साभार : Dainik Jagran
डाॅ. नीशू यादव
(हिंदी विभाग, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय,  जबलपुर)
विश्व धरा पर स्थित भारत भूमि, ऐसी भूमि है, जहाँ अनेकानेक संतों, महात्माओं, ऋषि-मुनियों तथा महापुरुषों ने जन्म लिया है और अपने व्यक्तित्व-कृतित्व से भारत-माता की आन-बान और शान को विश्व पटल पर बढ़ाया है। उन महान सपूतों में गुजरात प्रदेष के माटी में जन्में भारत के सच्चे सिपाही, देश भक्त, त्याग व समर्पित जीवन के प्रतीक माने जाने वाले सपूत सरदार वल्लभ भाई पटेल एक हैं, जिन्हें भारतीय इतिहास में लौह-पुरुष के रूप में जाना जाता है।
भारतीय इतिहास में ब्रिटिश सरकार की कहानी तथा उसके साम्राज्य की स्थापना एक विजय, विलय और शोषण का इतिहास है। भारतीयों के आपसी वैमनस्यता व एकता के अभाव का लाभ उठाकर सात समंदर पार से आये मुट्ठी भर अंगरेजों ने एक खुशहाल और समृद्धिशाली देश को गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया, अंगरेजों ने भारत भूमि पर अपना अधिकार वीरता तथा युद्ध कौशल से नहीं अपितु धूर्तता तथा विश्वासघात से हासिल किया।
‘‘सन् 1900 ई. में वल्लभ भाई पटेल ने वकालत प्रारम्भ की। दो वर्ष गोधरा में वकालत करने के पष्चात् 1902 में वल्लभ बाई बोरसद आ गये। जहाँ स्थानीय अधिकारियों के साथ विट्ठल भाई का संघर्ष चल रहा था। बोरसद में आने के बाद भी वल्लभ भाई अपने भाई विट्ठल भाई के निवास स्थान पर नहीं रहे। दोनों भाईयों में मिलना-जुलना भी कम ही होता था। वल्लभ भाई फौजदारी के ही मुकदमें लेते थे। अपनी वाक् शक्ति और जिरह की पटुता के कारण शीघ्र ही वल्लभ भाई ने ख्याति प्राप्त कर ली और एक सफल वकील के रूप में गिने जाने लगे।’’1
बारसोद क्षेत्र में बहुत संख्या में अपराध दर्ज हो रहे थे, क्योंकि वहां पर अनेक तरह की समस्याएं थीं, जिससे लोग त्रस्त हो चुके थे। यही कारण हैं कि वहां मारपीट वैगरह ज्यादा होते थे।
‘‘बोरसद ताल्लुका आपराधिक मामलों में अग्रणी समझा जाता था और यह एक क्रिमिनल वकील के लिए बहुत अच्छी जगह थी। इतने दिनों में वल्लभ भाई यह अच्छी तरह समझ गये थे, तो उन्होंने निष्चय किया कि वे एक क्रिमिनल वकील के रूप में ही प्रैक्टिस करेंगे, क्योंकि ऐसे मामलों को हल करने में उन्हें विशेष आनंद आता था और प्राणों की रक्षा व जेल से बचने के लिए लोग धन भी खुलकर खर्च करते थे।’’2
