Thursday, March 5, 2026
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डॉ. कुमारी उर्वशी का लेख – स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य : कल्पना, संवेदना और जीवन-दृष्टि

हिंदी साहित्य की परंपरा में बाल साहित्य एक महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट विधा के रूप में विकसित हुआ है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बच्चों के भीतर मानवीय मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक संवेदनशीलता के बीज बोने का सशक्त साधन है। बाल साहित्य का कार्य है बाल मन की जिज्ञासाओं को पोषण देना, उन्हें नई कल्पनाओं से भरना और साथ ही जीवन के छोटे-बड़े सत्य से परिचित कराना। इसी संदर्भ में स्वयं प्रकाश का योगदान अद्वितीय है।
स्वयं प्रकाश ने अपने लेखन से यह सिद्ध किया कि बच्चों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य केवल परियों और राजा-रानियों की कहानियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसमें जीवन का यथार्थ, मानवीय संघर्ष और सामाजिक चेतना भी प्रतिबिंबित होनी चाहिए। उन्होंने अपनी सहज, सरस और चित्रोपम भाषा के माध्यम से बालक-पाठकों को मनोरंजन के साथ-साथ जीवन-दृष्टि भी प्रदान की। उनकी कहानियाँ बच्चों को हँसाती हैं, रुलाती हैं, चकित करती हैं, और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि उन्हें सोचने पर मजबूर करती हैं।
स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य केवल बच्चों को नैतिक शिक्षा देने वाला साहित्य नहीं है, बल्कि यह उन्हें एक जिम्मेदार, संवेदनशील और जिज्ञासु नागरिक बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। ‘प्यारे भाई रामसहाय’, ‘सप्पू के दोस्त’, ‘हमारे विज्ञान रत्न’, ‘परमाणु भाई की दुनिया’ जैसी उनकी रचनाएँ बच्चों को जीवन की विविधता, मानवीय रिश्तों की सच्चाई और वैज्ञानिक चेतना से परिचित कराती हैं। उनके साहित्य में हास्य, रोमांच और कल्पना शक्ति के साथ-साथ सामाजिक सरोकार भी गहराई से जुड़े हैं। इसीलिए स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य हिंदी साहित्य की उस परंपरा का सशक्त स्तंभ है, जो बच्चों को केवल पाठक नहीं, बल्कि सक्रिय चिंतक और संवेदनशील इंसान बनाने का काम करता है।
स्वयं प्रकाश ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद औद्योगिक क्षेत्र में कार्य किया, उनका बचपन और जीवन का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बीता। वे प्रेमचंद की परंपरा के महत्त्वपूर्ण कथाकार माने जाते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका वसुधा और बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका चकमक के संपादन के साथ उन्होंने कथा और उपन्यास विधा में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके एक दर्जन से अधिक कहानी-संग्रह और पाँच उपन्यास प्रकाशित हुए।
चकमक के संपादक के रूप में उन्होंने बच्चों को केवल पाठक नहीं, बल्कि संवेदनशील और समझदार इंसान माना। इस पत्रिका ने रूढ़ कहानियों की जगह विज्ञान, साहित्य, कला और जीवन से जुड़ी सामग्री प्रस्तुत की। सरल, रोचक और ज्ञानवर्धक शैली के कारण चकमक बच्चों और बड़ों दोनों में लोकप्रिय हुई। इस प्रकार स्वयं प्रकाश और चकमक एक-दूसरे के पर्याय बन गए। उनके सहज लेखन और बच्चों के प्रति अपनत्व ने हिंदी बाल साहित्य को नई दिशा दी।
