आधुनिक सन्दर्भ में सनातन  हिन्दू धर्म के मुख्‍यतः चार संप्रदाय माने गए है- वैदिक, वैष्णव, शैव और स्मार्त। शैव संप्रदाय के अन्तर्गत  ऐसे दार्शनिक व धार्मिक संगठन आते है, जो शिव को सर्वोच्च देवता के रूप में पूजते हैं। शैव संप्रदाय के अंतर्गत ही नाथ संप्रदाय आता हैं। जिस तरह शैव संप्रदाय के कई उप संप्रदाय है उसी तरह वैष्णव और अन्य सम्प्रदायों के उपसम्प्रदायों का भी उल्लेख शास्त्रों में  मिलता हैं। भारत में शैव, शाक्त, नाथ और वैष्णवी संतधारा के आलावा भी कई अन्य ब्रह्मवादी संत समाज की धाराएं प्राचीनकाल से प्रवाहित होती रही है इसके भी प्रमाण मिलते है। लेकिन समय के साथ वे नाथ संप्रदाय में विलीन हो गयी
 
नाथ शब्द का सामान्य अर्थ स्वामी, प्रभु , मालिक आदि लगाया जाता है। वैष्णवों में स्वामी और शैवों में ’नाथ’ शब्द का महत्व है। इसलिए  नाथ शब्द की  व्युत्पत्ति पर विचार करें तो नाथ शब्द नाथृ धातु से बना है जिसका अर्थ याचना ऐश्वर्य  उपताप (तापों को तप से समाप्त करना) आशीर्वाद आदि होता  है। अर्थात जिससे ऐश्वर्य आशीर्वाद कल्याण मिलता है वह नाथ है। 
योगी नरहरिनाथ जी  शाब्दिक पक्ष पर एक ओर  परिभाषा हमारे सामने रखते हैं  उन के अनुसार नाथ यानी न+ अथ जिसका अर्थ है नहीं , दूसरे शब्दों में कहें तो  इससे आगे कोई तत्व नहीं। अगर कोई  इस ब्रह्मांड की सीमा से पार है तो वह नाथ है। इसका सीधा सीधा अर्थ यह हुआ कि  नाथ  अनादि है। ‘सम्प्रदाय से तात्पर्य एक ऐसी परम्परागत धार्मिक संस्था से है जिसमें धार्मिक शिक्षाएं एक आचार्य से दूसरे आचार्य को शिष्य परम्परा की एक निश्चित प्रक्रिया से हस्तान्तरित की  जाती है।
अब प्रश्न उठता है कि  जो संप्रदाय अनादि है उसके जनक कौन? शास्त्रों की माने तो इस महान नाथ धर्म का शुभारंभ आदिनाथ भगवान शिव ने किया, वे इस संप्रदाय के प्रथम नाथ निर्माता नियंता मार्गदर्शक है। . आदि का अर्थ हैं प्रारंभ। ’नाथ’ शब्द का प्रचलन हिन्दू, बौद्ध और जैन संतों के बीच विद्यमान है। यह हम  सभी जानते हैं कि भगवान शंकर को ’भोलेनाथ’ अमरनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ और ’आदिनाथ’ भी कहा जाता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि  उन्हीं के योग ज्ञानामृत का कल्पवृक्ष नाथ योग है। इसके पीछे तर्क देखें तो आदिनाथ होने के कारण शिव का एक नाम आदिश भी है। इस आदिश शब्द से ही आदेश शब्द बना है। ’नाथ’ साधु जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश। एक ओर  प्रमाण के रूप में  देखें तो भगवती पार्वती ने शिवोपदिष्ट नाथ योग पर प्रकाश डालते हुए योग बीज के आरंभ में-नमस्ते आदिनाथाय विश्वनाथाय ते नमः। कहकर शिव की आदिनाथ रूप में वंदना की है। उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि योग ज्ञान आदिनाथ शिव की ही देन है।
भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। भगवान शंकर के बाद इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम भगवान दत्तात्रेय का आता है। उन्होंने वैष्णव और शैव परंपरा में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया।  भगवान दत्तात्रेय के बाद सिद्ध संत गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने ’नाथ’ परंपरा को फिर से संगठित करके पुनः उसकी धारा अबाध गति से प्रवाहित करने का कार्य किया।  गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के बाद उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ का नाम प्रकाश में आता हैं जिन्होंने  शैव धर्म की सभी प्रचलित धारणाओं और धाराओं को एकजुट कर ’नाथ’ परंपरा को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया। 
ऐतिहासिक पक्ष की ओर  दृष्टिपात करें तो एक धारणा  ओर  यह देखने में आती हैं कि  नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति आदिनाथ भगवान शिव द्वारा मानी गयी । उसके बाद लोक कल्याण के लिए इस परम्परा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से  नव नारायणों ने नवनाथों के नाम से, कविनारायण ने श्री मत्स्येन्द्रनाथ के नाम से, करभाजन नारायण ने गहनिनाथ के नाम से, अन्तरिक्ष नारायण ने जालन्धरनाथ के नाम से, प्रबुद्धनारायण ने कानीफरनाथ के नाम से, अविहोर्त्रनारायण ने नागनाथ के नाम से, पिप्पलायननारायण ने चर्पटनाथ के नाम से, चमसनारायण ने रेवणनाथ के नाम से, हरिनारायण ने भर्तृहरिनाथ के नाम से तथा द्रमिलनारायण ने गोपीचन्द्र नाथ के नाम से इसे समय-समय पर धरती के कोने कोने  में  फैलाया।
