बनारस हिन्दी का गढ़ है। रामानन्द, कबीर, तुलसी, भारतेन्दु, देवकीनन्दन खत्री, प्रेमचंद, प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, धूमिल, शिवप्रसाद सिंह, अब्दुल बिस्मिल्लाह, और इस ज़माने के हजारों छोटे-बड़े साहित्यकारों ने इस शहर की हवाओं में सांस लेकर, यहाँ का गंगा-जल पीकर, यहाँ के जीवन्त, अलमस्ती भरे वातावरण से जीवनी शक्ति ग्रहण कर हिन्दी की जड़ों को सींचा है, उसे उस मुक़ाम पर पहुँचाया है, जहाँ आज वह है।
ऐसे बनारस में कल-परसों, यानी 13-14 नवम्बर 2021 को हिन्दी की चिन्ता की जाएगी, उसके भूत, वर्तमान और भविष्य पर विचार किया जाएगा। यह विचार कितना सार्थक और संगत होगा, यह तो समय बताएगा। किन्तु एक बात लगभग तय है। यह समस्त आयोजन किसी राजनीतिक मेले की तरह सम्पन्न होगा, और इसमें हिन्दी के वे तमाम सरोकार शायद ही उभर कर सामने आएँगे, जिनसे वह विगत कुछ दशकों से जूझती चली आ रही है।
आज सुबह दाढ़ी बनाने के लिए उस्तरे में ब्लेड लगा रहा था तभी एक बहुत पुरानी बात याद हो आयी। सन उनहत्तर से पहले अपने शैशव और बाल्य-काल में जब मैं आज़मगढ़ – मऊ के अपने गाँव में रहता था, तब इसी ब्लेड को हम क्या कहते थे? पत्ती? अंग्रेजी शब्द ‘ब्लेड’ का एक अर्थ पत्ती भी है, किसी वनस्पति की पत्ती। बचपन में जब सरपत (सरकंडा या मूँज) के आसपास से गुज़रते थे तो विशेष सावधान रहने की ज़रूरत पड़ती थी। कारण? उसकी लम्बी-लम्बी पत्तियाँ इतनी धारदार होती थीं कि देह में जहाँ छुआएँ, सप्प से काटकर खून निकाल दें। यही हाल गन्ने के पत्तों का होता है। यदि आप सावधान न हों तो छुआने पर कटना निश्चित है। पत्ती-पत्तों की तीक्ष्ण धार को देखते हुए ही संभवतः अंग्रेजी शब्द ‘ब्लेड’ के समानान्तर हिन्दी में भी ‘पत्ती’ शब्द खूब चला। हमारी पीढ़ी के हिन्दी-भाषी पाठक हमारे इस कथन से सहमत होंगे।
किन्तु इधर कई दशकों से उपर्युक्त अर्थ में ‘पत्ती’ शब्द न किसी ने बोला न किसी ने सुना। और हमें पूरा विश्वास है कि हमारे गाँवों में भी अब शायद ही कोई मनुष्य ब्लेड के लिए ‘पत्ती’ शब्द का प्रयोग करता होगा। ऐसे बहुत-से शब्द हैं, जो अब हमारे दैनंदिन जीवन से पूरी तरह निकल चुके हैं। और वे हमारे जीवन से निकल गये तो इसलिए नहीं कि वे कठिन थे, या भदेस थे, या वे जिस वस्तु अथवा संकल्पना से जुड़े थे वह वस्तु अथवा संकल्पना ही समाप्त अथवा प्रचलनबाह्य हो चली है। आत्म-मंथन करें तो हम पाएँगे कि हमारे सुप्रचलित, सुव्यवहृत हिन्दी शब्द इसलिए हिन्दी-भाषियों के दैनंदिन प्रयोग-क्षेत्र से निकल गये कि अब हम अपनी शब्द-संपदा के प्रति सचेत नहीं रहे, कि हमें अपनी भाषा और उसकी शब्द-संपदा से प्यार नहीं रहा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 में व्यवस्था की गयी थी कि हम हिन्दी का विकास करेंगे। और वह विकास संस्कृत के साथ-साथ हिंदीतर भारतीय भाषाओं से शब्द एवं अन्य भाषिक तत्व ग्रहण करके होगा। हमने शब्दावली-निर्माण और भाषा-शिक्षण की नियोजित विकास-प्रक्रिया अपनायी, किन्तु उसकी स्वाभाविक, सहजात प्रक्रिया की जड़ों को सींचना भूल गये। इसलिए जो हिन्दी हमें सहज ही उपलब्ध थी, हमारे लोक-जीवन में रची-बसी थी, वह धीरे-धीरे प्राण-शून्य होने लगी। और सबसे अधिक दुःख की बात यह है कि इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। इस सम्मेलन में जाएगा, इसकी उम्मीद करें क्या? चलिए, करते हैं। दो दिन बात इसकी मीमांसा करेंगे।
