राम चरित मानस में कथा का प्रवाह संवाद में निहित है यथा- शिव-पार्वती संवाद, भारद्वाज-याज्ञवल्क्य संवाद, परशुराम-लक्ष्मण संवाद इत्यादि। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण संवाद है – कागभुशुण्डि-गरुड़ संवाद। भुशुण्डि रामायण का तुलसी दास जी ने अवश्य ही अध्ययन किया होगा क्योंकि वे मानस में इसका व्यवस्थित प्रयोग करते हैं । इन्हीं संदर्भों में यह अत्यंत शोधपरक एवं महत्वपूर्ण लेख पाठकों को समर्पित है लेखक

कागभुशुण्डि का सर्वप्रथम उल्लेख योगवासिष्ठ रामायण में मिलता है । योगवाशिष्ठ रामायण का रचनाकाल 1100 ई. से 1250 ई. के बीच माना गया है । इस ग्रंथ के अंतिम प्रकरण सर्ग  14 -24 में कागभुशुण्डि  के जन्म की कथा दी है। इनके पिता चंड नामक काक थे जो अलवंसा देवी के वाहन थे। इनके 21 भाई थे। इनकी माताएं  ब्राह्मी भगवती के रथ की हंसिनी  थी। फिर ये सुमेरु पर्वत पर निवास करने चले गए। उनके सभी भाई मर गए और यह जीवित रहे । यद्यपि योगवशिष्ठ में कागभुशुण्डि का रामकथा से कोई संबंध नहीं है किन्तु अन्यान्य संदर्भों में योगवशिष्ठ रामायण के सूत्र प्रासंगिक हैं ।
भुशुण्डि रामायण को आदिरामायण का पूर्वखंड भी माना जाता है क्योंकि इसके सप्तम अध्याय का समापन इस तरह है  –
आदि रामायणं नाम श्री रामचरितं शुभम ।
आदि रामायणं दिव्यं ब्राह्मे कल्पे विनिर्मितम ।।
प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर लिखा है –
इति श्रीमदादिरामायणे ब्रह्माभुषुण्ड संवादे ।।
राम नवरत्नसार संग्रह में भुशुण्डि रामायण  से उद्धृत संदर्भ किया गया है । इसके रचयिता रामचरण दास जी  हैं । रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास में लिखा है कि रामचरण दास जी ने अपने महन्त  की पुष्टि के लिए अनेक नवीन कल्पित ग्रंथ प्राचीन बताकर अपनी शाखा में फैलाए । जैसे – लोमशसंहिता, अमर रामायण, भुशुण्डि रामायण, महारामायण, कौशल खंड, महारासोत्सव ।
कागभुशुण्डि रामायण में मथुरा के तीर्थों का विस्तार से वर्णन किया गया है ।  यह तुलसी दास से पूर्व की रचना है और मानस पर इसका स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है ।
भुशुण्डि रामायण पौराणिक पद्धति की रचना है जिसमें चार अध्यायों को पूर्वखंड, दक्षिणखंड, पष्चिमखंड एवं उत्तरखंड नाम दिया गया है। भुशुण्डि रामायण का संबंध अयोध्या में  विशिष्टाद्वैत सिद्धांत से पोषित श्रीसंप्रदाय तथा श्रीसम्प्रदाय से है  ।
कागभुशुण्डि के चरित्र का मानस में तुलसीदास ने विस्तार से वर्णित किया है। पूर्व जन्म के किसी कल्प में वह अयोध्यावासी शूद्र था।  उज्जैन में जीविकोपार्जन हेतु जाना हुआ । वह वहां शिवभक्त हो गया। गुरु का सम्मान न करने से वह शापवष सर्प हो गया । शापमुक्ति पश्चात ब्राहमण कुल में जन्म लेकर वह लोमश ऋषि का षिष्य हुआ। जिनसे पुनः सगुण निर्गुण विवाद पर लोमश ऋषि ने चांडाल का काक योनि में जाने का शाप दे दिया। तबसे भुषुण्ड जी कागभुशुण्डि  बन गए।  राम के नारायणत्व पर संदेह होने पर राम ने भुशुण्डि को पकड़ना चाहा। भुशुण्डि भागे।  वे आकाश में उड़ते हुए राम की भुजाओं को अपने निकट ही देखते रहे।  तब उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिए। उन्होंने अपने को अयोध्या में राम के समक्ष पाया।  भुशुण्डि ने राम के मुख में प्रवेश कर राम के शरीर में ब्रह्मांड के दर्शन कर अपने को मोहान्धकार को दूर किया ।
