हमारे देश भारत के पूर्वोत्तर  राज्यों में लिपिविहीन बोली जाने वाली विभिन्न जनजातीय बोलियों के बोले जाने के अतिरिक्त पढ़े लिखे लोंगो  में ज्यादातर अंग्रेजी का प्रचलन हैं ! देवनागरी लिपि से सुसज्जित सुशोभित हिंदी दूसरे नंबर पर बोली जाती है ! धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान  लोक विरासत को सुरक्षित , संरक्षित रखने हेतु वहां की बोली भाषा लिपिबद्ध करना समय की मांग है !
हम सभी अवगत हैं कि संसार की सबसे प्राचीन धर्म ग्रंथ भारत में वेदों की भाषा संस्कृत की लिपि देवनागरी है , जिससे हमारे वेद ग्रंथ सुरक्षित हैं ! पूर्वोत्तर राज्यों में भी एक लिपि प्रतिबद्धता  पूर्णतः उचित है के क्रम में पूर्वोत्तर की बोलियों / भाषा को सुरक्षित , संरक्षित करने व विस्तार देने के लिए अद्भुत रुप से पूर्ण सुव्यवस्थित , वैज्ञानिकता से समृद्ध , स्वर व्यंजन स्पष्टता व क्रमबद्धता के गुण से सज्जित  देवनागरी लिपि हर हाल में उपयुक्त हो सकती है !
विश्व के प्रबुद्ध भाषाविदों , मनीषी विद्वानों ने भी भारत की  विशुद्ध अति प्राचीन देवनागरी लिपि को सबसे सक्षम, पूर्ण व्यवस्थित लिपि के रूप में बिना किसी अगर- मगर के स्वीकार किया है ! देवनागरी लिपि अक्षरात्मक लिपि है अपनी  ध्वन्यात्मक , स्पष्ट अक्षरात्मक लिपि संकेतों के विशिष्ट गुणों ( एक ध्वनि के लिए एक सांकेतिक चिन्ह जैसा बोले वैसा पढ़ें , जैसा लिखे वैसा पढें ) सम्पूर्ण भारत की ही नहीं विश्व लिपि बनने में पूर्ण सक्षम है , यह अध्यछ  अद्भुत सामर्थ्यवान प्राचीन भारतीय लिपि है ! वर्तमान इंटरनेट के दौर में तो ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम उपलब्ध है जिनकी सहायता से देवनागरी लिपि में लिखे आलेख को किसी भी भारतीय लिपि में बदला जा सकता है !
हम सभी जानते हैं कि मानव सभ्यता के आरंभ से ही हर देश काल में किसी भी जन समुदाय के लोग परस्पर भाव विचार कुछ न कुछ बोल कर करते रहे , सभ्यता के क्रमिक विकास क्रम  में धरती की मिट्टी पर रेखा संकेत खींचकर अपनी बात बताने / कहने की कोशिश करते थे , दीवारों पर पशु-पक्षियों या देवी देवताओं के काल्पनिक रेखाचित्र / सांकेतिक रेखाएं बनाकर कर अपने भाव को स्पष्ट करने के क्रम में कालांतर भाषा विकास के साथ में लिपि संकेतों का विकास होता गया और लिखने के लिए भोजपत्र यहां तक कि चमड़े की  खाल का भी प्रयोग हुआ ! लेखन कला हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की पहचान है !
इस संदर्भ में हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन ने कहा था कि बोलिए भाषा मातृ शब्द नहीं है यह हमारी संस्कृति का पर्याय हैं  !
चिंता का विषय यह है कि हमारे देश में संभवतः आज बहुत सी जनजातीय भाषाएं /लिपियां संकुचित होती संक्रमण काल के दौर से गुजरते हुए विलुप्ति  के कगार पर पंहुच आयी हैं ! ऐसे विकट परिवेश में पूर्वोत्तर लिपिविहीन जनजातीय बोलियों / भाषा की स्थिति भी ऐसी सोचनीय दशा में पंहुच चुकी हैं , जिनको  पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखना संरक्षित रखना राष्ट्रीय एकता अस्मिता एवं सामाजिक समरसता के लिए , यहां तक कि मनुष्यता के विकास के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है !
वर्तमान में विश्व की अनेक लिपियों में देवनागरी लिपि ही सर्वोत्तम है इसे भारतीय संविधान में दर्जा प्राप्त  है ! इस तथ्यात्मक सच को भारतीय मनीषी प्रबुद्ध भाषाविद् ही नहीं विदेशी भाषा विद्वान सहर्ष तार्किक रूप से स्वीकार करते  इसकी प्रशंसा में बहुत कुछ लिखे हैं !
