Sunday, June 23, 2024
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संदीप तोमर की कहानी – डार्क चॉकलेट

सर्दी का मौसम था, दिल्ली की आब-ओ-हवा उसे हिमालय की बर्फ का एहसास करा रही थी। ऐसा लगता था सूरज पीठ फिराकर बैठ गया है। जावेद अपने बयालीस मीटर के डीडीए के फ्लैट में दोहरे कम्बल में लिपटा लैपटॉप की स्क्रीन पर निगाह गड़ाए हैं। पुराना लैपटॉप ख़राब होने के बाद वह काफी दिनों तक तंग रहा, अभी हाल ही में उसने बाहत्तर हज़ार रूपये में नया लैपटॉप ख़रीदा है। एचपी कम्पनी का लैपटॉप टच स्क्रीन है जिसमें एक साथ एक से ज्यादा स्क्रीन खोलकर काम किया जा सकता है। जावेद एक फिक्शन राइटर है। नए लैपटॉप की विंडो खोलकर वह एक तरफ कहानी लिख रहा है तो दूसरी स्क्रीन पर उसने स्काइप खोला हुआ है। वह जब भी लिखने बैठता है, साथ-साथ सर्फिंग भी करता है। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि जावेद एक साथ एक से ज्यादा काम करने में माहिर है। लिखते हुए उसे कुछ और भी करना पसन्द है, उसका मानना है कि वह बिना सर्फिंग करते हुए लिख ही नहीं सकता। रोमन टाइपिंग में हिन्दी लिखने वाले सॉफ्टवेयर के आने के बाद से उसने फिर कभी कागज पर नहीं लिखा। इस तरह लिखना उसे जहाँ त्रुटियों से बचाता है वहीँ एडिट करने, कुछ नया कहीं भी जोड़ने में आसानी भी है। हालाकि वह कहता है कि लैपटॉप पर लिखने से वह प्रकृति के अधिक निकट हो गया है, कागज बचाकर वह पर्यावरण का हित कर रहा है। कोई उससे ये बहस क्यों करे कि लैपटॉप चलाते समय इसका विकिरण और ख़राब होने पर इसका इ-कचरा पर्यावरण के लिए कितना घातक है, बिजली की बर्बादी है सो अलग।
रात के तकरीबन साढ़े दस का वक़्त है, ठण्ड इतनी है कि कम्बल से बाहर निकली अंगुलियाँ कटने जैसा एहसास करा रही हों… जावेद कहानी लिखने में मशगूल है। जावेद का एक नाम अमन भी है, उसने अमन नाम से ही सब सोशल साइट्स के अकाउंटस बनाए हुए हैं। इस नाम से अकाउंट बनाने के पीछे एक वजह मजहबी पहचान का न होना भी है। उसकी स्काइप आईडी पर एक रिक्वेस्ट आई है- नाम कोई नादिका संजीवनी करुनाथिल्के लिखा है। उसने पूरी प्रोफाइल को कंघालना शुरू किया। वह स्काइप जैसी वेबसाइट पर कोई रिस्क लेना नहीं चाहता। ये दक्षिण एशिया के पडोसी मुल्क श्रीलंका की रहने वाली है, पेशे से नेवी एडुकेशन में राजनीति विज्ञान की प्रवक्ता है। जावेद को पढाई-लिखाई के पेशे से जुड़े लोग हमेशा से पसन्द हैं। उसने खुद दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट से आर्कियोलॉजी में मास्टर डिग्री की है। वह भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय के राष्ट्रीय संग्राहलय में अनुबंध पर नौकरी करता है। जावेद ने स्काइप पर आये अनुग्रह को स्वीकार कर लिया। दोनों की तरफ से बातचीत का सिलसिला शुरू हो चुका है। पहले दिन की बातचीत परिचय तक सीमित रही।
जावेद ने अपनी सुविधा के लिए इस लम्बे नाम वाली लड़की के नाम को छोटा कर लिया। उसने उसे नादिका कहना शुरू किया है। स्काइप पर बातचीत का ये फायदा है कि इसमें टेक्स्ट और वीडियो दोनों की सुविधा है। नादिका की मूल भाषा सिंघली है जबकि जावेद के परिवार में हिंदी-उर्दू दोनों बोली जाती हैं। अलग-अलग मातृभाषा होने के चलते उन्होंने सम्पर्क भाषा अंग्रेजी को अपनी बातचीत का जरिया बनाया।