मानस के अनुसार सर्वप्रथम शिवजी ने मानस की रचनाकर अपने मानस में रखा और योग्य पात्र जानकर लोमश ऋषि को सुनाया । लोमष ने कागभुशुण्डि को सुनाया।  शिव पार्वती संवाद के अनुसार कागभुशुण्डि ने जो कथा गरुड़ को सुनाई वह शिवजी ने ही हंस रूप धारण कर सुनी थी और वही कथा पार्वती जी को सुना रहे हैं। अतः वास्तव में मानस के चार घाट यह चार संवाद है । शिव – लोमष ऋषि, लोमष ऋषि – कागभुशुण्डि, कागभुशुण्डि – गरुड़ और शिव-पार्वती। भुशुण्डि रामायण में कागभुशुण्डि श्रोता के रुप में हैं। काल की बहन कालकण्टकी  इनकी माता और सूर्य इनके पिता हैं। इन्होंने पक्षी रूप में जन्म लिया था। ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर इसने विष्णु वाहन गरुड़ को पराजित किया था। फिर वह  अत्याचार करने लगा। देवताओं ने ब्रह्माजी से रक्षा की प्रार्थना की तब ब्रह्मा ने स्वयं भुशुण्डि के पास जाकर उसे समझाया और प्रसंग वश राम की कथा जिसे आदि रामायण कहा जाता है कही । राम की कथा से भुशुण्डि इतने प्रभावित हुए कि वे राम के बड़े भक्त बन गए।
यह ग्रन्थ अप्राप्य है।  संस्कृत के इस विशाल ग्रन्थ की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
(1) श्रीराम-जन्म मुहूर्त तथा रामनवमी-जानकीनवमी पर्व मनाने का विधिवत् वर्णन मिलता है । इसके अतिरिक्त अयोध्या, प्रमोदवनधाम, मन्दाकिनी, यमुना व सरयू नदी की उत्पत्ति तथा सरयू माहात्म्य का वर्णन किया गया है।
(2) सेतु निर्माण, सेतु पार कर लंका पहुँचना, अंगद का दूत रूप में लँका आगमन, मेघनाद से प्रथम युद्ध व राम-लक्ष्मण का नागपाश में बँधना, कुम्भकर्ण वध, मेघनाद वध, राम-रावण युद्धावधि, रावण वध, विभीषण राज्याभिषेक, राम का अयोध्याप्रस्थान, भरत से मिलन, राज्याभिषेक व अयोध्या प्रवेश, जानकी-गर्भाधारण, सीतावनगमन, इत्यादि महत्वपूर्ण घटनाओं का तिथि वार वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
(3) भुशुण्डि रामायण में भगवान् राम के बालचरित्न का अद्भूत वर्णन है। रावण से कुमारों की रक्षा हेतु दशरथ द्वारा उन्हें सरयू पर गोप प्रदेश भेजा जाता है। वहाँ श्रीराम ने पूतना व विकटासुर वध, कौसल्या को विश्वरूपदर्शन, माखनलीला, वत्सचारणलीला एवं सीता व गोपियों संग दिव्य-रास लीलाएँ कीं।
(4) भुशुण्डि रामायण में ब्रह्म राम द्वारा गोपियों को दिये गये भक्ति ज्ञानोपदेश का वर्णन हैजिसे रामगीता कहा जाता है । रामगीता के इन तत्वपूर्ण उपदेशों से गोपियों के मानस नेत्र खुल गये और भावी वियोग से उत्पन्न उनकी चिन्ता दूर हो गयी। साथ ही ग्रन्थ में श्री रामचन्द्र जी, सीताजी, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न तथा सरयू नदी के सहस्त्र नामों का वर्णन भी दिया गया है।
(5) दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र राम पर शासन का भार सौंपकर अपने प्रियजनों की एक विशाल मण्डली के साथ सप्तद्वीपस्थ तीर्थों का दर्शन करने के लिए कैकेयी सहित जाते हैं । काशी, प्रयाग, बदरी-केदारनाथ बृज प्रदेश में वे राम द्वारा कृष्णावतार में की गयी समस्त मधुर लीलाओं का श्रवण करते हैं ।
(6) भरत श्रीराम की पादुकाओं को लाकर सिंहासनारूढ़ करके स्वयं नन्दिग्राम में तपोमय जीवन व्यतीत करने लगते हैं। भरत ने रामपादुका-शासनकाल में निर्विघ्न तथा कल्याणकारी शासन-संचालन का कार्य किया।
(7) गरुड़ और कागभुशुण्डि का यह प्रसंग अपनी पूर्णता न पा सकेगा यदि इसमें उन प्रश्नों को समाहित न किया जाए जो गरुड़ ने भुशुण्डि महाराज से किए । इस प्रसंग को मानस में तुलसी दास ने विस्तार दिया है । सात प्रश्नों के उत्तर जो भुशुण्डि रामायण का सार हैं ।
1- सबसे दुर्लभ शरीर कौन सा है?
