हिन्दीतर भाषी हिंदी लेखक, लेखिकाएँ भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से हिंदी से जुड़े हुये हैं और हिंदी को आगे बढ़ाने में इन सब का योगदान विशेष है, जिनके साहित्य कई क्षेत्र में हिंदी को समृद्ध किया है। हिन्दीतर भाषी होने से हिंदी समझने और हिंदी में जुड़े रहने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उनमें से बहुत बड़ी चुनौती है हिंदी में सही तरह से उच्चारण करना, हिंदी व्याकरण में गलतियों को समझना और लिंग, वचन आदि का प्रयोग में सही समझ होना। अलग-अलग प्रान्त से जुड़े लेखकों को शुद्ध हिंदी बोलने और लिखने में कई परेशानियां आती हैं जिस कारण वे हिन्दी से दूरी बना लेते हैं। एक प्रान्त की बोली से दूसरे प्रान्त की बोलियों से काफी अलग है। अलग-अलग प्रन्तों की अलग-अलग भाषाओं के बोल से भाषा प्रभावित होना आश्चर्य की बात नहीं है। चाहे भारत की किसी भी दिशा से हो, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर या पूर्व से हों बोलियों में फर्क देखने को मिलती हैं। कहीं उच्चारण में छोटी इ की जगह बड़ी ई का प्रयोग होता है तो कहीं बड़ी मात्रा की जगह छोटी मात्रा का प्रयोग होता है (उदाहरण मराठी और हिंदी के बोली में फरक महसूस किया जा सकता है।)। तेलुगु प्रान्त की भाषा में वस्तुओं में कोई लिंगभेद नहीं होता। जैसे कुत्ता, चाँद को भी आया संबोधन न हो कर आई संबोधन होता है। लिंग भेद सिर्फ इंसान के लिए होता है। आखिर पशुओं को भी स्त्री लिंग में सम्बोधित किया जाता है। जैसे अंग्रेजी में he/she के लिए verb का प्रयोग किया जाता है। ‘it’ संबंधित चीज़ों को लाया या लाई यानी लाने वाले इंसान के संबंध में प्रयोग किया जा सकता है ना कि वस्तुओं का स्त्री/पु लिंग का प्रयोग नहीं होता। it संबंधित हर संज्ञा को स्त्रीलिंग/नपुसंक लिंग में प्रयोग होता है।
ओड़िआ, बांग्ला कुछ एक समान बोलियाँ हैं। लिपि, और बोलने का ढ़ंग annotation में फरक रहता है। लिपि अलग जरूर है। लिंग और क्रिया का प्रयोग में भी काफी समानता है। तेलुगु, कन्नड़ बोलियों में भी समानता पायी जाती है। मगर हिंदी में जिस तरह वस्तुओं को लिंग के दायरे में बांटा गया है, किसी अन्य भाषा में कम ही है जैसे अवधि और कुछ देवनागरी में लिपि के समान बोलियाँ हैं। यही कारण है जब अलग अलग प्रान्त से हिंदी लेखक देवनागरी में लिपिबद्ध करते हैं कई व्याकरण समस्याओं से जूझना पड़ता है। इसी कारण कई प्रान्त में हिंदी साहित्य को परहेज भी किया जाता है खास कर दक्षिण भारत के लोग। क्यों कि वस्तुओं का लिंगभेद दिमाग में सहज ही नहीं उतरता। ना ही एक उम्र के बाद श्रेणी में बैठा जा सकता है।
यूँ कहा जाए तो शुद्ध हिंदी भाषी लेखक भी कई बार टंकण में गलतियाँ करते हैं जैसे खड़ी बोली और साधरण प्रयोग में लाने वाली हिंदी। एंड्राइड फ़ोन में टाइपिंग के दौरान ऐसी कई गलतियाँ सामने आती है। दुःख की बात यह है कि भारत के हिंदी बेल्ट में रहते हुये साहित्यकार भी ऐसी गलतियां करने में नहीं चूकते। और व्याकरण संबंधित गलतियों के कारण भाषाई अशुद्धि के लिए हिन्दीतर साहित्यकारों को प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से हिंदी के अशुद्धि का कारक बनाया जाना उनके हिम्मत तोड़ने का काम करता है। मुम्बई क्षेत्र में क्षेत्रीय हिंदी अखबारों में भी काफी ज्यादा अशुद्धियाँ देखने को मिलती है। प्रादेशिक राज्यों में हिंदी व्याकरण में मुश्किलें अपनी जगह होने के बावजूद इनके भाषाई प्रेम ने हिन्दीभाषा को जीवंत रखा है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