हम अपनी हिंदीतर भाषाओं से शब्द ग्रहण करते तो हिन्दी और भारतीयता का कितना बड़ा लाभ होता, इसे कोई समझ नहीं रहा। मसलन गुजराती में व्यवहृत ‘हाँकना’ क्रिया को लें। वहाँ मोटर-कार, बस आदि ‘ड्राइव’ करने यानी चलाने को आज भी ‘हाँकना’ कहते हैं- गाड़ी धीरे हाँकवा नू (गाड़ी धीरे चलाएँ)। हिन्दी में भी ‘हाँकना’ शब्द प्रचलित रहा है। भैंसों, गायों, बैलों, घोड़ों आदि जानवरों को आज भी हाँका जाता है। ‘गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे’- फिल्म ‘मदर इंडिया’ का यह सुमधुर गीत याद कीजिए, जिसमें गाड़ी हाँकने की बात की गयी है। गाड़ी का स्वरूप बदल गया, अब वह इंजन या मोटर से चलती है। तो भी उसके लिए ‘ड्राइव करना’ जैसे बड़े पदबंध के स्थान पर ‘हाँकना’ शब्द के इस्तेमाल में क्या बाधा है? यह शब्द पहले से प्रचलन में है, हमारा जाना-पहचाना है। लेकिन यह बात हम हिन्दी के विद्वज्जन से कहें तो वे शायद ही इसे स्वीकार करेंगे। शायद हमारे इस आग्रह को किसी दुराग्रही की झख बताते हुए हँसें भी। किन्तु सवाल यह है कि क्या हमें अपनी भाषायी विरासत के लिए आग्रही नहीं होना चाहिए? मेरा आग्रही होना, किसी भाषा-विरोधी के लिए दुराग्रह भी हो सकता है। लेकिन इसमें मेरा क्या दोष?
इसी बनारस शहर के एक टोले में हमारे कुछ नातेदार रहते हैं। नातेदार यानी- रिश्तेदार। उस घर में सात-आठ वर्ष के दो बच्चे कुछ लिखने बैठे। मैं बड़ी जिज्ञासा से उनके संवाद सुन रहा था। दोनों की पेंसिलें तो अलग-अलग थीं, किन्तु रबड़ एक ही था। मेरे इस वाक्य में प्रयुक्त दो अंग्रेजी शब्दों को देखें। ‘पेंसिल’ और ‘रबड़’। बचपन में हम पेंसिल को ‘शलाका’ कहते थे। इतना अच्छा शब्द, सबकी जिह्वा पर चढ़ा शब्द, क्यों लुप्त हो गया? शायद इसलिए कि हम अपनी भाषिक विरासत को सहेजने में असफल रहे। खैर..। हम बात पेंसिल की नहीं, ‘रबड़’ की करना चाहते हैं। वे दोनों बच्चे अपनी कॉपी (पुस्तिका?) में कुछ गलत लिखा मिटाने के लिए जब एक-दूसरे से ‘रबड़’ माँग रहे थे, तो उसे ‘मिट्टन’ कह रहे थे। हो सकता है, उनके पारस्परिक संवाद में यह शब्द विकसित हुआ हो। यह भी संभव है कि बनारस की प्राथमिक शालाओं में ‘इरेजर’ को ‘मिट्टन’ ही बोला जाता हो। जैसे अंग्रेजी में ‘इरेज’ यानी मिटाने का काम करनेवाली वस्तु को ‘इरेजर’ कहा जाता है, उसी प्रकार हिन्दी में ‘मिटाने’ का काम करनेवाली वस्तु को ‘मिटौना’, ‘मिट्टक’ या ‘मिट्टन’ क्यों नहीं कह सकते?  मिट्टन और ऐसे ही अनेक शब्दों को लोक-व्यवहार से लेकर हम अपने कोशों में क्यों नहीं शामिल कर सकते?
