मेरे हिस्से की धूप : मानवतावादी दृष्टि 3
‘मेरे हिस्से की धूप’ नीना शर्मा ‘हरेश’ द्वारा रचित उपन्यास सन् २०२० में माया प्रकाशन ने प्रकाशित किया। इस उपन्यास ने बहुत ही जल्द चारों ओर वाह वाही लूटी। पोलैंड में कोरोना समयमें छत्तीसगढ़ के वेबिनारों में किन्नर विमर्श पर चर्चा परिचर्चा हुई। उसी के तहत मैंने आदरणीय श्रद्धेय डॉक्टर विनय पाठक जी की पुस्तक ‘किन्नर विमर्श दशा और दिशा’ पर वक्तव्य दिया और लेखिका डॉ. नीना शर्मा के इस उपन्यास के विमोचन पर चर्चा हुई और उनसे बातचीत हुई। उनसे पी.डी. एफ. मँगवाकर मैंने इस उपन्यास को पढ़ा। मित्रों! सच मानना बहुत कम उपन्यास, कहानी संग्रह होते हैं जिन्हें एक ही बैठक में पूरा का पूरा ध्यान योग में पढ़ा जाता है। किन्नर विमर्श पर बहुत उपन्यास आ गये हैं। कहानी संग्रह, आत्मकथा, कविता संग्रह आये हैं। यह विषय, विषय नहीं, यह मानवतावादी दृष्टि का अभिन्न अंग है। मानवतावादी सोच के द्वारा हमें इस पर बात करनी होगी, तभी हम अपने भाई बहनों को अपने साथ जोड़ पायेंगे। यह सोच लेखिका की पूरे उपन्यास में नज़र आती है। एक समीक्षक का धर्म ‘पुस्तक’ को केन्द्र में रखकर समीक्षा करना ही पुस्तक और समीक्षक के औचित्य को शोभा देता है। विचारधारा, लेखक की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर कभी किसी भी पुस्तक की समीक्षा नहीं करनी चाहिए, पर ऐसा होता है। यही कारण है कि अच्छे लेखक आगे बढ़ने में अधिक समय ले लेते हैं। बढ़ते हैं, पढ़े भी जाते हैं। अगर समीक्षाएँ निष्पक्ष हो तो, लेखक और समीक्षक दोनों का मान बढ़ता है।
११९ पृष्ठ में लिखा गया यह उपन्यास मोतीलाल और पुष्पा के घर जन्मी पहली संतान के रूप में मोनी की कहानी है। यह कहानी मोनी के साथ-साथ उन माताओं-पिताओं भाई-बहनों की कहानी है, जो समाज में नित्य प्रति आरोपों तानों-बानों से गुजर कर और मजबूती से उभर कर आते हुए पात्र मोनी की कहानी है। इस उपन्यास का कथानक एक परिवार की कहानी है, जो टूटता-फूटता, बिखरता-सा होने पर भी कथानक के बीज तत्त्व जिज्ञासा को बनाये रखता है। जिज्ञासा कहानी, उपन्यास, आत्मकथा की प्राणशक्ति होती है। यही कारण है कि पाठक एक बार पढ़ने बैठने पर यह उपन्यास जिज्ञासावश पूरा पढ़करही चैन की साँस लेता है। कथानक चरमसीमा पर जाकर उद्देश्य को, लक्ष्य को पूरा करते स्पष्ट प्रतीत होता है। लेखिका की पकड़ प्रारंभ से लेकर अंत तक बनी रही है। केवल विचारों को तीन-पाँच वाक्यों में कहकर उसकी व्याख्या को पाठकों के लिए छोड़ दिया है।
मोनी सुबह शेविंग करते करते चेहरे पर हरे रंग के निशान को देखते हुए तैयार होती है और नाश्ते में माँ से पोहे लेती है। माँ पुष्पा मोनी के उस रूप को देखकर मंत्रमुग्ध होती है। नवीन मोनी से छोटा बेटा माँ से नाश्ते के बारे में पूछता है, वह तो पराठे खाना चाहता है, वह मोनी के लिए बने पोहे नहीं खाना चाहता। घर की पहली घटना पाठक के मन में प्रश्न उकेरती है, जो स्वाभाविक भी है और विचारणीय भी है। भाई को पता है पर फिर भी माँ का मोनी के प्रति विशेष लगाव नवीन को अखरता है।माँ उसके लिए भी पराठे बनाती है। माँ के लिए सब संतान एक बराबर होती है। “मैंने कहा ना मुझे नहीं खाना। और नवीन वहाँ से चला गया। मोनी को समझ नहीं आया कि वह क्या करे। पुष्पा भी स्तब्ध-सी खडी थी। चाय उबलकर गैस पर गिर पड़ी। मोनी को लगा कि उसने कुछ कहा तो माँ रो देगी। हर दूसरे तीसरे दिन यही होता है पुष्पा और नवीन के बीच तकरार चलती रहती है। नवीन को लगता है कि माँ के लिए उससे ज्यादा मोनी का महत्त्व है”। (पृष्ठ ८)
