Friday, June 21, 2024
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मनोरमा जैन पाखी का लेख – बाल-मनोविज्ञान की बढ़ती आवश्यकता

वर्तमान समय प्रतियोगिता का है साथ ही नेटवर्क और सोशल मीडिया के माध्यम यथा ओन लाइन शिक्षा के चलते बच्चों पर ,उनके शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है, यह जानना आज बेहद जरूरी हो गया है।
बच्चों का मस्तिष्क जितनी सक्रियता से सीखने की कोशिश कर रहा होता है और शरीर विकसित अवस्था में ..तब बहुत जरुरी है कि उनके मनोविज्ञान और विकास क्रम को समझा जाये।
बाल मनोविज्ञान बालक/बालिका के मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक विकास और क्षमता पर स्पष्ट प्रकाश डालता है।  आज बाल मनोविज्ञान की आवश्यकता पहले से अधिक है।
लगभग चालीस दशक पूर्व बचपन सहज था। परिवार के मध्य वह बहुत कुछ सहजता से अपनी क्षमतानुसार सीखते रहते थे। आज ढाई साल के बच्चे को – जो न ठीक से बोल सकता है, न अपनी तकलीफ बयाँ कर सकता है – क्रश स्कूल, प्ले स्कूल में भेजने का चलन महत्वपूर्ण हो गया है। वहाँ बालकों के कोमल मन पर पड़ते तनाव को अनदेखा किया जाता है।
लगभग दो साल पूर्व मैं मंदिर में दोपहर के समय  प्रवचन सुन रही थी, तभी एक बालक महाराज जी को प्रणाम करने आया। उम्र लगभग तीन साल। चरण स्पर्श के साथ उसने धोक दी और महाराज ने वात्सल्य से सर पर हाथ रख दिया। उसकी पीठ पर टँगे स्कूल बैग को देख पूछा—
 “कहाँ जा रहे हो ?”
..”कोचिंग ।”
“कोचिंग .!!”
..किस कक्षा में पढ़ते हो?”
“एल के जी”
“तो कोचिंग क्यों जा रहे इस समय ?”
बच्चे का मौन और आँखों में नमी देख आगे कुछ न पूछा।
ये स्थिति किस और इशारा करती है? क्या हम इतने संवेदन शील हो गये हैं कि आगे बढ़ने की होड़ में बच्चों से उनका सहज बचपन छीनते हमारा मन नहीं कचोटता?
नदी का सहज प्रवाह जहाँ मन को मोहता है वहीं प्रवाह बाधित होने पर वह नैसर्गिक सुंदरता नहीं दिखती। एक पहाड़ी झरना जिस तरह कलकल ध्वनि के साथ ऊँचाई से गिरता और अपनी राह बनाता आगे बढ़ता है ,वहीं कृत्रिम सरोवर उस सुंदरता का बोध नहीं कराते।
पुनः बात करती हूँ वर्तमान में  बाल-मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता की।  बाल-मनोविज्ञान में बच्चों के बाहरी व्यवहार का निरीक्षण बहुत सूक्ष्मता व विशेष नियमों के तहत किया जाता है। जिसके अंतर्गत आयु अनुसार  प्रश्नावली,सुव्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययन, कुछ विशेष प्रयोगके साथ लेखन और मनोविश्लेषण के द्वारा बच्चों की समस्या को समझा जाता है ।बच्चों से प्राप्त जानकारी से उनके पारिवारिक वातावरण ,माता-पिता के संबंध,शिक्षकों का व्यवहार आदि के माध्यम से उनकी मानसिकता, व्यवहार और विकास से संबंधित महत्वपूर्ण आँकडे जुटाये जाते हैं । विशेषज्ञ बच्चों के व्यवहारों को नियमित डायरी में लिखते हैं जो सदैव उपयोगी सिद्ध होती हैं।
कुछ महापुरुषों की जीवनी में उनके बचपन के अनुभव, कुछ विशेष घटनाक्रम मिलते हैं, कुछ उनके बचपन के मित्रों या उन्हें स्नेह करने वालों के बारे में जानकारी होती है। इससे पता चलता है कि बचपन की कौन-सी घटना उसके व्यक्तित्व को निर्धारित करने का कारक बनती है।