देखा जाये तो  नाथ संप्रदाय समाज, साहित्य और भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग प्रतीत होता  है। हिन्दू-धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों और मत-मतान्तरों में नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख स्थान दिखाई देता है। भारतवर्ष का कोई प्रदेश, अंचल या जनपद नहीं है जिसे नाथसम्प्रदाय के सिद्धों या योगियों ने अपनी चरण रज से साधना और तत्वज्ञान की महिमा से पवित्र न किया हो। देश के कोने-कोने में स्थित नाथ सम्प्रदाय के तीर्थ-स्थल, मन्दिर, मठ, आश्रम, दलीचा, खोह, गुफा और टिला इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि नाथ सम्प्रदाय भारतवर्ष का एक अत्यन्त गौरवशाली प्रभविष्णु, क्रान्तिकारी तथा महलों से कुटियों तक फैला सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने वाला लोकप्रिय प्रमुख पंथ रहा है। नाथ सिद्ध साहित्य और संप्रदाय के साधन और सिद्धांतों के संबंध में अनेक विवाद है। लेकिन उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्- के सिद्धांत को आज भी सामान्य जनता अपने जीवन और आचरण में उतारती है।
कुलमिलाकर यदि  नाथ संप्रदाय को परिभाषित करें तो आदिनाथ शिव द्वारा स्थापित, अवलोकितेश्वर मत्स्येंद्रनाथ द्वारा पोषित तथा गुरु गोरखनाथ द्वारा अनुप्राणित प्रचारित प्रसारित और नाथ सिद्धों एवं संत योगियों द्वारा साधित मार्ग नाथ संप्रदाय कहा जाता है इसे नाथ पंथ भी कहते हैं।
गुरु गोरखनाथ अथवा गोरक्षनाथ के विषय में बात करें तो गोरखनाथ नवी शती के उदारचेता कर्मठ संगठनकर्ता  समाजोद्धारक लोक रक्षक योग साधना के विशिष्ट पुरस्कार प्राप्त महा सिद्ध थे। आदिनाथ शिव से जो तत्वज्ञान श्री मत्स्येन्द्रनाथ ने प्राप्त किया था उसे ही शिष्य बनकर शिवावतार गोरक्षनाथ ने ग्रहण किया तथा नाथपंथ और साधना के प्रतिष्ठापक परमाचार्य के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की। मान्यता है कि  वे शिव के ही अवतार थे, महाकाल योगशास्त्र कल्पद्रुम में, देवताओं के पूछने पर गोरक्षनाथ कौन है ? उत्तर में स्वयं महेश्वर आदिनाथ कहतें हैं –
अहमेवास्मि गोरक्षो , मद्रूपं तन्निबोधत।
योगमार्गप्रचाराय मया रूपमिदम् धृतम्।I
अर्थात् “हे देवताओं मैं ही गोरक्षनाथ हूँ, उन्हें मेरा ही रूप जानो मेरे से पृथक नहीं, प्राणियों को मृत्यु के मुख में जाते हुए देख मैंने योगमार्ग के प्रचारार्थ इस रूप को धारण किया है” इस प्रकार श्री गोरक्षनाथ स्वयं सच्चिदानन्द शिव के साक्षात्स्वरूप के रूप में प्रसिद्ध हुए । 
गोरखनाथ जी साक्षात शिव स्वरूप ही थे परंतु लोक  मर्यादा के लिए उन्होंने संपूर्ण योग सिद्धि से संपन्न होते हुए भी योग साधना और तपस्या में तत्पर होकर लोगों में योग ज्ञान के प्रति अभिरुचि उत्पन्न की। साधारण मनुष्य की तरह गोरखनाथ जी ने योगीन्द्र मत्स्येंद्रनाथ से योग दीक्षा प्राप्त की थी। दीक्षा प्राप्त करने के बाद गोरखनाथ ने विभिन्न पुण्य स्थलों में तपस्या की और लोकमानस को नाथ योग चेतना से समृद्ध किया। उन्हें चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज, अमरकाय सिद्ध महापुरुष माना जाता है जिसने एशिया के विशाल भूखण्ड तिब्बत, मंगोलिया, कान्धार, अफगानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्श को अपने योग महाज्ञान से कृतार्थ किया।
गुरु गोरखनाथ एक ऐसा नाम है जो समस्त भारतीय समाज धर्म और साहित्य में समान भाव से चिरपरिचित और सम्मानित है। भारतीय समाज के लिए धार्मिक साधनात्मक और चिंतक मनीषी के रूप में शंकराचार्य के बाद गोरखनाथ जी का नाम लिया जा सकता है। गोरखनाथ जी के अलौकिकता  के कई प्रमाण भी समय समय पर मिलते है , नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार गोरखनाथ जी सतयुग में पेशावर (पंजाब) में, त्रेतायुग में गोरखपुर (उ.प्र.) में, द्वापरयुग में हरमुज (द्वारिका से भी आगे) में तथा कलियुग में गोरखमढ़ी (सौराष्ट्र) में आविर्भूत हुए थे। बंगाल में यह विश्वास किया जाता है कि गोरखनाथ जी उसी प्रदेश में पैदा हुए थे। 
परम्परा के अनुसार जिसका पाश्चात्य विद्वान्  ब्रिग्स ने उल्लेख किया है जब श्रीविष्णु कमल से प्रकट हुए उस समय गोरखनाथ जी पाताल में तपस्या कर रहे थे। उन्होंने सृष्टिकार्य में श्रीविष्णु की सहायता भी की थी। जोधपुर नरेश महाराज मानसिंह द्वारा विरचित ‘श्रीनाथतीर्थावली’ के अनुसार प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में कंकण बन्धन श्री गोरक्षनाथ जी की कृपा से ही हुआ था।
