संपादकीय : मीडिया का टी.आर.पी. घोटाला 3

हंसा द्वारा दर्ज की गयी एफ़.आई.आर. में रिपब्लिक टीवी का नाम नहीं है। उल्टा इंडिया टुडे का नाम है। 6 अक्तूबर को एफ़.आई.आर. दर्ज हुई और परमबीर सिंह इतने सक्षम पुलिस अधिकारी हैं कि एक ही दिन में इंडिया टुडे को क्लीन चिट दे दी और अर्णव गोस्वामी के विरुद्ध प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर डाली।… अपनी, मुंबई पुलिस, और महाराष्ट्र सरकार की भद्द पिटवाने के लिये कमिश्नर साहब को पद्मश्री से सम्मानित किया जाना चाहिये।

मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने एक और विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित करते हुए रिपब्लिक टी.वी. के ख़िलाफ़ पैसे देकर टी.आर.पी. (टेलिविज़न रेटिंग पाइण्ट्स) बढ़ाने का आरोप लगाया है। और उस चैनल पर एक्शन लेने की बात कही है।
मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने टी.आर.पी. रैकेट के भांडाफोड़ करने का दावा किया है और कहा है कि टेलीविजन चैनल्स टी.आर.पी. को मैनिपुलेट करते थे। सिंह ने कहा कि रिपब्लिक टीवी और और दो अन्य मुंबई के लोकल चैनल्स इस काम में संलिप्त पाए गए हैं। इन दोनों चैनलों के मालिकों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। मुंबई पुलिस कमिश्नर ने कहा कि रिपब्लिक टीवी के डायरेक्टरों और प्रमोटरों की जांच फिलहाल नहीं हुई है। उन्होंने आगे कहा कि रिपब्लिक चैनल के कुछ कर्मचारियों को समन भेजे जाएंगे। 
एफ़. आई. आर. आईपीसी की धारा 409 और 420 के तहत दायर की गयी है। परमबीर सिंह ने बताया कि ‘टीआरपी की निगरानी के लिए मुंबई में 2,000 बैरोमीटर लगाए गए हैं। बार्क (Broadcast Audience Research Council) ने इन बैरोमीटर की निगरानी के लिए ‘हंसा’ नामक एजेंसी से गोपनीय अनुबंध किया था जो टी.आर.पी. के साथ छेड़छाड़ कर रही थी। जिन घरों में ये कॉन्फिडेंशियल पैरामीटर्स लगाए गए थे उस डेटा को किसी चैनल के साथ शेयर कर उनके साथ टी.आर.पी. में छेड़छाड़ की गई।’
‘इन घरों में एक खास चैनल को ही लगाकर रखने के लिए कहा गया था। जिसके बदले में उन्हें पैसे दिए जाते थे।इस मामले में दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है और आठ लाख रुपये जब्त किए गए हैं। इसमें से एक रेटिंग को आंकने के लिए ‘पीपल मीटर’ लगाने वाली एक एजेंसी का पूर्व कर्मचारी भी है। दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस ने कहा कि आरोपी कुछ परिवारों को रिश्वत देते थे और उन्हें अपने घर पर कुछ चैनल चलाए रखने के लिए कहते थे।’
वैसे हंसा द्वारा दर्ज की गयी एफ़.आई.आर. में रिपब्लिक टीवी का नाम नहीं है। उल्टा इंडिया टुडे का नाम है। 6 अक्तूबर को एफ़.आई.आर. दर्ज हुई और परमबीर सिंह इतने सक्षम पुलिस अधिकारी हैं कि एक ही दिन में इंडिया टुडे को क्लीन चिट दे दी और अर्णव गोस्वामी के विरुद्ध प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर डाली।… अपनी, मुंबई पुलिस, और महाराष्ट्र सरकार की भद्द पिटवाने के लिये कमिश्नर साहब को पद्मश्री से सम्मानित किया जाना चाहिये। 
अर्णव गोस्वामी ने परमबीर सिंह को ललकारते हुए अपने चैनल से कहा कि उसे सुशांत सिंह राजपूत, दिशा, पालघर और महाराष्ट्र सरकार एवं मुंबई पुलिस को एक्सपोज़ करने के कारण ही पुलिस कमिश्नर ने यह चाल चली है। 