2- सबसे बड़ा दुख कौन सा है?
3- सबसे बड़ा सुख कौन सा है?
4- संत और असंत का मर्म कौन सया है?
5- सबसे महान पुण्य कौन सा है?
6- सबसे भयानक पाप कौन सा है?
7- मानस के कौन से रोग हैं?
कागभुशुण्डि ने इनके उत्तर दिये – मनुष्य का शरीर प्राप्त करना सबसे दुर्लभ है। सभी चराचर इसके लिए याचना करते हैं। ज्ञान भक्ति और वैराग्य को देने वाला तथा स्वर्ग, नर्क ओर मोक्ष का मार्ग बताने वाला मनुष्य का शरीर ही है। दरिद्रता के समान दुख और संतों के मिलने के समान कोई सुख नहीं है। वचन मन और शरीर से परोपकार करना संतों का स्वभाव है। संत दूसरों की भलाई के लिए दुख सहते रहते हैं तो असंत दूसरों को दुख पहुँचाने के लिए। दुष्ट लोग बिना किसी स्वार्थ के भी अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं। वे पराई संपत्ति का नाश करके  स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं। जैसे खेती का नाश करके ओले स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं। संतों का उदय सूर्य और चंद्र की भाँति सदैव सुखकर होता है। वेदों में अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म और पर-निंदा को सबसे बड़ा पाप माना गया है ।
कागभुशुण्डि गरुड़ को मानस रोगों के बारे में समझाते हैं सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उस व्याधि से फिर अनेक कंटक जन्म लेते हैं। काम वात है और लोभ अपार कफ है  और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है। तीनों (वात  पित्त  और कफ़) मिलकर सन्निपात रोग को जन्म देते हैं ।
काम वात कफ लोभ अपरा, क्रोध पित्त नित छाती जातरा ।
ममता दादु कंडु इरषाई  हरष विषाद गरह बहुताई ।।
ममता दाद है, ईर्ष्या खुजली है, हर्ष और विषाद गले के रोगों की अधिकता है। पराए सुख को देखकर जो जलन होती हे वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है ।
परदुख देखि जरनि सोइ छई , कुष्ट दुष्टता मन कुटलई ।।
अहंकार अत्यंत दुख देने वाला डमरु रोग है । दंभ कपट मद और मान नहरुआ ( नसों का) रोग है । तृष्णा  उदरवृद्धि रोग है। और तीन प्रबल इच्छाएं (पुत्र , धन और मान) तिजारी ( हर तीसरे दिन आने वाला बुखार) है। मत्सर (द्वैष) और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं ।
नियम , धर्म आचार तप ज्ञान यज्ञ जप दान आदि औषधियाँ भी इन रोगों को पूर्णतः ठीक नहीं कर पाती  किंतु ‘ राम कृपा नासहिं सब रागा ’।  रामजी की कृपा से सब रोग नष्ट हो जाते हैं ।
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अयोध्या का राजा बनने के बाद राम और सीता सुखपूर्वक दिन व्यतीत कर रहे थे । एक दिन राम ने सीता से पूछा -तुम्हारे मन में कोई इच्छा है तो कहो । सीता ने कहा- मैं वन में रहने वाले मुनियों की स्त्रियों की दरिद्रता से दुखी हूँ । उन्हें भोजन वस्त्र आदि सामग्री भेंट देना चाहती हूँ ।
राम की अनुमति के बाद सीता ऋषि मुनियों के आश्रम में उनकी तपस्विनी पत्नी के पास पहुंची । उन स्त्रियों ने आग्रह किया कि सीता कुछ दिन उनके साथ रहे और यह भी कि  बहुत इच्छा है यहीं रहकर वे अत्यंत शक्तिशाली संतान को जन्म दें।  सीता उनके आग्रह पर कुछ दिनों के लिए रुक गई ।