आधुनिक उदारीकरण  औद्योगिक युग में भारत ही नहीं विश्व में सभी भाषाओं के संरक्षित और सुरक्षित रखने के साथ देवनागरी लिपि का प्रयोग कर सामाजिक विज्ञान राजनीतिक इतिहास आदि के अक्षय भंडार को भी संरक्षित रखना मानव जीवन के सर्वांगीण विकास और प्रगति में भी अपेक्षित है ! वर्तमान समय में विश्व में  लगभग 74 करोड से उपर लोगों की भाषा देवनागरी हिंदी है ! यहां हमारे भारत में ही 78% लोग हिन्दी बोलते हैं जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है !
प्रथम मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त भारतीय गांधीवादी विचारक आचार्य विनोबा भावे जी ने देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता व्यापकता राष्ट्रीयता एवं उपयोगिता की दृष्टि से  संपूर्ण भारत में नागरी लिपि को व्यापक बनाने के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया ! राष्ट्रीय एकता हासिल करने में देवनागरी का सामान्य रूप से सभी द्वारा स्वीकार करने के लिए गांधीजी ने कहा था कि मैं तजुर्बे के साथ आप से कहता हूं कि दूसरी देशी भाषा सीख लेना कोई मुश्किल बात नहीं लेकिन इसके लिए एक सर्वमान्य लिपि होना आवश्यक है !
“ उन्होंने राष्ट्रीय एकता हासिल करने के लिए प्रांतीयता और संगीता छोड़ने का सादर आग्रह भी किया था !
वैसे वर्तमान वक्त में हमारे देश भारत के प्रगति का रथ तेजी से आगे बढ़ रहा है ! और सुखद स्थिति यह है कि कंप्यूटर युग में ऑनलाइन , सशक्तता के साथ पूरे विश्व में , विभिन्न देशों में देवनागरी लिपि में लिखित सशक्त हिंदी भाषा अपनी धमक के साथ अप्रत्याशित रूप से विस्तार पा रही है ! जनमानस पर असर करने वाली बहुत ही प्रभावी माध्यम फिल्म , सीरियलस,  बच्चों के तमाम कार्टून , एनिमेटेड फिल्में , जो पूरे विश्व में देखी जाती हैं , पसंद की जाती है , ये सभी जाने ,अनजाने देवनागरी लिपि के प्रचार प्रसार में अपना सतत अमूल्य योगदान दे रहे हैं !
फिर तो हमारे देश के हर अंचल में , हर जगह हर बोली भाषा के लेखन को स्थायित्व देने के लिए देवनागरी लिपि को अपनाया ही जाना चाहिए , ताकि कालांतर  में ये विस्तार पाकर विश्वलिपि के रूप में प्रतिष्ठित हो सके ! ऐसे सुखद सकारात्मक समय में पूर्वोत्तर राज्यों की सरकारों को दृढ़ निश्चय के साथ पूर्वोत्तर की  विभिन्न लिपिविहीन बोलियों / भाषाओं को लेखन में प्रत्येक दशा में देवनागरी लिपि को ही अपनाए जाने के लिए सकारात्मक कदम उठाने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए ! जिससे समस्त भारतीय नागरिकों  के जीवन मूल्यों की अक्षुण्ण सुगम राष्ट्रीय श्रृंखला का अस्तित्व सदाबहार रहे ! संपूर्ण हिंदुस्तान की भारतीय सनातनी सांस्कृतिक एकीकृत विरासत एक पहचान बन जाए !
हम सभी भारतीयों को प्रफुल्लित होना चाहिए कि हमारी देवनागरी लिपि ही है जिसमें ध्वनि समूह को अत्यन्त ही पूर्णता और स्पष्टता से  प्रकाशन हो जाता है , जो संसार के किसी भी अन्य लिपि में संभव नहीं है ! अद्भुत स्पष्ट उच्चारण और शब्दार्थ आदायेगी सम्पन्न सक्षमता एवम्  वैज्ञानिक क्रमबद्धता के कारण ही सभी भारतीय भाषाविद विद्वान पूर्वोत्तर की बोलियों / भाषा के लेखन में नागरी के प्रयोग किए जाने के प्रबल हिमायती व प्रतिबद्ध हैं !
आज पूरब से पश्चिम तक , कश्मीर से कन्याकुमारी तक , उत्तर से दक्षिण तक संपूर्ण भारत की सभ्यता , सांस्कृतिक पहचान रखने के लिए और हमारी राष्ट्रीय एकता , अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी हर बोली भाषा लेखन में देवनागरी लिपि का प्रयोग करना ही अपरिहार्य हो गया है !