लिखने-पढ़ने के काम से जुड़े कितने ही संज्ञा शब्द/पद हमारे व्यहार-क्षेत्र से बाहर, विस्मृति में चले गये हैं! और हमें बोध तक नहीं। ‘कूंची, तूलिका, रोशनाई, कलम, पटरी, फुट्टा, परकार, श्यामपट्ट, जीवा, त्रिज्या, व्यास, अर्धव्यास, वृत्त’ ये वस्तुएँ व संकल्पनाएँ आज भी हमारे जीवन में हैं। किन्तु इनके नामों का अंग्रेजीकरण क्यों हो गया? इन हिन्दी और लोक-प्रचलित नामों में क्या कमी थी? ऐसे हजारों शब्द होंगे। लेकिन बात हमारे संज्ञान में ही नहीं है।
पीछे पढ़ा कि ऑक्सफोर्ड प्रेस ने ‘VAX’ को वर्ष के दौरान अंग्रेजी में सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द या ‘वर्ड ऑफ द इयर’ घोषित किया है। हिन्दी और देश की हिन्दीतर भाषाओं के संबंध में किसी व्यक्ति या संस्था ने ऐसा कोई शोध किया है क्या? संस्थाएं तो बहुतेरी हैं। और उनमें से अधिकतर सरकार से वित्तपोषित हैं। उनके कर्ता-धर्ता भी वेतन भोगी हैं।
हमारा निवेदन है कि ऐसी संस्थाएं और उनके पदाधिकारी अपने-अपने नगरों के वातानुकूलित कक्षों से निकलकर कुछ वर्षों के लिए देश के विभिन्न गाँवों-कस्बों में प्रवास करें और देखें कि हिन्दी की समृद्ध शब्द-सम्पदा से कितना खज़ाना लुप्त हो चुका और जो नया जुड़ रहा है उसे किस तरह सहेजा जा सकता है। यदि यह नहीं कर सकते तो विकल्पतः सभी जनपदों में हम अपने कार्यकर्ता नियुक्त कर सकते हैं, स्वयंसेवियों की मदद ले सकते हैं।
हिन्दी-सेवा के लिए (या उसके व्याज से) बनारस में पधार रहे माननीय अतिथियों का स्वागत है। औढ़रदानी बाबा विश्वनाथ, सत्यवादी, महादानी राजा हरिश्चन्द्र, आधुनिक हिन्दी के प्रणेता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और सदियों से हजारों हिन्दी-सेवियों की नगरी रही काशी में देश के विभिन्न कोनों से पधार रहे अतिथियों का मेला लगेगा। यह सोचकर ही हमारा पुरबिया मन उमगने लगा है। अपनी इस हुलास की अभिव्यक्ति कैसे करें! शब्द कम पड़ रहे हैं। हमारे तईं महात्मा कबीर इस काशी नगरी के अधिष्ठाता हिन्दी-सेवी हैं। इसलिए काशी में पधार रहे हिन्दी-सेवियों, हिन्दी-जीवियों और हिन्दी-प्रेमियों का स्वागत हम कबीर के ही इन शब्दों में करना चाहेंगे- दुल्हिन गावहु मंगलचार, हम घर आए राम भरतार।

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