बोरसद में उनका काम तेजी से बढ़ा उनकी वकालत चलने लगी और उन्हें अनुभव भी होने लगा। जल्द ही बोरसद में वल्लभ भाई प्रसिद्ध हो गये। उनके सहयोगी नरहरि पारिख ने लिखा है – ‘’फौजदारी मुकदमों ने उन्हें जल्द ही अपराधियों के बीच प्रसिद्ध कर दिया था। वे जानते थे कि वे उन्हें बचा सकते हैं, ज्यादातर वे बचाव पक्ष की ओर होते थे। सरकारी वकील हमेशा अहमदाबाद से आते थे। उसी समय उनकी विदेश जाकर वकालत पढ़ने तथा बैरिस्टर बनने की इच्छा तीव्र हुई क्योंकि कई मुकदमों में उन्हें अहमदाबाद से बैरिस्टर को बुलाना पड़ता था, क्योंकि बैरिस्टर को अधिक फीस मिलती थी और मुवक्कील अपने मुकदमें में बैरिस्टर से जिरह करवाना चाहते थे। वल्लभ भाई बैरिस्टर के साथ होते, परन्तु उन्हें यह बात रास नहीं आती थी। इसीलिये उन्होंने स्वयं बैरिस्टर बनने का प्रण किया।’’3
वल्लभ भाई ने कार्य और योग्यता को देखते हुए अपनी योजनाएँ बनाते थे और उसके क्रियान्वयन में जी जान लगा देते लेकिन कुछ लोगों को वह अच्छा न लगता। शायद इसी का नतीजा रहा कि बारसोद की अदालत आनन्द में स्थानांतरिक की गई और कुछ दिनों के बाद फिर वापस बारसोद आ गई। ‘‘वल्लभ भाई और विट्ठल भाई की योजना के कारण नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि अंगरेज सरकार ने जिला अदालत को आनन्द में स्थानांतरित कर दिया क्योंकि आनन्द में रेल्वे जक्सन था, बोरसद में नहीं। आनन्द ताल्लुका उनके करमसद वाले घर के पास ही था, इसलिये वल्लभ भाई भी वहीं चले गये और वकालत में कोई अंतर नहीं आया। सरकार भी जैसा चाहती थी, वैसा कर न सकी इसलिये अदालत पुनः बोरसद भेज दी गई, क्योंकि फौजदारी मुकदमें वहीं ज्यादा बनते थे। वल्लभ भाई भी पुनः बोरसद चले गये।’’4
एक व्यक्ति जो रेल्वे में था, अपना किस्सा वल्लभ भाई के पास लेकर आया उस पर रेल्वे सम्पत्ति का झूठा आरोप लगाया जा रहा था। वल्लभ भाई को पता चला कि उसका अंगरेज अफसर वास्तव में केवल उसे अपमानित करने के लिए उसे फंसा रहा है। उसने यह भी कहा कि अगर वल्लभ भाई के मुवक्किल को पहले कभी जेल हुई तो उसे कैद नहीं होगी। वल्लभ भाई ने अपने मुवक्किल से कहा कि-’अगर तुम्हारे पास अपनी जन्म तिथि सनद है तो मुझे ला दो, जिसे मुवक्किल ले आया। वल्लभ भाई ने उस बर्थ सर्टिफिकेट के साथ अपनी ऐप्लीकेशन तैयार करके लगा दी, जिसके अनुसार मुवक्किल नौ माह की कैद काट चुका था। ‘‘कैद की तारीख जन्म तिथि के नौ माह पूर्व की थी। कोर्ट में सरकारी वकील उस व्यक्ति की ऐप्लीकेशन के तर्क को काट नहीं सका कि कहीं भी बंद रहना कैद ही है। चाहे वह जेल में हो अथवा माँ की कोख में। नौ माह का कैदी तो मैं रह चुका हूँ अतः मुझे सजा नही मिलनी चाहिए और उसे सजा नहीं हुई।5 और वल्लभ भाई ने बहुत ही कम समय में इस केस को खत्म कर दिया। उनका मुवक्किल खुषी-खुषी चला गया उसके अफसर को सरकारी वकील करने का अफसोस था।
एक दिन सुबह-सबेरे वल्लभ भाई अपने कमरे में आराम कुर्सी पर हुक्का पी रहे थे, जबकि मोटा काका एकदम साफ-सफेद कपड़ों में अन्दर आए। वल्लभ भाई को उनके आने की खबर नहीं थी, इसलिए हुक्का उनके हाथ से छूट गया उन्होंने कुर्सी की ओर बैठने का आग्रह करते हुए कहा – ‘‘मोटा काका, अगर आपने कहलवा दिया होता तो मैं स्वयं आ जाता और मुझे माँ के दर्शन भी हो जाते। मोटा काका ने कहा जब मुझे बोरसद में काम है तो तुम्हें करमसद बुलाकर क्या करता ?’’6