स्वयं प्रकाश ने ‘प्यारे भाई रामसहाय’ शीर्षक से एक स्तंभ भी लिखा, जिसमें अपने बचपन की यादों को काल्पनिक मित्र रामसहाय के नाम लिखे पत्रों के रूप में प्रस्तुत किया। ये पत्र बच्चों और बड़ों को समान रूप से प्रिय लगे। इन्हीं संस्मरणों पर आधारित पुस्तक के लिए उन्हें 2017 का बाल साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
वे कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, अनुवाद और पत्रकारिता जैसी विधाओं में सक्रिय रहे। चकमक जैसी बाल पत्रिका और प्रगतिशील वसुधा जैसी वैचारिक पत्रिका के संपादन से लेकर बाल साहित्य और जनवादी साहित्य तक, उनका लेखन बहुआयामी रहा। उनकी कहानियों और उपन्यासों में वैज्ञानिक सोच, सहज भाषा और मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों का सजीव चित्रण मिलता है। चकमक के संपादन ने उन्हें बच्चों का सबसे लोकप्रिय कथाकार बनाया, वहीं उनकी वैचारिक दृष्टि ने उन्हें हिंदी साहित्य का विशिष्ट और सम्मानित रचनाकार स्थापित किया।
स्वयं प्रकाश की कहानियों में जीवन का राग, रंग और रस एक साथ मिलते हैं। उनका कथा-संसार केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि हमें सोचने, समझने और आत्मपरीक्षण करने को भी बाध्य करता है। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘बलि’ इसकी सशक्त मिसाल है। जब वे लिखते हैं –
“घनी हरियाली थी, जहाँ उसके बचपन का गाँव था। साल, शीशम, आम, कटहल और महुए के पेड़। पेड़ के नीचे खड़े होकर ऊपर देखो तो सूरज न दिखाई दे। चारों तरफ धान के खेत, पोखर और इच्छा नदी। मिट्टी-घास के मकान, केले के पेड़ और बेलों से लिपटी लौकी-कद्दू की झोपड़ियाँ। पोखर में कूदती मछलियाँ और चूल्हे पर चढ़ी काली हाँड़ी में खदबदाता भात…” —तो पाठक केवल दृश्य नहीं देखता, बल्कि उस वातावरण में साँस लेने लगता है। यही उनकी लेखनी का जादू है।
उनकी कहानियों में साधारण जीवन की जटिलता और गहराई बड़े सहज ढंग से उजागर होती है। ‘बाबूलाल तेली की नाक’ (संग्रह संधान से) व्यंग्य और हास्य की आड़ में आधुनिक चिकित्सा-जगत और उपभोक्तावादी मानसिकता पर तीखा प्रश्नचिह्न लगाती है। वहीं ‘एक खूबसूरत घर’ (संग्रह आधी सदी का सफ़रनामा से) बच्चों की मासूमियत, उनकी सच बोलने की प्रवृत्ति और उस पर मिलने वाली दंडात्मक प्रतिक्रिया के माध्यम से पारिवारिक जीवन की सच्चाइयों को उद्घाटित करती है। सामान्य से लगने वाले क्षणों को स्वयं प्रकाश इस तरह लिखते हैं कि उनके भीतर छिपा मनोविज्ञान उजागर हो उठता है।
उनके बाल साहित्य की दुनिया भी उतनी ही समृद्ध है। सप्पू के दोस्त, प्यारे भाई रामसहाय, हाँजी नाजी, परमाणु भाई की दुनिया में और हमारे विज्ञान रत्न जैसी कृतियाँ बच्चों के लिए ज्ञान और मनोरंजन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं। वहीं उनकी कहानियाँ—कानदाँव, गौरी का गुस्सा, बर्डे, जंगल का दाह, अविनाश मोटू उर्फ़ एक आम आदमी, सूरज कब निकलेगा, क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?, नैनसी का धूड़ा, स्वाद, मूलचंद, उस तरफ, लड़ोकन, हत्या, विचित्र बीमारी, अकाल मृत्यु, गणित का भूत, आख़िर चुक्कू कहाँ गया आदि—भले ही आकार में छोटी हों, पर प्रभाव में गहरी और स्थायी हैं।
स्वयं प्रकाश की कहानियाँ मानो जीवन की झिलमिलाती तस्वीरें हों, जहाँ हर रेखा अपने भीतर कोई मूल्य संजोए होती है। उनका साहित्य यह विश्वास दिलाता है कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन मूल्यों का संवाहक भी है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ कभी उपदेशात्मक या अखबारी नहीं लगतीं, बल्कि सहज, वैज्ञानिक और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत होती हैं। वे बच्चों को न केवल हँसाती-गुदगुदाती हैं, बल्कि उन्हें सोचने और बेहतर इंसान बनने की राह भी दिखाती हैं।
