आंतरिक सुरक्षा का सामान्य अर्थ एक देश की अपनी सीमाओं के भीतर की सुरक्षा से है। आंतरिक सुरक्षा एक बहुत पुरानी शब्दावली है लेकिन समय के साथ ही इसके मायने बदलते रहे हैं। स्वतंत्रता से पूर्व जहाँ आंतरिक सुरक्षा के केंद्र में धरना-प्रदर्शन, सांप्रदायिक दंगे, धार्मिक उन्माद थे तो वहीँ स्वतंत्रता के बाद विज्ञान एवं तकनीकी की विकसित होती प्रणालियों ने आंतरिक सुरक्षा को अधिक संवेदनशील और जटिल बना दिया है।
पारंपरिक युद्ध की बजाय अब छदम युद्ध के रूप में आंतरिक सुरक्षा हमारे लिये बड़ी चुनौती बन गई है।
1.नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ।वर्ष 1967 में चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। जल्द ही नक्सलवाद ने देश के कई राज्यों को अपनी चपेट में ले लिया। परिणामस्वरूप नक्सलवाद ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। आज नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
2. स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक भारत में अनेक सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। जिसने भारत की बहुलतावादी संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर दिया है, धर्म, भाषा या क्षेत्र आदि संकीर्ण आधारों पर अनेक समूह व संगठनों ने लोगों में सामाजिक विषमता बढ़ाने का प्रयास भी करते रहे हैं। ये अतिवादी संगठन अपने धर्म, भाषा की श्रेष्ठता का दावा प्रस्तुत करते हैं तथा विद्धेषपूर्ण मानसिकता का विकास करते हैं। और आज इस जातिवाद ने अपना भयंकर रूप धारण कर लिया है। जात पात पर खून बहाए जा रहे है। स्त्री सुरक्षा भी एक बड़ा सवाल बन कर देश के सामने खड़ी है। जिसका ना कोई हल नजर आ रहा है ना कोई ठोस कदम। आए दिन जो घटनाएं घटती है, बस कुछ समय के लिए, उसके खिलाफ़ आवाज उठाई जाती है, सांत्वना के शब्द बोले जाते है। फिर जैसा का वैसा माहौल बन जाता है।
3.भ्रष्टाचार तो सभी समस्याओं की जननी है या कहिए एक गंदी नाली का कीड़ा, जो समाज में दीमक की तरह लग गया है। क्योंकि यह राज्य के नियंत्रण, विनियमन एवं नीति-निर्णयन क्षमता को प्रतिकूल रूप में प्रभावित करता है। वस्तुतः ऐसा कार्य जो अवांछित लाभ को प्राप्त करने के इरादे से किया जाए,तथा निर्णय निर्माण प्रक्रिया में एकीकरण के अभाव व शक्ति का दुरुपयोग करता हो।
4.मादक द्रव्य से न जाने कितनी अनगिनत युवा पीढ़ी इसकी चपेट में आ गई है। घर बर्बाद हो चुके है। आम इंसान भी अपनी रोज की कमाई इन नशीली चीजों के लिए बर्बाद कर रहा है।भारत के पड़ोसी देशों में ‘स्वर्णिम त्रिभुज’ (म्यांमार,थाईलैंड और लाओस),’स्वर्णिम अर्द्धचंद्राकार’ (अफगानिस्तान, ईरान एवं पाकिस्तान) क्षेत्रों की उपस्थिति के फलस्वरूप मादक द्रव्य का बढ़ता व्यापार भारत की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष प्रमुख चुनौती बन कर उभरा है।
5. काले धन को वैध बनाना ही मनी लाँड्रिंग है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा अवैध स्रोत से अर्जित की गई आय को वैध बनाकर दिखाया जाता है। मापन में कठिनाई के बावजूद हर साल वैध बनाए जाने वाले काले धन की राशि अरबों में है और यह सरकारों के लिये महत्त्वपूर्ण नीति संबंधी चिंता का विषय बन गया है।
6.आतंकवाद ने तो आज हर तरफ तहलका मचा रखा है। हर तरफ़ भय व क्षति उत्पन्न है। किसी भी प्रकार का आतंकवाद, चाहे वह क्षेत्रीय या राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय हो, देश में असुरक्षा, भय और संकट की स्थिति को उत्पन्न करता है। आतंकवाद की सीमा कोई एक राज्य, देश अथवा क्षेत्र नहीं है बल्कि आज यह एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या के रूप में उभर रही है। संगठित अपराध- प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक अथवा अन्य लाभों के लिये एक से अधिक व्यक्तियों का संगठित दल, जो गंभीर अपराध करने के लिये एकजुट होते हैं। परंपरागत संगठित अपराधों में अवैध शराब का धंधा, अपहरण, जबरन वसूली, डकैती, लूट और ब्लैकमेलिंग इत्यादि।
गैर-पारंपरिक अथवा आधुनिक संगठित अपराधों में कारोबार, साइबर अपराध, मानव तस्करी, मादक द्रव्य व्यापार।
इन सारी आंतरिक सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने से, यह बात स्पष्ट हो जाती है कि, हमारा देश आंतरिक रूप में बिलकुल ही असुरक्षित है। इन के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है। एक ठोस प्रणाली जो इन आंतरिक समस्याओं का निवारण कर सके। पर कदापि ऐसा कोई सुरक्षा कवच बना ही नहीं। आज जातिवाद ने ही देश को आधा खोखला बना दिया है। बची कूची कसर, देश में फैले गैरकानूनी धंधों ने,भ्रष्टाचार पूरे कर रहे है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हैं तो, कभी कभी लगता है, आजाद देश के नागरिक आज जाती वाद की दलदल में गिरकर एक दूसरे को ही गुलाम बनाने पर अड़े हैं,जाती के नाम पर खून बहा रहे है, भ्रष्टाचार की लपेट में आकर देश को खोखला बना रहे है। और हमारी ऐसी हरकतें दुश्मनों की राह आसान बना रही है। इससे बेहतर हम अंग्रेजों के गुलाम थे वही अच्छा था….!

2 टिप्पणी

  1. लेखिका ने देश की आन्तरिक सुरक्षा के सभी पक्षों पर अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किये हैं, सच है आन्तरिक सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है. वाह्य सुरक्षा के खतरे तो प्रत्यक्ष दिख जाते हैं.. किन्तु आन्तरिक सुरक्षा में सेंध लगाने वालों को ढूंढना पड़ता है. कई सामाजिक पक्षों पर भी उन्होंने ध्यान दिया है

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