वल्लभ भाई की प्रबल इच्छा थी कि इंग्लैण्ड की यात्रा करने जाएं। परंतु यात्रा के खर्च की चिंता थी और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इसकी व्यवस्था कहां से हो पाएगी। उनकी यह इच्छा जब उनकी झबेर बा अर्थात् उनकी पत्नी, को पता चली तो उन्होंने पैसे दिए थे, जिसका वर्णन करते हुए वल्लभ भई एक जगह लिखते हैं कि ‘‘वे नहीं जानते थे, कि झबेर बा उनकी इच्छा के अनुरूप दस हजार रुपये बचा सकी थीं, जो उन्होंने वल्लभ भाई को दिए। वल्लभ भाई ने ’थामस एण्ड कुक’ नामक ट्रेवल कम्पनी से अपनी विदेश यात्रा के संबंध में बात की थी। जिन्होंने दस हजार रुपयों की मांग की थी और उनका पासपोर्ट व जरूरी कागजात तैयार करने का निश्चित समय दिया था परन्तु कागजाद तैयार होकर वी.जे. पटेल के नाम से विट्ठल भाई के घर पहुँच गए।7 वी.जे. पटेल नाम से विट्ठल भाई भी आसानी से इंग्लैण्ड जा सकते थे। उन्होंने वल्लभ से पहले इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टरी पढ़ने की मांग की। वल्लभ भाई उनकी उस इस बात को जवाब हाँ में देने के सिवाय कुछ न कह सके। विट्ठल भाई ने उनसे कहा कि ’मैं तुमसे बड़ा हूँ, तुम्हें जाने अवसर शीघ्र ही दोबारा मिल जायेगा। इसके साथ ही विट्ठल भाई ने अपनी गृहस्थी की देखभाल करने की जिम्मेदारी भी वल्लभ भाई को सौंप दी और वे स्वयं इंग्लैण्ड चले गये।’8
वकालत और निरपराधी को बचाने का जो जुनून वल्लभ भाई के मन में था उसका एक उदाहरण इस रूप में भी सामने आता है कि एक बार की बात है, जब वल्लभ भाई की की पत्नी झबेर बा की तबियत बहुत  खराब थी और उसी समय एक कैदी के मुकदमें की पैरवी करने आनन्द जाना था। बिना समय गवाएं वल्लभ भाई ने झबेर बा को अस्पताल में भर्ती करवाकर आनन्द ताल्लुके में एक खून के अभियुक्त को बचाने के लिए गये थे। ‘‘जिरह के दौरान उन्हें झबेर बा की मृत्यु का तार मिला। (उस दिन 11 जनवरी, 1909) तार उन्होंने बिना जिरह रोके अपनी जेब में रख लिया, जबकि उनका मन अधीर हो गया था और वे अपनी धर्मपत्नी के पास रहना चाह रहे थे। उन्होंने जिरह पूरी कर अभियुक्त को बचा लिया तब अपने सहयोगियों को तार और तुरन्त वहाँ से रवाना होने के विषय में बताया। वे केस जीत गये थे, परन्तु उनका कभी न पूरा होने वाला नुकसान हो गया था।’’9
पत्नी के वियोग में अथाह दुख को अपने अंदर छुपा लेने वाले वल्लभ ऐसे ही सामान्य नजर आ रहे थे। लेकिन किसी ने भी उनके आँसू नहीं देखे, दर्द का सारा लावा भीतर ही बहता रहा परन्तु वे किसी से कुछ नहीं बोले आगे उन्हें क्या करना यह वल्लभ भाई म नही मन में तय कर चुके थे। क्योंकि पत्नी के न रहने पर बच्चों की देखभाल उनकी पहली प्राथमिकता थी।
