यूके में हिंदी शिक्षण का इतिहास ब्रिटेन की उपनिवेशवादी नीति के साथ जुड़ा हुआ होने के कारण ब्रिटिश राज्य के भारत पर शासन काल जितना ही पुराना है। सर्वप्रथम औपनिवैशिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर भारत भेजे जाने वाले सरकारी अफसरों को हिंदी सिखाने के लिए विश्वविद्यालयों में हिंदी का पाठ्यक्रम शुरू किया गया था। शिक्षण की भाषा का स्वरूप हिंदी-उर्दू का मिश्रित रूप, हिंदुस्तानी था। पाठ्यक्रम केवल उन वयस्कों को दृष्टि में रखकर बनाया गया था जिन्हें भारत जाकर स्थानीय लोगों के साथ काम करना होता था। हिंदी या हिंदुस्तानी सीखना भारत के कार्यकाल में उनकी व्यावहारिक ज़रूरत थी न कि भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रति प्रेम। उनके लिए हिंदी सीखने का प्रयोजन केवल दैनिक जीवन में काम चलाना भर था। 
वर्तमान समय में यूके में हिंदी सीखने वालों के अलग-अलग वर्ग हैं। 
प्रथम वर्ग में भारत में जन्मे वे विद्यार्थी हैं जिनकी मातृभाषा हिंदी है और जो कुछ बड़े होने पर अपने माता-पिता के साथ उनके पेशे के सिलसिले में उनके साथ यूके आए हैं। ये बच्चे यहाँ आने से पहले से ही हिंदी में लिख, पढ़ और बोल सकते थे। उनके माता-पिता का प्रयत्न रहता है कि वे स्कूल के अन्य विषयों के साथ हिंदी में भी योग्यता प्राप्त करें। 
दूसरी श्रेणी में हिंदीभाषी परिवारों के यूके में जन्मे बच्चे हैं, जिनके घर में हिंदी बोली जाती है। वे हिंदी समझ भर सकते हैं पर स्वयं अंग्रेज़ी में ही सहजता अनुभव करते हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अंग्रेज़ी में हुई और वे रोमन लिपि में साक्षर हैं। हिंदी सीखना उनके लिए द्वितीय भाषा सीखने जैसा है। 
तीसरी श्रेणी में ब्रिटेन में जन्मे अहिंदीभाषी परिवार के बच्चे हैं जो केवल रोमन लिपि में साक्षर हैं। उनके परिवेश में हिंदी का प्रभाव न के बराबर है, पर वे हिंदी कक्षा में हिंदी सीखने आते हैं। 
चौथी श्रेणी में मॉरिशस, फिजी, दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका से आए परिवार हैं जिनके बच्चे तृतीय या चतुर्थ भाषा के रूप में हिंदी बोलते हैं।
पाँचवीं श्रेणी अंग्रेज़ बच्चों की है जो हिंदी सीख रहे हैं। 
अंतिम श्रेणी में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी सीखने वाले स्थानीय वयस्क हैं जो अपनी रुचि और भारत-भ्रमण या काम के सिलसिले में हिंदी सीख रहे हैं। कुछ इंडोलौजी के शोधार्थी हिंदी और संस्कृत के पुरातन ग्रंथ पढ़ने के लिए हिंदी और संस्कृत सीखते हैं। 
इस प्रकार इन 6 वर्गों की भाषा सीखने की आवश्यकता मे भिन्नता होने के साथ भाषा के स्तर पर अधिकार तथा सीखने की क्षमता भी अलग–अलग है।
सन 1947 के पश्चात स्वतंत्र भारत, पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान के नागरिक युद्धोत्तर कालीन ब्रिटेन के कारखानों में काम करने के लिए एक बड़ी संख्या में आए। जबकि उनकी पहली पीढ़ी के लोगों का काम बिना अंग्रेज़ी बोलना और लिखना पढ़ना सीखे ही चल रहा था, उनके बच्चों की ज़रूरत उनसे भिन्न थी। स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी थी। इसलिए दूसरी पीढ़ी के बच्चों के लिए अंग्रेज़ी सीखना ज़रूरी हो गया। यूके के ब्रैडफर्ड, लैस्टर, लीड्स, मैंचैस्टर, बर्मिंघम आदि शहरों में वर्कवीसा लेकर आए भारतीयों के बच्चों को यहाँ की अनिवार्य शिक्षा पद्धति से जोड़ने के लिए शिक्षाविभाग ने लैंग्वेज सेंटर खोले। उनका उद्देश्य प्रवासियों के घर की भाषा और प्राथमिक विद्यालयों के अंग्रेज़ी भाषा माध्यम के बीच एक सेतु का काम करना था।