 स्वयं प्रकाश का लेखन एक ओर बच्चों को उनके अपने अनुभव संसार से जोड़ता है, तो दूसरी ओर समाज और जीवन की गहरी समझ देकर उन्हें सजग और संवेदनशील नागरिक बनाने की दिशा में प्रेरित करता है। यही उनकी कथा दृष्टि की सार्थकता और स्थायित्व है।
स्वयं प्रकाश की कहानियाँ अपने रचाव में इतनी भिन्न और जीवंत हैं कि पाठक उनमें उतरते ही किस्सागोई की जादुई दुनिया में प्रवेश कर जाता है। वे आधुनिक हैं, परंपरा के विरोधी नहीं; बल्कि परंपरा की ठोस धरती पर खड़े होकर समकालीन जीवन के सत्य और सरोकारों को पकड़ते हैं। उनकी कहानियों की शुरुआत अक्सर किसी सहज किंतु असरदार प्रसंग से होती है, जो पाठक को तुरंत बाँध लेता है। जैसे–– “बरामदे में धूप आते ही बूढ़ा और बुढ़िया धूप में आ बैठते थे। या तो वे भीतर से ही लड़ते हुए आते थे या बाहर आकर बैठते ही लड़ना शुरू कर देते थे। अड़ोसी-पड़ोसी उनके आपसी झगड़े के अभ्यस्त हो चुके थे। उन्हें यह उतना ही स्वाभाविक लगता जितना मुर्गे का बाँग देना, किसी घर में टीवी चालू हो जाना या सब्ज़ीवाले का पुकार लगाना…” यह अंश केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि जीवन के गहरे यथार्थ की अनुगूँज है। स्वयं प्रकाश की यही ताक़त है कि वे कहानी कहते हैं, लिखते नहीं। उनकी शैली ऐसी है जिसमें कथ्य साधारण होते हुए भी किस्सागोई का मोहक वातावरण रचता है, और खासकर बालक-पाठकों के प्रिय कुतूहल को जगाता है।
2017 में उन्हें बाल साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी अद्वितीय रचना “प्यारे भाई रामसहाय” के लिए मिला। यह स्तंभ मूलतः चकमक पत्रिका में छपता था, जिसके वे संपादक भी रहे। यहाँ उन्होंने केवल कहानियाँ और कविताएँ ही नहीं दीं, बल्कि बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच भी प्रदान किया। उनके लेखन की दृष्टि में बच्चों से संवाद का अर्थ था—उन्हें सोचने की स्वतंत्रता देना, प्रश्न पूछने की आदत डालना और जीवन के अनुभवों को गहराई से परखने की प्रेरणा देना। जब वे लिखते हैं— “क्या कोई एक सही या एक गलत हो सकता है? शायद नहीं। कई बार तो एक वक्त का सही बाद में गलत साबित होता है। …सरवन जो गाना अच्छा गाता था उसे मौके मिले। शोहरत, पैसा सब मिला। साथ ही मिली शराब की आदत और छोटी-सी उम्र में वह चल बसा। अब रामसहाय सोच रहे हैं… गलती कहाँ हुई?” तो इसके भीतर बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी सोचने के लिए उकसाने वाला एक गहरा जीवन-दर्शन छिपा होता है।
उनकी कृतियाँ “परमाणु भाई की दुनिया” और “हमारे विज्ञान रत्न” विज्ञान, जिज्ञासा और कल्पना का अद्भुत संगम हैं। बाल मनोविज्ञान को गहराई से समझते हुए उन्होंने बच्चों के लिए सहज, सुबोध और चित्रोपम भाषा का निर्माण किया। छोटे शब्द, छोटे वाक्य, संक्षिप्त अनुच्छेद और दृश्यात्मकता उनकी लेखनी की पहचान बन गए।
चकमक के संपादन में उन्होंने अंकुरित होती प्रतिभाओं को दिशा दी, उन्हें सिंचित किया और उनके लिए सृजन का वातावरण तैयार किया। उन्होंने केवल बाल साहित्य लिखा ही नहीं, उसे जिया भी। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ बच्चों के मन से सीधे संवाद करती हैं।
स्वयं प्रकाश हिंदी बाल साहित्य के ऐसे दुर्लभ रचनाकार हैं, जिनके यहाँ आधुनिकता, वैज्ञानिक दृष्टि और मानवीय संवेदनाएँ सहजता से मिलती हैं। वे स्वयं बच्चे की सरलता और जिज्ञासा को जीते रहे, इसलिए वे इतने अनुपम बाल साहित्य रच सके। उनकी कहानियाँ हमें यह विश्वास दिलाती हैं कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संस्कारों और जीवन मूल्यों के निर्माण का माध्यम भी है।
