संविधान के अनुच्छेद-343 के खंड-1 में कहा गया है कि भारत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा। खंडि-२ में यह उपबंध किया गया था कि संविधान के प्रारंभ में 15 वर्ष की अवधि तक अर्थात 26 जनवरी 1965 तक संघ के सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा जैसा कि पूर्व में होता था। वर्ष 1965 तक राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग का प्रावधान किए जाने का कारण यह था कि भारत वर्ष 1947 से पहले अंग्रेजों के अधीन रहा था और तत्कालीन ब्रिटिश शासन में यहां इसी भाषा का प्रयोग राजकीय परियोजनों के लिए होता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अचानक राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी का प्रयोग कर पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था, इसलिए वर्ष 1950 में संविधान के लागू होने के बाद से अंग्रेजी के प्रयोग के लिए 15 वर्षों का समय दिया गया और यह तय किया गया कि इन 15 वर्षों में हिंदी का विकास कर इसे राजकीय प्रयोजनों के उपयुक्त कर दिया जाएगा, किंतु ये 15 वर्ष पूरे होने से पहले ही हिंदी को राजभाषा बनाए जाने का दक्षिण भारत के कुछ स्वार्थी राजनीति ने व्यापक विरोध करना प्रारंभ कर दिया। देश की सर्वमान्य भाषा हिंदी को क्षेत्रीय लाभ उठाने के ध्येय से विवादों में घसीट लेने को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली और बांग्ला भाषा दूसरे स्थान पर विराजमान है। भारत के संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। इसी तरह तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी इत्यादि भाषाएं बोलने वालों की संख्या भी काफी है। भाषाओं की बहुलता के कारण भाषायी वर्चस्व की राजनीति के भाषावाद का रूप धारण कर कर लिया है। इसी भाषावाद की लड़ाई में हिंदी को नुकसान उठाना पड़ रहा है और स्वार्थी राजनीतिज्ञ इसको इसका वास्तविक सम्मान दिए जाने का विरोध करते रहे हैं।
वाल्टर कैनिंग ने कहा था- “विदेशी भाषा का किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की राज-काज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।”
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं से प्रेम करते थे। उनके लेखन और वक्तव्य में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति उनका लगाव झलकता है। जब दिनकर राज्यसभा के सदस्य थे तो उस दौर में हिंदी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। 6 मई, 1963 को राज्यसभा में दिनकर ने हिंदी को लेकर अपनी बात रखी थी, भाषा पर पेश विधायी प्रस्ताव पर संशोधन प्रस्तुत करते हुए दिनकर ने आशा प्रकट की थी कि, ‘केंद्रीय सरकार तत्काल कुछ ऐसा उपयुक्त तंत्र बनाएगी जो केंद्रीय सरकार की विभिन्न शाखाओ में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग पर सलाह देगा और संसद की सभाओं को हिंदी की प्रगति के संबंध में समय-समय पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा, ताकि 1975 के वर्ष तक हिंदी विधि निर्माण और प्रशासन का उतना ही प्रभावी माध्यम बन जाए, जितना इस समय अंग्रेजी है।‘
उनकी चिंता स्वाधीनता के बाद हिंदी को उसका उचित अधिकार नहीं मिलने को लेकर थी। उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के एक वक्तव्य को भी अपनी चिंता से जोड़ा था। गृह मंत्री ने तब कहा था कि ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चितकाल के लिए जीवन दान दे रहे हैं अनंत काल के लिए नहीं।‘ दिनकर ने गृह मंत्री के वाक्य को उद्धृत करते हुए अपना मत रखा था। ‘जिस प्रकार सरकार इस बारे में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह कल-कल की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘ दिनकर जी की यह आशंका स्वाधीन भारत में सही साबित हुई और हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश कल-कल करते हुए सचमुच अनंत काल तक चलती चली जा रही है। गांधी जी भी अपने लेखो और भाषणों में इस बात की संकेत देते रहते थे की हिंदी को स्वाधीनता के बाद राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। गांधी जी तो स्वराज के लिए भी भारतीय भाषाओं को आवश्यक मानते थे ।