कारण तार्किकता लिए हुए स्पष्ट  है कि इसमें कुल 42 अक्षरों में 14 स्वर एवम् 38 व्यंजन  वर्णमाला क्रम व्यवस्था ( विन्यास ) शुद्ध व स्पष्ट उच्चारण के साथ वैज्ञानिक क्रमबद्धता के साथ सरल व सहज रूप से ग्राह्य है ! अपने इन्हीं  विशिष्ट विशेषताओं के कारण देवनागरी एकमात्र लिपि है जो पूर्वोत्तर की बोलियों /भाषा के लिए सर्वथा उपयुक्त है ! इन्हीं विशेषताओं के कारण ही देवनागरी लिपि का प्रयोग हिन्दी के साथ साथ अधिकांश भारतीय भाषाओ में जैसे संस्कृत कोकड़ी नेपाली सिंधी मराठी गुजराती डोगरी हरियाणवी राजस्थानी मैथिली भोजपुरी आदि भाषाओं में भी किया जाता है ! नागरी लिपि के कारण ही भारतीय जनमानस की सुबोध भाषा हिंदी जन सामान्य की भाषा हुई है !
यदि दक्षिण की बंजारा जनजातियों ने  ( गोर , लंबाडा , सिराली , लमाणी आदि ) बंजारा बोली के लिए देवनागरी लिपि को अंगीकार कर लिया है , तो  पुर्वोत्तर की बोलियों / भाषा के लिए भी जितना शीघ्र हो सके भारतीय संविधान द्वारा राजलिपि की रूप में प्रतिष्ठित देवनागरी लिपि को स्वीकार किया जाना चाहिए ! नागरी लिपि के द्वारा हम देश में वर्तमान परिस्थितियों में असहिष्णुता के मनगढ़न्त दौर में राष्ट्रीय सामाजिक संस्कृति का निर्माण व विस्तार करने एवम् आज राष्ट्रीय एकता  पर विराजमान ख़तरे के संकटकाल में मज़बूती प्रदान करने में समर्थ होंगे ! आज अपने मुल्क में एकता कायम रखने के लिए भी वक्त की मांग भी यही है !
यही वजह है कि देवनागरी लिपि की प्रशंसा बहुत से प्रख्यात विदेशी विद्वानों ने जैसे एफ एस गाउसु , हार्ले , व्यूलर,  हुक्स मैकडोनाल्ड थॉमस आइज़क टेलर जॉन शोर आदि द्वारा भी किया गया है !
अंग्रेजी के प्रख्यात विद्वान सर विलियम जोंस ने जो स्वयं रोमन भाषा के पक्षधर थे की देवनागरी लिपि की प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सके , उन्होंने कहा है कि देवनागरी लेखन प्रणाली के वर्तमान स्वरूप में किसी भी अन्य प्रणालियों से अधिक सुव्यवस्थित है लज्जा की बात है कि हमारी अंग्रेजी वर्णमाला वर्तनी निहायत अपूर्ण और हास्यपद है! उन्हीं के शब्दों में, “ Devanagari  system which as it is more natural arranged than any others ……..our English alphabets and orthography as disgracefully and most ridiculously imperfect . “
यही नहीं विदेशी विद्वान भाषाविद डाक्टर अार्थर मैक्डोनाल ने संस्कृत साहित्य में लिखा है ,” 400 ईसापूर्व पाणिनि के समय भारत ने अपनी  लिपि को वैज्ञानिकता से समृद्ध कर विकास के उच्चतम सोपान पर प्रतिष्ठित किया जबकि हम यूरोपियन लोग इस वैज्ञानिक युग में 2500 साल वर्ष बाद भी वर्णमाला को गले लगाए हुए हैं जिसें ग्रीकों ने पुराने सेमेटिक लोगों से अपनाया था , हम हमारी भाषा के समस्त ध्वनि समुच्चय का प्रकाशन करने में भी असमर्थ हैं !
अतः भारत की प्राचीन वैज्ञानिक देवनागरी लिपि के वैज्ञानिक क्रमबद्धता स्वर व्यंजन वर्णमाला पूर्ण रूपेण सुव्यवस्थित होने व सहज , सरल , सुग्राह्य  होने के विशिष्ट गुणों के आधार पर हम पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ इस बात का समर्थन करते हैं की पूर्वोत्तर बोलयों / भाषाओं को लिपिबद्ध करने व पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखने के लिए देवनागरी लिपि ही सर्वथा उपयुक्त है !
डॉ. तारा सिंह अंशुल
विभिन्न राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मानों से नवाजी़ गयी वरिष्ठ कवयित्री , लेखिका , कथाकार , समीक्षक , आर्टिकल लेखिका। आकाशवाणी व दूरदर्शन गोरखपुर , लखनऊ एवं दिल्ली में काव्य पाठ , परिचर्चा में सहभागिता। सामाजिक मुद्दे व महिला एवं बाल विकास के मुद्दों पर वार्ता, कविताएं व कहानियां एवं आलेख, देश विदेश के विभिन्न पत्रिकाओं एवं अखबारों में निरन्तर प्रकाशित। संपर्क - tarasinghcdpo@gmail.com

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