खून के रिश्ते हों, विकलांगता हो मानववृत्ति अद्भुत है। हम हर बात में भेदभाव, कम-अधिक का भाव रखकर माता-पिता से बात करते हैं। नवीन का यह व्यवहार मोनी और माँ पुष्पा को अखरता है, पर क्या करें। पास में रहने वाली गोपी चाची का ताना “हाँ बेटा —— तुझे तैयार होने में हमसे ज्यादा समय लगता है ना”। (पृष्ठ -९) हर्षिता का रिश्ता टूट जाने पर घर में हर्षिता का बहन मोनी और माँ पुष्पा से कहना। “एक लड़के ने ना कहा है ना, दूसरा आ जाएगा’ मोनी ने कहा तो हर्षिता ने बात काटते हुए कहा “नहीं आएगा जब तक आप हो – कभी नहीं आएगा – आएगी तो बस नो नो – बिकॉस ऑफ यू” हर्षिता गुस्से में चिल्लाई। ‘हषिता’ – पुष्पा ने उसके गाल पर एक चाटा लगा दिया”।(पृष्ठ१९) मोनी घर में माता-पिता के जिगर का टुकड़ा है, इसके बावजूद भी समाज की मानसिकता और स्वयं की वृत्ति मोनी को कटघरे में खड़ा कर देती है। यह उपन्यास संवेदना के इस रूप को बेहतरीन ढंग से बयाँ करता है। मोनी का परेशान होना समाज से पहले घर से भी है। उसके हिस्से की धूप, उसके हिस्से की खुशियाँ, केवल केवल एक कारण से उसे वंचित उपेक्षित और उसके कारण उसके माता-पिता को दुःख ही दुःख झेलने पड़ते हैं। मोतीलाल जी का भाई पहले व्यवसाय से अलग होकर, राज्य छोड़कर चला गया। हर्षिता और नवीन की शादी मोनी के ना आने पर तय हुई। यह पीड़ा मोनी की तो है ही उसके माता-पिता की भी है।
यह उपन्यास किन्नर समाज को समाज का ही अभिन्न हिस्सा मानने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही परिवार उस बच्चे के प्रति अपने दायित्व को पूरा करने के लिए भी सचेत करता है। प्रथम कर्त्तव्य माता-पिता का है, माता-पिता उसके लिए मोतीलाल और पुष्पा जैसे बन सकें। दूसरी जिम्मेदारी भाई-बहन और मित्र की आती है। इस उपन्यास में लेखिका ने भाई बहन के दायित्व को दिखाकर, समाज के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया है। जहाँ उनका मन और संवेदना बदली है वहाँ मोनी ने संयत रहकर भी उसे संभाला है। मित्र रूप में शादी शुदा साजिद का उसके जीवन में आना, यह प्रसंग कहानी को गति ही नहीं देता है, अपितु समाज को आगे बढ़कर आने के लिए अनायास प्रेरित करता है। एक मित्र के रूप में यह उपन्यास साजिद और मोनी की ऐसी प्रेम-गाथा को दिशा देता है, जिसमें समर्पण और एक-दूसरे के प्रति सम्मान है। जब-जब मोनी बिखरती-टूटती है तब-तब साजिद उसकी दिशा और मनोबल बढ़ाकर, उसे उसकी अस्मिता और कर्त्तव्यबोध से अवगत करता है। यह संबंध मित्रता का है। साजिद की पत्नी सायरा और माँ सकीना को पसंद न होने के कारण मोनी हमेंशा दूर से ही साजिद से सलाह लेती नज़र भी आती है। वह स्वयं के कारण साजिद का घर भी तोड़ना नहीं चाहती है। यही कारण है कि माँ सकीना के कहने का वह बुरा भी नहीं मानती है। साजिद और मोनी के ये संवाद अनूठी मित्रता को व्याख्यायित करते हैं -“साजिद – बहुत प्यार करता हूँ”- साजिद ने उसका वाक्य पूरा किया। जानती हूँ – साजिद – वो तुम मुझे छोड़ दो – मोनी बोली। ——- मोनी किसी बात की मत सोचो? अपने पापा-मम्मी का सोचो, मोनी की आँखें गीली हो गयी। पूरे समाज से लड़े हैं तुम्हारे लिए। —– साजिद दुल्हन तो बनी नहीं लेकिन सब के दुःखों का कारण बन गयी। माँस का एक टुकड़ा इधर-उधर क्या हुआ मेरी पहचान ही खतम हो गयी। लगता है दया कर रहे हैं मुझ पर। अब तो ये मन भी तैयार है लोगों के ताने सुनने को लेकिन —— अपनों के ताने नहीं सहे जाते साजिद अब —-”। (४३-४४)