1921 में उन्होंने कहा था ‘अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी भारतीय मस्तिष्क का सर्वोच्च विकास संभव होना चाहिए। अंग्रेजी से प्रेरणा लेने की गलत भावना से छुटकारा होना स्वराज के लिए अत्यंत आवश्यक है।‘ उन्होंने अपनी पत्रिका ‘हरिजन‘ में भी लिखा था मेरा आशय यह है कि ‘जिस प्रकार हमने सत्ता हड़पने वाले अंग्रेजों के राजनीतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका। हमें सांस्कतिक अधिग्रहण करने वाली अंग्रेजी को भी हटा देना चाहिए। यह आवश्यक परिवर्तन करने में जितनी देरी होगी उतनी ही अधिक राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती जाएगी।‘ संविधान सभा में सदस्यों ने भाषा संबंधी गांधी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा। भाषा के प्रश्न पर लगातार बहस से बचते रहे और उसकी अंतिम बैठकों के लिए टालते रहे। आखिरकार 14 सितंबर 1949 को यह तय किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी देश की राजभाषा होगी। संविधान सभा में हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर भी बहस और मत विभाजन हुआ था, लेकिन हिंदी के पक्ष में बहुमत था।
अहिंदी भाषियों ने भी हिंदी को मजबूती देने का काम किया चाहे वह वीर सावरकर हो, तिलक हो, भूदेव मुखर्जी हो, सुनीति कुमार हो या अन्य महानुभाव।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, “भारत की सारी प्रांतीय बोलियां, जिनमें सुंदर साहित्यों की रचना हुई है, अपने घर या प्रांत की रानी बनकर रहे, प्रांत के जन-गण के हार्दिक चिंतन की प्रकाश-भूमि स्वरूप कविता की भाषा होकर रहे और आधुनिक भाषाओं के हार के मध्य-मणि हिंदी भारत-भारती होकर विराजती रहे।”
आचार्य विनोबा भावे के अनुसार, “मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूं, पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत ना हो यह मैं नहीं सह सकता।”
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में, “हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है, जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।”
पंडित गोविंद वल्लभ पंत कि कहीं यह बात सत्य साबित होती है, “हिंदी का प्रचार और विकास कोई रोक नहीं सकता।”
हिंदी की वर्तमान स्थिति
* हिंदी विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली तीसरी भाषा है और भारत की राजभाषा के रूप में इसकी पहचान बनी हुई है। हिंदी विश्व की दस सबसे प्रभावशाली भाषाओं में शामिल है और कई देशों में पढ़ी-लिखी जाती है। भारत में 57.1% जनसंख्या हिंदी जानती है, जिसमें से लगभग 44% मूल रूप से हिंदी भाषी हैं।
2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजराती होते हुए भी उन्होंने अपनी प्राथमिक भाषा हिंदी बनाई। तो शासन की भाषा बदलने लगी, 2019 में जब अमित शाह गृह मंत्री बने तो उन्होंने खामोशी से राजभाषा हिंदी को मजबूत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। वह खुद हिंदी में लिखने लगे और अधिकारियों को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने लगे। जब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री राजभाषा हिंदी में कार्य करने लगे तो अन्य मंत्रियों ने भी इसको प्राथमिकता देना आरंभ किया। परिणाम यह हुआ कि अन्य मंत्रालय में हिंदी में काम को वरीयता मिलने लगी। राजभाषा गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है, गृह मंत्री ने रुचि लेकर 49 मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समिति का गठन करवाया। राजभाषा विभाग की सक्रियता सतह पर दिखने लगी, अन्य भारतीय भाषाओं को हिंदी से जोड़ने का कार्य आरंभ हुआ। ‘लीला राजभाषा‘ और ‘लीला प्रवाह‘ के अंतर्गत 14 भारतीय भाषाओं में हिंदी सीखने की सहूलियत प्रदान की गई। केंद्रीय हिंदी समिति की ओर से भाषा प्रचार के लिए रणनीतियां बनाई गईं, जिसमें ‘हिंदी शब्दसिन्धु‘ शब्दकोश का निर्माण, भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत और सरकारी संगठनों में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सम्मेलनों का आयोजन शामिल है।