वहीं एक तापसी के मुख से एक  दिन सीता ने प्रवाद सुना कि राम ने सीता का त्याग कर दिया है । रावण के यहाँ स्पष्टतः  कामवष रखी गई स्त्री को राम ने कैसे स्वीकारा ? यह लोक में उपहास का विषय बना हुआ है । सीता यह सुनकर बहुत दुखी हुई और पुनः अग्नि परीक्षा के लिए प्रेरित हुई । तभी वाल्मीकि ने आकर उन्हें समझाया और उन्हें अपने साथ अपने आश्रम ले गए। वाल्मीकि आश्रम में सीता के लव और कुश दो पुत्र हुए।  भुशुण्डि रामायण के अनुसार अपने स्वर्गारोहण के पूर्व राम ने अयोध्या के चक्रवर्ती साम्राज्य को अपने तथा भाइयों के पुत्रों में बाँट दिया। लव और कुश को क्रमशः  कुशावली और अवंति का राज्य मिला।  लक्ष्मण के पुत्रों को कारापथ, भरत के पुत्र पुष्कर को पुष्करावती और शत्रुघ्न के पुत्रों को मथुरा का राजा बनाया ।
भुशुण्डि रामायण के अनुसार राम कथा की वाचन प्रक्रिया अलग है । ब्रह्माजी भुशुण्डि को कहते हैं कि सर्वप्रथम यह कथा प्रमोदवन में राम ने सीता को , फिर सीता ने लक्ष्मण को और लक्ष्मण ने भरत को सुनाई। हनुमान ने यह कथा स्वयं राम के मुंह से सुनी। पुनः हयग्रीव ने अगस्त्य को यह कथा सुनाई। उन्हीं से सुनकर  ब्रह्मा जी ने भुशुण्डि के समक्ष इस कथा का वाचन किया । सत्योपख्यान  के अनुसार राम को ष्षष्कुली (पूरी पकवान) खाते हुए कागभुशुण्डिको राम के  नारायण होने में संदेह होने लगता है और वे परीक्षार्थ राम के हाथ से शष्कुली लेकर भागते हैं परंतु राम की भुजा उनका पीछा करती है। राम चरित मानस में यह प्रसंग कुछ इस प्रकार है-
सप्तावरन भेद करि  जहाँ लगै गति मोरि ।
गयउ तहाँ प्रभु निरख व्याकुल भयउ बहोरि ।।  (मानस 7/79 )
भयभीत होकर उन्होंने आंखें बंद कर लीं और अपने को अयोध्या में पाया । भुशुण्डि ने राम के मुख में प्रविष्ट होकर भीतर बहुत से ब्रह्मांड देखे । इस तरह उनका मोह भंग हुआ । राम चरित मानस के उत्तरकांड में कागभुशुण्डि की कथा में उनका परिचय मिलता है।  मेघनाद ने युद्ध में जब राम को नागपाश में बांध लिया तब देवर्षि नारद के कहने पर सर्पभक्षी गरुड़ ने  राम को मुक्त तो करा दिया किंतु राम के भ्रम होने पर संदेह हुआ ।  नारद ने शंका समाधान हेतु उन्हें ब्रह्मा के पास, ब्रह्मा ने शंकर के पास तो फिर शंकर ने कागभुशुण्डि के पास भेजा । कागभुशुण्डि ने गरुड़ को रामकथा सुनाकर संतुष्ट किया । उन्होंने अपनी कथा सुनाते हुए कहा कि वे पूर्व में एक शूद्र परिवार में जन्मे थे ।  गुरु का निरादर करने पर शिव ने सर्प योनि में भेज दिया ।  उसके बाद अनेक योनियों में जन्मा ।  अंतिम शरीर उसने ब्राह्मण का पाया ।  तब ज्ञान प्राप्ति के लिए वह लोमश ऋषि के पास पहुंचा किंतु स्वभाव से कुतर्की वहाँ  भी चूक गया और गुरु से विवाद कर बैठा । लोमश ऋषि ने उसे चांडाल पक्षी (कौवा) बनने का श्राप दिया किंतु फिर ऋषि ने उसे अपने पास बुलाकर राम मंत्र दिया, इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। राम मंत्र मिलने पर वे कौए  के शरीर में ही प्रभु भक्ति में रम गए और काग भुशुण्डि के नाम से विख्यात हुए ।