लैंग्वेज सेंटर में विद्यार्थियों को एक द्वितीय भाषा के रूप में अंग्रेज़ी सिखाई जाती थी ताकि वे यहाँ की शिक्षा पद्धति से जुड़ सकें। अंग्रेज़ी में साक्षरता प्राप्त करने के बाद ही विद्यार्थी यहाँ के स्कूलों की मुख्य धारा में प्रवेश करते थे। इस तरह धीरे-धीरे दूसरी पीढ़ी जो यहीं जन्मी और बड़ी हो रही थी, स्कूलों में जाकर अंग्रेज़ी सीखने लगी। जैसे-जैसे वे बच्चे बड़े होते हुए यहाँ के वातावरण और भाषा को आत्मसात करने लगे, परिवार के बड़े-बूढ़ों को लगा कि उनकी अगली पीढ़ी के साथ वार्तालाप की भाषा लुप्त होती जा रही है।
यहाँ की शिक्षा पद्धति में सफल होने के लिए अभिभावक उन्हें अंग्रेज़ी सीखने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, पर साथ ही उन्हें यह एहसास हो रहा था कि वे अपने ही परिवार और अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। वे बच्चे छुट्टियों में भारत जाने पर अपने ही परिवार के सदस्यों से घुलमिल कर उनके साथ बातचीत नहीं कर पाते थे। यहाँ के माध्यमिक विद्यालयों में अंग्रेज़ी के साथ क्लासिकल भाषा के रूप में लैटिन और मॉडर्न यूरोपियन लैंग्वेज़ के अंतर्गत फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश आदि भाषाएँ सीखने के अवसर थे, पर भारतीय भाषाओं के लिए कोई प्रावधान नहीं था।
मातृभाषा के संभावित विस्थापन से चिंतित भारतीय अभिभावकों ने यहाँ के मंदिरों, चर्च हॉल और घरों में हिंदी की स्वैच्छिक शिक्षा की शुरुआत की। हिंदी, गुजराती, बंगला आदि भाषाओं की कक्षा सामान्यत: सप्ताहांत में या संध्या समय होती थीं। शिक्षक प्राय: पेशेवर शिक्षक नहीं थे, उनकी योग्यता का प्रमाण उनका हिंदी भाषा-भाषी होना भर था। अलग-अलग केंद्रों में वे अपनी सोच और रुचि के अनुसार पाठ्यक्रम बना रहे थे। इस तरह से प्रारम्भ हुई यूके में प्रारम्भिक स्तर पर हिंदी की शिक्षा। यद्यपि अलग-अलग शहरों और मोहल्लों में बिखरे प्रयासों का कोई सुनियोजित रूप नहीं था, तथापि उनके प्रयास का महत्व नींव के पत्थरों की तरह है जिनके ऊपर हिंदी-शिक्षण की इमारत स्थापित हुई है। 
वर्षों बाद, सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में जब यहाँ राष्ट्रीय पाठ्यक्रम, नैशनल करीक्युलम बना, उसके अंतर्गत स्कूलों में आधुनिक विदेशी भाषा के अंतर्गत उर्दू, गुजराती, और बंगला के साथ हिंदी को भी शामिल किया गया। यूके की शिक्षानीति में प्रवासियों की मातृभाषा को मान्यता देना एक सकारात्मक कदम था, परंतु उसके लिए स्कूलों में शिक्षण या बजट में धनराशि निर्धारित न किए जाने के कारण उसकी अपनी सीमा थी। स्कूल के पाठ्यक्रम में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के शिक्षण के लिए कोई प्रावधान नहीं था, योग्य शिक्षक भी सहजता से उपलब्ध नहीं थे। इस दृष्टि से यहाँ की शिक्षानीति नार्वे जैसे देश से बहुत ही पिछड़ी हुई थी जहाँ यदि कक्षा में एक भी विद्यार्थी की मातृभाषा नार्वेजियन से भिन्न हो तो शिक्षाविभाग को उसके लिए उसकी मातृभाषा के शिक्षण की व्यवस्था करनी होती है। फिर भी हिंदीभाषी समुदाय ने इस बात का स्वागत किया कि राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने के फलस्वरूप यदि कोई विद्यार्थी अन्य विषयों के साथ हिंदी में ओ लेवल की परीक्षा देना चाहे तो विद्यालय को उसे यह अवसर देना होगा।
