विगत दिनोंबिहार के राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय के नये भवन के उद् घाटनहेतु प्रधान मंत्री आये थे। लगभग एक दशक पहले स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर के नये भवन काउद्घाटन करते हुए प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कल कहा कि यह एक विकास-यात्रा है। ‘नालंदा’ सिर्फ़ नाम नहीं, पहचान है, गौरव है, सम्मान है। आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकतीं। उनका संकेत श्री नालन्दा महाविहार के पुस्तकालय को जलाए जाने से था। पुस्तकालय जलने से अन्धकार नहीं व्यापता। ज्ञान हृदय का उजाला है। अंधकार से प्रकाश की ओर जाना हमारा अभीष्ट रहा है। नालन्दा एक नयी शुरुआत कर सकता था। उसने यही किया है। विश्व में आज विद्या व ज्ञान के माध्यम से नालंदा भारत के सामर्थ्य का परिचय देगा। वह यह भी बतायेगा कि हम मजबूत मानवीय मूल्यों पर खड़े हैं। प्रधान मंत्री ने कहा कि हम भविष्य की नींव रखना जानते हैं। अबनालंदा विश्व के अतीत ही नहीं भविष्य को भी उद् घाटित करेगा। नालंदा ज्ञान के अविरल प्रवाह का नाम है। शिक्षा सीमाओं से परे है। शिक्षा हमें गढ़ती है, विचार देती है। नालन्दा समकाल में सांस्कृतिक विनिमय का केंद्र बनेगा। श्री मोदी ने कहा कि लोकतंत्र की आरम्भिक वैश्विक आधारशिला है , बिहार। इस बहाने भी समूचे संसार में लोकतांत्रिकता के प्रसार कासंदेश जायेगा। इस अवसर पर अपने सम्बोधन मेंमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कल कहा कि नालंदा – क्षेत्र पाँच धर्मों का केंद्र है।प्रधान मंत्री व मुख्य मंत्री : दोनों का संदेश पूरे विश्व में सहमति व असहमति के बीच सेतु के रूप में कार्य करेगा। सच यह है किनालंदाविचारों के लोकतंत्र व विविधता के लिए विश्व को आकर्षित करता है।
उनके साथ इस कार्यक्रम में राज्यपालराजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विदेश मंत्री एस जयशंकर, सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा , नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. अरविंद पानगढ़िया, कुलपति प्रो. अभय कुमार सिंह और सत्रह भागीदार देशों के राजदूत आदि मौजूद थे। श्री आर्लेकर ने नालंदा को शैक्षिक विरासत व संस्कृति बताया। नालंदा की भव्यता को वापस लाना ज़रूरी था। एस. जयशंकर ने नालंदा को भारत के ज्ञान की आभा बताया। डॉ. पानगढ़िया ने इसे ज्ञान का उन्नयन बताया।
आधुनिक समय में भी नालंदा विद्या व संस्कृति के नये केंद्र के रूप में उभरा है। इसमें दक्षिण एशिया व विश्व को नयी समझ, शान्ति व मनुष्यता को विकसित करने की अपार क्षमता है। यह उसके अतीत से आता है। नालंदा विश्व का ऐसा पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जो सामान्य व्यक्ति के लिए भी उपलब्ध था। इस विश्वविद्यालय से विश्व भर में शिक्षा की व्यवस्थित व वैज्ञानिक प्रणाली विकसित होनी सम्भव हुई थी। तब विश्वविद्यालय शब्द चलन में नहीं था। इसके लिए अमूमन महाविहारशब्द का प्रयोग करते थे।प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को श्री नालंदा महाविहार के रूप में जाना जाता था। नालंदा विचार का केंद्र था।सबसे बड़ी बात कि साहित्य काकेंद्र था।
