वह विलक्षण है
उसका प्रेम
परे है
किसी विशेषण से
किसी सीमांकन से,
विश्वास और अविश्वास
दान और प्रतिदान
अपेक्षा और उपेक्षा जैसे
किसी सरलीकृत द्वैत में
रखकर नहीं देखना है उसे
अपने प्रेम को,
वह बस
चाहती चली रही है
एक लड़के को
शुरू से लेकर अबतक
और यह तब से है
जब पहली बार
प्रस्फुटित हुआ था
उसके भीतर
कोई प्रेमांकुर,
कोई रूहानी भाव
उतरने लगा था
उसके भीतर
चुपचाप,
कोई मधुर तान
यकयक
निकलना चाह रहा था
उसके कंठ से,
बनमिट रही थीं
जानीअनजानी कई लहरें
उसके मनसागर में,
सुगबुगाया था कोई स्वप्न
उसकी अधपकी नींद में,
उसके भीतर की चिड़िया
पर फैलाना चाह रही थी,
समुत्सुक आकाश
साँस रोके
जिसकी परवाज़ की प्रतीक्षा 
कर रहा था 
वह लड़का
समझता रहा
कुछ नहीं भी,
उसके वास्ते
लड़की के प्रेम पर
मगर
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा
वह अटूट
प्यार करती रही उसे  
वह लड़की
जिस घर जाकर
पगफेरा करना चाहती थी
नहीं पहुँच पाई
मनोवांछित उस दहलीज़
नहीं लौट पाई कभी
अपने मायके,
शादी के नाम पर
उसे भेज दिया गया
किसी अभेद्यसे क़िले में
जहाँ किसी भोग्या से अधिक
कुछ नहीं समझा गया उसे
कभी भी
वह लड़की से औरत बनी
कच्ची उम्र में,
नहीं सुन पाई कभी
प्यार के दो मीठेकोमल बोल
अपनी ससुराल में,
बर्दाश्त किया
अपने तन पर
ज़बरदस्ती के डंक को
हर बार,
दमन का हथौड़ा
टूटता रहा उसपर
मगर, नहीं स्वीकार पाई
वह नन्हीं जान
उस शख़्स की सत्ता को
जिसे बताया गया था
उसका नियंता,
उसका अधेड़ पति
ख़ूब अत्याचार करता उसपर
उसे भूलने को कहता
वह सुनहरा पन्ना
उसके अतीत का
जिसकी ख़ुशबू के सहारे
वह जीती चली रही थी
किसी नज़रबंद कीसी ज़िंदगी
अब तक,
सब कुछ सहा उसने चुपचाप
मगर नहीं भूल पाई वह
अपने पहले प्यार को,
नहीं फाड़ पाई
उस पन्ने को
जिसके एवज़ में
जाने कितनी बार
तारतार हुआ उसका वज़ूद,
जलाकार स्वयं को
उजाले के चंद क़तरों
को बटोरती रही
हर बार,
बहते रहते उसके आँसू
अपने आप
सूखते रहते उसके आँसू
उसे ही बिखरना था
स्वयं
उसे ही सँभलना था,
जाने कैसेकैसे ताने
सहे उसने
हर ओर से
मगर तानकर कोई अदृश्य चादर
प्यार की
वह छाँव देती रही
अपने घावों को
फिर एक दिन
वह मंज़र भी आया
माँ बनी वह
माँ के हिस्से का प्यार
ख़ूबख़ूब लुटाई
अपने बच्चे पर,
पूरे किए उसने
अपने सारे कर्तव्य
रिश्तों की अलगनी से
जुड़े थे
जितने भी
जैसे भी
मगर,
उस औरत के भीतर
साँस लेती रही
हरदम एक लड़की
जिसने कभी हार नहीं मानी
नहीं त्यागे
कभी स्वप्न देखने
जिसने नहीं छोड़ा चाहना
उस लड़के को,
वह हृदय में बसाए रही उसे
अकारण
बिना कोई उम्मीद रखे उससे
कोई शिकायत किए बिना उससे,
वह औरत
पालती रही शिद्दत से
अपने भीतर की लड़की को
जैसे पाल रही हो कोई  माँ
अपनी बेटी को,
अपनी स्त्री की दुर्बलता को
खारिज़ करती रही वह
अपने हिस्से आई नियती को भी
बारबार
होकर चोटिल  
अपने विगत प्रेम को स्वीकारते
और बसाए हुए
अपने मनआँगन में
वह
अस्वीकारती चली रही है
अपना वर्तमान
और इसके लिए
वह ताक़त पाती है
अपने अतीत की
उसी स्नेहिल भूमि से
जहाँ
दो किशोर
एकदूसरे से मिले थे
सकुचातेलजाते हुए
जहाँ दो जोड़े नयनों ने
पसंद कर लिया था
एकदूसरे को,
वह दृष्टिमिलन अद्भुत था
जिसके गवाह थे
धरतीआकाश, हवाधूप,
जहाँ कोई
ताक़तवर और कमज़ोर नहीं था,
जहाँ बस एक लड़का था
जहाँ बस एक लड़की थी
जहाँ बस प्यार था
एकदूजे के लिए
एकदूजे की आँखों में   
पहाड़से अत्याचार के नीचे
पिसती हुई
वह जैसे स्वयं
अडोलसी हो गई है,
प्रेम, जिसके लिए
नहीं रहा कभी कोई सौदा
वह ऐसी सौदाई थी,
किसी मलंग कासा
हो गया है
मन उसका,
इस दुर्लभ प्रेमगाथा की
रचयिता और नायिका है वह
जो भी कहें,
विलक्षण है वह
और उसका प्रेम भी
तीन काव्य संग्रह 'नदी के पार नदी' (2002), 'मैं सड़क हूँ' (2011), ‘पोले झुनझुने’ (2018) एवं एक उपन्यास 'पच्चीस वर्ग गज़' (2017) प्रकाशित एवं चर्चित। आलोचना की एक पुस्तक 'आत्मकथा का आलोक' (2020) का संपादन। संपर्क - arpankumarr@gmail.com

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