नादिका का रंग सांवला है लेकिन उसकी लम्बाई तकरीबन पाँच फीट नौ इन्च है, उसके बाल घुंघराले हैं, तीखे नयन-नख्स हल्के से मोटे होंठ। उसके शरीर का पूरा भूगोल किसी मॉडल का लगता है। अगर उसके रंग को छोड़ दिया जाए तो ब्रिटेन की राजकुमारी डायना के जीवित होने पर उसके रूप-सौन्दर्य को मात दे दे। हँसते हुए उसके गालों के गड्ढे उसके सौन्दर्य में चार-चाँद लगा देते हैं जबकि जावेद उसकी बनिस्पत कुछ नाटा है, उसकी लम्बाई कुल जमा साढ़े पाँच फीट है। जावेद को बालों का शौक कुछ ज्यादा ही है, वह हर साल नए स्टाइल के बाल रखता है।
दोनों को बातचीत करते हुए कुल जमा तीन महीने हो चुके हैं। आभासी दुनिया के रंग कितने निराले हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन तीन महीनों में दोनों ने एक दूसरे के परिवार, पेशे से लेकर शरीर के इतिहास-भूगोल तक का ज्ञान ले लिया है। यूँ तो जावेद और नादिका दोनों ही जानते हैं– स्काइप नग्नता के लिए एक बदनाम साइट है लेकिन दोनों की पढ़ाई-लिखाई का एक स्तर होने के चलते वे देश-राजनीति-साहित्य- वर्ग संघर्ष सब पर बातचीत करते हैं। नादिका के चलते ही जावेद तमिल-सिंघली विवाद को अख़बारों, न्यूज़ चैनल्स की ख़बरों से इतर गहराई से समझ पाया है, हालाकि अब यह विवाद उतना बड़ा नहीं है जितना नब्बे के दशक में हुआ करता था।
जावेद नहीं जानता कि श्रीलंका में भारत की तरह बसंत का कितना महत्व है लेकिन अगर भारतीय अंदाज में कहा जाए तो नादिका अपने जीवन के अट्ठाईस बसन्त देख चुकी है, लेकिन अभी तक उसे योग्य जीवनसाथी नहीं मिला है। नादिका का परिवार बेहद गरीब है, बड़े भाई की आकस्मिक मौत के बाद उसके परिवार की जिम्मेदारी भी पूरी तरह से उसके ही ऊपर है। परिवार में माँ-बापू के साथ उसके भाई की विधवा पत्नी, उनके तीन बच्चे और खुद नादिका है। वह और उसका परिवार गामपाहा जिले के मिनुवंगोड़ा शहर में रहता है। ये एक झोपडीनुमा कच्चा सा मकान है, जिसे नादिका ने जावेद को कई बार वीडियो पर दिखाया है।
जावेद का रूटीन है– सुबह साढ़े नौ ऑफिस जाना, शाम को छह बजे ऑफिस से छुट्टी होने पर सात बजे तक भारी जाम से जूझते हुए घर आना, नौ बजे तक खाना-पीना, सबसे फ्री हो अपने उस बयालीस मीटर डीडीए फ्लैट पर जाना और लिखने, सर्फिंग करने में लग जाना। चौंकिए मत– उसने नादिका को नहीं बताया कि इस फ्लैट के अलावा उसका एक घर भी है- जिसमें एक बीवी है और एक बेटी भी। समझा जा सकता है- एक घर के होते हुए जावेद को अलग फ्लैट की क्या जरुरत है? फ्लैट उसने इसलिए खरीदा कि घर में बीवी और बच्चे की चोंपों में वह लिख नहीं पाता और आजकल वह पुरातत्व से सम्बन्धित विषय पर शोध कर रहा है जिसे पीएचडी कहा जाता है। जबकि बीवी को लगता है कि जनाब अलग फ्लैट लेकर कुछ और ही गुल खिला रहे हैं, वह गुल जो भी हो लेकिन उसे अपनी सौतन लगता है।
नादिका से शादीशुदा होना छुपाना उसे एकदम गलत नहीं लगता। जावेद खा-पीकर फ्लैट पर आ गया है, उसने लैपटॉप पर अपनी पुरानी फाइल की विंडो खोल ली है और साथ-साथ ही स्काइप भी लॉग इन कर लिया है। नादिका को उसके लॉग इन होने/ऑनलाइन आने का बेसब्री से इन्तजार रहता है। नादिका ने पूछा-“अमन! खाना खा लिया?”