भारत में कलयुग में दो महान संतों का जन्म हुआ है। पहले आदि शंकराचार्य और दूसरे गुरु गोरखनाथ। दोनों के ही कारण धर्म और संस्कृति का पुनरुत्थान हुआ। यह देश इन दोनों का ऋणि है। आज भी भारत में साधु और संतों की जो भी परंपरा, संप्रदाय या अखाड़े विद्यमान हैं, वे सभी शंकराचार्य या गुरु गोरखनाथ की परंपरा से संबंधित ही रहे हैं।
गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। गुरू गोरखनाथ के जन्म के सम्बन्ध में योगी नरहरिनाथजी कहते हैं –
वैशाखी शिव पूर्णिमा तिथिवरे वारे मंगले।
  लोकानुग्रह विग्रहः शिवगुरुर्गोरक्षनाथो भवत।।
अर्थात महायोगी  गुरु गोरक्षनाथ का जन्म वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि और वार मंगलवार को हुआ था। अंग्रेजी माह के अनुसार यह जयंती मई माह में आती है,  गुरु गोरखनाथ के जन्म के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित है। उन्हीं में से गुरु गोरक्षनाथ के जन्म की एक कथा बहुत  रोचक है। जिसके अनुसार 
एक बार भिक्षाटन के क्रम में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ किसी गांव में गए। किसी एक घर में भिक्षा के लिए आवाज लगाने पर गृह स्वामिनी ने भिक्षा देकर आशीर्वाद स्वरूप पुत्र की याचना की। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ सिद्ध तो थे ही। अतः गृह स्वामिनी की याचना स्वीकार करते हुए उन्होंने एक चुटकी भर भभूत देते हुए कहा कि इसका सेवन करने के बाद यथासमय वे माता बनेंगी। उनके एक महा तेजस्वी पुत्र होगा जिसकी ख्याति चारों और फैलेगी।
आशीर्वाद देकर गुरु मत्स्येन्द्रनाथ अपने भ्रमण क्रम में आगे बढ़ गए। बारह वर्ष बीतने के बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उसी ग्राम में पुनः आए। कुछ भी नहीं बदला था। गांव वैसा ही था। गुरु का भिक्षाटन का क्रम अब भी जारी था। जिस गृह स्वामिनी को अपनी पिछली यात्रा में गुरु ने आशीर्वाद दिया था, उसके घर के पास आने पर गुरु को बालक का स्मरण हो आया। उन्होंने घर में आवाज लगाई। वही गृह स्वामिनी पुनः भिक्षा देने के लिए प्रस्तुत हुई। गुरु ने बालक के विषय में पूछा।
गृहस्वामिनी कुछ देर तो चुप रही, परंतु सच बताने के अलावा उपाय न था। उसने तनिक लज्जा, थोड़े संकोच के साथ सब कुछ सच सच बतला दिया। उसने कहा कि आप से भभूत लेने के बाद पास-पड़ोस की स्त्रियों ने राह चलते ऐसे किसी साधु पर विश्वास करने के लिए उसकी खूब खिल्ली उड़ाई। उनकी बातों में आकर मैंने वह भभूत को पास के गोबर से भरे गड्डे में फेंक दिया था।

गुरु मत्स्येन्द्रनाथ तो सिद्ध महात्मा थे। उन्होंने अपने ध्यानबल देखा और वे तुरंत ही गोबर के गड्डे के पास गए और उन्होंने बालक को पुकारा। उनके बुलावे पर एक बारह वर्ष का तीखे नाक नक्श, उच्च ललाट एवं आकर्षण की प्रतिमूर्ति स्वस्थ बच्चा गुरु के सामने आ खड़ा हुआ। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ बच्चे को लेकर चले गए। यही बच्चा आगे चलकर गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
गुरू  गोरखनाथ उस समय अवतरित हुए जब हिंदी के आदि कालीन समाज में अमर्यादित जीवन स्वेच्छाचार अतिवादिता, आडंबर विलास की आड़ में भोग को योग घोषित करने की प्रवृत्ति का बोलबाला था। योग के प्रति धारणा गिरती जा रही थी  अंधविश्वास बढ़ रहा था। ऐसे समय में वज्र साधकों और सहजयानियों के बीच अनुशासित जीवन का मार्ग गुरू  गोरखनाथ ने ढूंढ निकाला। जिससे शरीर शुद्धीकरण शुद्ध आचार सात्विक कर्मठ और अनुशासित जीवन सामने आया। हिंदी का संत साहित्य सूफी साहित्य विश्व व्यापक बौद्ध साहित्य आदि ने किसी न किसी रूप में गोरखनाथ जी से प्रेरणा ग्रहण की। संपूर्ण भारत में ही नहीं उससे बाहर भी संप्रदाय एवं पंथ संस्थाएं अभी भी इस बात की साक्षी है।
गोरखनाथ जी ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा करके दलित पीड़ित उपेक्षित जन समाज का उद्धार किया और मानवता का संदेश देकर तत्कालीन समाज को स्वस्थ सबल चारित्रिक आदर्श के मार्ग पर जाति धर्म आदि से मुक्त होकर चलने के लिए प्रेरित किया। जैसा कि पाश्चात्यविद्वान जार्ज ग्रियर्सन ने भी कहा है, ‘‘उन्होंने लोकजीवन का पारमार्थिक स्तर उत्तरोत्तर उन्नत और समृद्ध कर, निष्पक्ष आध्यात्मिक क्रान्ति का बीजारोपण कर योगकल्पतरु की शीतल छाया में त्रयताप से पीड़ित मानवता को सुरक्षित कर जो महनीयता प्राप्त की वह उनकी महती अलौकिक सिद्धि की परिचायिका है।’’