इस रिश्ते को मोनी की मौसी शालिनी इस प्रकार व्यक्त करती है “जीजी वो इंसान है। जो हमारी मोनी को समझता है। उसका मज़ाक नहीं उड़ाता, उसका सम्मान करता है। उसे धिक्कारता नहीं उसे प्यार करता था”। (पृष्ठ -५२)
इस उपन्यास में लेखिका ने मौसी के रूप में शालिनी का चरित्र अद्भुत बना दिया है। शालिनी बांझ औरत के रूप में चित्रित की गई है। वह संतान न होने का दुःख समझती है। कई उपचार के उपरान्त भी उसे संतान नहीं होती है। वह मोनी को बेटी के रूप में मानती है। वह हमेंशा अपनी बहन पुष्पा और मोनी को समझाती है। कहीं भी उन्हें बिखरने नहीं देती है। यही कारण है कि मौसी शालिनी मोनी की मौसी न बनकर पाठक की मौसी बनकर गरिमामयी, उपन्यास की जिंदादिल पात्र बनकर उभरकर आती है। जैसे ही बचपन में मोनी के किन्नर होने की खबर लगती है वह अपनी ‘चंद्रिका’ को लेकर परेशान हो उठती है। पुष्पा और मोनी को साथ ले जाकर डॉ. से मिलती है। उसके हर्मोनल टेस्ट करवाती है। ‘देखिए वो भगवान की तीसरी दुनियाँ है। डॉ. शुभांगी ने धीरे से कहा। ‘किन्नर’ ये बोलते-बोलते शालिनी के होंठ और आवाज काँपने लगी। उसके हाथ पैर ठंडे हो गये। पुष्पा को समझ नहीं आया वह चीखी।(पृष्ठ – ६७) शालिनी मोनी को अपनी बेटी मानकर हमेंशा उसका ध्यान रखती थी।
वहीं साजिद मोनी से डॉक्टरों की राय सुनकर मोनी से कहता है “देखो मोनी इसी सत्य के साथ तुमको जीना है”। (पृष्ठ – ५३) साजिद की माँ सकीना के समझाने पर मोनी को लगता है कि इस रिश्ते में विराम जरूरी है। वह वहाँ से जाने लगती है, साजिद उसे रोकता है तो मोनी उसे कहती है“नहीं साजिद छोड़कर नहीं जा रही- बस अपने पापा का सपना मुझे बुला रहा है। मुझे वह सपना इस हाथ में देने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। – हाँ तुम्हारी ताकत की जरूरत तो मुझे होगी ही। कुछ सवालों के जवाब मुझे भी तलाशने हैं। और जब तक उन सवालों के जवाब मुझे न मिल पाए तब तक शायद मैं – यहाँ न आ सकूँ”। (पृष्ठ – १०४)
मित्रता का ऐसा भाव, संबंधों की ऐसी गरिमा समर्पण का भाव है जहाँ देह भूख नहीं है और मित्र को उसकी अस्मिता के साथ स्वाभिमानपूर्वक कर्त्तव्यबोध सिखाती है। परिवार के साथ अन्य रिश्तों की ऐसी मिठास, निश्चित रूप से इन्हें सम्मानपूर्वक जीने का हक दिला सकती है। हम लगातार चर्चा-परिचर्चा में, लेखों में इस बात पर जोर देते हैं कि समाज की सोच बदले, लोगों का नज़रिया बदले। समाज इन्हें अपना समझे।
इस उपन्यास की यह कहानी, संवेदना और उद्देश्य को गति ही नहीं देती है, अपितु अद्भूत प्रेम कहानी बना देती है। इससे कहानी में कहीं भी नीरसता नहीं आती है।
घर में बहन हर्षिता की शादी तय ना होने के कारण मोनी स्वयं को दोषी मानकर किन्नरों के घर अर्थात् गुरु के पास पहुँच जाती है। वहाँ पर पहुँचकर, उनकी हालत देखकर उसे पछतावा भी होता है। बबली और मोनी के संवाद के द्वारा लेखिका ने उस पीड़ा को दर्शाया है, जो इन्हें झेलनी पड़ती है साथ ही साथ बबली को एक समझदार मित्र, बहन के रूप में दिखाया है। “क्यों आई तू यहाँ”। बबली ने कमर पर हाथ रखते हुए पूछा।
वो मैं —- मैं मैं बंद कर तेरे माँ-बाप तुझे खाने को नहीं देते थे? मारते थे?