बच्चों के व्यवहार को समझने के लिये मनोवैज्ञानिक कुछ विशेष प्रश्नावलियाँ बनाकर भी परिवार, पड़ोस, पैरेंट्स या शिक्षकों से भी उपयोगी जानकारी  इकट्ठा करते हैं।
वर्तमान में बदलते समय में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग किये जा रहे हैं जो बच्चों की सीखने की प्रक्रिया, उनकी स्मरण-शक्ति और बुद्धि के विकास व व्यवहार संबंधी अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग हो रहे हैं। बाल सुधारगृह व बच्चों के डाक्टर (चाइल्ड स्पेशलिस्ट)भी इस संबंध में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं अर्थात् बालसुधार गृह में आने वाले बच्चों के व्यवहार का रिकार्ड और डाक्टर्स के पास आने वाली समस्याओ-समाधानों का रिकार्ड ।
बालमनोविज्ञान की शाखा के निर्माण में परिवार शिक्षक ,डाक्टर ,समाजशास्त्रियों की अहम भूमिका होती है।
मनोवैज्ञानिक बच्चों के स्वाभाविकव्यवहार को समझने हेतु जिन उपकरणों यथा टेपरिकार्डर, कैमरा आदि का प्रयोग करते हैं जिनसे उनकी सहज अभिव्यक्ति को परखा जा सके।
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में बाल्यावस्था या शैशवावस्था से लेकर किशोरावस्था तक के व्यवहार का मूल्यांकन विभिन्न परिस्थितियों व बालकों के समूह में उनके व्यवहार पर आधारित होता है।जो अधिक विश्वसनीय होता है। वर्तमान समय में बाल अपराध की समस्या से विकसित व विकासशील दोनों प्रकार के देश जूझ रहे हैं ।इन
विशेष समस्याग्रस्त बालकों के इलाज में बाल-मनोविज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
आवश्यकता है कि हम इसे इलाज की प्रक्रिया समझें, न कि बच्चे की स्थिति को  विक्षिप्तता या पागलपन समझने की भूल करें। दोनों स्थितियों में पर्याप्त अंतर है। जहाँ एक तरफ मानसिक विकार और घटनाएँ कारक हैं, वहीं विक्षिप्तता में मानसिक असंतुलन ।
बच्चों के मनोविज्ञान को समझना बदलते दौर की महती आवश्यकता है वह भी तब जब एकल परिवार के नाम पर माता-पिता और एक बच्चा रह गया हो और बच्चे को भी शिक्षा के चलते हॉस्टल आदि में रखा जा रहा हो ।संचार क्रांति,सूचना तकनीक और वैश्वीकरण की अवधारणा ने जिस तीव्रता से लोगों की सोच को बदला है, जीवन-पद्धति को बदला है साथ ही नवीन सूचनाओं, जानकारियों की सुलभता  ने सहजता,सरलता व पुरानी पारंपरिक सोच पर सेंध लगाई हैं उसकी चपेट में बच्चे -बड़े सभी आगये। निजी स्थाई  अनुभव नगण्य हो गया। आज साल भर के बच्चे जिस तीव्रता से मोबाइल फोन ,इंटरनेट का इस्तेमाल व इंडोर गेम्स सीख जिस कुशलता से इसका प्रयोग ,उपयोग कर रहे हैं ,बड़ी उम्र के लोग उस तेजी से नहीं सीख पा रहे ।इस कारण भी बच्चों के भीतर घट रहे समस्यामूलक कारणों को भी नहीं समझ पा रहे ।और बच्चे व माता पिता या परिवार में दूरियाँ बढ़ रहीं हैं जिसे जैनरेशनगेप का नाम दिया जा रहा है। और साथ ही बाल अपराधों में वृद्धि भी। इसी कारण आज बाल-मनोविज्ञान की बढ़ती आवश्यकता से इंकार नहीं किया था सकता।

मनोरमा जैन पाखी
गृहिणी। लघुकथा, कहानियाँ समीक्षा आदि शौकिया लेखन। जैनिज्म लेखन हेतु अवार्ड प्राप्त। पूर्व शिक्षिका, समीक्षिका एवं संपादक। असम – नराकास समिति, मेघालय–शिलोंग से पत्र द्वारा रचनाकार (लेखिका) घोषित। इनबुक सोशल कैफे मुंबई से सम्मान-पत्र।
संपर्क – manoramajain43718@gmail.com
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