 गोरखनाथ जी ने समय-समय पर भारत के विभिन्न स्थानों में तपस्या और योग साधना की सौराष्ट्र पंजाब उत्तराखंड हिमालय बंगाल कर्नाटक आदि प्रदेशों में उनकी तप:स्थलियां विद्यमान है। 3 शक्तिपीठ विशेष रूप से प्रसिद्ध है नेपाल और भारत की सीमा पर स्थित प्रसिद्ध देवीपाटन शक्तिपीठ। नेपाल में चौघड़ा स्थान और गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर।
गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित योगी-सम्प्रदाय सामान्यतः ‘नाथ-योगी’, ‘सिद्ध-योगी’, ‘दरसनी योगी’ या ‘कनफटा योगी’ के नाम से प्रसिद्ध है। योगी का लक्ष्य नाथ अर्थात् स्वामी होना है। प्रकृति के ऊपर पूर्ण स्वामित्व स्थापित करने के लिये योगी को अनिवार्यतः नैतिक, शारीरिक बौद्धिक एवं आध्यात्मिक अनुशासन की क्रमिक विधि का पालन करना पड़ता है। उसे अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और क्रियाओं, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीर तथा स्थान और समय, गरिमा और गुरुत्व, प्राकृतिक नियमों एवं भौतिक तत्त्वों आदि सभी पर नियंत्रण करना पड़ता है। उसे निश्चय ही सभी प्रकार के बन्धनों, दुःखों और सीमाओं से ऊपर उठना पड़ता है। उसे शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करनी पड़ती  है। उसे मृत्युंजयी होना पड़ता है।  उसे अज्ञान के परदे को फाड़कर निरपेक्ष सत्य की अनुभूति करनी पड़ती है। योग साधना के सम्बन्ध में  प्रखरतम संत गोरखनाथ की इस अद्भुत वाणी को देखिए–
“मरो हे जोगी मरो!
मरो, क्योंकि मरण है मीठा
ऐसी मरण मरो
जैसी मरण गोरख मरदीठा।”
योगियों को विभिन्न संज्ञाएँ सम्भवतः इसलिये दी गई हैं कि जिस उच्चतम आध्यात्मिक आदर्श की अनुभूति के लिये उन्होंने योग-सम्प्रदाय में प्रवेश किया है, उसकी स्मृति अनंत रूप से बनी रहे।। यह भौतिक शरीर भी आध्यात्मिक स्पर्श के द्वारा समय और स्थान की सीमाओं से परे दिव्य बना दिया जाता है, जिसे आध्यात्मिक शब्दावली में काया-सिद्धि कहते हैं। जो योगी आत्मानुभूति की उच्चतम स्थिति तक पहुँच जाता है, सामान्यतः अवधूत कहलाता है। अवधूत से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, जो प्रकृति के सभी विकारों का अतिक्रमण कर जाता है, जो प्रकृति की शक्तियों और नियमों से परे है, जिसका व्यक्तित्व मलिनताओं, सीमाओं, परिवर्तनों तथा इस भौतिक जगत् के दुःखों और बन्धनों के स्पर्श से परे हो जाता है। वह जाति, धर्म, लिंग, सम्प्रदाय और राष्ट्र के भेदों से ऊपर उठ जाता है। वह किसी भी प्रकार के भय, चाह या बन्धन के बिना पूर्ण आनन्द और स्वच्छन्दता की स्थिति में विचरण करता है। उसकी आत्मा परमात्मा या भगवान शिव, विश्व के स्रष्टा, शासक और हर्ता के साथ एकाकार हो जाती है।। इस प्रकार का अवधूत ही सच्चे अर्थों में नाथ, सिद्ध या दर्शनी है; जब कि अन्य योगी इस स्थिति की कामना करने वाले मात्र हैं।
सभी शैव मत  तीन सिद्धान्तों पर सहमत हैं। ये सिद्धान्त क्रमशः
  1. ‘पति अर्थात शिव,
  2. ‘पशु  अर्थात जीव अथवा आत्मा और
  3. ‘पाश अर्थात बन्धन जो आत्मा को भौतिकता में बांधे रखता है। आत्मा के लिये इस बंधन से मुक्ति और   शिवत्व की प्राप्ति का उद्देश्य निर्धारित किया गया है। 
इस उद्देश्य के निमित्त चार मार्ग बताये गये हैं। 
  1. ‘चर्या अर्थात उपासना के बाह्य कार्य,
  2. ‘क्रिया अर्थात ईश्वर की सेवा के लिये अन्तरंग कार्य,
  3. ‘योग अर्थात आत्मा तथा परमात्मा के मिलन की क्रिया और
  4. ‘ज्ञान अर्थात तत्त्वज्ञान को शामिल किया गया है।
इस प्रकार  शैव मत के एक से अनेक होने की कथा अनंत है और ऐसा प्रतीत होता है कि, सृष्टि के विस्तार के उद्देश्य से आदिनाथ शिव की ‘एकोऽहं बहुस्याम अर्थात एक से अनेक होने की इच्छाशक्ति  शैव मत के सन्दर्भ में भी चरितार्थ हुई ।
नाथ साहित्य शैव साहित्य है। नाथ मार्ग को कुछ विद्वान अद्वैतवादी मानते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि नाथ सिद्ध आचार्य अपना भेद स्थिर करने के लिए सिद्धांत की दृष्टि से स्वयं को द्वैताद्वैत विलक्षण वादी कहते हैं क्योंकि नाथ तत्व द्वैत और अद्वैत दोनों से परे है।
डॉ कल्याणी मल्लिक ने बताया है कि गोरक्ष का दर्शन प्राचीन काल के शैव मत के अद्वैतवाद पर आधारित है। किंतु उनका नाथ तत्व द्वैत अद्वैत साकार निराकार से परे है।शिव शक्ति संबंध के विषय में नाथ गण कहते हैं।
शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति: शक्तेरभ्यन्तरे शिव:
अन्तरं नैव पश्यामि चन्द्रचंद्रिकयोरिव:
अर्थात एक ही अद्वितीय परम तत्व दृष्टि भेद से शिव या शक्ति आख्या को प्राप्त करता है।
शिव शक्ति रूप होकर सर्वा कारों में स्फूरित होते हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रय भूत है। धर्म के बिना धर्मी अकल्पनीय है इस प्रकार दोनों तत्वत: अभिन्न है।
नाथ योगी साधक का लक्ष्य है शिव और शक्ति का सामरस्य रूप सहज समाधि। इ स प्रकार की जाने वाली शक्ति की उपासना अंततः शिव उपासना ही है।
योगी-सम्प्रदाय के योगी कुछ निश्चित प्रतीकों का प्रयोग करते हैं, जो केवल व्यवहारगत् साम्प्रदायिक चिह्न न होकर आध्यात्मिक अर्थ भी रखते हैं। नाथ-योगी का एक प्रकट चिह्न उसके फटे हुये कान तथा उसमें पहने जाने वाले कुण्डल हैं। इस सम्प्रदाय का प्रत्येक व्यक्ति संस्कार की तीन स्थितियों से गुजरता है। तीसरी या अन्तिम स्थिति में गुरु उसके दोनों कानों के मध्यवर्ती कोमल भागों को फाड़ देता है और जब घाव भर जाता है तो उनमें दो बड़े छल्ले पहना दिये जाते हैं। यही कारण है कि इस सम्प्रदाय के योगी को सामान्यतः कनफटा योगी कहते हैं। संस्कार का यह अन्तिम रूप योगी शिष्य की सच्चाई और निष्ठा की परीक्षा प्रतीत होता है, जो इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि शिष्य अति पवित्र जीवन व्यतीत करने तथा रहस्यमय योग-साधना में पूरा समय और शक्ति देने को प्रस्तुत है। योगी के द्वारा पहना जाने वाला छल्ला ‘मुद्रा’, ‘दरसन’, ‘कुण्डल’ गुरु के प्रति शिष्य के शरीर के पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है। इस प्रकार का आत्मसमर्पण ही शिष्य के शरीर और मनको पूर्णतः शुद्ध कर देता है। उसे समस्त अहमन्यताओं और पूर्वाग्रहों से मुक्त करके इतना स्वच्छ कर देता है कि वह ब्रह्म, शिव या परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभति कर सके।
गोरखनाथ के उन अनुयायियों को, जिन्होंने सभी सांसारिक सम्बन्धों को त्याग दिया है और योगी-सम्प्रदाय में प्रविष्ट हो गये हैं किन्तु जिन्होंने अन्तिम दीक्षा-संस्कार के रूप में कान नहीं फड़वाया है, सामान्यतः औघड़ कहते हैं। इनकी स्थिति बीच की है। एक ओर तो सामान्य शिष्य हैं जो अभी योगी सम्प्रदाय के बाहर हैं और दूसरी और दरसनी योगी हैं, जिन्होंने सांसारिक जीवन को पूर्णतः त्याग दिया है और जब तक लक्ष्य- सिद्धि न हो जाय, योग के गुह्य साधना-मार्ग से विरत न होने का दृढ़ व्रत लिया है। औघड़ तथा दर्शनी योगी ऊन का पवित्र ‘जनेव’ (उपवीत) पहनते हैं। इसी में एक छल्ला जिसे ‘पवित्री’ कहते हैं, लगा रहता है। छल्ले में एक नादी लगी रहती है जो ‘नाद’ कहलाती है और इसी के साथ रुद्राक्ष की मनिया भी रहती है। ‘नाद’ उस सतत एवं रहस्यात्मक ध्वनि का प्रतीक है, जिसे प्रणव (ऊँ) की अनाहत ध्वनि कहते हैं, जो परमतत्त्व (ब्रह्म) का ध्वन्यात्मक प्रतीक है तथा पिण्ड और ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। रुद्राक्ष (शिव या रुद्र की आँख) तत्त्वदर्शन (ज्ञान) या ब्रह्म की प्रत्यक्ष अनुभूति से मानव-चेतना के प्रकाशित होने का प्रतीक है। इस प्रकार योगियों के द्वारा धारण किये जाने वाले सभी बाह्य उपकरण, जिस सत्य की उन्हें अनुभूति करनी है, जिस आदर्श तक उन्हें पहुँचना है और जिस अनुशासन एवं विधि का उन्हें पालन करना है, उसकी स्मृति को सतत सजीव करने के लिए हैं।

नाथ पंथ में अभिवादन की एक अलौकिक प्रथा है। सामान्य जन से अभिवादन के समय इस पंथ के लोग प्रचलित अभिवादनों का प्रयोग करते हैं। परन्तु आपस में अभिवादन के लिए ‘आदेश’ शब्द का घोष किया जाता है। अपने से वरिष्ठ को अभिवादन करते समय ‘आदेश महाराज जी’ कहा जाता है। प्रति उत्तर में वरिष्ठ द्वारा आदेश-आदेश बोला जाता है।
। भारत में नाथ योगियों की परंपरा बहुत ही प्राचीन रही है। नाथ समाज हिन्दू धर्म का एक अभिन्न अंग है। भगवान शंकर को आदिनाथ और दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है। इन्हीं से आगे चलकर नौ नाथ और 84 नाथ सिद्धों की परंपरा शुरू हुई। नौ नाथों के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं। सभी नाथ साधुओं का मुख्‍य स्थान हिमालय की गुफाओं में है। नागा बाबा, नाथ बाबा और सभी कमंडल, चिमटा धारण किए हुए जटाधारी बाबा शैव और शाक्त संप्रदाय के अनुयायी हैं, लेकिन गुरु दत्तात्रेय के काल में वैष्णव, शैव और शाक्त संप्रदाओं का समन्वय किया गया था। नाथ संप्रदाय की एक शाखा जैन धर्म में है तो दूसरी शाखा बौद्ध धर्म में भी मिल जाएगी। यदि गौर से देखा जाए तो इन्हीं के कारण इस्लाम में सूफीवाद की शुरुआत हुई। भोलेनाथ, भैरवनाथ  साईनाथ बाबा (शिरडी) भी नाथ योगियों की परंपरा से थे। गोगादेव, बाबा रामदेव आदि संत भी इसी परंपरा से थे। तिब्बत के सिद्ध भी नाथ परंपरा से ही थे।