स्वयं प्रकाश जी का बाल-साहित्य अपने भीतर वह ऊष्मा और सहजता समेटे हुए है, जो बालमन की जिज्ञासा, उनकी कल्पना-शक्ति और उनकी मासूम दृष्टि को एक साथ प्रकाशित करता है। उनकी रचनाओं में वह विशिष्ट संवाद-शक्ति है, जो पाठक को मात्र मनोरंजन नहीं देती, बल्कि जीवन के गहरे मूल्य और अनुभव भी सौंपती है।
‘नेताजी का चश्मा’ में देशभक्ति का चित्रण अत्यंत भावुक और सम्मानीय रूप में मिलता है। कैप्टन चश्मे वाले द्वारा नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाना और उनके निधन के बाद बच्चों द्वारा सरकंडे का चश्मा बनाकर मूर्ति पर चढ़ाना—यह दृश्य केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक गहन संदेश है कि देशप्रेम का परिचय बड़े-बड़े त्याग से ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कार्यों से भी दिया जा सकता है। यह कहानी सिखाती है कि प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह बालक हो या वृद्ध, अपने सामर्थ्य के अनुसार राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभा सकता है। वर्तमान समय की स्वार्थपरक परिस्थितियों में यह संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है।
स्वयं प्रकाश जी ने बाल-विज्ञान साहित्य को भी विशिष्ट ऊँचाई प्रदान की। बच्चों के मन में उठने वाली जिज्ञासाओं को उन्होंने ऐसी भाषा और शैली में व्यक्त किया, जो पाठ्य-पुस्तकों की कठोरता से भिन्न, मोहक और जीवंत है। उनकी वैज्ञानिक रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कठिन से कठिन विषय को भी बालसुलभ सहजता के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। बच्चे उनके साहित्य को पढ़कर न केवल आनन्दित होते हैं, बल्कि वैज्ञानिक मानसिकता और तार्किक दृष्टि का विकास भी करते हैं।
उनकी साहित्य अकादमी से सम्मानित कृति ‘प्यारे भाई राम सहाय’ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें उठाए गए प्रश्न और मुद्दे आज भी समाज में गूँजते हैं। यह रचना बच्चों और युवाओं को जीवन की गहन सच्चाइयों से अवगत कराती है। सरल भाषा, स्पष्ट विचार और संवेदनशील प्रस्तुति इसे अद्वितीय बनाती है। यही स्वयं प्रकाश जी की लेखनी की विशेषता है—वे बच्चों की दुनिया से संवाद करते समय न तो जटिलता थोपते हैं और न ही उपदेशात्मकता, बल्कि सहजता और आत्मीयता से उन्हें सीखने की दिशा दिखाते हैं।
‘बेर की गुठली’ जैसी कहानी बच्चों की मासूमियत और कल्पना की उर्वरता का सुंदर प्रमाण है। जब बच्चा यह सोचकर घबरा जाता है कि उसके पेट में बेर का पेड़ उग जाएगा, तो यह दृश्य मात्र हास्य उत्पन्न नहीं करता, बल्कि हमें यह भी सोचने पर विवश करता है कि बच्चों के सामने किस प्रकार की बातें रखनी चाहिए। बच्चे बड़ों की बातों पर पूर्ण विश्वास करते हैं और कई बार अनावश्यक चिंता में पड़ जाते हैं। यह कहानी हमें बच्चों के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार होने का संदेश देती है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करती है कि कल्पना और मासूमियत का यह अद्भुत संगम बच्चों की दुनिया को कितना जीवंत और रोचक बनाता है।
इसी प्रकार ‘मुझे वह थप्पड़ आज तक याद है’ कहानी में साइकिल सीखते हुए हुए एक अप्रत्याशित प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि जीवन में गलतियाँ स्वाभाविक हैं, लेकिन उनसे सीखना ही असली अनुभव है। एक थप्पड़, जो दंड की तरह प्रतीत होता है, अंततः जीवन का मूल्यवान सबक बन जाता है। बच्चे के भीतर उत्पन्न सहानुभूति और आत्मबोध इस कहानी को गहराई प्रदान करते हैं।