“हाँ, नादिका! मैं जल्दी खाना खाने में विश्वास करता हूँ, जबकि दिल्ली में लोग लेट नाईट खाने के आदी हैं।“
 “ओह! मैं भी आजकल देर से खाना खाती हूँ, नेवी में पढ़ाने के लिए घर आकर पढना भी होता है। और यह जॉब ऐसी है कि इसमें हर श्रेणी के कर्मचारी को नियमित अभ्यास जरुरी है, मतलब यहाँ सब सैनिकों की तरह अभ्यास करते हैं। तमिल, सिंघली मुद्दा भी इसकी एक वजह है। पता नहीं कब उपद्रव हो और सैनिको की जरुरत पड़ जाए।“
“मैं समझ सकता हूँ, इधर भारत में भी सबको सैनिक की ट्रेनिंग करनी होती है भले ही कोई किसी भी पद पर हो। आजकल तो तुम्हारे देश में भी हमारे यहाँ की शांति सेना है, जो तमिल-सिंघली-विवाद में मुख्य भूमिका निभा रही है।“
“जहाँ मैं रहती हूँ यह भी तमिल बाहुल क्षेत्र है, हर समय भय जैसा माहौल अभी भी रहता है।“
“इसी विवाद ने तो हमसे राजीव जी जैसे अच्छे नेता को छीन लिया।“
“यू मीन मिस्टर प्राइममिनिस्टर राजीव गाँधी? ही वाज़ सच अ नाईस पर्सन।“
“सही में वे एक अच्छे और भले इंसान थे। पब्लिक में घुलमिल जाते थे, वही उनकी मौत का कारण भी बना।“
“फिर क्यों उन्होंने प्रभाकरण से बातचीत की, उनको ऐसा स्टेप नहीं लेना चाहिए था।“
“नादिका! भारत की सियासत बहुत खतरनाक है, इस पर बात करेंगे तो कितनी ही परते निकलेंगी।“
“ओके, मैन! कुछ और बात करते हैं। आपको पता है ज्यादातर सिंघली बौद्ध हैं, कुछ ईसाई भी हैं। मैं भी बौद्ध धर्म को मानती हूँ, आप भाग्यशाली हो जो हमारे गॉड के देश में पैदा हुए। आपसे दोस्ती की एक वजह ये भी है कि वह बुद्ध की पवित्र भूमि है।“
“बुद्ध एक जागृत आत्मा थे, जागृत माने एनलाइटेड, बहुत कम लोग हैं जो एनलाइटेड हो पाए, तुमको पता है एनलाइटमेंट के लिए एक लाख लोग तपस्या करने निकलते हैं, निन्यानवे हज़ार लोग बीच रास्ते ही बाधाओं से घबराकर भाग निकलते हैं या बाधाओं को न सहने के चलते मृत्यु को प्राप्त होते हैं, बचे एक हजार में से नौ सौ नब्बे सतपुरुष तो बन जाते हैं लेकिन वे भी एनलाइटेड नहीं हो पाते, वे चैतन्य, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, ओशो, महात्मा गाँधी होते हैं, दस लोगो को एनलाइटमेंट होता है, नौ लोग एनलाइटमेंट के बाद शरीर में प्रवेश होने वाली विद्युत ऊर्जा को सहन नहीं आकर पाते, वह जो अंतिम व्यक्ति होता है उसका पूर्ण रूप से एनलाइटमेंट होता है, वही बुद्धत्व को प्राप्त होता है, बुद्धत्व यानि विचार-शून्य होना, उसके बाद वह जो भी बोलता है, वह उपदेश हो जाता है, आदि वाक्य हो जाता है।“
“ओह अमन! आपको कितना ज्ञान है? कितना कुछ अर्जित किया है आपने? मैं तो सुनकर ही आश्चर्यचकित हूँ।“
बातें करते हुए कितना वक़्त बीत जाता, उन्हें पता ही नहीं चलता। नादिका जावेद से बात करते हुए बस एक असीम शांति से भर जाती, उसे लगता समुन्दर के उस पार एक व्यक्ति है जो उसके भगवान की भूमि से है, जिसे वह मन ही मन पसंद करने लगी है।
सच्चिदा बिहार के जयनगर का रहने वाला है, जावेद से उसकी पहली मुलाकात किसी कैफेटेरिया में हुई थी, पहली ही मुलाकात में दोनों अच्छे दोस्त बन गए। सच्चिदा ने बौद्धिज्म में पीएचडी किया है, वह जावेद का सोशल साइट्स पर भी मित्र है। नादिका ने सच्चिदा को मित्रता प्रस्ताव भेजा। जावेद के उभयनिष्ठ मित्र होने के चलते उसने सहजता से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। सच्चिदा जीवन के अठतीस सावन पार कर चुका है, लेकिन अभी तक विवाहोत्सव का योग नहीं बना है। यत्र-तत्र कोशिश जारी रहती है लेकिन कामयाबी उससे दो कदम पीछे ही रहती है। जब से नादिका से मित्रता हुई है, वह हिन्दी शिक्षक बन उसे हिन्दी सिखा रहा है। हिन्दी सिखाने का वही घिसा-पिटा तरीका है- रोमन में हिन्दी लिखने का। नादिका जो कुछ भी सच्चिदा से सीखती है सब कुछ जावेद पर अप्लाई करती है।
“अमन! तु…म… मे…रे… अ…च्छे… दो…स्त… हो… ।“
“ओह! हिन्दी सीखी जा रही है?”
“यस मैन… ।“
“इसकी जरूरत है?”
“सोच रही हूँ, हिन्दी सीखकर भारत आ जाऊँ, और वहीं की नागरिकता ले लूँ, श्रीलंका के हालात ख़राब हैं और यहाँ की पावर्टी से परेशान हो चुकी हूँ, पता नहीं कब यहाँ की इकॉनमी क्रेस हो जाये।“
“कुछ भी हो अपना मुल्क अपना ही होता है, आर्थिक स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती, मेहनत से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।“
“अमन! कितना पॉजिटिव सोचते हो आप।“
“मैं ही नहीं मेरे देश का हर नौजवान सदनियति, और आगे बढ़ने की सोच रखता है।“
 “तब तो किसी भारतीय लड़के को जीवन-साथी बनाना पड़ेगा।“
“ऐसा क्या देख लिया, भारतीय लड़कों में जो जीवनसाथी बनाने का सपना पाल रही हो?”