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गोरक्षनाथजी के बारे में लिखित उल्लेख हमारे पुराणों में भी मिलते हैं। विभिन्न पुराणों में इससे संबंधित कथाएं मिलती हैं। इसके साथ ही साथ बहुत-सी पारंपरिक कथाएं और किंवदंतियां भी समाज में प्रसारित हैं।
गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणीधान को अधिक महत्व दिया है। इनके माध्‍यम से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया। श्री गोरखनाथ जी द्वारा प्रतिपादित योग मार्ग में मंत्र योग लययोग हठ योग राजयोग और महायोग है। 
गोरखनाथजी का योगी सम्प्रदाय कई उपपंथों में विभाजित है। इनमें से प्रत्येक या तो गोरखनाथ जी के निकटतम शिष्य या उनके प्रमुख अनुयायी द्वारा प्रवर्तित हैं। इस सभी उपपंथों की सामूहिक संख्या 12 मानी जाती है। इसलिये इन्हें ‘बारह पन्थी’ कहते हैं (अर्थात वह सम्प्रदाय जिसमें 12 उपपंथ हैं)। जिस प्रकार शंकराचार्य के अनुयायी संन्यासियों की 10 शाखाएँ हैं, उसी प्रकार गोरखपंथी योगियों की 12 शाखाएँ हैं। ये सभी शाखाएँ साधना-प्रणाली एवं दार्शनिक मत दोनों में साम्य रखती हैं और सभी गोरखनाथ जी के प्रति श्रद्धालु हैं। उनमें कुछ छोटी-मोटी भिन्नताएँ हैं। अनेक उपलब्ध तालिकाओं के आधार पर इन उपपंथों की वास्तविक संख्या 12 से अधिक हो जाती है। इससे इस बात की पूरी सम्भावना की जा सकती है कि मूल शाखाएँ आगे चलकर कुछ प्रधान गुरुओं के द्वारा पुनः विभाजित कर दी गयी हैं। सम्प्रदाय के प्रमुख उपपंथ निम्नलिखित हैं-
1. सतनाथी, 2. रामनाथी, 3. धर्मनाथी, 4. लक्ष्मननाथी, 5. दरियानाथी, 6. गंगानाथी, 7. बैरागीपंथी, 8.रावलपंथी या नागनाथी, 9. जालन्धरनाथी, 10. आई पंथी या ओपन्थी, 11. कापलती या कपिल पंथी, 12. धज्जा नाथी या महावीर पंथी।
गोरखनाथ की परंपरा में ही आगे चलकर कबीर, गजानन महाराज, रामदेवरा, तेजाजी महाराज, शिरडी के साई आदि संत हुए।
ये विभिन्न 12 पंथ भारतवर्ष के विभिन्न भागों में अपना प्रमुख केन्द्र रखते हैं किन्तु ये सभी देशव्यापी पंथ एक संगठन से सम्बद्ध हैं। अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा केन्द्रीय संगठन की तरह कार्य करती है। अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा भारतवर्ष में धर्माचार्यो का सबसे बड़ा संगठन है। इस केन्द्रीय संगठन की स्थापना ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ महाराज जी द्वारा की गयी थी। उनके बाद ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज इस केन्द्रीय संगठन के मुखिया रहे। वर्तमान में गोरक्षपीठाधीश्वर महंत आदित्यनाथ जी महाराज इस केन्द्रीय संगठन के मुखिया हैं। विभिन्न पंथों के मुखिया या उनके प्रतिनिधि महंत आदित्यनाथ जी महाराज के मार्गदर्शन में मंदिर, मठों या पूजा स्थलों का संचालन करते हैं। 
नाथ-पंथी योगियों का साहित्य विशाल है- संस्कृत में भी और विभिन्न प्रान्तीय बोलियों और भाषाओं में भी। योग-साधना तथा सिद्धान्त को लेकर लिखे गये प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों के अतिरिक्त, जिन्हें योगी लोग पूर्णतः प्रामाणिक मानते हैं, स्वयं गोरखनाथ, ऐसी अनेक रचनाओं के प्रणेता बताये जाते हैं, जो योग-साधना के पथ पर चलने वालों के लिये अमूल्य हैं। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथ की हिन्दी में सबसे प्रसिद्ध रचना ‘सबदी’ है, इसका काफी महत्व है। डॉ. बड़थ्वाल की खोज में निम्नलिखित 40 पुस्तकों का पता चल हैं- 1.सबदी, 2. पद, 3.शिष्यादर्शन, 4.प्राण सांकली, 5.नरवै बोध, 6.आत्मबोध, 7.अभय मात्रा जोग, 8.पंद्रह तिथि, 9. सप्तवार, 10.मंछिद्र गोरख बोध, 11.रोमावली, 12.ग्यान तिलक, 13.ग्यान चैंतीसा, 14.पंचमात्रा, 15.गोरखगणेश गोष्ठ, 16.गोरखदत्त गोष्ठी (ग्यान दीपबोध), 17.महादेव गोरखगुष्टिउ, 18.शिष्ट पुराण, 19.दया बोध, 20.जाति भौंरावली (छंद गोरख), 21. नवग्रह, 22.नवरात्र, 23.अष्टपारछ्या, 24.रह रास, 25.ग्यान माला, 26.आत्मबोध (2), 27.व्रत, 28.निरंजन पुराण, 29.गोरख वचन, 30.इंद्र देवता, 31.मूलगर्भावली, 32.खाणीवाणी, 33.गोरखसत, 34.अष्टमुद्रा, 35.चौबीस सिध, 36 षडक्षर, 37.पंच अग्नि, 38.अष्ट चक्र, 39 अचूक 40. काफिर बोध।