‘नहीं होना बीमार’ कहानी में बीमारी का झूठा बहाना बनाकर छुट्टी मारने वाले बच्चे की निराशा और ऊब का चित्रण है। यहाँ लेखक यह बताते हैं कि असत्य और आलस्य का जीवन कितना नीरस हो सकता है। सच्चाई और जिम्मेदारी ही जीवन को गरिमा प्रदान करती है। यह कहानी बच्चों को ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा का महत्त्व सिखाती है।
‘सप्पू बन गया चाचा नेहरू’ में नकल और अभिनय के माध्यम से बच्चों की रचनात्मकता का उत्सव मनाया गया है। बच्चे जब बड़ों की नकल करते हैं तो उसमें हास्य भी होता है और आत्मविश्वास का संचार भी। कहानी यह भी बताती है कि मौलिकता ही अंततः सम्मानित होती है। यह बाल-मन की खिलखिलाहट और समाज की एकता का प्रतीक है।
‘तोताराम का डर’ और ‘भाषा की चुहल’ जैसी कहानियाँ मित्रता, भाषा-खेल, और बाल-हास्य की चंचलता को रूपायित करती हैं। बच्चे जब भाषा के साथ खेलते हैं, कविताओं और गीतों के अर्थ-अनर्थ बनाते हैं, तो यह केवल मनोरंजन नहीं होता, बल्कि उनकी रचनात्मकता का विकास भी होता है। ये कहानियाँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि भाषा बच्चों के लिए केवल सीखने का माध्यम नहीं, बल्कि कल्पना और रचनाशीलता का खेल भी है।
इसी कड़ी में ‘नाटक में बवाल’ बच्चों की सामूहिक रचनात्मकता और सामुदायिक चेतना को उजागर करती है। मोहल्ले में गणेश उत्सव का आयोजन और बच्चों द्वारा किया गया नाटक यह सिखाता है कि सहयोग, उत्साह, परिवार का समर्थन और सामुदायिक भागीदारी बच्चों के विकास में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
स्वयं प्रकाश जी की कहानियों में बालमन की कोमलता, कल्पना की उड़ान, हास्य की चंचलता और जीवन की गहरी शिक्षाएँ एक साथ मिलती हैं। यही कारण है कि उनका बाल-साहित्य केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि जीवन के गहरे मूल्यों की स्थापना करता है। उनकी कहानियाँ बच्चों के मन में उत्साह, जिम्मेदारी, संवेदना और रचनात्मकता का संचार करती हैं—और यही उनके साहित्य का स्थायी मूल्य है।
स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य भारतीय साहित्य परंपरा की उस विशिष्ट धारा का अंग है, जहाँ कल्पना और यथार्थ, मनोरंजन और शिक्षा, हँसी और संवेदना एक-दूसरे में घुल-मिलकर बच्चों के मानस को समृद्ध करते हैं। उनकी कहानियों में केवल बाल-मन की चंचलता नहीं, बल्कि जीवन के ठोस और गहरे सत्य भी प्रत्यक्ष होते हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य बच्चों को केवल खिलखिलाहट नहीं देता, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और आगे बढ़ने की राह भी दिखाता है।
‘अरे वैज्जी कहाँ हैं?’ कहानी सामुदायिक चेतना और मानवता के उस स्वरूप को सामने लाती है, जो संकट की घड़ी में सहज रूप से प्रकट होता है। बजरंग जलपान गृह में आग लगने की घटना केवल दुर्घटना भर नहीं, बल्कि इस बात का साक्षात उदाहरण है कि विपत्ति के समय समाज किस प्रकार एकजुट हो उठता है। प्रभुराम का साहस, जो अपनी जान की परवाह किए बिना गल्ला निकालने के लिए जलते हुए गृह में घुस जाता है, हमें यह याद दिलाता है कि निस्वार्थ कर्म ही सच्चे साहस की पहचान है। फायर ब्रिगेड की उपस्थिति और बच्चों की आँखों में उनके प्रति आश्चर्य व आदर्श की चमक, यह दिखाती है कि समाज के सेवक बच्चों के लिए प्रेरणा-पुरुष होते हैं। यह कहानी इस गहरे संदेश के साथ समाप्त होती है कि संकट का सामना करने के लिए सामुदायिक भावना, सहयोग और मानवता ही सबसे बड़ा सहारा हैं।
