघले सीसे की तरह भरा जा रहा था।
मैंने एक नज़र अंतरा को देखा, उसकी जहरीली मुस्कान हर भेद को खोल रही थी।
‘‘ओह! चरित्रहीन!!’’ अनायास ही मेरे मुँह से निकला, और मेरी सिसकियाँ पूरे कमरे में फैल गई। मैं पूरी तरह टूट चुका था। उसने मेरी जिंदगी को तबाह और बर्बाद कर दिया था। अंतरा के घर से बाहर निकला तो पुलिस की जीप दिखाई दी। एक दरोगा और उनके साथ आये पांच सिपाही मेरा ही इंतजार कर रहे थे -शायद पुलिस को मेरे यहाँ होने की खबर भी अंतरा ने दी हो।
कात्यायनी सिंह
कादम्बनी, पुष्पवाटिका , दस्तक टाइम्स ,मधुराक्षर, प्रभात खबर, हिंदुस्तान, गृहलक्ष्मी पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर रचनायें प्रकाशित। प्रकाशित किताब -- अक्स ( कहानी संग्रह ) , मैं अपनी कविताओं में जीना चाहती हूँ (कविता संग्रह )। संपर्क - katyayanisingh5620@gmail.com

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