सम्प्रदाय के परवर्ती शिक्षकों ने भी प्रचुर साहित्य-सृजन किया है। ‘गोरक्ष-शतक’, गोरख-संहिता, सिद्धान्त-पद्धति, योग-सिद्धान्त पद्धति, सिद्धसिद्धान्त-पद्धति, हठयोग, ज्ञानामृत आदि अनेक संस्कृत-ग्रन्थ गोरखनाथ जी कृत बताये जाते हैं। हठ-योग प्रदीपिका, शिव-संहिता, और घेरण्ड-संहिता योग-साधन सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं और इनके रचयिता इसी सम्प्रदाय के योगी बताये जाते हैं। ‘गोरक्षगीता’, ‘गोरक्षकौमुदी’, ‘गोरक्ष-सहस्रनाम’, ‘योग-संग्रह’, ‘योग-मंजरी’, ‘योग-मार्तण्ड’ तथा इसी प्रकार की अन्य अनेक कृतियाँ गोरखनाथ के शिक्षा-सिद्धान्तों पर आधृत हैं। इनके साथ ही हिन्दी, बंगाली, मराठी तथा अन्य भाषाओं में इस सम्प्रदाय से सम्बद्ध अनेक पुस्तकें हैं।
गोरक्षनाथ अपने काल के परम शक्तिशाली महात्मा थे। रचना पद्धति और काव्य शैली की दृष्टि से गोरक्षनाथ की रचनाओं में अनेक रूप मिलते हैं। उनकी रचनाओं के जो रूप उपलब्ध हैं वह भिन्न-भिन्न प्रकार और शैलियों के हैं। प्रायः सभी भारतीय भाषाओं के साहित्यों में इनसे संबंधित रचनाएं मिल जाएंगी। बौद्धों शैवों शाक्तों कापालिकों तथा भोटिया साहित्य में भी इनकी महिमा स्वीकृत है। गोरखनाथ एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। 
माना जाता है कि जितने भी देवी-देवताओं के साबर मंत्र है उन सभी के जन्मदाता श्री गोरखनाथ ही है। कहते हैं कि मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है, मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है और मं‍त्र से किसी यक्षिणी और यक्ष को भी साधा जाता है। ’मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है। मुख्यतः 3 प्रकार के मंत्र होते हैं- 1.वैदिक मंत्र, 2.तांत्रिक मंत्र और 3.शाबर मंत्र। साबर मंत्रों के जनक गुरु मत्स्येंद्र नाथ और उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ हैं। इन मंत्रों को शैवपंथ की नाथ परंपरा के अलावा आदिवासी, बंजारा, सपेरा, जादूगर और भारत की अन्य जनजातियों के मंत्र माने जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि असल में इन शाबर मंत्रों से तामसिक देवों की प्रार्थना की जाती है, साबर मंत्र को प्राकृत मंत्र भी कहते हैं। अर्थात यह संस्कृत नहीं बल्कि प्राकृत भाषा की आम बोलचाल की भाषा के मंत्र है। सामान्यतया ‘शाबर-मंत्र’ हिंदी में ही मिलते हैं लेकिन कुछ मंत्रों में संस्कृत, हिंदी, मलयालम, कन्नड़, गुजराती ऊर्दू या तमिल भाषाओं का मिश्रित रूप या फिर शुद्ध क्षेत्रीय भाषाओं की ग्राम्य शैली का भी समावेश देखा गया है शाबर मंत्र से ज्ञान या मोक्ष नहीं बल्की सांसारिक कार्य और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। इस साधना को किसी भी जाति, वर्ण, आयु का पुरुष या स्त्री कर सकते हैं। इन मंत्रों की साधना में गुरु की इतनी आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि इनके प्रवर्तक स्वयंसिद्ध-साधक रहे हैं।
गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे। माता ज्वालादेवी के स्थान पर तपस्या कर उन्होंने माता को प्रसंन्न कर लिया था। उन्होंने योग के कई नए आसन विकसित किए थे। जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठिन (आड़े-तिरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ’यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’
गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है। गोरखनाथ के हठयोग की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं- चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव ( जालंधर या जालिंदरनाथ) आदि। 13वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। कुछ लोग नौ नाथ का क्रम ये बताते हैः- मत्स्येन्द्र, गोरखनाथ, गहिनीनाथ, जालंधर, कृष्णपाद, भर्तृहरि नाथ, रेवणनाथ, नागनाथ और चर्पट नाथ।।।
