संपादकीय - क्या अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा विश्व के लिये चुनौती है ? 1
तस्वीर साभार : The Economist

सबसे महत्वपूर्ण मामला है आतंकवाद का। जिस आसानी से तालिबान ने अमरीका और नैटो की सेनाओं को अफ़गानिस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया उससे विश्व भर के आतंकवादी संगठनों का हौसला बढ़ा होगा। अब ब्रिटेन, यूरोप, अमरीका और भारत को विशेष तौर पर आतंकवादी हमलों से बचने की तैयारियां लगातार करते रहना होगा। इन सब देशों में आतंकवादी फ़िलहाल निष्क्रिय मुद्रा में मौजूद हैं। तालिबान की जीत उनमें नये जीवन का संचार अवश्य करेगी। भारत को केवल काश्मीर ही नहीं अन्य शहरों पर भी सतर्क निगाह रखनी होगी।

यह सोचा जा रहा था कि अमरीका को चिढ़ाने के लिये तालिबान अपनी मंत्री-परिषद की घोषणा 11 सितम्बर को करेगा। आज से बीस साल पहले इसी दिन अमरीका पर एक हवाई आतंकी हमला हुआ था और वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की जुड़वां इमारतों को तबाह कर दिया गया था। 
मगर तालिबान ने चंद दिन पहले ही अपने मंत्रियों के चेहरे दिखा कर विश्व को चुनौती दे डाली क्योंकि उस मंत्री परिषद में बहुत से ऐसे चेहरे शामिल हैं, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा ग्लोबल आतंकी घोषित हैं या किसी पर अमेरिका ने ईनाम घोषित किया हुआ है 
इस मंत्री परिषद में कुछ नाम तो ख़ास तौर पर भौंहों पर बल डालने को मजबूर कर देंगे। बामियान में भगवान बुद्ध से जुड़ी यादों को तबाह करने वाला मुल्ला मुहम्मद हसन संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल आतंकियों में शामिल है और तालिबान ने उसे अपना प्रधानमंत्री घोषित किया है।
उप-प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल गनी उर्फ मुल्ला बरादर तालिबान का सबसे सशक्त चेहरा है। वह एक लंबे अर्से तक पाकिस्तान की जेलों में बंद रहा। संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित सूची में उसका नाम भी शामिल है। मगर सच्चाई यह है कि मुल्ला बरादर ही अब तक तालिबान को एकजुट रखने वाला नेता है।
ड्रग्स सप्लाई में लिप्त अब्दुल सलाफ़ हनफ़ी तालिबान का उप-प्रधानमंत्री है। संयुक्त राष्ट्र ने उसे भी आतंकी सूची में शामिल कर उसका मान बढ़ाया है। यानि कि यह तय है कि जो जितना बड़ा आतंकी उसे उतना ही बड़ा ओहदा। 
सिराजुद्दीन हक्कानी का इस मंत्री-परिषद में शामिल होना शायद ही किसी के गले उतरे। उसे गृह-मंत्री बनाया गया है। वैश्विक स्तर पर घोषित आतंकवादी (हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान का हिस्सा) अफ़गानिस्तान का आंतरिक मामलों का मंत्री!
आमिर ख़ान मुतक्की विदेश मंत्री और मुल्ला उमर का बेटा मुल्ला याकूब रक्षा मंत्री बनाये गये हैं। 
याद रखने लायक बात यह है कि इन सभी मंत्रियों को देश चलाने का कोई अनुभव नहीं है। इन्हें केवल गोली चलाना आता है। इनमें से किसी ने पढ़ाई में डिग्रियां हासिल नहीं की हैं। इन की अपनी कुछ संस्थाएं हैं। जब एक आतंकवादी एक जगह की सदस्यता छोड़ता है तो दूसरी संस्था से जुड़ जाता है। ये लोग किसी कॉर्पोरेट जगत के प्रोफ़ेशनल नहीं हैं… केवल गोली चलाना जानते हैं। ये लोग काबुल में मोटर-साइकलों पर सवार हो कर आए थे… हाथ में एके-47 और अन्य हथियार। 
तालिबान ने सत्ता संभालते ही पूरे देश में विज्ञापनों पर महिलाओं के चेहरे काले रंग से पोत दिये। स्कूलों से सह-शिक्षा बंद कर दी… यानी कि लड़के और लड़कियां अलग-अलग स्कूलों में पढ़ेंगे। महिलाओं को हिजाब और बुरक़ा पहनना होगा। उनके नौकरी करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। महिलाओं की खेलों की सारी टीमों पर भी प्रतिबंध लग गया। यानी कि अब अफ़गानिस्तान की टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर नहीं जा सकेगी।
तालिबान सरकार ने अफ़गान जेलों से तमाम आतंकवादियों को रिहा कर दिया। 
तालिबान की जीत पर यदि कोई उनसे अधिक ख़ुशियां मना रहा है तो वह है पाकिस्तान – ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना।’ एक तरफ़ तो पाकिस्तान के न्यूज़ एंकर शोर मचाते रहते हैं कि पाकिस्तान तो ख़ुद आतंकवाद का शिकार रहा है। भला हम कैसे आतंकवादियों का साथ दे सकते हैं। मगर पंजशीर घाटी में पाकिस्तान की भूमिका और पाकिस्तानी आईएसआई प्रमुख फैज हमीद के नेतृत्व में पाकिस्तान का उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल तालिबान के निमंत्रण पर काबुल पहुंचने के बाद मंत्रिमंडल का गठन होना पूरी तरह से पाकिस्तान की भूमिका स्पष्ट करता है। 
सबसे महत्वपूर्ण मामला है आतंकवाद का। जिस आसानी से तालिबान ने अमरीका और नैटो की सेनाओं को अफ़गानिस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया उससे विश्व भर के आतंकवादी संगठनों का हौसला बढ़ा होगा। अब ब्रिटेन, यूरोप, अमरीका और भारत को विशेष तौर पर आतंकवादी हमलों से बचने की तैयारियां लगातार करते रहना होगा। इन सब देशों में आतंकवादी फ़िलहाल निष्क्रिय मुद्रा में मौजूद हैं। तालिबान की जीत उनमें नये जीवन का संचार अवश्य करेगी। भारत को केवल काश्मीर ही नहीं अन्य शहरों पर भी सतर्क निगाह रखनी होगी।