भुशुण्डि रामायण में रामकथा के अनेक रोचक एवं नवीन तत्व मिलते हैं। पूर्वखंड में श्रीराम के जन्म, मास, पक्ष, तिथि और नक्षत्र वर्णन सहित योग का उल्लेख है ।  वाल्मीकि रामायण में यह उपलब्ध नहीं । उत्तरखंड में रामनवमी, जानकी-नवमी पर्व , व्रत अनुष्ठान की महिमा का विधिवत वर्णन है।  इसके अतिरिक्त अयोध्या , प्रमोदवनधाम ,मंदाकिनी, यमुना व सरयू नदी की उत्पत्ति तथा सरयू महात्म्य  का भी वर्णन है ।  भुशुण्डि रामायण में सेतुनिर्माण ,लंका पहुंचना,  मेघनाद युद्ध , राम लक्ष्मण को नागपाश में बांधना , कुभकर्ण वध , मेघनाद वध , राम-रावण युद्धावधि , रावण वध , विभीषण राज्याभिषेक , राम का अयोध्या प्रस्थान , राज्याभिषेक आदि महत्वपूर्ण घटनाओं  का  तिथि-वार वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
दशरथ की तीर्थयात्रा का वर्णन प्रथम बार इसी रामायण में प्राप्त होता है । राम की बाल लीलाओं का सुंदर रोचक वर्णन जैसा भुशुण्डि रामायण में है वैसा वाल्मीकि रामायण  में भी नहीं है । रावण से रक्षार्थ चारों बालकों को गोप प्रदेश भेजा जाना,  पूतना वध, विकटासुर वध , कौशल्या को विश्वरूप दर्शन तथा गोपियों के साथ रासलीला का दिव्य वर्णन है ।  गोपियों को भक्ति ज्ञानोपदेश  के साथ राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न सीता और सरयू नदी के सहस्त्र नामों का वर्णन भी इसमें है । मानस पीयूष के अनुसार कागभुशुण्डि जी का निवास स्थान उत्तर दिशा में अवस्थित किंपुरुषवर्ष के उत्तर में हरिवर्ष, उसके उत्तर में इलावृत्तवर्ष है। इलावृत्तवर्ष के बाद रम्यकवर्ष पड़ता है । इसकी सीमा पर नीलगिरी है। वहीं ये कागभुशुण्डि  निवास करते थे। (पृथ्वी के केंद्र में स्थित द्वीप को जम्बूद्वीप कहा गया है। इनके अलग-अलग वर्ष , वर्ण , उपद्वीप , समुद्र तथा देव होते हैं। किंपुरुषवर्ष के स्वामी हनुमान हैं। रम्यकवर्ष के अधिपति मनु  हैं, जहां मत्स्य की पूजा होती है। हरिवर्ष में प्रहलाद रहते हैं जहाँ नरसिंह पूजा होती है।)
भुशुण्डि रामायण की हस्तलिखित प्रतियों में इसे आदि रामायण तथा ब्रह्मरामायण भी कहा गया है । किंतु उनका साम्य मेल नहीं खाता। इसके रचनाकार का नाम भी स्पष्ट नहीं है। भक्ति की धारा में प्रवहमान कथा वाचकों ने जिस प्रकार वाल्मीकि, व्यास अथवा शुकदेव के नाम पर अपनी काव्य प्रतिभा को समर्पित कर दिया उसी प्रकार भुशुण्डि रामायण के रचनाकार का नाम भी उसी दिव्य आलोक में स्थापित हो गया। भुशुण्डि रामायण का मूल स्वर प्रायः श्रृंगारी रामोपासना ही लक्षित होता है ।
भुशुण्डि रामायण के चारों खंडों के प्रत्येक अध्याय के अंत में लिखा है – इतिश्रीमदादिरामायणे ब्रह्मभुषुण्डसंवादे। (स्पष्ट है कि वक्ता ब्रह्म है न कि ब्रह्मा।)
