Sunday, June 23, 2024
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डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ का लेख – क्रियोली हिंदी के निर्माण में लगी मीडिया

हिंदी को हिंदी न रहने देने के संकल्प के साथ हिंदी मीडिया आज हिंदी की धज्जियाँ उड़ा रहा है। पहले मुद्रित माध्यम(प्रिंट मीडिया) और अब इलेक्ट्रानिक माध्यम ने देशी भाषा में कहें तो भाषा की ऐसी-तैसी ही कर दी है। पहले फिल्मों में लोकप्रिय हुई मुंबइया हिंदी अब समाचार पत्रों और धारावाहिकों तथा न्यूज़ चैनलों में भी लोकप्रिय हो रही है। 
आजकल किसी भी धारावाहिक में महिला से बात करते हुए ‘आप कहाँ रहते हैं? क्या करते हैं?’ जैसे प्रश्न आम हैं। उत्तर में भी पुंल्लिंग वाक्य ही परोसे जाने लगे हैं।इनकी बोली-बानी से लगता है कि जैसे सामाजिक बदलाव भाषा से ही शुरू हो सकता है। वह भी केवल वाक्यों के लिंग परिवर्तन से मन और विचार परिवर्तन से नहीं। ‘अपने’ सर्वनाम का प्रयोग भी अब सीमित हो गया है। लगता है कुछ दिनों के बाद यह अपने होने की दया याचिका दायर करेगा तभी इसका अस्तित्त्व बचेगा। उदाहरण के लिए ‘मैं मेरे घर जाता हूँ’ ‘अपने’ नहीं। ‘तुम तुम्हारे घर जाओ’ जैसे वाक्यों को सुनकर लगता है जैसे कि इन सबका अपना घर कहीं गुम हो गया है।
कुछेक वर्तनी और वाक्य विन्यास की अशुद्धियों को छोड़ दें तो हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में अभी यह चिंताजनक पतन आरंभ नहीं हुआ है। जब चीन जैसे देश में था तो वहाँ रहते हुए हिंदी के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ इतनी आसानी से सुलभ नहीं थे। अत: वहाँ रहते हुए इसकी प्रामाणिकता के लिए मैंने हिंदी की बहुत सारी आनलाइन और ऑफलाइन साहित्यिक पत्रिकाएँ खँगाली थीं तो मन संतुष्ट हुआ था कि इनसे बहुत अधिक निराश होने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन वहाँ भी सावधान होने की ज़रूरत अवश्य है। अगर हम सावधान न हुए तो दुनिया को हम अपनी वैश्विक होती हिंदी भाषा का एक मानकीकृत रूप न दे पाएँगे। 
साहित्य के क्षेत्र में निकल रही पत्रिकाओं की भाषा और किसी अख़बार की भाषा में बहुत अंतर रहता है। भाषा में इतना अंतर उचित नहीं है। आम आदमी जो भाषा बोलता है, उसी को लिखना ज़रूरी नहीं है। उन्हें उस भाषा से भी परिचित होने देना है, जिसकी मदद से वे साहित्य को पढ़ सकते हैं।
संपादकों की व्यवहार बुद्धि के चलते अख़बारों और समाचारपत्र व पत्रिकाओं में आने वाला साहित्य अब या तो घटिया हो गया है या फिर उनमें से गायब ही हो गया है। कुछ अख़बारों ने तो साहित्य से किनारा करना शुरू कर दिया है। कुछ ने लाज -हया कायम रखते हुए किसी खास दिन पर साहित्य के लिए अब भी ज़गह छोड़ी हुई है। अख़बारों में हमेशा साहित्य हाशिए पर रहा है। लेकिन वह हाशिया प्राय: रोज़ रहता था और चौड़़ा भी होता था किंतु आज की स्थिति यह है कि यह हाशिया कहीं-कहीं या तो संकीर्ण हो गया है या फिर गायब ही हो गया है। 
उत्तर भारत में रहते हुए पाया कि कुछ एक अख़बार अब भी अपनी भाषिक मर्यादा बनाए हुए हैं। कुछ दिनों पूर्व एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के साहित्य संपादक से एक पुस्तक की समीक्षा को लेकर बातचीत हुई तो उन्होंने सगर्व बताया कि अब वे पुस्तक समीक्षा नहीं छापते। उन्होंने इस शैली में मुझे सूचना दी कि जैसे उन्होंने पुस्तक समीक्षा का कुकर्म त्याग दिया है मैं भी त्याग दूँ। पुस्तक समीक्षा हटा देने से वे उस स्थान का उपयोग विज्ञापन में कर सकेंगे। अखबारों की यही व्यापार बुद्धि भाषा और साहित्य को क्षति पहुँचा रही है।