यह बात कम लोगों को ज्ञात है और मीडिया में ठीक से नहीं लाई जाती कि नालंदा में हिन्दी कविता का जन्म हुआ। यह अपभ्रंश के रूप में हुआ। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सरहपाहिन्दी कविता के प्रथम कवि थे।उनकी रचना ‘दोहा कोश’ राहुल सांकृत्यायन को तिब्बत में अनूदित मिली , जिसका अपभ्रंश मेंरूपान्तरणउन्होंने किया। इस रचना ने भारतीय कविता का नया द्वार खोला। एक नयी दृष्टि, भावबोध व काव्य-व्याकरण को जन्म देने का श्रेय सरहपा की रचना को जाता है। कविता व जीवन की सहजता का एक नया सम्बोध। एक ऐसी सहजता , जो जीवन व साहित्य को अपक्षित था।सहज यान। एक नयी सम्भावना। सरहपा की जैसी चर्चा नालंदा के परिप्रेक्ष्य में होनी चाहिए थी, न जाने क्यों सम्भव नहीं हुई। कोई पीठ, कोई मार्ग, कोई भवन , कोई चौराहा तक नहीं है उनके नाम पर। लोग भी शायद भूल गए लगते हैं। कथ्य है कि राहुल श्रीभद्र यानी सरहपा प्राचीन श्री नालंदा विश्वविद्यालय के अंतिम दिनों में आचार्य थे, उसके बाद यह धरोहर में तब्दील हो गया।
गुप्त शासकों के शासनकाल में विकसित उदार सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएँ नालंदा के बहुविषयक शैक्षणिक पाठ्यक्रम का मूल आधार बनीं, जिसमें बौद्धिक बौद्ध धर्म को विभिन्न क्षेत्रों में उच्च ज्ञान के साथ मिश्रित किया गया।
ध्यातव्य है कि नालंदा आरम्भ से ही जैन, बौद्ध व सनातन का समन्वित केंद्र रहा है। पावापुरी में जैन धर्म के 24 वेंतीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण हुआ था।महाभारतकालीन अवशेष , जरासंध का अखाड़ा , विश्वस्तरीय मलमास मेला ,गर्म जल का कुंड , गया में पितरों का विसर्जन आदि की सनातन परम्परा रही है।
बिम्बिसार ने भगवान बुद्ध का प्रथम बार राजगीर में स्वागत किया। बुद्ध की जेठियन पदयात्रा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। वेणु वन भी इस संदर्भ में प्रासंगिक है। इस तरह यह स्पष्ट है कि नालंदा केवल बुद्ध का ही आभा-क्षेत्र नहीं रहा है , इसलिए नालंदा के माध्यम से केवल बुद्ध धर्म को रेखांकित करना एकांगिकता है।
दूसरा पक्ष यह है कि इस बात से विचारकों में असहमति है कि पांचवीं शताब्दी में स्थापित श्री नालंदा महाविहार के बाद राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय जो 2014 में स्थापित हुआ, सीधे उत्तराधिकारी है। सच यह है कि नव नालंदा महाविहार , जो नालंदा में स्थित है वह प्राथमिक रूप से 1951 में ही भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सौजन्य से स्थापित हो चुका था।भिक्षु जगदीश काश्यप ने इस इलाक़े में नया जागरण किया था। वे और प्रख्यात हिन्दी लेखक व बिहार के तत्कालीन शिक्षा सचिव जगदीश चन्द्र माथुर, आई.सी.एस. ने इसकी कल्पना की थी। आज नव नालंदा महाविहार संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार का समविश्वविद्यालय है , जिसमें अनेक देशों के विद्यार्थीपढ़ने आते हैं। यहाँ पालि, बौद्ध अध्ययन, हिन्दी, अंग्रेज़ी , तिब्बती, चीनी, जापानी आदि अनेक विषय पढ़ाए जाते हैं।