‘‘वल्लभ भाई के समक्ष अब बच्चों की परवरिश उनकी शिक्षा और देखभाल तथा स्वयं इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टरी करने की थी। अगस्त, 1910 को उन्होंने मणि और दया को सेंटमेरी स्कूल की मिस विल्सन के हवाले कर बम्बई में छोड़ दिया था।10 उस दिन भी वे अपना एक मुकदमा जीतकर बम्बई आये थे। अपने क्षेत्र में इस समय उनका दिल भी नहीं लग रहा था, दूसरे उनके पास पुनः दस हजार रुपये एकत्र हो गये थे। वे स्वयं भी बैरिस्टर बनना चाहते थे और उनकी धर्मपत्नी ने भी इसके लिए बहुत मेहनत की थी, इसलिये वे चले गये।’’
वल्लभ भाई जब लंदन पहुँचे तब उनके हाथ में हुक्का था। कस्टम अधिकारी ने उनसे पूछा यह क्या है? वल्लभ भाई ने जवाब दिया – ‘’यह भारतीय मिठाई है, क्या आप चखेंगे।’ एक बार हुक्के का कश खींचकर अधिकारी ने हुक्का वल्लभ भाई को वापस दे दिया, वह कुछ कह पाता इससे पहले ही वल्लभ भाई आगे बढ़ गये थे।11 वल्लभ भाई पच्चीस महीने चार अलग-अलग अंगरेज महिलाओं के घरों में किरायेदार रहे, जो मिसेस पैट्रीक थामस, विल्सन, विलियम्स थी। हर हफ्ते का किराया दो या तीन पौण्ड होता था, परन्तु सभी का व्यवहार ठीक था।12 वल्लभ भाई अपनी मानवता व दूसरों की मदद करने से वहाँ भी पीछे नहीं रहे। उनकी एक मकान मालकिन का पति उसे बहुत ही मारता था, कुछ दिन बर्दाश्त करने के बाद वल्लभ भाई ने उस आदमी की शिकायत पुलिस में कर दी, जिससे वह स्त्री राहत में आई।13 व्यवसाय से अलग सच्ची मानवता में भी कभी पीछे नहीं रहे वल्लभ भाई। इसके लिए उन्होंने न देश की परवाह की न ही प्रदेश की। जहां भी उन्होंने गलत देखा आवाज उठाया और उसका पुरजोर विरोध कया।
इंग्लैण्ड में रहते हुए भी अपने स्वभाव के अनुरूप वल्लभ भाई चहलकदमी में विश्वास रखते थे, क्योंकि इससे लोगों से मिलने और यथास्थिति समझने का मौका मिलता था।
‘‘वल्लभ भाई का दिमाग जब और पढ़ने से इंकार कर देता तो वे अपनी हैट सर पर रखकर टहलने निकल जाते थे। उनके हुक्के की जगह सिगरेट ने ले ली थी। कभी-कभी वे मांस भी खा लेते थे।’’14 सर्दी के लिए उन्होंने कुछ कपड़े खरीदे शेष यह कहा जा सकता है कि वे लंदन पढ़ने गये थे सारा वक्त पढ़ते ही रहे। उन्होंने अपनी सभी परीक्षाएँ निश्चित समय सीमा से कम समय में तथा प्रथम श्रेणी में पास कीं। दो या तीन ईनाम भी जीते जो पचास पौंड के थे और वे छः महीने पहले ही घर लौट कर आ सके।15
