Wednesday, May 22, 2024
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डॉ. ऋतु शर्मा ( ननंन पाँडे) का लेख – भारतीय संस्कृति के प्रहरी प्रवासी भारतीय

दुनिया में जहाँ कही भी भारतीय रहते हैं,वह अपने आप को भारतीय कहलाने में गर्व महसूस करते हैं ।वह सालों साल भारत की माटी को स्पर्श भी नहीं कर पाते लेकिन उसके प्रति ममत्व,स्नेह,अपनेपन का मोह वैसे का वैसा ही बना रहता है । आज पूरे विश्व में भारत की उन्नति का डंका बज रहा है । यह हम प्रवासी भारतीयों के लिए किसी सम्मान से कम नहीं है । विश्व में भारत की गरिमा व संस्कृति को बनाए रखने में हम प्रवासी भारतीयों की भी उतनी ही भागीदारी है,जितना भारत में रहने वाले भारतीयों की भागीदारी है। आज मैं आपको अपने देश नीदरलैड में हिन्दी भाषा व भारतीय संस्कृति की तेज़ी से पनपती बेल के बारे में जानकारी देना चाहती हूँ । इसे समझने के लिए हमें थोड़ी सी जानकारी नीदरलैंड के बारे में भी लेनी चाहिए । नीदरलैंड को बहुत से लोग हॉलैंड के नाम से भी जानते हैं । अब आप सोच रहे होंगे एक ही देश के दो नाम क्यों? मैं आपकी इस जिज्ञासा का उतर इस तरह से दे सकती हूँ नीदरलैंड दो शब्दों नीदर + लैंड डच शब्दों से मिलकर बना है । जिसका अर्थ डच में है- नीदर= नीचा +,लैंड =ज़मीन या भूमि,= अथार्थ ज़मीन की नीची सतह या नीची भूमि वाला स्थान । अंग्रेज़ी में इसका शाब्दिक अनुवाद कर हॉलैंड नाम दे दिया गया । नीदरलैंड यूरोपीय महाद्वीप का एक प्रमुख देश है। यह उत्तर – पूर्वी यूरोप में स्थित है । इसके दक्षिण में बेल्जियम और पूर्व में जर्मनी है ।
दो तरह के प्रवासी
नीदरलैंड में दो तरह के प्रवासी भारतीय रहते हैं । जिसमें लगभग 2,00,000 सूरीनाम भारतीय संस्कृति के लोग निवास करते हैं ।लगभग 50,000 के आस-पास भारतीय प्रवासी जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से लेकर अब तक रोज़गार,उच्च शिक्षा,व अन्य कारणों से हवाई जहाज़ से यहाँ आ कर बस गये। सूरीनामी भारतीयों का यह तीसरा प्रवास स्थान बना।1872 में ब्रिटिश व डच लोगों के आपसी समझौते अंतर्गत 1973-1916 के बीच भारत के विभिन्न भागों से लगभग 35,000 लोगों को बिहार, बहराइच, जौनपुर, बलिया बिहार, बहराइच, जौनपुर,बलिया, उड़ीसा, बंगाल से कलकत्ता के बंदरगाह से श्री राम के गाँव के नाम पर सूरीनाम ले जाए गए। सूरीनाम जो दक्षिण अमेरिका के महाद्वीप के उत्तर में स्थित एक देश है । 25 नवंबर में 1975 में सूरीनाम डच शासन से स्वतंत्र हो गया । सूरीनाम में रह कर भारतीय प्रवासीयों ने जो पीड़ा व दर्द सहे उनके लिए यह एक सुनहरा अवसर था । उस समय डच सरकार ने सूरीनाम के लोगों को नीदरलैंड में बसने में मदद भी की थी।
भारतीय संस्कृति