“अभी आपने ही तो इतनी तारीफ की भारतीय लड़कों की।“
जावेद को नादिका की बात से लगता मानो वह प्रेम में है, लेकिन जावेद जानता है उसके लिए प्रेम के क्या मायने है और फिर परिवार? परिवार से उसे याद आया, कैसा परिवार, किसका परिवार? कौन सा परिवार? वो परिवार जिसका दिन कलह से शुरू होता है? उसकी बीवी समरीन उसे एक बदमिजाज़ औरत लगती है, एक झगडालू औरत। जिसने तालीम को बेहतरी का जरिया नहीं बनाया। उसे लगता है शोहर का काम कमाना और बच्चे पैदा करना है, जबकि जावेद एक पढा-लिखा भद्र पुरुष है। वह आधुनिक होने के मायने समझता है, वह अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर ऑफिसर बनाने के सपने देखता है जबकि समरीन उसे मजहबी तालीम दिलाकर खुद के जैसी घरेलु औरत में तब्दील कर देना चाहती है। कुल मिलाकर कलह का माहौल रहता है। यही वजह है कि उसने अपने पढने-लिखने के लिए अलग फ्लैट लिया हुआ है। समरीन नहीं जानती कि वह फ्लैट किस जगह है?
जावेद के पास सच्चिदा का कॉल आया, बोला-“यार जावेद! तू तो जानता है मैं बहुत जल्दी चालीस साल का हो जाऊँगा, अभी तक शादी नहीं हुई, सोच कब शादी होगी, कब बच्चे होंगे, और जब तक वे बड़े होंगे मैं बूढा हो चुका हूँगा, यार कुछ कर न मेरे लिए भी, तू तो लेखक है, बहुत सी लड़कियाँ, महिलाएँ सम्पर्क में रहती होंगी।“
“अच्छा यार सच्चिदा! एक बात बता- अब तक तेरी शादी क्यों नहीं हुई, मतलब….।“
“इधर बिहार में लड़कियों की शादी में बहुत दहेज़ देने का चलन है, छोटी बहन की शादी का दहेज़ इकठ्ठा करने के चक्कर में मेरी शादी समय पर नहीं हो पाई। यार मेरे लिए शादी करना बहुत जरुरी है।“
“तुम क्या नवाब की औलाद हो जो तुम्हारे लिए शादी जरूरी है?”
“यार जावेद, देख मजाक नहीं, बस तू शादी करा दे, लड़की मैं तुझे खुद बता देता हूँ।“
“बता… ।“
“वो तेरी श्रीलंकन दोस्त है न, नादिका…।“
“अबे, तूने उसे भी खोज लिया, अच्छा चल आज उससे बात होगी तो तेरे बारे में बात करता हूँ।“
“सिर्फ बात नहीं करनी है, उसे मेरे लिए कन्विंस भी करना है।“
“ठीक है यार, दोस्ती के लिए ये भी सही।“
जावेद ने सच्चिदा को नादिका से बात करने के लिए हाँ तो कर दी लेकिन इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि जिसके लिए उसके मन में एक सॉफ्ट कार्नर है, उसे किसी और को कैसे सुपुर्द किया जा सकता है, ऐसा करना तो खुद के अरमानों को सुपुर्दे खाक करना होगा।
सारा दिन वह परेशान रहा, उसने रात को नादिका से बात की।
“सुनो नादिका! बड़ी उलझन में हूँ, तुमने भी कुछ नहीं बताया।“
“क्या नहीं बताया, अमन?”
“वो असल में सच्चिदा का कॉल आया था, उसने बताया की तुम दोनों आपस में बातचीत करते हैं और वह तुम्हें लेकर सीरियस है। तुमसे शादी करके घर बसाना चाहता है, तुम जानती हो भारत में शादी का मतलब क्या होता है?”
“अमन! सच्चिदा आपका दोस्त है, आप उसे बेहतर जानते होंगे, मुझे तो वह काम-पिपाषु लगा जो औरत के मन को नहीं तन को तरजीह देता है, उससे शादी का मैं सोच भी नहीं सकती, वैसे भी वह उम्र में भी काफी बड़ा है।“
अब जावेद के पास कहने को कुछ रहा नहीं, अलबत्ता मन को एक सुकून जरूर मिला। ऐसा सुकून जिसने उसके मन की बड़ी उलझन को ख़त्म कर दिया।
नादिका ने जावेद से भारत भ्रमण की अपनी इच्छा जाहिर की। उसने बताया कि भारत आने के लिए उसने कब से योजना बनायी हुई थी, जिसके लिए उसने एक लाख रुपया भी जोड़ लिया था। जावेद ने उसे भारत आने का न्योता दिया ये कहकर कि आने-जाने के टिकट की व्यवस्था वह खुद कर ले, बाकि जहाँ-जहाँ उसे घूमना है, वह सब जिम्मा उसका खुद का।
सहमति होने पर नादिका ने चेन्नई की टिकट कराई, दक्षिण भारत के दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किया। बोधगया जाने से पहले उसने सच्चिदा से सम्पर्क किया। सच्चिदा समय निकाल, उसे गया और आसपास का भ्रमण कराने चला गया । गया के बाद वे सारनाथ गए। घूम-फिर कर साथ में खाना खाया। नादिका को यहाँ के खाने में सबसे ज्यादा दिक्कत मिर्च और मसालों को लेकर थी।
घूमते समय सच्चिदा ने कई बार कोशिश की– अपने मन की बात उससे कहने की लेकिन वह कह नहीं पाया था। खाने के समय उसने कहा-“नादिका! मैं आपसे शादी करना चाहता हूँ, अगर आप इजाजत दो तो श्रीलंका आकर आपसे आपके रीति-रिवाज से शादी करके जयनगर ले आऊँ।“
“सच्चिदा! हम अच्छे दोस्त हैं लेकिन आपको मैंने पति के रूप में नहीं देखा, प्लीज हम फिर से इस विषय पर बात न करें, अमन भी इस बारें में बार कर चुका है, मैंने उसे भी अपने जवाब से अवगत करा दिया था, शायद उसने आपको बताया भी होगा।“
अब सच्चिदा के पास कहने को शब्द नहीं थे। वह सोच में पद गया की जावेद ने उससे इस बाबत  बात क्यों नहीं की, सारनाथ से बुझे मन से उसने नादिका को दिल्ली की रेलगाड़ी में बैठाकर विदा किया।
रविवार का दिन था, रेलगाड़ी दिल्ली की सीमा में प्रवेश करने वाली थी, उसने जावेद को कॉल लगायी। जावेद अनजान नम्बर से आई कॉल को कभी तवज्जों नहीं देता, लेकिन आज उसने अनजान कॉल को पिक कर ही लिया, उधर से आवाज नादिका की थी। जावेद ने पूछा-“भारत के नंबर से कॉल?