वल्लभ भाई की यह उपलब्धि आश्चर्यजनक लगती है, क्योंकि उनकी शिक्षा प्राप्त करने इच्छा-शक्ति आत्मविश्वास और आत्मनिर्णय बिना काॅलेज या विश्वविद्यालयों में ही उन्हें प्राप्त हुई थी। ऐसा बालक जिसके स्कूल जाने की उम्मीद नहीं थी, इंग्लैण्ड जाकर वकालत पास करना और बैरिस्टर बनना उस समय विस्मयकारी था। घर लौटते समय उन्होंने इंग्लैण्ड, आयरलैण्ड तथा स्काटलैण्ड देखा, जिससे उन्हें स्वस्थ लाभ भी मिला अब उनकी इंग्लैड में कोई रुचि नहीं थी और ना ही वे दोबारा आना चाहते थे।16 उनके स्वभाव में या आदतों में लंदन कोई परिवर्तन न ला सका था उनके विचार, उनके सपने थे, पहनावा अवश्य बदला था। वकालत के साथ उन्होंने बहुत कुछ सीखा था वल्लभ भाई बैरिस्टर बन चुके थे जो उनके जीवन की एकमात्र महत्त्वाकांक्षा थी। इसके बाद वे अभिजात्य वर्गीय जीवन स्तर के स्वामी बन गये।
इग्लैंण्ड से वापस होने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में अपनी प्रैक्टीस आरम्भ की। उन्हें वहाँ अपनी प्रैक्टिस जमाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा उनकी तीन वर्ष की अनुपस्थिति किसी भी चीज में बदलाव नहीं ला सकी थी। वल्लभ भाई भी वैसे ही थे और कोर्ट तो भारत में ही था, वल्लभ भाई का आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया था, वह जो भी चाहते थे, वह कर लेंगे यह बात उनकी बोलचाल और चाल-चलन के ढंग में स्पष्ट नजर आती थी। जिस जीवन स्तर के उन्होंने स्वप्न देखें थे, उसे वे प्राप्त कर चुके थे। सारे जूनियर बार में वे आकर्षण का केन्द्र बने हुये थे, उन्होंने स्वयं को दूसरों से अलग और खास सिद्ध कर दिया था। स्वयं से ऊपर अंगरेज अधिकारियों व पुलिस वालों को कभी अपनी सीमा से परे नहीं जाने देते थे और ना ही स्वयं अपनी मर्यादा छोड़ते थे। किस समय कौन सी बात किस प्रकार कही जायेगी उसका अंतर वे भलीभांति समझते थे। उनके मस्तिष्क में अंगरेज सरकार के लिये, जो झूठी और अत्याचारी साबित हुई थी, के लिये उनके मन में कोई सम्मान नही था और ऐसी झूठी सरकार से झूठ बोलकर अपने लोगों को बचाना वे गलत नहीं समझते थे।17
ज्यादातर अभियुक्त और अपराधी कहे जाने वाले लोग निर्दोष होते थे। अपने बारे में बताते हुये उन्होंने कहा एक सैशन जज के यहां दो भाईयों को मुकद्मा खून का दोषी था, जमानत की अर्जी इसलिये रद्द कर दी गई क्योंकि पुलिस अधिकारियों ने अपने पक्ष में यह सफाई दी थी वे दोनों खेड़ा जिले के हैं और क्रूर अपराधी हैं अगर इन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया तो वे सारे प्रमाणों को खत्म कर देंगे।18 वल्लभ भाई स्वयं खेड़ा जिले के थे, उन्हें यह बात अपमानजनक लगी क्योंकि वे जानते थे कि यह सत्य नहीं है, इसके अतिरिक्त उन्हें पता चला कि स्वयं पुलिस अधिकारियों द्वारा दोनों भाईयों की स्थिति अपमानजनक बना दी गई है।