भारत की संस्कृति विश्व की प्रधान संस्कृति है,यह एक वास्तविकता है ।भारतीय संस्कृति अपने परम्परागत अस्तित्व केसाथ अजर अमर है। अपने प्रथम प्रवास के समय इन प्रवासियों के लिए अपनी मूल जड़ों से नए स्थान,नई संस्कृति,भाषिकविविधताओं व असहनीय विषम परिस्थितियों में भारत से जाते समय अपने साथ,रामायण,महाभारत गीता, कबीर वसूरदास की कुछ पुस्तकें ,लोक गीत ,लोक परम्पराएँ ले गये थे वहीं इनकी शक्ति बना। अपने दूसरे यानी सूरीनाम सेनीदरलैंड प्रवास के साथ ही उनकी सांस्कृतिक विरासत भी नीदरलैंड आ गई । सूरीनाम व भारत से आने वाले ज़्यादातरभारतीय ऐम्सटर्डम, रोटर्टेडम देनहाग़ व कुछ यूतरैखत में बस गये। ऐम्सटर्डम व देनहाग़ में भारतीय बहुलता में थे इसलिएउन्होंने अपना एक सामाजिक संगठन बना अपनी धार्मिक आस्था,त्यौहारों व रीति रिवाजों का विस्तार किया।शुरुआत मेंयह कार्य बहुत मुश्किल था तब यह लोग एक दूसरे के घरों में इकट्ठा हो रामायण पाठ, दुर्गा पूजा,व अन्य उत्सवों काआयोजन करते थे किन्तु बाद में इस प्रवासी भारतीय समुदाय ने स्वयं धन एकत्र कर मंदिर का निर्माण किया। आजनीदरलैंड में छोटे बड़े लगभग पचास सनातन ,आर्य सामाज व एक बड़ा ईस्कॉन मंदिर है।लगभग पाँच गुरुद्वारे हैं । भारतीयसंस्कृति में सोलह संस्कारों का विवरण सनातन धर्म में मिलता है जिसका अनुपालन यहाँ के प्रवासी भारतीयों करते है ।प्रवासी भारतीय आज भी जब मिलते हैं तो हैलो या नमस्कार नहीं बल्कि राम – राम और जय सीता राम से संबोधित करते हैं।
नीदरलैंड में रजिस्टर्ड विवाह का क़ानून है इसलिए हम प्रवासी भारतीय अपनी भारतीय परम्परा व नीदरलैंड परम्परा दोनों निभाते हैं। भारतीय परंपराओं में विवाह के सभी रीति रिवाज उसी तरह से किये जाते हैं जैसे उस समय (1872-1915) तकभारत में किये जाते थे । विवाह का कार्ड जिसे “न्यौता“कहा जाता है विवाह से एक महीने पहले उसपर लवंग, अक्षत व हल्दी कुमकुम लगा कर बाँटा जाता है। विवाह की तैयारी के प्रथम दिन गोबर व जौ से सजा कर घर के भंडार घर गणेश भगवान की मूर्ति के साथ कलश स्थापना की जाती है फिर कुम्हार के चाक पूजन की विधि जिसे स्थानीय भाषा मे“मटकौडवा”कहते है की जाती हैं ।विवाह से दो दिन पहले हल्दी व तेल चढ़ाने की विधि की जाती है जिसे “ तैलवान “ कहाँजाता है और विवाह के एक दिन पहले “ भतवान” होता है जिसमें होने वाले दुल्हन या दुल्हे का मामा उनके कपड़े, मिठाईलाता है व बुआ लावा भूजति है जिसे लावा भूजाई की रीत कहते हैं इसी दिन रात को मेहंदी लगती है व घर की महिलाएँपारम्परिक गीत गा कर हंसी ठिठोली करती है। विवाह के दिन वर व वधू को भगवान राम व सीता का अवतार मान जाता हैमंडप में जाने से पहलें वधू से गौरी पूजा कराई जाती है इमली का पत्ता खिलाया जाता है जिसके पीछे यह मान्यता है कीअब तुम्हारे लिए मायका खट्टा हो गया और ससुराल मिठा है इसलिए तुम ससुराल में जा कर सिर्फ़ मिठास घोलना। मंडप में आने से पहले की “ दुल्हा “ परछाये की रीत की जाती है जिसमें वर का स्वागत किया जाता है यह रीत वधू की माँ,भाभी याबड़ी बहन करती है उसके बाद वर पक्ष से पाँच पुरुषों को पंच परमेश्वर माना जाता हैं।मंडप में वर व वधू दोनों पक्ष के पंडितउपस्थित हो कर विवाह संपन्न करवाते हैं।विवाह में जो आकर्षण का केन्द्र बिन्दु होता है वह है “लोन्ंडा का डॉंस “ इसमें एक पुरूष महिला के कपड़ों में लंहगा चोली पहन पारंपरिक विवाह गीत पर ( कभी कभी अश्लील शब्दों का प्रयोग भी होताहै) नाच करता है। विवाह के बाद परिवार के कुल देवी देवताओं की पूजा व अन्य रीति रिवाज सम्पन्न किये जाते है।इसीतरह ,गोद भराई, शिशु के जन्म लेने पर छटी पूजा, जनेऊ संस्कार, कर्ण भेद संस्कार, से लेकर अंतिम संस्कार व पितृपक्षतक सभी का पालन यहॉ देखने को मिल जाएगा ।अधिकांश भारतीय घरों में लोग अपनी मातृभाषा मे , भोजपुरी यासरनामी हिंदी में बात करते है।रिश्तों में, आजा-आजी, काका -काकी,फूफा-फुआ,नाना-नानी,बहनोई,नंदोई जैसे शब्दोंका प्रयोग किया जाता है। घाम, मेध, माँड़ो ( मंडप) बिहान(कल) मेहरारू, पतोहू, दुल्हन, दुल्हनियाँ,तुरई,भाटा (बैंगन) अंझूर (अंधेरा) आदी शब्द बोल चाल में है।