चीन का रुख़ भी ख़ासा दिलचस्प रहा है। चीन और पाकिस्तान के रिश्ते जग-ज़ाहिर हैं। चीन ने तालिबान को क़रीब अढ़ाई अरब डॉलर की सहायता की पेशकश कर दी है। मगर बहुत से देशों ने अपने-अपने दूतावास पर ताले लगा रखे हैं। जब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी कोई भी देश भला अपने डिप्लोमैटिक स्टाफ़ की जान कैसे ख़तरे में डाल सकता है। 
अधिकांश देश प्रतीक्षा कर रहे हैं। तालिबान भी जानते हैं कि बिना वैश्विक सहायता के वे सरकार चला नहीं पाएंगे और विश्व तब तक सहायता नहीं करेगा जब तक तालिबान उनकी शर्तों को नहीं मानेंगे।
इस बीच ईरान ने पंजशीर घाटी पर पाकिस्तानी भूमिका पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा किए गए ड्रोन हमले को लेकर ईरान भड़क गया है… ईरान का कहना है कि इस तरह किसी भी बाहरी ताकत द्वारा हमला किया जाना ग़लत है। 
वहीं दूसरी ओर अमेरिका की खुफिया एजेंसी (सीआईए) प्रमुख विलियम बर्न्स ने काबुल में तालिबानी नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ गोपनीय मुलाकात की है। द वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इसकी सूचना दी गयी। 
ब्रिटिश विदेश सचिव डॉमिनिक राब का कहना है कि ब्रिटेन अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता देने की योजना नहीं बना रहा है, लेकिन वह आतंकवादी समूह के साथ रचनात्मक संबंध बनाने के लिए तैयार है। राब ने आगे कहा कि पश्चिमी सैनिकों की वापसी और तालिबान के अधिग्रहण के बाद दुनिया को “अफगानिस्तान में नई वास्तविकता का सामना करना होगा”। 
पांच देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका) के संगठन ब्रिक्स ने एक मीटिंग इस बीच सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन ने अफगानिस्तान का मुद्दा उठाया. तो सम्मेलन के समापन पर, ब्रिक्स नेताओं ने नई दिल्ली घोषणाके तहत अफगानिस्तान संकट को शांतिपूर्ण तरीके से निपटने का आह्वान किया। वहां हाल में हामिद करजई हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले की निंदा की गई है। उम्मीद जताई गई है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही अफगानिस्तान को नशा उत्पादों के कारोबार का केंद्र नहीं बनने दिया जाएगा। वहां अफगानी महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाए जाएंगे।
याद रहे कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने ही अफगानिस्तान के हालात और आतंकवाद पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हमने ब्रिक्स ‘Counter Terrorism Action Plan’ को अपना लिया है तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा, अफगानिस्तान आतंकवाद और ड्रग स्मगलिंग का अड्डा नहीं बनना चाहिए।
तालिबान ने नई सरकार के गठन के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए भारत, चीन, अमेरिका, पाकिस्तान, रूस, ईरान, तुर्की समेत कई देशों को आमंत्रित किया है। चीन और पाकिस्तान के साथ-साथ रूस को भी तालिबान का समर्थक शुरू से ही बताया जा रहा है, लेकिन अब रूस ने तालिबान की अंतरिम सरकार के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय  की तरफ से जारी बयान में इसकी आधिकारिक घोषणा की गई है। इस घोषणा के बाद तालिबान को एक बहुत बड़ा झटका लगा है।
वर्तमान स्थिति यह है कि तालिबान ने अपना 11 सितम्बर वाला शपथ ग्रहण समारोह फ़िलहाल रद्द कर दिया है। यदि पाकिस्तान के अतिरिक्त कोई और देश शपथ ग्रहण समारोह में आने को तैयार ही नहीं तो उनके पास और कोई विकल्प कहां रह जाता है?
वैसे एक सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि तालिबान के पास देश चलाने के लिये पैसा तो है नहीं फिर देश चलेगा कैसे। डॉलरों की कमी के चलते पाकिस्तानी रुपये को भी अफ़गानिस्तान में मान्यता दे दी गयी है। मगर याद रहे कि तालिबान के पास अफ़ीम की खेती से ख़ासा नक़द नारायण आता रहा है। उसी पैसे से हथियार भी ख़रीदे जाते रहे हैं।
मगर एक सवाल ज़रूर सिर उठाता है कि बीस साल तक अमरीकी सेना अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद रही। सेना के पास सैटेलाइट के माध्यम से हर तरह की जानकारी उपलब्ध थी; हथियार थे और लड़ाकू जहाज़ भी थे। तो फिर अमरीका ने तालिबान के अफ़ीम के खेत जला क्यों नहीं डाले? क्यों पूरी दुनिया में उस नशे को पहुंचने दिया।… कहीं सी.आई.ए. को भी तो इस नशीले नोटों का हिस्सा तो नहीं मिल रहा था। क्या पता तालिबान और अमरीका का ख़र्चा एक ही स्त्रोत न रहा हो। और अब तो पूरे का पूरा नशा तालिबान के हाथ में है।… सोचिये अब क्या होगा… तालिबान और पाकिस्तान खुला खेल खेलने के लिये साथ-साथ।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