“हाँ, अमन! इंटरनेशनल कॉल के चार्ज बहुत ज्यादा लगते हैं तो आते ही पहले पासपोर्ट दिखाकर ये नया नम्बर लिया। अच्छा सुनो, मैं दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच रही हूँ, आप मुझे पिक कर लीजियेगा।“
“नादिका! ये कैसा सरप्राइज हुआ, यार! पहले बताना भी होता है, मैं यहाँ हूँ या नहीं, अगर बाहर होता तो फिर क्या करती तुम?”
“सॉरी अमन! ये तो मैंने सोचा ही नहीं, अब बोलो आप मुझे पिक करोगे न? देखो यहाँ तक आते-आते मेरे सब पैसे भी खत्म हो गए हैं, तुम नहीं आये तो मैं मुसीबत में फँस जाऊँगी।“
 जावेद ने स्कूटी उठाई और नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुआ। स्कूटी पर लगेज लाना आसान होता है जबकि बाईक पर यह एक मुश्किल काम है।
रविवार होने के चलते आज वह ट्रेफिक जाम में नहीं फंसा, वर्ना उसके घर से रेलवे स्टेशन तक की दूरी को पैंतीस मिनट में नापना असम्भव जैसा है। वह प्लेटफोर्म तक नहीं गया, उसकी सम्वेदना में प्लेटफोर्म पर भीड़ बढ़ाना नहीं है, चुनांचे उसने एक जगह पर खड़ा होना निश्चित किया। नादिका प्लेटफ़ोर्म से बाहर आई, दोनों गले मिले, सामान स्कूटी के पायदान पर सेट करके स्कूटी पर बैठ गंतव्य की ओर चल दिए।
जावेद उसे फ्लैट पर ले गया, नादिका फ्रेस होने बाथरूम की तरफ रवाना हुई तो जावेद चाय बनाने के लिए किचन की ओर मुड़ गया।
एक छोटी सी मेज के दोनों तरफ दो कुर्सियाँ लगी हुई हैं, एक पर नादिका बैठी है उसके सामने वाली कुर्सी पर जावेद। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए नादिका ने कमरे का मुआयना करते हुए सवाल किया-“ अमन! आपके कमरे में कोई धार्मिक तस्वीर नहीं है जबकि मैंने तो सुना है कि भारत के लोग संसार में सबसे अधिक धार्मिक हैं।“
“नादिका, हालांकि मैं धर्म से ज्यादा अध्यात्म को तरजीह देता हूँ, लेकिन फिर भी हर इंसान में कुछ संस्कार धार्मिक भी होते ही हैं, मैं मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ, वहाँ मूर्ति पूजा को हराम माना गया है। इसलिए मेरे यहाँ तुम्हें किसी भी धर्म की कोई मूर्ति नहीं दिखाई देगी।“
“व्हाट! आप मुस्लिम हैं? लेकिन आपके नाम से तो पता नहीं चलता, श्रीलंका में भी मुस्लिम हैं, उन्हें तो नाम से ही पहचान लिया जाता है।“
“तुम भी ऐसा ही सोचती हो, जो बाकी सब मुस्लिमों के बारे में सोचते हैं?”
“नहीं अमन! वो बात नहीं है, लेकिन तुमने ये बात मुझे बताई नहीं, तो अभी सुनकर अजीब लगा।“
“जब जो बात बहुत मायने न रखती हो तो उस बात को बताना, न बताना ज्यादा मायने नहीं रखता।“
बात करते-करते ही दोनों ने चाय ख़त्म की, जावेद ने पूछा- खाने में क्या पसंद करोगी?”