‘आखिर चुक्कू कहाँ गया’ केवल एक पिल्ले की गुमशुदगी की कथा नहीं, बल्कि उस मासूम रिश्ते का दस्तावेज़ है जो मनुष्य और जीव-जंतुओं के बीच सहज रूप से बनता है। चुक्कू, राधेश्याम और उसके दोस्तों का लाड़ला, घर का सदस्य बन चुका था। उसकी मासूम शरारतें और छोटे-छोटे काम जैसे चूहों को पकड़ना, उसे और भी प्रिय बना देते हैं। उसके अचानक गायब हो जाने पर पूरे मोहल्ले की बेचैनी यह साबित करती है कि स्नेह का संबंध आकार या रूप नहीं देखता। एक छोटा-सा जीव भी हमारे जीवन में भावनात्मक रिक्तता छोड़ सकता है। यह कहानी बच्चों को न केवल जीवों के प्रति संवेदनशील बनाती है, बल्कि उन्हें यह भी सिखाती है कि हर रिश्ता, चाहे वह मनुष्य का हो या पशु का, जीवन में कितना महत्त्वपूर्ण होता है।
‘प्यारे भाई रामसहाय’ स्वयं प्रकाश की उन गंभीर रचनाओं में है, जो बाल साहित्य को केवल हँसी-ठिठोली तक सीमित नहीं रखती, बल्कि जीवन की कठिन सच्चाइयों और सामाजिक समस्याओं को भी सहज रूप से सामने लाती है। परीक्षा का दबाव और गणित जैसे विषय से उपजा भय बच्चों को अंधविश्वास की ओर धकेल देता है। वे तांत्रिक के बताए उपाय पर विश्वास कर श्मशान तक जा पहुँचते हैं। यहाँ कहानीकार बच्चों के भय, साहस और अंधविश्वास के द्वंद्व को बड़ी आत्मीयता से उकेरते हैं। अंततः बच्चों का श्मशान से भाग आना केवल भय की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि यथार्थ और कल्पना के बीच अंतर को पहचानने की दिशा है। इस कहानी में मित्रता और सहयोग की शक्ति भी झलकती है—कि साथ मिलकर बच्चे बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना करने का साहस जुटा लेते हैं।
इन कहानियों के माध्यम से यह स्पष्ट हो उठता है कि स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि वह बच्चों को जिम्मेदार, संवेदनशील और प्रगतिशील नागरिक बनाने का सशक्त माध्यम भी है।
‘नेताजी का चश्मा’, ‘बेर की गुठली’, ‘नहीं होना बीमार’, ‘सप्पू बन गया चाचा नेहरू’, ‘भाषा की चुहल’ और ‘नाटक में बवाल’ जैसी रचनाओं से लेकर ‘अरे वैज्जी कहाँ हैं?’ और ‘आखिर चुक्कू कहाँ गया’ तक—हर कहानी बच्चों के भीतर प्रश्नवृत्ति, करुणा, सहयोग, वैज्ञानिक सोच और कल्पना की ऊर्जा भरती है।
आज जब वैश्वीकरण और बाज़ारवाद बच्चों की सहज संवेदनाओं को प्रभावित कर रहे हैं, जब उनके हाथों से किताबें छिनकर मोबाइल स्क्रीन आ बैठी हैं, ऐसे समय में स्वयं प्रकाश का साहित्य दीपशिखा की भाँति आलोकित है। यह साहित्य बच्चों को जीवन की कठिनाइयों से परिचित कराता है, साथ ही उन्हें आशा, विश्वास और संघर्ष की शक्ति भी देता है।
स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य इस विश्वास की पुष्टि करता है कि कहानियाँ केवल सपनों की उड़ान नहीं, बल्कि जीवन का सच भी होती हैं—वह सच, जो बच्चों को जीवन की राह में संवेदनशील और सशक्त बनने की प्रेरणा देता है।
निःसंदेह, स्वयं प्रकाश का बाल साहित्य हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा का अनमोल हिस्सा है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी उतना ही प्रेरित करेगा जितना अपने समय में उसने किया। उनका साहित्य हमें यह विश्वास दिलाता है कि बाल साहित्य केवल बालकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज को संवेदनशील और सजग बनाने का साधन है।
डॉ. कुमारी उर्वशी 
सहायक प्राध्यापिका,
हिन्दी विभाग, राँची वीमेंस काॅलेज, राँची।
मो0 – 09955354365
ईमेल आईडी  [email protected] 
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