शिक्षण की समुचित व्यवस्था करवाने का दायित्व अभिभावकों का था जिन्होंने पूरी प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत प्रयत्न द्वारा ओ लेवेल तथा ए लेवल के पाठ्यक्रम के लिए विद्यार्थियों को तैयार किया। अभिभावकों के प्रयत्न, लगन और हिंदी के प्रति समर्पण से हिंदी की ओ लेवल और ए लेवेल की परीक्षाएँ कुछ वर्षों तक चल कर दुर्भाग्यवश परीक्षार्थियों की यथेष्ट संख्या न होने के कारण बताकर 1994 में बंद कर दी गईं। परीक्षाबोर्ड के इस निर्णय का हिंदी शिक्षण की प्रगति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। लेकिन इस बीच अलग-अलग शहरों में हिंदीभाषी समुदाय में हिंदी शिक्षण के दल सक्रिय हो रहे थे। 
अस्सी के दशक में अल्पसंख्यक नस्ली समंवय एथनिक मईनोरिटी अस्सिमिलेशन की लहर चली। लदन की ब्रेंट, इनर लंदन एजुकशन ऑथौरिटी आदि बरॉ जहाँ भारतीय और एफ्रोकैरेबियन समुदाय की बहुलता थी, की एजुकेशन औथौरिटी ने शिक्षा संस्थानों में अल्पसंख्यक समुदाय पर नस्ल के आधार पर होने वाले भेदभाव की जाँच के लिए निरीक्षक नियुक्त किए जिनका काम स्कूलों में जाकर शिक्षकों को नस्ल के आधार पर होने वाले भेदभाव के उदाहरण देकर अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के प्रति समान अधिकार और उन्हें स्थानीय विद्यार्थी समुदाय के साथ जोड़ने के तरीके बताना था।
प्रवासी भारतीयों को स्थानीय समुदाय के साथ समंवित करने के लिए शिक्षा विभाग के आदेशों को क्रियांवित करने की पहल स्कूलों के बाह्य परिवेश मे परिवर्तन लाकर हुई। स्कूलों के प्रवेश द्वार और कक्षा की दीवारों पर अंग्रेज़ी के साथ भारतीय भाषाओं में अभिवादन – ‘स्वागत’, ‘नमस्कार’ आदि तथा हिंदू त्यौहारों के अवसर पर हिंदी भाषी विद्यार्थियों के माता-पिता को त्यौहारों के महत्व के बारे में बताए जाने के लिए आमंत्रित करने का प्रचलन हुआ।
भाषा के विकास में मातृभाषा के महत्वपूर्ण योगदान पर की गई शोध से प्रेरित होकर प्रकाशकों ने अंग्रेज़ी के साथ हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के द्विभाषी बाल साहित्य प्रकाशित किए। कक्षा के पुस्तकालय में अंग्रेज़ी और हिंदी की द्विभाषीय पुस्तकें सजा दी जाती थीं और विश्व पुस्तक दिवस जैसे अवसर पर उनकी खोज मचती थी। पर स्कूलों के पाठ्यक्रम में हिंदी शिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। हिंदी शिक्षण तब भी मंदिरों और चर्च हॉल या घरों में ही हो रहा था। 
वर्तमान समय में हिंदी शिक्षण दो स्तरों पर हो रहा है। प्रथम स्तर जो वर्षों से चला आने वाला मंदिरों, चर्च हाल आदि में शनि-रवि-वारीय कक्षा के तहत सक्रिय है और दूसरा स्तर विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम के रूप में है। वस्तुत: यूके में प्राथमिक स्तर पर हिंदी शिक्षण एक कुटीर उद्योग की तरह हो रहा है। इस संदर्भ में हिंदी-शिक्षकों की योग्यता का प्रश्न भी विचारणीय है।