“जो भी उपलब्ध हो पाए, बस चिली और मसाले न हो, इन्डिया में आकर तो बस खाने की ही सबसे ज्यादा दिक्कत हुई।“
जावेद को याद आया, उसने पूछा ही नहीं कि नादिका कितने दिन पहले भारत आए और अकेले क्यों और कहाँ-कहाँ घूमे? उसने सब बातें जाननी चाही, नादिका ने उसे चेन्नई से सारनाथ और सच्चिदा से मिलने तक की सारी कहानी सुना दी। जावेद ने ठण्डी आह भरते हुए कहा- “ओह तो अपने होने वाले पति से मिलकर आ रही हो?”
“अमन! ऐसे मत बोलो डिअर! आपको पता है सच्चिदा से मेरी गहरी दोस्ती नहीं है, वो तो उससे हिन्दी सीखनी थी वो भी आपको इम्प्रेस करने के लिए। फॉर गॉड शेक, विश्वास करो मैं उसके बारे में सोच भी नहीं सकती।“
“जावेद, जावेद भी कह सकती हो मुझे, मेरा नाम जावेद है, अमन मेरा निक नेम है।“
“नहीं मुझे अमन नाम बेहद पसंद है और जब से मेरी दोस्ती है तब से आप मेरे लिए अमन ही हो।“
जावेद ने नादिका के लिए खाने की व्यवस्था की तब तक नादिका ने शावर लिया। खाना खाते हुए साढ़े नौ बज गए।
जावेद दीवान पर बैठा है, नादिका का सिर उसकी गोद में है। जावेद की अंगुलियाँ उसके बालों से होते हुए गालों और फिर होंठो तक का सफ़र तय कर चुकी हैं, दोनों के दिलों की धड़कने बढ़ गयी हैं। नादिका भी जानती है कि वह किसी जवां मर्द के पास समुन्दर पार करके आई है तो दोनों के बीच कुछ तो होना तय है। जावेद के हाथ होंठो से आगे गर्दन से होते हुए उभारों पर आकर टिक गए। एक आह नादिका के मुँह से निकली, एक अजीब सा एहसास हुआ, लेकिन ये एहसास बहुत मधुर है।
जावेद के इरादे कुछ अधिक की चाह लिए हैं लेकिन नादिका ने कहा- “अमन डार्लिंग, मैं पीरियड्स में हूँ।“
“हाइजीनिक दृष्टि से हमें सावधान रहना चाहिए, लेकिन एक बात कहूँगा- आने से पहले भी तो अंदाजा होगा ही कि कब पीरियड्स होने हैं।“
“अमन, मेरे साथ ये दिक्कत है कि मुझे इर्रेगुलर पीरियड्स होते हैं, फ्लाइट्स तक भी ऐसा कुछ नहीं था, आज दूसरा दिन है।“
“वैसे भी दोस्ती, मिलना, प्रेम इनमें इन सब बातों का कोई ज्यादा महत्व भी नहीं है।“
“मुझे सुनकर अच्छा लगा कि राम और बुद्ध के देश में इतने भद्र पुरुष हैं।“
सोने के लिए जावेद ने दीवान के पास एक चटाई बिछाई, और लेटने लगा।“
नादिका ने कहा-“अमन! आप नीचे क्यों सो रहे हो, इधर ऊपर ही सोते हैं न।“
“नहीं, तुम थकी हो तो आराम से सो पाओगी। मैं यहाँ नीचे सोता हूँ।“
नादिका सोने के लिए लेट गयी, नींद अभी नहीं आ रही थी तो दोनों लेटे हुए बातें करने लगे। नादिका ने पूछा- “अमन! आप यहाँ एकदम अकेले रहते हैं, परिवार में कोई नहीं है?”
“अरे है न, मेरी पत्नी और एक पाँच साल की बेटी, बेटी स्कूल जाती है।“
“व्हाट! आपने मुझसे बताया नहीं पहले ये सब, और वे लोग यहाँ नहीं हैं? कहीं गए हैं क्या ? आई मीन किसी रिश्तेदार के यहाँ या फिर अपने मायके?
“नहीं, वे दूसरे मकान में हैं, ये फ्लैट मैंने अपनी शांति, अपने काम, अपने लेखन के लिए लिया हुआ है। जब कभी मन की शांति खोजनी होती है तो यहाँ चला आता हूँ।“
“जब घर का खाने से ऊब जाओ तो बाहर का खाने के लिए भी बढ़िया जगह है, लेकिन माय डिअर बाहर का खाने से एड्स होने के चांस भी बढ़ जाते हैं।“- नादिका ने एक जोर का ठहाका लगाते हुए ये बात कही।
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे बाहर का खाने का कोई शौक नहीं है, बड़ा ही सात्विक इन्सान हूँ।“- यह बात कहते हुए वह मन ही मन सोच रहा है- घर की दाल नसीब नहीं है, बाहर क्या खाक मुर्गी चबाने को मिलेगी?
“तब मुझे लेकर आप उस घर न जाकर यहाँ इस सुन्सान सी जगह पर लाये हो? घर ही लेकर चलना था न?”
“रुको, एक मिनट, अभी।“
 जावेद ने समरीन को कॉल लगाया, उधर से समरीन बोली-“जावेद, आज इतवार के रोज़ भी घर पर नहीं रहे और अब रात में भी… तुम्हें पता है तुम्हारी औलाद मेरा मग्ज खाती रहती है, पापा कब आएंगे, पापा कब आएंगे?”