“नहीं-नहीं” –  मोनी ने कहा।
“तो क्यों मरने चली आई यहाँ….”? ये नरक है नरक। और हम भी अपनी मर्जी से यहाँ नहीं आए, फेंक गये हमारे बाप यहाँ। और देख एक तू है इतना ऐशो आराम छोड़कर आयी है। और प्यार-ममता भी। हम जैसों को कोई घर में नहीं रखता माँ भी नहीं। और तुझे उन्होंने दुनिया का सामना करके रखा तो तू यहाँ चली आई?…… आप क्यों नहीं चली गई? मोनी ने हिम्मत करके पूछा। हाँ तो क्या बोल रही थी कि मैं क्यों नहीं चली जाती? बबली फिर हँसी- एक बात अपने भेजे में डाल ले यहाँ आने के रास्ते हैं। जाने के नहीं। और बता कहाँ जाएँ? कौन रखेगा हमें। यहाँ अनाथ आश्रम है, वृद्धाश्रम हैं लेकिन हिजड़ा आश्रम नहीं है। इस समाज में कपूत बेटे के लिए परिवार में जगह है, नाकारा बेटी के लिए जगह है लेकिन हिंजड़े के लिए कोई जगह नहीं है”।(पृष्ठ – २८-२९)
लेखिका ने बबली और मोनी के संवाद से, पहली मुलाकात में ही कहानी के उद्देश्य के बीज को रोप दिया। बबली मोनी को वहाँ से भगाने में मदद करती है। उसको घर जाने के लिए ही प्रेरित करती है। लेखिका ने अंत में उसी बबली को मोनी से मिलवाया “भाग आयी मोनी मैं भाग आयी बस वहाँ से भागना था। दो दिन से कुछ खाया भी नहीं। कहाँ जाती। हिंजड़ों को कौन काम देता है? फिर तेरी याद आयी”। (पृष्ठ ११६) मोनी उसे खाना खिलाकर डॉ. के पास ले जाती है। वहाँ पर पता चलता है कि बबली को ऐड्स है। कुछ दिनों की मेहमान है। उसे हॉस्पिटल में भर्ती करवाती है। मोनी को चैन नहीं पड़ रहा था बाजार में दीपावली की रौनक बढ़ गयी थी पूरा इंदौर दूल्हन की तरह सजा हुआ था। कई दिये और रोशनी से नहाया ये शहर। “इसे तो पता ही नहीं कि एक अस्पताल में एक पलंग पर एक आधा-अधूरा इंसान अपने लिए रोशनी की तलाश में साँसे गिन रहा है”।(पृष्ठ – ११७) बबली की मृत्यु के उपरांत मोनी का बबली के कहे शब्दों पर कार्य के लिए बेचैन हो उठना, कार्य के लिए तैयार होना, “वह मोनी तो बन गयी। लेकिन अब मोतीलाल बनना चाहती थी। मुझे मेरे हिस्से की धूप तो मिल गयी लेकिन कितनी बबली हैं जिनके हिस्से की धूप बाकी है”।(पृष्ठ -११०)
लेखिका ने बहुत ही सुंदर ढंग से पूर्वदीप्ति के सहारे पुष्पा, शालिनी मौसी के द्वारा मोनी के जन्म से लेकर उसके किन्नर के पता चलने की कहानी को दिखाया है, उसी में परिवार के लोगों को जाना, मोतीलाल-पुष्पा का अकेले पड़ना दिखाया है। इस कारण कथानक में कहीं बिखराव नहीं है। क्रमबद्धता बनी रहती है। दो बार किन्नरों की घटना को दिखाकर लेखिका ने उनमें रहने के तौर तरीके और भाषा-व्यवहार को दर्शाया है। पूरा उपन्यास भाषा की संजीदगी से जुड़ा हुआ है। पढ़े-लिखे परिवार