किसी भी भाषा को विधिवत सिखाने के लिए उस भाषा के व्याकरण के ज्ञान के साथ शैक्षणिक पद्धति की जानकारी भी आवश्यक होती है। हिंदी के प्रचार-प्रसार में सक्रिय संस्थाओं में यूके हिंदी समिति का उल्लेखनीय अवदान है, जिसकी स्थापना 1990 में डॉ पद्मेश गुप्त ने की थी। यूके हिंदी समिति के संरक्षक, प्रसिद्ध साहित्यकार, ऑक्सफर्ड बिज़नेस स्कूल के निदेशक डॉ पद्मेश गुप्त ने वर्षों तक हिंदी की पत्रिका पुरवाई का सम्पादन करने के साथ साहित्य सृजन तथा यूके हिंदी समिति के तत्वावधान में हिंदी के कार्यक्रमों की परिकल्पना और हिंदी शिक्षण का नेतृत्व करके लंदन में हिंदी शिक्षण को गति दी।
सन 2014 से यूके हिंदी समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के दायित्व को सुरेखा चोफ्ला और सीमा वेदी अत्यंत निष्ठा से सम्हाल रही हैं। सुरेखा जी ने 1994 में अपनी बेटी को हिंदी सिखाने से हिंदी शिक्षण की शुरुआत की और बाद में स्वर्गीय वेद मोहला जी के साथ पश्चिम लंदन के मंदिरों में हिंदी सिखाने का काम शुरू किया। वर्तमान समय में यूके हिंदी समिति के तहत प्राथमिक और माध्यमिक कक्षा के छात्रों के साथ अहिंदीभाषी वयस्क भी हिंदी सीख रहे हैं।
पाठ्यक्रम को सुनियोजित करने और विद्यार्थियों की प्रगति का आकलन करने के लिए पाठ्यक्रम को 6 स्तरों में विभाजित किया गया है। उनकी गतिविधि का दायरा क्रमश: बढ़ता गया है। वर्तमान समय में यूके हिंदी समिति के साथ लंदन, मैंनचेस्टर, लीड्स, बर्मिंघम, लिवरपूल आदि यूके के शहरों से लगभग 45 संस्थाएँ जुड़ी हुई हैं। कोविद काल में प्रौद्यौगिकी के सहयोग से शिक्षण, आकलन, वाद-विवाद प्रतियोगिता, कवितापाठ आदि समस्त गतिविधियाँ सुचारु रूप से परिचालित होती रही हैं।
पिछले तीन वर्षों से स्विट्ज़रलैंड से तीन स्कूल और गत वर्ष अमेरिका की एक संस्था भी उनके साथ जुड़ी है। विभिन्न देशों के विद्यार्थियों को परस्पर जोड़ने के लिए हिंदी को सेतु बनाने का यह एक बहुमूल्य प्रयास है। भारतीय उच्चायोग के पूर्व हिंदी और संस्कृति अधिकारी, तरुण कुमार ने हिंदी शिक्षण से संबंधित गतिविधियों को लंदन के भारतीय उच्चायोग का मंच उपलब्ध कराके उसकी गरिमा में वृद्धि की। कवितापाठ और वादविवाद प्रतियोगिता के विजेताओं को उच्चायोग द्वारा धनराशि से पुरस्कृत करने से हिंदी के विद्यार्थियों के उत्साह में निश्चित वृद्धि हुई।
हिंदी समिति की अपनी आकलन पद्धति है, किंतु उनके दिए योग्यता के प्रमाणपत्र का शिक्षाबोर्ड से अनुमोदन हुए बिना उच्च शिक्षा या नौकरी के आवेदन पर कोई अनुकूल प्रभाव नहीं हो सकता है। आवश्यकता है शिक्षण के साथ आकलन के मानकीकरण और योग्यता के प्रमाणों को शिक्षाबोर्ड द्वारा मान्यता मिलने की ताकि विद्यार्थी अपनी हिंदी की योग्यता के प्रमाणपत्र को उच्चशिक्षा के आवेदन में अंग्रेज़ी तथा अन्य आधुनिक यूरोपियन भाषाओं में प्राप्त जी सी एस ई और ए लेवल की ग्रेड्स की तरह से दिखा कर अपने आवेदन को बल दे सकें। इस दिशा में जितना सुनियोजित काम हुआ है उतनी ही ज़मीन अभी अछूती है। अभी भी हिंदी-शिक्षण यूके के अलग-अलग शहरों में ही नहीं. बल्कि लंदन के विभिन्न भागों में भी बिखरा हुआ है। विभिन्न समुदायों में परस्पर संवाद न होना उनकी सुनियोजित प्रगति में बाधक है। समस्त समुदायों का एक दूसरे से संवाद स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती है जिसका सामना करने के लिए दूरदृष्टिसम्पन्न नेतृत्व की आवश्यकता है। 