हिंदी भाषा
भारतीय हिन्दी भाषा के लगभग पाँच प्राथमिक विद्यालय यहॉ हैं जिनमें लगभग बारह सौ बच्चे हिंदी व संस्कृत भाषा पढ़ाईजाती है। हिन्दी विद्यालयों के अतिरिक्त यहाँ प्रवासी भारतीयों द्वारा लगभग 45 वर्षों से “ सूरीनामी हिन्दी परिषद्” संगठनहिन्दी के प्रचार प्रसार में अपनी प्रमुख भूमिका निभा रहा है साथ ही श्री नारायण शर्मा मथुरा,,डॉ जीत नारायण,डॉ. मोहनकांत गौतम,डॉ. रामा तक्षक व डॉ ऋतु शर्मा भी हिंदी व भारतीय संस्कृति को आने वाली पीढ़ी तक ले जा रहे हैं । हिन्दी के कई ऑनलाइन कार्यक्रम , अंतरराष्ट्रीय हिन्दी संगठन नीदरलैंड, व साँझा संसार,महिला काव्य मंच नीदरलैंड,द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं । मंदिर में सप्ताहांत में हिन्दी व संस्कृत भाषा सिखाई जाती है साथ ही रामायण पाठ, सावन में शिव पुराण व पितृपक्ष में गरूड़ पुराण का वाचन व महत्व हिन्दी व सरनामी भाषा में किया जाता है क्योंकि डचलोगों की भारतीय संस्कृति के प्रति बहुत रूचियाँ बढ़ गई है इसलिए इनका डच मौखिक अनुवाद भी किया जाता है।यहॉ केमंदिर की दुकानों से आप पूजा की समस्त सामग्रियों ,मूर्ति,धार्मिक ग्रंथ, हिन्दी भाषा की बाल पुस्तकें के साथ, भारतीय परिधान भी
ख़रीद सकते है। देंनहाग़ में भारतीय समुदाय की अधिकता के कारण वहाँ की क्रुखपॉल गली को “ मिनी इणिया “भी कहा जाता है .
यहॉ आप बॉलीवुड की फ़िल्मों की डि वी डि से लेकर वो सब सामान ख़रीद सकते जिसके लिए आप भारत जाने की सोच रहे हैं ।
यहॉ पर आपको प्रवासी भारतीयों की कपड़ों कीदुकानें, जवाहरात की दुकानें,व भारतीय ,सूरीनामी के व दक्षिण भारतीय रेस्टोरेन्ट मिल जाएँगे .भारतीय सूरीनाम के व्यंजन डच लोगों के प्रिय भोजन है।
भारतीय उत्सव
साल में एक बार “ मिलान” ( मिलन का अपभ्रंश रूप) देनहाग़, अलमेर मे सूरीनाम भारतीय पाँच दिवसीय मेला लगता हैजिसमें सूरीनाम व भारत के गीत, लोक नृत्य,व बॉलीवुड गायकों व कलाकारों को बुलाया जाता है भारत से आने वाले लोगभी इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं । होली को यहाँ पारम्परिक रूप में मनाया जाता है फाल्गुन माह के प्रथम दिन से हीचौताल का कार्यक्रम शुरू हो जाता है शाम को लोग काम से आ कर मंदिरों या सामुदायिक भवनों में अपना रंग जमाते हैं।खेलने वाली होली से एक दिन पहले पारंपरिक रूप में होलिका दहन किया जाता है सब लोग वहाँ एकत्र हो कर पूजा करतेहै फिर पंडित जी द्वारा होलिका दहन होता है।