श्री नालंदा महाविहार की अपनी विशेषताएं थीं। इसमें अध्यापन की भाषा संस्कृत थी। अपभ्रंश के कवि , जिन्होंने हिन्दी कविता की नीव रखी , सरहपा भी संस्कृत के ही आचार्य थे। नालंदा ने प्राचीन और प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में एक प्रमुख शैक्षणिक प्रतिष्ठान के रूप में कार्य किया है।5वीं शताब्दी ई. से 12वीं शताब्दी ई. तक के मंदिरों, मठवासी आवासों, प्रार्थना संरचनाओं , कांस्य और पत्थर से बनी कलाकृतियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। आधुनिक समय मेंनालन्दा शिक्षा का नया केंद्र बनता जा रहा है : एक नये एजुकेशनल हब के रूप में।
प्राचीन श्री नालन्दा महाविहार में आर्यभट्ट प्रमुख रह चुके थे। वे शून्य को अंक के रूप में स्थापित करने वाले पहले व्यक्ति थे जो एक क्रांतिकारी अवधारणा थी, जिसने गणितीय गणनाओं को सरल बनाया और बीजगणित तथा कलन जैसे अधिक जटिल क्षेत्रों को विकसित करने में मदद की।
श्री नालंदा महाविहार में प्रवेश के इच्छुक छात्रों को नालंदा के शीर्ष आचार्यों के साथ कठोर मौखिक साक्षात्कार में भाग लेना पड़ता था। जो भाग्यशाली होते थे, उन्हें भारत के विभिन्न कोनों से आए आचार्यों के समूह द्वारा पढ़ाया जाता था।उस युग के सबसे प्रतिष्ठित विद्वानों : धर्मपाल और सीलभद्र के साथ आचार्य अध्यापन करते थे। पुस्तकालय की नौ मिलियन हस्तलिखित, ताड़-पत्र पांडुलिपियाँ दुनिया में बौद्ध ज्ञान का सबसे समृद्ध भंडार थीं, और इसकी तीन पुस्तकालय इमारतों में से एक को तिब्बती बौद्ध विद्वान तारानाथ ने नौ मंजिला बताया था।
प्रख्यात चीनी भिक्षु और यात्री ह्वेनत्सांग ने नालंदा में अध्ययन और अध्यापन किया। ह्वेनत्सांग दुनिया के सबसे प्रभावशाली विद्वानों में से एक थे। अनेक ग्रंथों का चीनी में अनुवाद करके अपना जीवन ग्रंथ बनाया, जिसका मुख्य विचार यह था कि पूरा विश्व मन का एक प्रतिनिधित्व है।
गुप्त काल के बाद भी नालंदा को शाही संरक्षण प्राप्त रहा: हर्षवर्धन (606-648 ई.) के शासनकाल के दौरान, कन्नौज (उत्तर प्रदेश में) के राजा; और पाल वंश, जिन्होंने 8वीं से 12वीं शताब्दी तक आधुनिक बिहार, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश पर शासन किया।
नालंदा में चीन, जापान, कोरिया और दक्षिण-पूर्व और मध्य एशिया के देशों से छात्र आते थे।
माना जाता है किनालंदा का पाठ्यक्रम धार्मिक ग्रंथों से आगे बढ़कर साहित्य, धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, दर्शन, कला और तत्त्वमीमांसा को भी शामिल करता था। व्याख्यान, चर्चाएँ और सभाएँ महाविहार में नियमित शिक्षण का एक हिस्सा थीं। ह्वेनत्सांग नेमहाविहार की शोभा बढ़ाने वाले गुणमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, ज्ञानचंद्र,सांतरक्षित,सीलभद्र, धम्मपाल और चंद्रपाल जैसी प्रसिद्ध हस्तियों का उल्लेख किया है।
श्री नालंदा महाविहार का अपने आस-पास के कृषि गांवों और बस्तियों के साथ एक गतिशील संबंध रहा होगा। इससे महाविहार को अपनी खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने और असंख्य निवासी भिक्षुओं के लिए वस्तुओं और सेवाओं का स्रोत बनाने में मदद मिली होगी जो विशेष रूप से उपभोक्ता थे।