हिंदी के प्रचार और प्रसार में हिंदी सिनेमा, हिंदी गानों और दूरदर्शन में प्रसारित सीरियल की महत्वपूर्ण भूमिका है जो परोक्ष रूप से अपना अवदान दे रही हैं। इसके अतिरिक्त कोरोना काल में प्रवासी हिंदी लिखकों की मल्टीमीडिया में सक्रियता से हिंदी के प्रति रुझान में वृद्धि हुई है। साहित्य की अनेक विधाओं के सुविचारित कार्यक्रमों को अखिल विश्व के हिंदी प्रेमियों के साथ जोड़ने के अत्यंत प्रेरणा और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रशंसनीय हैं। हिंदी साहित्य की समृद्धि में यूके के हिंदी लेखकों का अवदान अपने आप में एक स्वतंत्र विषय है जिसके बारे में विस्तार पूर्वक शोध होनी आवश्यक है।
जहाँ तक हिंदी शिक्षण की बात है, मेरे विचार से आवश्यकता है कि इन कार्यक्रमों के विषय निर्वाचन करते समय युवावर्ग की रुचियों को ध्यान में रखा जाए ताकि वे उससे जुड़ सकें। हिंदी के प्रचार और प्रसार का भविष्य नई पीढ़ी को उसके साथ जोड़ने पर ही सुरक्षित हो सकता है। दूसरा स्तर विश्वविद्यालयों की शिक्षानीति के अंतर्गत हिंदी शिक्षण का है जो यूके के कुछ विश्वविद्यालयों में विविध रूप से हो रहा है। जहाँ तक मुझे मालूम है, यूके के विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण मुख्य विषय के रूप में न होकर दक्षिण एशियाई अध्ययन, इंडोलॉजी जैसे विषयों के आनुसंगिक विषय के रूप में अधिक हो रहा है। कोविद काल में सभी शिक्षा संस्थाएँ प्रत्यक्ष शिक्षण की जगह ऑनलाइन प्रशिक्षण कर रही है। 
लंदन के किंग्स कॉलेज में हिंदी की शिक्षा सप्ताहांत या संध्याकालीन कार्यक्रम के अंतर्गत उपलब्ध है। पाठ्यक्रम मे अक्षरज्ञान से शुरू करके भाषा अर्जन के चारों चरण, श्रवण, वाचन, पठन और लेखन निम्नलिखित रूप में शामिल हैं: 
हिंदी स्तर 1, भाग 1 अध्ययन मोड: मानक, अवधि:15 घंटे
यह पाठ्यक्रम हिंदी में सामान्य रुचि रखने वाले छात्रों की एक विस्तृत श्रृंखला के उद्देश्य से है। हिंदी का कोई पूर्व ज्ञान आवश्यक नहीं है क्योंकि पाठ्यक्रम पूर्ण शुरुआती के लिए है।
शाम का कोर्स:
हिंदी स्तर 2, भाग 1 अध्ययन मोड: मानक, अवधि:15 घंटे
एमएलसी (मॉडर्न लैंग्वेज सर्टीफिकेट) या जीसीएसई (जेनरल सर्टीफिकेट ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन) के समकक्ष के साथ हिंदी स्तर 2: यह पाठ्यक्रम हिंदी में सामान्य रुचि रखने वाले छात्रों की एक विस्तृत श्रृंखला के उद्देश्य से है, जिन्होंने पाठ्यक्रम 1 पूरा किया है। 
लंदन विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया विभाग सोआस के अंतर्गत साक्षरता से लेकर स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर तक का पाठ्यक्रम उपलब्ध है। सोआस की वेबसाइट में हिंदी का परिचय इस प्रकार से दिया गया है:
बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी विश्व की तीसरी भाषा है। कई उत्तर भारतीय राज्यों की आधिकारिक भाषा होने के अलावा, यह पूरे भारत में एक लिंक भाषा के रूप में व्यापक रूप से बोली जाती है, और भारत से यूके में कई हिंदू प्रवासियों द्वारा उनकी मुख्य सांस्कृतिक भाषा के रूप में मानी जाती है। हिंदी का उर्दू से बहुत गहरा संबंध है, जिससे यह मुख्य रूप से केवल लिपि और उच्च शब्दावली में भिन्न है। आधुनिक मानक हिंदी लेखन और पत्रकारिता के एक निरंतर बढ़ते शरीर का वाहन है, और हिंदी फिल्म उद्योग द्वारा इसे अपनी प्राकृतिक सीमाओं से बहुत आगे ले जाया गया है। अपने व्यापक अर्थ में हिंदीनाम उत्तरी भारत की कई क्षेत्रीय बोलियों को शामिल करता है, जिनके पूर्व-आधुनिक साहित्य उत्तर भारतीय हिंदू धर्म की समझ के लिए विशेष रूप से मूल्यवान स्रोत हैं।