जहाँ तक कि अनुवाद साहित्य की बात हो तो हिन्दीतर साहित्यकारों ने कई धरोहर पुस्तकों का हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद कर अच्छा साहित्य को अपने सीमा से आगे बढ़ाया है। यह प्रांतीय भाषाओं का सम्मान भी है जिनकी किताबें भारत के कोने-कोने तक पहुँचती है। और अब टेक्निकल उपलब्धियों की बढ़ोतरी से फ़ोन पर ट्रांसलेटर एप्प उपलब्ध हैं जिससे किसी भी भाषा का अनुवाद आसानी से पढ़ सकते हैं। कई त्रुटियों के बावजूद इन एप्प से अनुवाद किया जा सकता है लेकिन वाक्य और व्याकरण प्रयोग में सावधानियां बरतना जरूरी है। हाल ही में एक तेलुगु कहानी का हिंदी अनुवाद करते हुए मैंने महसूस किया कि एंड्रॉइड ट्रांसलेटर से ज्यादा अपने खुद के दिमाग इस्तेमाल कर अनुवाद किया जाए तो ही सटीक अनुवाद हो सकता है। क्यों कि जो अनुवाद एप्प के द्वारा तैयार आता है वह खिचड़ी के समान होता है उसे समझने के लिए उतना ही परिश्रम करना पड़ता है जितना कि सीधे अनुवाद करना या तो उससे ज्यादा मेहनत।
यह समझना जरूरी है कि अगर हिंदी को आगे बढ़ाना है तो साथ काम करना जरूरी है और इन्हीं कुछ अहिन्दी भाषी साहित्यकार ही होंगे जो हिन्दूस्थान में हिंदी को देश के कोने कोने तक पहुँचाकर आगे ले जाने और हिंदुस्तान को हिन्दीस्थान बनाने में कारगर साबित होंगे। यही वह साहित्यकार होंगे जो हिंदी साहित्य को देश के अलग अलग स्थानों में स्थापित कर सकेंगे। 40-50 के उम्र मे लेखकों को हिंदी सीखने स्कूल जाना संभव नहीं यह तो उम्र और अनुभव के साथ सीखना होगा। इसलिये हिंदी साहित्यकारों को आवश्यक है कि अहिन्दी साहित्यकारों को हर संभव आगे बढ़ने का मौका दिया जाए और स-सम्मान हिंदी में उनका स्वागत करना चाहिये। हिंदी व्याकरण में कुछ कठिनाइयों को सहज करना भी हिंदी के विस्तार में सहायक होगा।


भाषा के संबंध में आपके विचारों से अवगत हुए लता जी।जहाँ तक वर्तनी गत और भाषागत त्रुटियों की बात है,दोनों ही अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं अगर वर्तनी गलत है तो कभी-कभी अर्थ भी बदल जाते हैं जैसे अवधि-निश्चित समय और अवधी से अर्थ -अवध की भाषा।सास और सांस का अंतर देखिये। अनुस्वार के यथोचित प्रयोग करने व न करने से भी वाक्य या भाव बदल जाता है।
प्रादेशिक भाषाओं के कारण दिक्कतें आना स्वाभाविक है पर लेखन भी पठन से जुड़ा है। यहाँ तो हम एक ही बात कह सकते हैं कि अगर कोई गलतियाँ बताए तो धीरे-धीरे सुधार संभव है।
कई बार हमने समूहों में ऐसी कविताएँ पढ़ीं जहाँ वह वर्तनी की त्रुटि के कारण कवि जो कहना चाहते थे उसका अर्थ ही बदल गया।तो भाव भी बदल जाते हैं।
सभी प्रांतीय भाषाओं का सम्मान है ,नहीं आती हो तब भी , क्योंकि उन्हें संवैधानिक मान्यता प्राप्त है ।और साँस्कृतिक भिन्नताओं के बाद भी हम एक ही हैं।और सभी साहित्यकारों का स्वागत है।हमें नहीं लगता कि कोई भेद है और न होना चाहिये। जहाँ तक सीखने की बात है, हर ग़लती को तत्काल सुधार लेना सुधार की दृष्टि से सहज होता है। कोई भी संपूर्ण नहीं , गलतियाँ सबसे संभावित हैं।
बस सुधारते चलें।
बिना प्रान्तीय समस्या के भी हम ने हर जगह यही देखा कि चाहे किसी भी विधा की रचना हो, अगर कोई ग़लती या सुधार लगता है तो बताने पर सभी विचार विमर्श से सहर्ष स्वीकार कर सुधार करते हैं। यहाँ दोनों ही निरभिमान होते हैं कोई ईगो प्रॉब्लम भी नहीं।
व्याकरण किसी भी भाषा का बेस है। वैसे भी बोलचाल की भाषा सहज सरल होती है लेखन की थोड़ी परिमार्जित।परिवर्तन करना या स्वीकार करना जिनके अधिकार में है यह वे विद्वतजन ही समझ सकते हैं।
बोली और भाषा में अंतर होता है।हर 80-90 किलोमीटर के अंतराल में बोली बदल जाती हैं।
सामान्यतः टंकण त्रुटि समझ में आ जाती है।
अनुवाद में अनुवादक की समझदारी अपेक्षित है क्योंकि हरभाषा का अपना व्याकरण है।उसे समझ कर कथ्य के भाव को बिना परिवर्तन अपने शब्दों में लिखना। इस मामले में एप सार्थक समाधान नहीं।
आपके इस लेख को पढ़कर आपके मन्तव्य को समझ पाए।
शुक्रिया आपका लता जी!