इस मामले में मैं जनसत्ता और पंजाब केशरी को औरों से बेहतर स्थिति में पाता रहा। गुजरात में बसकर पाया कि ‘राजस्थान पत्रिका’ ने अपनी भाषिक शुद्धता पर कमोबेश वही ध्यान रखा है जैसे ये और अंग्रेज़ी के अख़बार रखते हैं। 
हम अंग्रेज़ी के अख़बारों की वर्तनी और उनके वाक्य विन्यास को आज भी उदाहरण के रूप में किसी के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन हिंदी का कहें या हिंदी वालों का दुर्भाग्य कि अधिकांश हिंदी अख़बारों की भाषा के उदाहरणों का इस विश्वास के साथ इस्तेमाल नहीं कर सकते।
हिंदी अपने वैश्विक स्वरूप के साथ उभर रही है। हिंदी देश से बाहर कदम ही नहीं रख चुकी है बल्कि दुनिया भर में अपने कदम जमा भी रही है। भले ही दुनिया के हर देश में मुद्रित पत्र-पत्रिकाएँ न मिलें पर उनके विकल्प के रूप में ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाएँ दुनिया भर में अपनी पैठ बना रहे हैं।कुछ समाचार पत्र अपने ऑफ लाइन ई-संस्करण भी निकाल रहे हैं। ऐसे में भाषा की शुद्धता पर ध्यान देना ज़रूरी हो गया है।
कुछ वर्ष पूर्व ‘जनसत्ता’ के भूतपूर्व संपादक ओम थानवी जी ने अपने एक आलेख ‘चिंदी-चिंदी हिंदी’ में चंडीगढ़ की जिस अख़बारी भाषा का खेद के साथ उल्लेख किया था, सच में वह किसी भी स्तर से हिंदी नहीं कही जा सकती है। वह भाषा का नया रूप है, जिसे हिंग्लिश कह सकते हैं।
मारीशस में इसी तरह क्रियोल भाषा ने रूप लिया है। लगता है हम भी किसी क्रियोली हिन्दी की रचना प्रक्रिया में हैं। ओम थानवी जी लिखते हैं, “अखबार के कई खाने थे… सिर्फ पहले का नाम हिंदी में था -संघ राज्य क्षेत्र… बाकी खाने नागरी में यों थे: न्यूज़,इवेंट, बेस्ट ऑफ़ सिटी, सिटी ब्लॉगर, सिटी गैलरी, डायरेक्टरी, ई-पेपर। मैने ‘बेस्ट सिटी का पन्ना खोला। कुछ बानगी देखिए: “ट्राइ सिटी चंडीगढ़ में शोपिंग के लिए… शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, रेस्तरां, बैंक, डिस्को और पब सेक्टर-१७ को मोस्ट हैपेनिंग प्लेस बनाते हैं।”
सोशल मीडिया की लिपि अभी से रोमन हो चुकी है। बहुत कम लोग देवनागरी में टंकित करते हैं।नई पीढ़ी तो रोमन लिपि को ही प्राथमिकता देती है। अगर हिंदी इसी तरह विकसित होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब उर्दू की ही तरह हिंदी से फिर किसी नई भाषा का जन्म होगा। वह जो रूप लेगी उसे रोमन हिंदी जैसा कोई नाम मिल सकता है। सोशल मीडिया की तरह ही बहुत संभव है कि अखबारों में भी उसकी लिपि भी रोमन ही स्वीकृत हो जाए।
भाषा से अब किसी माध्यम का कोई विशेष सरोकार नहीं है। हाँ,आकाशवाणी का अब भी भाषा से सरोकार बना हुआ है और उसे अपवाद कहा जा सकता है। अख़बार प्रूफ रीडर (संशोधक) का पद ही समाप्त कर दे रहे हैं। अब संवाददाताओं के द्वारा भेजी गई ख़बरें सीधे छपती हैं। यह प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है। 
मीडिया के मुद्रित और वैद्युत (इलेक्ट्रोनिक) दोनों माध्यम क्रियोली हिंदी के निर्माण में लगे हैं। यदि इन माध्यमों विशेष रूप से समाचार पत्रों ने भाषा की शुद्धता पर ध्यान न दिया तो भावी पीढ़ी इन्हें माफ़ नहीं करेगी।

डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 
संपर्क – 00-91-8000691717
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