17 टिप्पणी

  1. बदलते हुए वैश्विक समीकरण पर सटीक, सार्थक, सारगर्भित
    सम्पादकीय के लिए अभिनंदन ।
    पढ़ते ही एक गीत याद आ गया ‘सम्हल के रहना अपनेघर में छुपे हुए गद्दारों से , आतंक के दम पर सत्ता हासिल करने की इस तालिबानी हिम्मत ने पूरी दुनिया को चौका दिया है । नशे की खेती
    के भयानक परिणाम और इसके भीतर छुपा पूंजीवादी रहस्य पर
    अच्छा संकेत है ।दुनिया को अब पुनः चिंतन करना होगा रणनीति और रणनीति दोनों फिर से लिखी जाएगी ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  2. You have raised significant questions regarding the role of America in Afghanistan
    Rather you have even insinuated it to have been part of its drug trade.
    We,as readers of your Editorial, gain a clearer view of various political issues and wish you to accept our thanks and congratulations.
    Warm regards and best wishes,Tejendra ji
    Deepak Sharma

  3. तालिबान एक आतंकवादी संगठन ही नहीं सोच भी है जो बड़ी तेज़ी से विश्वभर में ज़हर की तरह फैल रही है। अब तो ऐसा लगता है कि महादेशों को अँगूठा दिखाकर कह रहा है कि तुमसे जो बनता है करो लेकिन हम नही सुधरेंगे। अभी तो शुरुआत है, आगे आगे देखिए होता है क्या। इनकी ज़हरीली सोच भविष्य में पूरे विश्व को एनाकॉन्डा की तरह लील लेगी।