अर्णव ने कहा, “मुंबई पुलिस कमिश्नर पूरी तरह से एक्सपोज हो गए हैं। टी.आर.पी. मामले में एफ़.आई.आर. की एक कॉपी में इंडिया टुडे का ऐसे चैनल के रूप में उल्लेख किया गया है जिसकी जांच की जानी चाहिए। बल्कि इंडिया टुडे का एफ़.आई.आर. में कई बार उल्लेख किया गया है। रिपब्लिक टीवी का एक बार भी उल्लेख नहीं है। अब, मामले में मुख्य गवाह ने इंडिया टुडे का ऐसे इंग्लिश चैनल के रूप में नाम दिया है, जिसके लिए कथित रूप से दर्शकों की संख्या हासिल करने के लिए पैसे दिए गए थे। इंडिया टुडे के खिलाफ शिकायत 6 अक्टूबर को की गई थी। परम बीर सिंह ने 16 घंटे के भीतर इंडिया टुडे के खिलाफ जांच बंद कर दी और रिपब्लिक टीवी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। अब चूंकि एफ़.आई.आर. सामने आ गई है और महत्वपूर्ण गवाह रिकॉर्ड में है और मुंबई पुलिस कमिश्नर को रंगे हाथों पकड़ लिया गया है, उन्हें नैतिकता के हित में इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।”
सवाल यह तो उठता ही है कि आख़िर एन.डी.टी.वी., आजतक, इंडिया टुडे, ज़ी टीवी, और इंडिया टीवी आख़िर क्यों अर्णव गोस्वामी के विरुद्ध कमर कस कर क्यों खड़े हो गये हैं। उन्हें क्यों नहीं महसूस हुआ की मुंबई पुलिस पत्रकारिता के विरुद्ध षड़यन्त्र कर रही है। उन्हें अपने दुश्मन (अर्णव गोस्वामी) का दुश्मन (परमबीर सिंह) अपना दोस्त लगा और वे परमबीर सिंह की बीन बजाने के लिये तैयार हो गये। वे भूल गये कि कल को यदि उन्होंने किसी राज्य की सरकार के विरुद्ध कुछ लिखा तो वहां की राज्य सरकार उनके साथ यही सुलूक़ कर सकती है। 
मज़ेदार स्थिति यह है कि जुलाई में बी.ए.आर.सी. ने इंडिया टुडे पर यही आरोप लगाया था। इंडिया टुडे (राजदीप सरदेसाई, एवं राहुल कंवल) के जवाब से संतुष्ट न होने पर उन्होंने इंडिया टुडे पर पांच लाख रुपये का जुर्माना किया था। एक ध्यान देने लायक समाचार यह भी है कि सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद उनके चरित्र हनन के आरोप में भी इंडिया टुडे को एक लाख रुपये का जुर्माना भरना पड़ा है और लाइव टीवी पर माफ़ी मांगने की सज़ा भी मिली है।  
एक बात साफ़ कर दूं कि मुझे अर्णव गोस्वामी, अमीश देवगण और दीपक चौरसिया का चिल्लाने वाला अंदाज़ बिल्कुल पसन्द नहीं है। आजकल टीवी चैनल शोरीले होते जा रहे हां। मगर हाँ,  हिन्दी टीवी चैनलों को समझना होगा कि आपस में लड़ने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। किसी ने ठीक है कहा है कि “हमाम में सब नंगे होते हैं।” सभी चैनल चाहते हैं कि वे देश के पहले नंबर का चैनल बन जाएं। उसके लिये वे तरह तरह के हथकण्डे भी अपनाते हैं। अपने अपने चैनल पर सभी दावा करते हैं कि वे नंबर वन हैं। 
जितना समय टीवी चैनल एक दूसरे पर कचरा फेंकने में लगा रहे हैं, बेहतर हो कि वही समय सच्ची ख़बरें देनें में लगाएं। हमें ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चाहिये… सच्ची ख़बर चाहिये। राजदीप सरदेसाई हमेशा कहते हैं कि समाचार ब्लैक एण्ड व्हाइट नहीं होता बल्कि ग्रे (स्लेटी रंग) कलर का होता है। मैं राजदीप सरदेसाई को बताना चाहूंगा कि समाचार केवल सच्चा होना चाहिये, उस पर किसी भी चैनल की सोच का रंग नहीं चढ़ा हुआ होना चाहिये। 
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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