अगले दिन रंग की होली खेली जाती है क्योंकि यहाँ ठंड अधिक होती हैइसलिए पानी के रंगो से नहीं बल्कि सूखे रंग ,गुलाल जो अब आसानी से उपलब्ध है पहले जब गुलाल उपलब्ध नहीं था तबटैलकम पाउडर को अंक दूसरे पर छिड़क कर खोली खेली जाती थी। कुछ स्थानों पर होली के सप्ताहांत पर समुदाय भवनमें होली का रंगारंग कार्यक्रम रखा जाता है । नवरात्र के दिनों में मंदिरों में दुर्गा पाठ नौ दिन तक किया जाता है लोग उपवासकरते हैं व दसवें दिन मंदिर व घरों में बड़े उत्सव के साथ समापन किया जाता है । यहॉ लगभग सभी भारतीय परिवारों मे एकछोटा मंदिर मिलेगा । भारतीय घरों को यहॉ आप आसानी से पहचान सकते हैं सभी घरों के बाहर लाल झंडी व धार्मिकचिन्ह देख सकते हैं । अब दस दिन का गणेश उत्सव,जगन्नाथ यात्रा व अन्य भारतीय त्यौहारों को भी नीदरलैंड में बहुत बड़ेसमारोहों रूप में मनाया जाने लगा है। इन उत्सवों को मनाने के लिए कोई सरकारी अवकाश अभी तक नीदरलैंड सरकार नेघोषित नहीं किया है किन्तु आप इन त्यौहारों के लिए अपने काम व विद्यालयों अवकाश ले सकते हैं किन्तु हिन्दू विद्यालयोंमें प्रमुख भारतीय त्यौहारों पर अवकाश रहता है। यहॉ के टीवी. चैनलों पर भी भारतीय त्यौहारों का प्रसारण किया जाता है।
आजकल इन्टरनेट ने भारत और नीदरलैंड को बहुत पास ला दिया है अब प्रवासी युवा पीढ़ी भारत में अपनी जड़ों को खोजकर फिर से अपना अस्तित्व बना रहे हैं। भारतीय प्रवासी भारतीयों का नीदरलैंड की आर्थिक व्यवस्था को उच्च स्तर पर लेजाने में बहुत योगदान है वही आज के आधुनिक युग को चलाने वाली तकनीक भी ज़्यादातर भारतीयों के हाथों में ही है ।भारत सरकार द्वारा ओ सी आई कार्ड की सुविधा ने भारत व नीदरलैंड की दूरियों को पाट दिया है।
आज के प्रवासी युवाओं की भारत की संस्कृति को जानने पहचानने की उत्सुकता उनके निरंतर भारत की और खींचती हैं ।आज भारत में जिस हिन्दी भाषा का स्थान धीरे-धीरे अंग्रेज़ी भाषा ने ले रही है ,वहीं यहाँ नीदरलैंड में हिन्दी व सरनामी हिन्दी बढ़ रही है। इन सब बातों व देखते हुए यदि आज हम कहें कि हम प्रवासी भारतीय ही भारतीय संस्कृति व भाषा के पहरेदार हैं, तो मिथ्या नहीं होगा।
डॉ. ऋतु शर्मा ( ननंन पाँडे)
स्वतंत्र पत्रकार, लेखिका,कवयित्री
कार्यकर्ता सलाहकार समिति नीदरलैंड
ईमेल : RituS0902@gmail.com
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1 टिप्पणी

  1. नमस्ते ऋतु जी!
    आपका पूरा लेख पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है। आपके माध्यम से जान पाए की नीदरलैंड और हॉलैंड एक ही देश के दो नाम है। नीदरलैंड के अर्थ को आपने स्पष्ट किया। वहां हिंदू संस्कृति को जिस तरह से आप सबने जीवित रखा वह काबिले तारीफ है।
    बात तो सही है कि भारतीय लोग अंग्रेजी भाषा के चक्कर में हिंदी की उपेक्षा कर रहे हैं।। नहीं वह पूरी तरह अंग्रेजी सीख पा रहे हैं और हिंदी तो खैर सीख ही नहीं पा रहे इस बात का वाकई अफसोस है।
    हिंदी और संस्कृत हमारी भी प्रिय भाषा है।
    जिस तरह से आपने बहुत विस्तार से नीदरलैंड की सारी जानकारी दी उससे निश्चित ही कह सकते हैं कि आप जैसे प्रवासी भारतीय ही भारतीय संस्कृति और भाषा के पहरेदार हैं।
    वैसे सरनामी हिन्दी कैसी होती है यह जानने की उत्सुकता है।
    यह लेख हमारे लिए बहुत सुखद रहा। शुक्रिया आपका और साथी पुरवाई का भी जिससे जुड़कर समृद्ध हो रहे हैं।

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