  4. बेहतरीन सटीक सार्थक अभिव्यक्ति
    यह जो धीमा जहर है धीरे धीरे संपूर्ण विश्व को नष्ट ही कर देगा ।परिणाम आने में समय नहीं लगेगा।

  5. वैश्विक पटल पर तालिबानी रूपी आतंकी साया जो संपूर्ण विश्व पर मंडरा रहा है यह संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक सोचनीय विषय है। भारत इन आतंकियों से कितना सुरक्षित है अथवा सुरक्षित रहेगा यह भी चिंतनीय है।
    डॉ पुष्पा सिंह

  6. शोधपरक तथ्यात्मक आलेख एवं वर्तमान स्थिति की सटीक जानकारी। विचारणीय बात यह है कि ऐसी स्थिति में सभी देशों को अतिशीघ्र सुरक्षा और शान्ति बनाए रखने के महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। आज के उपाय ही कल का भविष्य लिखेंगे।

  7. समसामयिक और सारगर्भित संपादकीय के लिए अभिनंदन। एक पुस्तक पढ़ी थी, I Am Pilgrim, Author-Terry Hayes. उसे पढ़ने के बाद शायद आज की तालिबानी सरकार के बारे में या समान्य शब्द आतंकवाद (इस्लामिक) के बारे में में विशदता से सोचा जा सकता है। मन में कोई भी सकारात्मक भविष्य की छवि नहीं बनती। तालिबान या आतंकवादी संगठनों को कहाँ से कैसे सहायता मिलती है, यह प्रश्न चिह्न है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बाकी के सभी मुस्लिम देश और पूरे विश्व में फैले हुए सैकड़ों आतंकवादी धीरे धीरे संगठित होकर, आज तक की सभ्यता और अन्य धर्मों को निगल जाएंगे। मात्र इस्लाम ज़िन्दा रहेगा और रहेगा आतंकवाद। व्यापार और पैसे के लिए अमेरिका ही नहीं अन्य देश किस स्तर तक गिर चुके हैं, तालिबान सरकार उस आइस बर्ग का ऊपरी सिरा है। अंत का आरम्भ है…

      • संपादक महोदय। बहुत चिंतनीय विषय को सार्थक शब्दों के माध्यम से पाठक वर्ग तक पहुंचाने हेतु आपको साधुवाद।
        बुराई कोई भी हो जब तक उसका अंत जड़ से ना किया जाएगा ,ये कुकुरमुत्ते की तरह जगह -जगह उगते रहेंगे।इस आतंकवाद में केवल भय ही नहीं है, कहीं न कहीं कुछ फायदा भी लोग लेे रहे हैं ,तभी तो ये मजबूत जड़ें पकड़ता चला गया! आकाओं को कभी किसी भी आतंकवाद से कोई क्षति नहीं पहुंची ? यह एक गंभीर प्रश्न है!इसीलिए यह बड़े लोगों की छाया में पनपता रहा और साधारणजन मौत के घाट उतारे जाते रहे।चर्चा खूब हुई पर हल एक न निकला! सोचिए , पनाह देने वालों को जब सुरक्षा मिल गई फिर कौन से देश को बचाने की बात की जाए?
        आज एक बार फिर सोचना होगा कि जड़ को कैसे काटा जाए , न कि उनकी मदद कौन कौन करेगा या नहीं!
        समय आ गया है…. क्रांतिकारी बन समाज की बुराइयों को जड़ से नष्ट किया जाए या फिर मानवता को शर्मशार होने दिया जाए!
        डॉ.सविता सिंह,
        पुणे।

  8. आदरणीय सम्पादक जी ! आपके सम्पादकीय ने वैश्विक और भारतीय स्तर पर, सामने साक्षात् दिखाई दे रहे भयंकर ख़तरे की ओर स्पष्ट संकेत कर दिया है। आपकी शोधपरक टिप्पणियाँ बहुत सटीक हैं। तालिबान के मंत्रीमंडल के विषय में भी आपने सुधी पाठकों को सही जानकारी दी है। पाकिस्तान और चीन तो तालिबानी चमचे हैं ; उनके अतिरिक्त बाक़ी विश्व को इस भीषण समस्या का कोई हल खोजना ही होगा, अन्यथा मानवता के विनाश में देर नहीं लगेगी।

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