और उनके पाठ्यक्रम का परिचय ‘’हम विभाग के भीतर डिग्री कार्यक्रमों के भाग के रूप में, और सोआस डिग्री की एक विस्तृत विविधता पर छोटे या खुले विकल्प के रूप में, स्नातक और स्नातकोत्तर दोनों स्तरों पर हिंदी भाषा और साहित्य में पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं। उन कार्यक्रमों के चयन के साथ-साथ हिंदी पाठ्यक्रमों की सूची नीचे सूचीबद्ध है।
डिग्री मॉड्यूल विकल्प
हिंदी भाषा 1ए
हिंदी भाषा 1बी
हिंदी भाषा 2
हिंदी भाषा 3
हिंदी भाषा 4
समकालीन हिंदी में रीडिंग
उत्तर भारत में साहित्य और उपनिवेशवाद
समकालीन हिंदी साहित्य में गतिशीलता के आख्यान
हिंदी भाषा 1ए (स्नातकोत्तर)
हिंदी भाषा 1बी (स्नातकोत्तर)
हिंदी भाषा 2 (स्नातकोत्तर)
हिंदी भाषा 3 (स्नातकोत्तर)
हिंदी भाषा 4 (स्नातकोत्तर)
एक आधुनिक दक्षिण एशियाई भाषा के साहित्य में निर्देशित रीडिंग
उत्तर भारत में साहित्य और उपनिवेशवाद (परास्नातक)
समकालीन हिंदी साहित्य में गतिशीलता की कथाएँ (परास्नातक)
समकालीन हिंदी में पढ़ना (स्नातकोत्तर)
सोआस में व्याकरण, शब्दावलि, सही उच्चारण, पठन और लेखन में प्रवीणता के शिक्षण और मूल्यांकन के प्रावधान हैं, किंतु विद्यार्थियों की संख्या बहुत उत्साहवर्धक नहीं कही जा सकती। उनसे जुड़े शिक्षकों में रूपर्ट स्नेल, फ्रांचेस्का ओर्सिनी, नरेश शर्मा, तेज़ भाटिया के नाम उल्लेखनीय हैं। रूपर्ट स्नेल और नरेश शर्मा की लिखी हिंदी स्वयं-शिक्षक पुस्तकें यूके की समस्त विश्वविद्यालयों में प्रयुक्त हो रही हैं।
पढ़ने का सुझाव
जे.एस.हॉली और मार्क जुएर्गेन्समेयर, भारत के संतों के गीत, नई दिल्ली 2004।
जूडिथ मेयर और नरेश शर्मा, हिंदी स्क्रिप्ट हैकिंग, लंदन 2019।
फ्रांचेस्का ओरसिनी, द हिंदी पब्लिक स्फेयर: लैंग्वेज एंड लिटरेचर इन द एज ऑफ नेशनलिज्म, ऑक्सफोर्ड 2002।
लुसी रोसेनस्टीन, नई कविता: हिंदी में नई कविता, दिल्ली/लंदन 2003।
सी. हथकड़ी और आर. स्नेल, हिंदी और उर्दू 1800 से, लंदन 1990।
नरेश शर्मा, हिंदी ट्यूटर: व्याकरण और शब्दावली कार्यपुस्तिका, लंदन 2018।
नरेश शर्मा और तेज भाटिया, द रूटलेज इंटरमीडिएट हिंदी रीडर, लंदन 2013।
साइमन वेटमैन के साथ रूपर्ट स्नेल, खुद को हिंदी सिखाएँ, लंदन (संशोधित संस्करण) 2000।
रूपर्ट स्नेल, खुद को शुरुआती हिंदी लिपि सिखाएँ, लंदन 2000।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, हिंदी साहित्य पर लेख (माइक्रोपीडिया में अनुक्रमित)।
कृपया ध्यान दें: सभी मॉड्यूल और कार्यक्रम हर साल उपलब्ध नहीं होते हैं।