में पोषित मोनी की भाषा एक अध्यापिका की संवादगी को दर्शाती है। लेखिका ने किन्नरों की भाषा में हरामजादी, कुतिया जैसे शब्दों का ही प्रयोग किया है। शोधार्थी-पाठक वर्ग को भाषा का विचलन खटकता है। यही कारण है कि यह उपन्यास बच्चों से लेकर युवा वर्ग ही नहीं सब वर्ग के लिए पठनीय है। लेखिका का उद्देश्य इस वर्ग की संवेदना को मानस-पटल पर उकेरना था, जो हुआ भी है। लेखिका ने अपने साक्षात्कार में भी कहा है कि मैं किसी किन्नर से मिलकर या उसकी आपबीती सुनकर मैंने यह उपन्यास नहीं लिखा है। मेरी संवेदना ही है कि मैं इन्हें उपेक्षित, हाशिये पर देखकर दुःखी होती थी, वही भाव कहानी बनकर मेरे उपन्यास में है।
इस उपन्यास का शीर्षक ‘मेरे हिस्से की धूप’ अपने नामकरण भी सार्थकता को भी सिद्ध करता है। यह शीर्षक पढ़ने को बाध्य करता है। यह उपन्यास मात्र मोनी के हिस्से की धूप, उसके अधिकारों, सम्मानों की, उसकी पीड़ा की कहानी मात्र न बनकर, उस वर्ग के हिस्से की धूप के लिए सोचने-समझने को मजबूर करता है। समाज में अपनी अस्मिता को स्वाभिमान के साथ जीने की दिशा देता है। मोनी अपनी अस्मिता स्वाभिमान के साथ अपने पिता मोतीलाल जी का व्यवसाय पुत्र की भाँति चलाती है। साथ ही साथ बबली के कथन को साकार करने को प्रयासरत दिखलाई पड़ती है। लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की तरह ‘मैं हिंजडा मैं लक्ष्मी’ की तरह स्वयं के लिए ही नहीं, दूसरे के लिए जीती है। किन्नर आज भी समाज से अशिक्षा, अस्पर्शित, अशिक्षा और अंधविश्वास से आच्छादित और अजीबोगरीब हरकत व जीवन शैली से दर्शित उपेक्षणीय बने हुए हैं। संक्रमण की इस संस्थिति में इन्हें नये दायित्व-निर्वाह करने के लिए एकता और संगठन के सोपान से अस्मिता के अन्वेषण के लिए न केवल वातावरण बनाना है, वरन् सद्भाव और सौमनस्य के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अस्तित्व के लिए संघर्ष और न्याय के पथ पर अग्रसित भी होना है। (किन्नरविमर्श:दशा एवं दिशा, डॉ. विनय पाठक, पृष्ठ – ८-९)
मानवतावादी सोच को अपनाते-समाते हुए यह उपन्यास समीक्षा की दृष्टि से पठनीय है ही, साथ-साथ किन्नर समाज पर लिखे उपन्यासों की अगली सुंदर कड़ी भी है। कभी किसी की तुलना नहीं की जा सकती। हर लेखक और उसकी दृष्टि अलग होती है। यही कारण है कि अभी २०२० में आया यह उपन्यास अपनी कई विशेषताओं के कारण अनूठा है।
संदर्भ
  • मेरे हिस्से की धूप, नीना शर्मा हरेश, माया प्रकाशन, २०२०
  • किन्नर-विमर्श दशा एवं दिशा, डॉ. विनय पाठक, नीरज बुक सेंटर,२०१९

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