“आ रहा हूँ, सुनो! एक विदेशी दोस्त आई है दिल्ली घूमने, उसके पास होटल तक के पैसे नहीं बचे हैं, तुम्हारी इजाजत हो तो उसे घर ले आऊँ, वर्ना नाहक ही होटल का खर्च भरना पड़ेगा।“- कहना तो वह कुछ और ही चाहता था लेकिन नादिका हिन्दी भले ही न समझ पाए हाव-भाव से तो समझ ही सकती थी कि दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। हालाकि समझ तो वह इस बात से भी गयी थी कि एक शादीसुदा व्यक्ति जो एक बच्ची का बाप भी है, वह अलग फ्लैट लेकर रहता है।
उधर से समरीन की आवाज आई-“ पूछ तो ऐसे रहे हैं जैसे हर काम मुझसे पूछकर ही करते हैं, अब वो मेहमान है तो उसे ऐसे कहीं बाहर क्यों रखेंगे?”
जावेद ये बात अच्छी तरह से जानता है कि समरीन से चाहे उसके सम्बन्ध कैसे भी हो लेकिन मेहमान नवाजी से वह कभी पीछे नहीं हटती। उसने कॉल काटी और नादिका को कहा-“चलो नादिका, घर चलते हैं, समरीन तुमसे मिलकर खुश होगी, तुम्हें भी वहाँ ज्यादा अच्छा लगेगा।
नादिका भी जावेद की बीवी से मिलने को उत्सुक थी, चलने से पहले उसके होंठो पर एक गहरा चुम्बन लिया। साथ ही बोला-“यू आर टू गुड मैन।“ कुछ ही पलों ने वह नादिका को लेकर अपने घर था। उनके पहुँचने से पहले ही समरीन बिस्तर लगा चुकी थी। बिना किसी औपचारिकता के सब अपने-अपने कमरों में सोने के लिए चले गए।
नादिका अब गेस्ट रूम में थी, गेस्ट रूम करीने से सजाया गया था, धूल का एक भी कण वहाँ नहीं देखा जा सकता था। सफ़र की थकी नादिका ने आँखें बन्द की, उसे जल्दी ही नींद आ गयी। आँख खुली तो इस आवाज के साथ- हैव ए गुड टी विद गुड मोर्निंग।“
नौ बजे के करीब पूरा परिवार तैयार होकर घूमने के लिए निकला, लाकिला पहुँचते ही जावेद को याद आया – आज तो सोमवार है, यानी दिल्ली टूरिज्म बन्द। इतने सालों से नौकरी करते हुए भी वह ये बात कैसे भूल गया। उसे खुद पर खीज हुई। लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था, उसने लोटस टेम्पल, कुतुबमीनार सब दिखाया लेकिन आधा-अधूरा, कहीं अन्दर जाने की एंट्री नहीं थी। अब गाडी मन्दिर मार्ग पर आ चुकी थी, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर। समरीन ही नादिका को लेकर अन्दर गयी, वह जावेद के अजीब तरह के नास्तिकवाद को जानती है। जावेद को याद आया कि नादिका तो पीरियड्स में है, अगर कोई हिन्दू रीति-रिवाज को मानने वाली लड़की होती तो शायद वह ऐसी हालत में मन्दिर के अन्दर प्रवेश ही न करती। वह जानता है कि ऐसे संस्कार भारतीय समाज के हर परिवार में लड़कियों को दे दिए जाते हैं।
लक्ष्मी नारायण मंदिर के बाद वे इण्डिया गेट आये, जावेद इण्डिया गेट को रात की रोशनी में दिखाना चाहता था। रात में इण्डिया गेट देखने में अधिक खूबसूरत लगता है, बिल्कुल सजी-संवरी दुल्हन की तरह। घूमते हुए अधिकतर समय उनकी बेटी नादिका से चिपकी रही। वह उसके साथ काफी घुल-मिल गयी थी।
अगले दिन वे सिम्बल ऑफ़ लव यानी ताजमहल गए। ताजमहल की आभा नादिका को आश्चर्यचकित कर रही थी। दिन भर आगरा घूमने के बाद वापसी में आते हुए रात अधिक हो गयी। मथुरा आकर उन्होंने डिनर किया। जावेद ने नादिका के टेस्ट का ख्याल रखते हुए बिना मिर्च के आलू पराठे बनवाये, जिन्हें दही के साथ सर्व किया गया था। नादिका को खाना पसंद आया।
घर पहुँचते हुए रात के बारह बज चुके थे। परिवार में सब सो गए लेकिन जावेद की नींद गायब थी। उसने गेस्ट रूम का रुख किया, जितना सम्भव था उसने नादिका को प्यार किया, वह भी खुश थी। ख़ुशी में वह भी उसका भरपूर साथ दे रही थी। सिंबल ऑफ़ लव का खुमार दोनों के मन में था। समरीन के जग जाने के भय से वह कुछ ही देर में वापिस अपने कमरे में चला आया।
बुधवार को नादिका की वापसी की फ्लाइट थी, एअरपोर्ट छोड़ने से पहले वह नादिका को लेकर फिर से फ्लैट पर आया, अभी उसने कपडे उतारने को हाथ आगे किया ही था कि नादिका ने कहा-“आज लास्ट डे है, अभी भी ब्लड फ्लो है?’