अनुवाद का सॉफ्टवेयर ‘कंठस्थ‘ और ‘ईमहाशब्दकोश‘ तैयार हुए। केंद्रीय हिंदी समिति की ओर से भाषा प्रचार के लिए रणनीतियां बनाई गईं, जिसमें ‘हिंदी शब्दसिन्धु‘ शब्दकोश का निर्माण, भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत और सरकारी संगठनों में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सम्मेलनों का आयोजन शामिल है। हिंदी शब्दसिन्धु परियोजना भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा संचालित एक विशाल शब्दकोष निर्माण परियोजना है, जिसका उद्देश्य हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों, वैज्ञानिक-तकनीकी शब्दावली एवं पारंपरिक ज्ञान से समृद्ध करना है। हिंदी शब्दसिन्धु में जनसंचार, आयुर्वेद, खेल, अंतरिक्ष विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान, कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रॉनिक्स, भूगर्भशास्त्र, मानवीकी आदि जैसे विभिन्न विषयों की आधुनिक एवं तकनीकी शब्दावली को शामिल किया जा रहा है। प्रत्येक शब्द के साथ उसका व्याकरणिक विवरण, अर्थ, पर्याय, प्रयोग, विलोम, मुहावरे तथा आवश्यक संदर्भ भी दिए जा रहे हैं। शब्दसिन्धु’ परियोजना भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के करीब लाने, हिंदी की सामान्य एवं तकनीकी शब्दावली को विस्तारित करने और अनुवाद कार्य को सरल करने में सहायक बन रही है। सरकारी वेबसाइटों, नोटिफिकेशनों, एप्स और मीडिया में हिंदी के प्रयोग को प्राथमिकता दी गई है, जिससे सूचना का संप्रेषण जन-साधारण तक उनकी अपनी भाषा में संभव हुआ। संसदीय राजभाषा समिति ने दस खण्डो में अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को दी। काशी में पहला अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन आयोजित किया गया। हिंदी दिवस के अवसर पर सूरत में राजभाषा का एक सम्मेलन गृह मंत्रालय आयोजित किया। शब्दकोश पर भी कार्य हो रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों के हिंदी प्रशिक्षण को लेकर भी राजभाषा विभाग सक्रिय दिख रहा है। गृह मंत्रालय की पहल पर गैर हिंदी भाषी कर्मचारियों में हिंदी सीखने की ललक बढ़ी है।गृह मंत्री अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि वह खुद हिंदी के व्यापक प्रयोग को लेकर सतर्क रहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि दिनकर ने जो आशंका जताई थी वह अब निर्मूल साबित होगी और हिंदी को उसका उचित स्थान मिलेगा और वह शासन के साथ ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।
हिंदी देश की भावनात्मक एकता को सूत्र में बांधने में सक्षम भारत की एकमात्र भाषा है, इसलिए इसे राजभाषा का वास्तविक सम्मान दिए जाने की आवश्यकता है। हिंदी की प्रगति हेतु भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियां आज भी उल्लेखनीय है
” निजभाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निजभाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निजभाषा ज्ञान बिन, रहे हीन के हीन।।”


हिन्दी भाषा को लेकर आपने बहुत महत्वपूर्ण लेख लिखा है। इसे सब को पढ़ना चाहिये।
जैसा कि आपने लिखा है-संविधान के अनुच्छेद-343 के खंड-1 में कहा गया है कि भारत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।पर प्रारंभ में 15 वर्ष की अवधि तक अर्थात 26 जनवरी 1965 तक संघ के सभी सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा जैसा कि पूर्व में होता था।”। वर्ष 1965 तक राजकीय प्रयोजनों कारण यह था कि तत्कालीन ब्रिटिश शासन में यहाँ इसी भाषा का प्रयोग राजकीय परियोजनों के लिये किया जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अचानक राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी व्यावहारिक रूप से संभव भले ही ना लगा हो लेकिन उसका प्रयास उसी समय कर लेना चाहिए था । 15 वर्षों राजनीतिक मानसिकता को बदलने के लिए बहुत होते हैं।
दक्षिण में आज भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने पर आपत्ति है।
इस लेख को पढ़कर पता चला की हिंदी भाषा के तहत काफी प्रयास किये गए हैं जानकर अच्छा लगा विशेष तौर से गुजरात में।
भाषा को लेकर आपने वरिष्ठ दिग्गज जनों के जितने भी उदाहरण दिए हैं वे काबिलेगौर हैं ।
जरूरी है कि हम सभी भाषाओं का सम्मान करें लेकिन हिंदी का अपमान हो यह भी सहन नहीं किया जा सकता।
बहुत-बहुत बधाई आपको इस लेख के लिये।