नालंदा ने महायान, वज्रयान व सहज यान के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। शान्तिदेव वधर्मकीर्ति की रचनाओं ने नया उन्मेष दिया। नागार्जुन नेशून्यवाद का नया दृष्टिकोण व दर्शन दिया।
श्री नालंदा महाविहार को वास्तुकला की एक उत्कृष्ट कृति माना जाता था, और इसकी पहचान एक ऊंची दीवार और एक द्वार से थी। नालंदा में आठ अलग-अलग परिसर और दस मंदिर थे, साथ ही कई अन्य ध्यान कक्ष और कक्षाएँ भी थीं। मैदान में झीलें और पार्क थे।
माना जाता है कि कुमारगुप्त ने 5 वीं शताब्दी ई. में श्री नालंदा महाविहार की स्थापना की थी। बुद्धगुप्त, नरसिंहगुप्त, कुमारगुप्त तृतीय आदि कई गुप्त राजाओं की मुहरें नालंदा से खुदाई करके पाई गई हैं। नालंदा दुनिया में बौद्ध शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था, जो 13वीं शताब्दी तक 800 से अधिक वर्षों तक चला। इसने पूरे एशिया से छात्र भिक्षुओं को आकर्षित किया, जिनमें चीन से तीन शामिल थे, जिनके यात्रा वृत्तांतों में 5-7वीं शताब्दी में भारत के सामाजिक जीवन और नालंदा में शैक्षणिक जीवन के बारे में आकर्षक जानकारी है। वे शहरी जीवन, कानून, चिकित्सा, शुद्धता और प्रदूषण के प्रति जुनून, भोजन संबंधी वर्जनाओं, अस्पृश्यता और सामाजिक संघर्षों का वर्णन किया है।
आज समकाल में भी नालंदा इन प्रश्नों के प्रति सम्वेदनशील है तथा गतिशील भी।
इस पूरे लेख को पढ़कर बहुत ही ज्यादा खुशी हुई। कल इसी विषय पर हमने एक वीडियो भी देखा था कि प्रधानमंत्री ने नालंदा विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया। पुराने नालंदा के संबंध में भी हमने काफी पढ़ा है।
नालंदा और तक्षशिला यह भारत की धरोहर थी अपने समय के प्रमुख और प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान रहे ये दोनों ही।
ऐतिहासिक पिक्चर ,सीरियल और उपन्यासों से इनके बारे में हमने बहुत कुछ पढ़ा और जाना था।
आज पुन: इसके बारे में पढ़कर और पुनर्स्थापना के बारे में जानकरी मन सही में बहुत प्रसन्न हुआ। हर दृष्टि से शिक्षा का महत्व है हमारे उत्थान की नींव ही यह शिक्षण संस्थान है। पहले भी पढ़ते हुए इतना अच्छा लगता था कि भारत ज्ञान का श्रोत था।
पुनः पुनश्च आपका शुक्रिया इस लेख को पढ़वाने के लिये।
इस पूरे लेख को पढ़कर बहुत ही ज्यादा खुशी हुई। कल इसी विषय पर हमने एक वीडियो भी देखा था कि प्रधानमंत्री ने नालंदा विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया। पुराने नालंदा के संबंध में भी हमने काफी पढ़ा है।
नालंदा और तक्षशिला यह भारत की धरोहर थी अपने समय के प्रमुख और प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान रहे ये दोनों ही।
ऐतिहासिक पिक्चर ,सीरियल और उपन्यासों से इनके बारे में हमने बहुत कुछ पढ़ा और जाना था।
आज पुन: इसके बारे में पढ़कर और पुनर्स्थापना के बारे में जानकरी मन सही में बहुत प्रसन्न हुआ। हर दृष्टि से शिक्षा का महत्व है हमारे उत्थान की नींव ही यह शिक्षण संस्थान है। पहले भी पढ़ते हुए इतना अच्छा लगता था कि भारत ज्ञान का श्रोत था।
पुनः पुनश्च आपका शुक्रिया इस लेख को पढ़वाने के लिये।