“उफ़ हमारी किस्मत ?”-उसने अफ़सोस जाहिर किया।
“टिकिट कराते समय तो ये सब कल्कुलेट नहीं हो सकता। अफ़सोस तो मुझे भी है कि तुम्हांरे शरीर की खुशबू अपने साथ नहीं ले जा सकती।”
“स्वीट हार्ट, हमने वादा तो किया था कि एक-दूसरे को भरपूर खुश करेंगे।”
वह नादिका का टॉप लगभग ऊपर कर चुका था।
“हाँ, डार्लिंग, लेकिन कुछ भी कहो ये ट्रिप मेरी जिन्दगी का शानदार ट्रिप है, मुझे तुम सबकी बहुत याद आएगी, स्पेसिअली तुम्हरी पत्नी की।“
“और मुझे तुम।“
“सुनो, ऐसा करो मेरी शादी किसी भारतीय से करा दो, फिर आपसे भी प्यार निभा लूँगी, सोचा तो था कि आपसे शादी करके सारी उम्र यहीं इसी मुल्क में रहूँ लेकिन आपको शादीसुदा देख भारी मन से जाना पड़ेगा।“
जावेद ने सुना तो उरोजो को मुँह में लेने की गरज से खुला मुँह उसने पीछे कर लिया। नादिका की अंगुलियाँ उसके बालों में घूम रही थी। उसने समरीन के साथ के रिश्तों की कड़वाहट को उसके सामने जाहिर नहीं होने दिया।
जावेद ने कहा– “बैग उठाओ, फ्लाइट से दो घंटे पहले एयरपोर्ट पहुँचना होता है। चेक इन की औपचारिकता बहुत समय ले लेती है।“
एअरपोर्ट पहुँचकर जावेद ने पच्चीस सौ रूपये उसके हाथ में थमाए। नादिका ने लेने से इंकार किया तो उसने तर्क दिया- “रख लो, सफ़र में हो, और अभी मेरे मुल्क में भी, कोई असुविधा न हो ये मेरी मेहमान नवाजी का दस्तूर है। अगर मन गवाही न दे तो अपने मुल्क जाकर लौटा देना, अब तो ये सब बहुत आसान है।“
“अमन! सुनो- एक काम और कर देना, मुझे बनारसी साड़ियाँ बहुत पसंद हैं, तुम मुझे बनारसी साडी जरूर भेज देना।“
“अरे तो पहले बताना था, घर के पास ही तो दुल्हन साड़ी सेंटर है, आ जाती साड़ी भी, अब तो फ्लाइट कस अमे भी हो गया, चलो मैं भेजता हूँ।“- अगले पल ही जावेद ने कहा-“ एक सरप्राइज पैकेट है तुम्हारे लिए लेकिन एक शर्त पर दूंगा-इसे फ्लाइट में बैठकर ही खोलना।“
नादिका ने पैकेट लेकर हैण्ड बैग में रख लिया। फ्लाइट में अपनी सीट पर बैठते ही उसने सबसे पहले जावेद का दिया पैकेट खोला, खूबसूरत रेपर के अन्दर डार्क चॉकलेट थी, नादिका डार्क चॉकलेट देखकर बहुत खुश हो रही थी, उसके मुंह से अनायास ही निकला- ओह अमन! आई लव डार्क चॉकलेट एंड यू टू।

संदीप तोमर
शिक्षा: एम एस सी (गणित), एम ए (समाजशास्त्र, भूगोल), एम फिल (शिक्षाशास्त्र)
सम्प्रति : अध्यापन
साहित्य सृजन
सच के आस पास(कविता संग्रह 2003), शब्दशिल्पी प्रकाशन, मौजपुर, दिल्ली
टुकड़ा टुकड़ा परछाई(कहानी संग्रह 2005), नवोदित प्रकाशन, निहाल बिहार, दिल्ली
शिक्षा और समाज (आलेखों का संग्रह 2010), निहाल पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन, गोकलपुरी, दिल्ली
महक अभी बाकी है (संपादन, कविता संकलन 2016), मुरली प्रकाशन, दिल्ली
थ्री गर्लफ्रेंड्स (उपन्यास 2017), वीएल मिडिया सलूशन, उत्तम नगर, दिल्ली
एक अपाहिज की डायरी (आत्मकथा 2018), निहाल पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन, गोकलपुरी, दिल्ली
यंगर्स लव (कहानी संग्रह 2019), किताबगंज प्रकाशन, गंगानगर, राजस्थान
समय पर दस्तक (लघुकथा संग्रह 2020), इंडिया नेटबुक, नॉएडा
एस फ़ॉर सिद्धि (उपन्यास 2021), डायमण्ड बुक्स, दिल्ली
कुछ आँसू, कुछ मुस्कानें (यात्रा- अन्तर्यात्रा की स्मृतियों का अनुपम शब्दांकन, 2021) इंडिया नेटबुक
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