यॉर्क विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ लैंग्वेज ऐंड लिंग्विस्टिक साइंस के अंतर्गत 1971 में डॉ महेंद्र वर्मा के कार्यकाल में वर्षों चला। वर्मा जी विभाग में भाषा विज्ञान का इतिहास पढ़ाते थे और भारत से उनके निरीक्षण निरीक्षण में पी एच डी के लिए शोध करने आए छात्र हिंदी। वर्मा जी प्रेमचंद की सरल कहानियों द्वारा विद्यार्थियों का परिचय हिंदी साहित्य से कराते थे। पर ख़ेद की बात है कि यह क्रम उनके अवकाश प्राप्त करने के बाद कोई उपयुक्त नियुक्ति न हो पाने के कारण रुक गया। यॉर्क विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर ऑनलाइन हिंदी-उर्दू शिक्षण के संदर्भ में प्रेमचंद के साहित्य के अध्ययन का उल्लेख है, किंतु उसके लिए हिंदी-उर्दू की साक्षरता आवश्यक नहीं मानी गई है क्योंकि उनकी लिखी कहानियों को अंग्रेज़ी अनुवाद द्वारा पढ़ाया जाता है। हिंदी-उर्दू पढ़ सकने वाले छात्रों को उनके हिंदी संस्करण पढ़ने की सलाह दी गई है। वेब साइट में हिंदी-उर्दू को एक साथ प्रस्तुत करना स्वयं में एक प्रश्न खड़ा करता है। 
ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय में फैकल्टी ऑफ ओरिऐंटल स्टडीज़ के तहत हिंदी के प्राथमिक से लेकर उन्नत पाठ्यक्रम का शिक्षण डॉ इमरे बंगा कर रहे हैं। वहाँ आधुनिक हिंदी के साथ पुरानी हिंदी (ब्रजभाषा) भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित है। एक मॉड्यूल सप्ताह में पाँच घंटों के लिए दस सप्ताह तक चलता है जिसमें साहित्यकारों की रचना का पठन किया जाता है। साहित्यिक हिंदी कक्षाओं में शास्त्रीय, दलित और समकालीन लेखकों सहित कुछ लघु कथाएँ और नाटक के अंश का अध्ययन किया जाता है। पाठ्यक्रम मुख्य रूप से ओरिऐंटल स्टडीज़ में नामांकित छात्रों के लिए है, साथ ही अन्य विषयों के विद्यार्थियों के लिए भी सीमित स्थान उपलब्ध हैं। वहाँ भी छात्र संख्या सीमित ही है। 
केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में डॉ मैकेग्रेगर के कार्यकाल में स्नातक स्तर तक का पाठ्यक्रम उपलब्ध था, पर उनके अवकाश प्राप्त करने के बाद वह भी स्थगित हो गया। अब फैकल्टी ऑफ एशियन ऐंड मिडिल ईस्टर्न स्टडीज़ के अंतर्गत हिंदी शिक्षा का प्रावधान केवल उन विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध है जो इंडोलौजी जैसे विषय में स्नातक या स्नातकोत्तर पढ़ाई कर रहे हैं और अपने मुख्य विषय के साथ हिंदी की साक्षरता अर्जित करना चाहते हैं। उनके लिए हिंदी ऑफिसर ऐश्वर्ज कुमार प्रारम्भिक अक्षर ज्ञान से शिक्षण शुरु करते हैं। मिडिल ईस्टर्न स्टडीज़ के अंतर्गत एक विकल्प के रूप में हिंदी और संस्कृत पढ़ाई जाती है जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को हिंदी के प्रारम्भिक स्तर तक शिक्षित करना होता है। विश्वद्यालय की वेबसाइट के अनुसार: 
हिंदी शुरुआती स्तर 1 पाठ्यक्रम
यदि आप हिंदी के ज्ञान के लिए शैक्षणिक आवश्यकता वाले स्नातक छात्र हैं तो हमारे पास नीचे दी गई कक्षाएं उपलब्ध हैं।
कृपया ध्यान दें कि ये कक्षाएं आमतौर पर विश्वविद्यालय के बाहर के लोगों के लिए उपलब्ध नहीं होती हैं।
यदि आप हमारी किसी भी भाषा को केवल बातचीत या छुट्टी के उद्देश्य से सीखने में रुचि रखते हैं, तो आप विश्वविद्यालय भाषा केंद्र से संपर्क करना चाह सकते हैं।
यह कोर्स जूम पर ऑनलाइन चलेगा। पाठ्यक्रम में केवल पंजीकृत नाम ही प्रत्येक सोमवार को जूम लिंक प्राप्त करेंगे।
केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अंतर्गत केम्ब्रिज इंटरनेशनल में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों को ग्यारह वर्ष (इलेवन+) से लेकर 18-19 वर्ष (ए लेवल) की हिंदी की परीक्षा उपलब्ध हैं जिसके लिए सुविचारित आकलन पद्धति स्थापित है और योग्यता के प्रमाणपत्र को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में मान्यता प्राप्त है। इस विषय में विस्तार से चर्चा करना हिंदी शिक्षन के संदर्भ में कदाचित प्रासंगिक न हो। 
लैस्टर विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण के लिए 20 सप्ताह का एक ऑनलाइन पाठ्यक्रम है जिसमें 60 घंटों हिंदी वर्णमाला से शुरू करके सामान्य वार्तालाप के विषय, जैसे अभिवादन, व्यक्तिगत रुचि, समय बताना, रास्ता पूछना, निर्देश देना, परिवार के विवरण, ख़रीदारी, उत्पाद, कीमत आदि विषयों को शामिल किया जाता है। 
हिंदी शिक्षण की दिशा:
हिंदी शिक्षण की वर्तमान स्थिति का विहंगावलोकन करने से यह स्पष्ट है कि इस दिशा में अपेक्षित प्रगति करने के लिए कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान देना आवश्यक है। सर्वप्रथम यूके के अलग-अलग शहरों में बिखरी हिंदी शिक्षण की निजी संस्थाओं की सूची बनाकर उनकी गुणवत्ता की जाँच करनी होगी। उनमें पारस्परिक संवाद करना होगा ताकि एक मानक पाठ्यक्रम जिसमें प्रगति के क्रमिक विकास और उसके आकलन की पद्धति निर्धारित हो, स्थापित हो सके।
हिंदी शिक्षा के विभिन्न स्तरों के उपयुक्त तथा यूके में रहने वाले विद्यार्थियों के परिवेश और रुचियों के अनुकूल शिक्षण सामग्री बनानी होगी जिसके साथ प्रवासी विद्यार्थी जुड़ सकें। पाठ्य सामग्री ऐसी हो जिसमें विद्यार्थी अपने परिवेश को पहचान सकें। सफल शिक्षण के अंतर्गत लर्निंग ऑबजेक्टिव अर्थात अधिगम के उद्देश्य, लर्निंग इंडीकेटर अर्थात अधिगम के सूचक और लर्निंग आउटकम अर्थात अधिगम या सीखने के प्रतिफल शामिल हैं।
शिक्षा का उद्देश्य केवल टीचिंग या पढ़ाना नहीं अधिगम के प्रतिफल – विद्यार्थी ने क्या सीखा, इसका आकलन करके विद्यार्थी की योग्यता का क्रमिक विकास करना है। यह जानना आवश्यक है कि विद्यार्थी ने क्या सीखा है और उसे इसके बाद क्या सीखना चाहिए। यह तभी संभव है जब आकलन के दोनों रूप – असेसमेंट फॉर लर्निंग अधिगम या सीखने के लिए आकलन और असेसमेंट ऑफ लर्निंग अर्थात अधिगम के आकलन सुनियोजित रूप से प्रयुक्त हों।
आकलन की प्रामाणिकता स्थापित करने के बाद ही यूके के शिक्षा विभाग से हिंदी की योग्यता को मान्यता मिल सकती है जिसके आधार पर हिंदी की परीक्षा की योग्यता को अंग्रेज़ी तथा अन्य आधुनिक यूरोपियन भाषाओं की योग्यता के समान मान्यता प्राप्त हो सकेगी। यह कार्य कठिन होते हुए भी असम्भव नहीं और अत्यावश्यक तो है ही। 
डॉ अरुणा अजितसरिया एम बी ई ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान, स्वर्ण पदक, स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास पर शोध कार्य करके पी एच डी और फ़्रेंच भाषा में डिग्री प्राप्त की। 1971 से यूके में रह कर अध्यापन कार्य, शिक्षण कार्य के लिए महारानी एलिज़ाबेथ द्वारा एम बी ई, लंदन बरॉ औफ ब्रैंट, इन्डियन हाई कमीशन तथा प्रवासी संसार द्वारा सम्मानित की गई। ब्रूनेल विश्वविद्यालय के अंतर्गत पी जी सी ई का प्रशिक्षण और सम्प्रति केम्ब्रिज विश्वविद्यालय की अंतर्राष्ट्रीय शाखा में हिन्दी की मुख्य परीक्षक के रूप में कार्यरत। संपर्क : arunaajitsaria@yahoo.co.uk

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