दशरथ की तीर्थयात्रा के प्रसंग में मथुरा के तीथों्र का वर्णन अत्यंत विस्तार के साथ मिलता है। वशिष्ठ मुनि ने भुशुण्डि रामायण में 522 श्लोकों में मथुरा के तीर्थों का उल्लेख किया है । इससे यह अनुमान भी लगाया जाता है  कि इस रामायण का रचयिता निश्चय ही कोई मथुरा वासी रहा होगा । मानस सहित  परवर्ती रामायणों में जिस प्रकार भुशुण्डि रामायण का प्रभाव देखा जाता है उससे इसका रचनाकाल 1100 ई माना जाता है किंतु आधुनिक लिपि की हस्तलिखित पोथियां  तथा उल्लिखित ज्योतिष गणना में अनुरूपता न होने के कारण और अयोध्या की प्रति पूजा स्थल से प्राप्त होने से यह एक अर्वाचीन रचना होने का अंदेषा होता है। विद्वानों का एक मत यह भी है कि भुशुण्डि रामायण के रचयिता महंत युगलयानन्यषरण हैं ।
राम को मनाने आए भरत को समझाते हुए वशिष्ठ ने व्यवस्था दी कि राम अपनी पादुकाएं भरत को देदें । भरत ने नन्दिग्राम में कुटी में सिंहासन पर राम की पादुकाओं को प्रतिष्ठित किया तथा छत्र – चामर -व्यंजनादि से उनकी पंचकाल सेवा में रहने लगे । (पंचकाल अर्थात – उषा , प्रभात , मध्यान्ह, गोधूली एवं संध्या ) प्रजा के सारे महत्वपूर्ण आवेदन पादुकाओंकी सेवा में निवेदित होते थे। संदिग्ध विषयों पर आकाशवाणी से व्यवस्था प्राप्त होती थी। रावण और बाणासुर को यह व्यवस्था ठीक न लगी। उन्होंने वेश बदलकर रात्रि में पादुकाओं के हरण के असफल प्रयास भी किए ।
राम को मनाने के लिए नन्दिग्राम के गोप गोपिकाएं सुखित और मांगल्या के साथ चित्रकूट आए । स्फटिक षिला पर सीता, सहजा और राम की अन्तरंग लीलाएं चलती रहीं । इसी कारण चित्रकूट की गणना राम के तीन प्रमुख विहार-स्थलों में होने लगी । राम की रासलीला के तीन केंद्र हैं – प्रमोदवन महारास, चित्रकूट मध्यरास और लंका अधमरास के स्थल हैं ।
भुशुण्डि रामायण के अनुसार राम ने पंचवटी में ही कुटी बनाकर चौदह वर्ष के वनवास का साढ़े बारह वर्ष का समय वहीं व्यतीत किया। जबकि अन्य रामायण यह संकेत देती हैं कि राम का निवास 10 वर्ष तक चित्रकूट में ही रहा । लक्ष्मण रेखा खींचे जाने का प्रसंग प्रथम बार भुशुण्डि रामायण में ही मिलता है ।
बाली वध के लिए सुग्रीव द्वारा राम की दो परीक्षा ली जाती हैं। पहली – सात ताड़ के वृक्षों को एक ही बाण से भेदना और दूसरा – दुंदुभि नामक दैत्य के अस्थियों के ढेर को राम के द्वारा उठाकर आकाश में फेंक देना । बाली का वध करने पर बाली राम से कारण पूछता है तब राम कहते हैं – मेरी पत्नी सीता को रावण हर कर ले गया है । उसकी खोज के लिए योग्य सहायक सुग्रीव से मित्रता की । बाली ने कहा – इतने छोटे से कार्य के लिए आपने सुग्रीव के साथ मिलकर मेरा वध किया । मुझे आज्ञा दी होती तो उसे अनायास ही पकड़ लाता । मैं उसे अपनी काँख में पकड़कर स्त्रियों के मनोरंजन के लिए यहाँ ला चुका हूं।
लँका जाने का सेतु निर्माण नल एवं नील वानरों ने किया । यह सेतु भुशुण्डि रामायण के अनुसार मात्र चार दिनों में तैयार हुआ। पौष माह कृष्ण 10 से कृष्ण 13 तक। तीन दिवस में 18 महापद्यसेना सेतु से पार हुई। लँका के निकट सेबल पर्वत पर पड़ाव बनाकर आठ दिनों तक लँका को घेरा गया ।
सुग्रीव ने बातों बातों में राम से पूछा – हे प्रभु , आपने लंका को जीतने के पूर्व ही विभीषण को लंका का राजा घोषित कर दिया है । यदि रावण आकर क्षमा मांग ले तो आप विभीषण से की गई अपनी प्रतिज्ञा का निर्वहन कैसे करेंगे ? राम ने निभ्रान्त भाव से कहा – मैं उसे अयोध्या का राज्य दे दूगा ।