गोरखनाथ का प्रार्दुभाव हिन्दी साहित्य के इतिहास के अनुसार आदिकाल या वीरगाथा काल में हुआ। उस समय हिन्दी भाषा गर्भावस्था में भी। फिर भी गोरखनाथ का व्यक्तित्व इतना विशाल और प्रभावशाली था कि उनके सैकड़ों साल बाद भक्ति काल के कवियों पर उनका प्रभाव देखा जाता है। राम सागर शुक्ल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भारतीय धर्म साधना के इतिहास में गोरखनाथ के नाथ संप्रदाय का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्रख्यात विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने ग्रंथ ‘नाथ सम्प्रदाय’ की भूमिका में लिखा है- ‘भक्ति आंदोलन के पूर्व यह (नाथ संप्रदाय) सर्वाधिक महत्वपूर्ण धार्मिक आंदोलन रहा सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का ‘योग मार्ग’ ही था। और बाद में भी शक्तिशाली रहा। भारत वर्ष की ऐसी कोई भाषा नहीं, जिसमें गोरखनाथ की कहानी नहीं पाई जाती है। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े धार्मिक और सामाजिक नेता थे, उन्होंने जिस धातु को छुआ, वही सोना हो गई । सच बात तो यह है कि गोरखनाथ स्वयं एक आन्दोलन थे। माना  कि  नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला।
प्राचीन काल से ही भारत में साधु और संतों के प्रति बहुत आदर और सम्मान रहा है। एक ओर जहां भारत में देवी, देवताओं और भगवानों के मंदिर बने तो दूसरी और सिद्ध ऋषि और मुनियों के समाधि स्थल भी बने। उल्लेखनीय है भारत में प्राचीनकाल से ही सिद्ध संतों की बैठक समाधि दी जाती रही है। साधु और संतों का कभी दाह संस्कार नहीं होता। भारत में ऐसे हजारों संतों के आज भी समाधि स्थल मौजूद है गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) थे।  मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि उज्जैन के गढ़कालिका के पास स्थित है। कहते हैं कि गोरखनाथ का समाधी स्थल गोरखपुर में है। यहां दुनियाभर के नाथ संप्रदाय और गोरखनाथजी के भक्त उनकी समाधि पर माथा टेकने आते हैं। इस समाधि मंदिर के ही महंत अर्थात प्रमुख साधु है महंत आदित्यनाथ योगी। महान चमत्कारिक और रहस्यमयी गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर और एक जाति का नाम गोरखा है। 
भारतीय नैतिकता और आचार का सजीव रूप गोरखनाथ की इन रचनाओं में मिलता है। आचरण के बिना शास्त्र रहस्यवाद नीति सिद्धांत उपदेश प्रवचन व्याख्यान खोखले हैं। आज के वातावरण में समानता की भावना सामाजिक समदृष्टि का विकास और सांप्रदायिक एकता की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है इसलिए भारतीय जनजीवन ही नहीं संपूर्ण मानव समाज को आज गोरखनाथ जैसे महापुरुषों के आदर्शों और सिद्धांतों की आवश्यकता है ‌।
गोरखनाथ का व्यक्तित्व एक प्रखर समाजसेवी, तेजस्वी धार्मिक नेता और ओजस्वी साहित्यकार का है। इसके बावजूद हिन्दी साहित्य के इतिहास और भारतीय इतिहास में उनकी उपेक्षा की गई। गोरखनाथ के व्यक्तित्व और कृतित्व का सही मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व का आकलन उनके कार्यों और उनके उपलब्ध साहित्य के आधार पर किया जाना चाहिए। अगर कबीर, रैदास, मीरा, तुलसीदास और अन्य संत कवियों की रचनाओं को शिक्षा के पाठ्यक्रम में रखा जा सकता है, तो इन सब संत कवियों पर अमिट छाप छोड़ने वाले गोरखनाथ की रचनाओं को भी युवाओं को पढ़ने का अवसर दिया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि महायोगी के रूप में स्थापित गोरक्षनाथ और नाथ पंथ के बारे में ज्ञान फैलाने, शोध करने के उद्देश्य  से दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में श्री गोरक्षनाथ शोध पीठ शुरू हो गई है। शोध पीठ ऑनलाइन भी नाथ पंथ के बारे में जानकारियां देगी। पंथ की पांडुलिपियों को सहेजने की भी जिम्मेदारी पीठ पर होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पीठ की आधारशिला रखते हुए एक वेबसाइट भी लांच की है, वेबसाइट के जरिए शोध पीठ लोगों को पंथ के बारे में ज्ञान देगी। पीठ की तीन भूमिकाएं होंगी। पहला शोध, दूसरा वेबसाइट के जरिए नाथ पंथ का ज्ञान फैलाना और तीसरा काम पांडुलिपियों को सहेजना और उन्हें प्रकाशित करना।
संदर्भ ग्रंथ
  1. गुरू गोरखनाथ पंथ और योगी आदित्यनाथ-राजीव अग्रवाल-श्री विनोद पुस्तक मंदिर आगरा।
  1. गोरख नाथ -नाथ संप्रदाय के परिप्रेक्ष्य में। डॉ नागेंद्र नाथ उपाध्याय। विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी।
  1. एशिया के ज्योतिपुंज गुरू गोरखनाथ –  राम सागर शुक्ल-रश्मि प्रकाशन.
  1. नाथ संप्रदाय के १२ पंथ – आलेख – हुकम सिंह  05/09 /2011  
  1. गोरख बानी सबदी  48-197
  1. शाबर मंत्र – आलेख – पं. रामप्रसाद मालवीय वेबदुनिया 30/12/2019
  1. गोरखनाथ-नागेंद्र नाथ उपाध्याय साहित्य अकादमी 
डॉ. उर्मिला पोरवाल हिन्दी विभागाध्यक्षा, शेषाद्रिपुरम महाविद्यालय बैंगलोर 7829275695

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