वल्लभ भाई ने दोनों भाईयों की एप्लीकेशन तैयार की और उसे बहुत ही गुस्से में प्रस्तुत किया। उनका प्रस्तुतीकरण इतना उग्र था कि जज और पुलिस अधिकारियों को इस बात का अंदाजा हो गया कि खेड़ावासी कैसे होते हैं। यह सारी बाते बहुत से वकीलों के सामने हुई थी, जब वल्लभ भाई पुलिस अधिकारी से जिरह कर रहे थे, तो वह पुलिस अधिकारी ठीक से जवाब नहीं दे पाया, जज ने अदालत को आधे घंटे के लिये बर्खास्त करते हुये कहा आप कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गये थे। सियासतदार से अपने कागज ले लें। आधे घंटे बाद उन भाईयों की जमानत हो गई थी।19
इस प्रकार वे सत्य के प्रति उग्र भी हो जाते थे और लोगों के साथ न्याय करने पर अंगरेज सरकार तक को विवश कर दिया था।
सन् 1917-18 तक वल्लभ भाई अहमदाबाद हाईकोर्ट के सबसे महंगे वकीलों में से एक थे उस समय अहमदाबाद में पांच या छः बेरिस्टर थे।20 परन्तु वल्लभ भाई के पास गरीब किसानों और मासूम निर्दोष लोगों के लिये सदैव समय और दया का भण्डार रहा। उनके भारत आने के कुछ समय बाद ही विठ्ठल भाई पटेल, विधायिका के सदस्य बन चुके थे, समाज सेवा करते हुये देष सेवा में लगना चाहते थे, जबकि वल्लभ भाई पूरी तल्लीनता से वकालत में लगे रहे। विठ्ठल भाई ने वल्लभ भाई से कहा- ’वल्लभ मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ, अतः मुझको राष्ट्र सेवा करने दो! तुम परिवार संभालों।’21
इस प्रकार हम देखते हैं कि वल्लभ भाई का व्यक्तित्व उच्च आदर्शों से परिपूर्ण था, उनमें राष्ट्र प्रेम कूट कूट कर भरा था। सत्य और निष्ठा के लिए परिवार के दर्द को भी छिपा लेते हैं।
संदर्भ ग्रंथ सूची –
1. सरदार वल्लभ भाई पटेल व्यक्तित्व एवं विचार – डाॅ. एन.सी. मेहरोत्रा एवं डाॅ. रंजना कपूर पृ. 13
2. सरदार पटेल एक शासक के रूप में – बी.के. आहलूवालिया एवं शशि  आहलूवालिया, पृ. 2
3. सरदार की आत्मीयता – डी.बी. ताहेमानकर, पृ. 34
4. सरदार की आत्मीयता – छगनलाल जोशी, पृ. 16
5. बी.के. आहलूवालिया एवं शशि  आहलूवालिया, पृ. 3
6. सरदार और उसकी सत्यता – टी. आर. देवगिरीकर, पृ. 25
7. सरदार पटेल भाग एक – डाॅ. एन. पारिख, पृ. 33
8. हिन्द के सरदार – रावजी भाई पटेल, पृ. 29
9. सरदार पटेल –  एल.एन. साारीन, पृ. 35
10. सरदार की आत्मीयता – छगनलाल जोशी, पृ. 18
11. सरदार की आत्मीयता – डी.बी. ताहेमानकर, पृ. 41
12. सरदार पटेल एक शासक के रूप में – बी.के. आहलूवालिया एवं शशि आहलूवालिया, पृ. 4
13. वही पृ. 4
14. सरदार की आत्मीयता – छगनलाल जोशी, पृ. 18
15. वर्मा विरेन्द्र, पृ. 15
16. वही पृ. 16
17. सरदार की आत्मीयता – छगनलाल जोशी, पृ. 19
18. वर्मा विरेन्द्र, पृ. 19
19. सरदार पटेल एक शासक के रूप में – बी.के. आहलूवालिया एवं शशि आहलूवालिया, पृ. 7
20. सरदार की आत्मीयता – डी.बी. ताहेमानकर, पृ. 46
21. सरदार पटेल –  एल.एन. साारीन, पृ. 40
22.वर्मा विरेन्द्र, पृ. 25

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