 मेघनाद के वध के उपरांत सुलोचना विलाप करती हुई उसका शव लेने युद्धभूमि में गई तो राम ने दयार्द्र होकर उसके पति को जीवित करने की इच्छा व्यक्त की किंतु सुलोचना ने इसे अस्वीकार करते हुए उसका असुर भाव दूर कर दास्य भक्ति की प्रार्थना की और अपने पति मेघनाद का शव लेकर सती हो गई । सीता की अमृतवर्षिणीदृष्टि से युद्ध में मारे गए सारे वानर जीवित हो गए। सीता ने अशोक वाटिका में अपनी अनन्य सखी और प्राण रक्षिका त्रिजटा को राम से मिलवाया ।
राम की प्रतिभा से पूरा राज्य ही प्रभावित था । योग्य उत्तराधिकारी के राज्याभिषेक के लिए दषरथ ने अपने मंत्रिमंडल के समक्ष दो प्रस्ताव रखे । पहला – सारा राज्य चार पुत्रों में बराबर बराबर बाँट दिया जाए। तथा दूसरा – कौशल राज्य की अखण्ता रक्षित करने के लिए पूरा दायित्व राम को सौंपा जाए। सभी मंत्रियों एवं उपस्थितों ने एक मत से दूसरे मत का अनुमोदन किया ।
रामकथा के पात्रों में सहजा नाम कहीं नहीं मिलता । भुशुण्डिरामायण में सीता की तरह सहजा को भी राम की स्वरुप शक्ति माना गया है। भुशुण्डि रामायण में सीता को मर्यादा शक्ति और सहजा को प्रेमाशक्ति की संज्ञा दी है। अयोध्या के निकटवर्ती ब्रज प्रदेश के निवास नन्दनगोप और राजनी की पुत्री सहजा हैं। सहजा के पति का नाम कुशलगोप है। राम के प्रति अलौकिक अनुराग की दृष्टि से सहजा और राम का वही सम्बन्ध है जो राधा और कृष्ण का है ।
सहजा जानकी सीता मोदिनी राधिका रमा ।
आनन्दिनी परालीला ललना लास्यकारिणी ।। (भु रामायण पूर्व – 48/22)
भुशुण्डि ने पूछा – राम के बलदेव , कृष्ण आदि अनेक रुप हैं । मुख्य रुप कौन सा है ? ब्रह्मा ने कहा -सारे रुप राम के ही हैं । ऐसी ही जिज्ञासा हनुमान से गरुड़ ने की थी । हनुमान ने गरुड़ को अयोध्या बुलाकर राम के दर्शन कराए तब राम ने अयोध्या के उत्तर द्वार पर सरयू के दोनों तटों पर गरुड़ को स्थान दिया और कहा कि यहाँ शरीर त्याग करने वालों को स्वर्ग ले जाने का कार्य गरुड़ ही करेंगे ।
भुशुण्डि रामायण में लक्ष्मण के सहस्त्रनाम का उल्लेख करते हुए उन्हें खेचरी विद्या का ज्ञाता कहा गया है ।
अमंदो मदनोन्मादी महायोगी महासनाः  ।
खेचरी सिद्धिदाता च योगविद् योगपारगः ।।  (पूर्वखंड-54/18)
खेचरी मुद्रा की  साधना के लिए हठयोगीजीभ को लम्बी करते हैं । जीभ के नीचे वाली पतली त्वचा को काटकर अधिक पीडे तक मुड़ सकने योग्य बनाया जाता है । सर्वसाधारण के लिए यह सिद्धि संभव नहीं । लक्ष्मण को यह सिद्धि थी । देवी भागवतपुराण में महाशक्ति को भी खेचरी मुद्रा में बताया गया है ।
तालुस्था त्वं सदाधारा विंदुस्था दुमालिनी ।
मूले कुण्डली शक्तिव्र्यापिनी  केशमूलगा ।। ( देवी भागवत)
                                                          
निदेशक रामायण केन्द्र, भोपाल (भारत) एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी, तीर्थस्थान एवं मेला प्राधिकरण, म.प्र.शासन. संपर्क - 7974004023

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