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दिव्या शर्मा की लघुकथा – रंगरेज़

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” यह पीला रंग तुम पर बहुत खिलेगा।”किसी ने हौले से उससे  कहा था।
वह मुस्कुराई और उसके तन-बदन पर पीत रंग चढ़ गया।
“तुम्हारे लिए अब  लाल रंग जरूरी है।” एक दिन उसी ने कहा।
वह मुस्कुराई। जल्द ही  सुर्ख लाली उसके चेहरे पर खिलने लगी।
“आओ, तुम्हें हरे रंग में रंग दूँ।” वह उसके कानों में फुसफुसाया और उसे अपनी बाँहों में भींच लिया।
वह फिर मुस्कुराई। लाज का दामन दूर जा गिराl हरा रंग उसकी रग-रग में दौड़ने लगाl और देखते-ही-देखते उसके चारों तरफ किलकारियाँ गूँजने लगीं। वह भूल गई अपनी पसंद का हर रंग और डूबती गई उसके दिए हरेक रंग मेंl
लेकिन फिर एक दिन…. सबने कहा…
“तुम्हारे लिए सफेद रंग जरूरी है।”
वह इस रंग को अपने से दूर रखना चाहती थी, क्योंकि यह रंग उसने न दिया था…
…लेकिन सफेद  रंग तन के साथ उसके मन पर भी पोत दिया गया। उसके दिए हुए सारे रंग छूट गए।
…. इस बार वह मुस्कुराई नहीं… रोई… और बहुत रोई।

1 टिप्पणी

  1. रंग के माध्यम से बहुत अच्छी तरह मनोभाव व्यक्त दिव्या जी।, सराहनीय

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