आज की दुनिया सोशल मीडिया की है। आज हम लोग इस वर्चुअल दुनिया से बहुत अधिक जुड़ चुके हैं कि इसके बिना हम अब अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह आभासी दुनिया बहुत हद तक हम सब को खुद में इतना अधिक उलझाए रखती है कि हम असली रिश्तों को कहीं गुम करते जा रहे हैं। इसकी दुनिया की शुरुआत 1997 में हुई। और उसके बाद तो इस दुनिया ने एक रुपहला संसार आभासी मित्र और अपने मन के लिखने के एक अनमोल तोहफा दुनिया को दे दिया।
इस आभासी दुनिया के फायदे नुकसान दोनों हैं। किसी भी वस्तु की अति उसको खराब भी कर देती है और सही तरीके से इस्तेमाल करने पर फायदा और बहुत सारी जानकारी भी देती है। मैं जब इस दुनिया से जुड़ी तो मुझे इस तरह के प्लेटफार्म की बहुत जरूरत थी। आज इसी से जुड़े कई संस्मरण मुझे याद आ रहें हैं।
मैं एक छोटे से अफगानी स्कूल में बच्चों को हिंदी पढ़ाती थी। एक दिन कुछ समस्या के कारण वो स्कूल बंद हो गया। बहुत अधिक व्यस्त रहने के बाद एक दम खाली हो जाना इंसान को डिप्रेशन में ले जाने लगता है। यह 2007 की बात है । तब मेरे बच्चे कंप्यूटर का काफ़ी इस्तेमाल करने लग गए थे। छोटी बेटी ने मुझे उस का इस्तेमाल करने को कहा क्योंकि मुझे शुरू से ही लिखने का और पढ़ने का शौक का। उसने मुझे ब्लॉग बनाना सिखाया और फिर उस पर पोस्ट करना। शुरुआत में बहुत अधिक झिझक होती थी। पर अपना लिखा हुआ कुछ भी पोस्ट करके और लोगों को पढ़ते देख बहुत अधिक खुशी भी मिलती थी।मेरा ब्लॉग “कुछ मेरी कलम से” धीरे धीरे बहुत से लोगों से जुड़ने लगा। शुरूआती दौर में इस पर कविताएं ही लिखी, फिर हर विधा को लिखा जो सराहा भी गया।
सोशल मीडिया के इस ब्लॉगिंग की दुनिया ने मुझे अपनी पहचान दी और बहुत से मित्र बने । ब्लॉगिंग मीट अप में जाना नए मित्रों से मिलना व्यस्त रखने लगा। हां इसमें कुछ मनी नहीं मिलती पर पहचान तो मिली। और कई अच्छे लेखन के पुरस्कार भी। लखनऊ ब्लॉगर मीटिंग में सर्वेष्ठ ब्लॉगर का पुरस्कार मिला। नन्हे मुन्ने बच्चों के लिए लिखने पर पुरस्कार मिला। मातृभूमि वेबसाइट ने मेरे एक सपने को पूरा किया । अमृता प्रीतम पर इस साइट पर मेरी पहली ए बुक आई ।उसके आज भी बहुत से पाठक हैं।
आज चाहे ब्लॉगर और ब्लॉग का वो दौर नहीं रहा। पर इस से जुड़ी मीठी यादें आज भी मन को तसल्ली देती हैं। उस वक्त की ब्लॉगिंग बहुत ही अलग थी फेसबुक की दुनिया से । ब्लॉग लिखने वाले और पढ़ने वाले बेबाक राय देते थे, जो बुरी नहीं लगती थी बल्कि लेखन में सुधार ही करती थी। कॉमेंट्स का इंतजार भी इसलिए रहता था। आज फेसबुक के लाइक का ज्यादा जोर है। और कॉमेंट्स भी मुक्तसर से बहुत बढ़िया ,या सुंदर आदि जो लिखने की पढ़ने की बस जैसे एक औपचारिकता ही करते हैं। ब्लॉग की दुनिया में कई ब्लॉग बहुत प्रसिद्ध हुए। जिन्होंने स्पेशल विषय को एयर भी रुचिकर बनाया। हिंद युग्म जैसे ब्लॉग बने जिसमे कहानी कविता और बाद में रेडियो जैसे विधा से भी परिचित करवाया। हिंदी ब्लॉगिंग का यह वाकई सुनहरा दौर रहा है।
फेसबुक आज भले ही सोशल मीडिया का सशक्त माध्यम हो अब पर ब्लॉग और इसमें वही टू मिनट नूडल्स वाला फर्क है। सोशल मीडिया के यू ट्यूब और इंस्टाग्राम भी अब अधिक चलते हैं। यू ट्यूब से बहुत अच्छी जानकारी मिलती है। खाना पीना और सब विषय जो आप समझना सीखना चाहते हैं। सोशल मीडिया आज के वक्त की जरूरत है ।अच्छी बुरी सभी जानकारी के लिए हम इसी पर तो निर्भर हैं।

रंजू भाटिया
शिक्षा– बी .ऐ .बी .एड
पत्रकारिता में डिप्लोमा
अनुभव —१२ साल तक प्राइमरी स्कूल में अध्यापनदो वर्ष तक दिल्ली के मधुबन पब्लिशर में काम जहाँ प्रेमचन्द के उपन्यासों और प्राइमरी हिंदी की पुस्तकों पर काम किया सम्राट प्रेमचंद के उपन्यासों की प्रूफ़-रीडिंग और
एडीटिंग का अनुभव प्राप्त हुआ।
प्रकाशन — प्रथम काव्य संग्रह “साया” सन २००८ में प्रकाशित..स्त्री हो कर सवाल करती है .साझा संग्रह .बोद्धि प्रकाशन ..पग्दंदियाँ काव्य संग्रह..संपादक और सांझा संग्रह …कुछ मेरी कलम से …काव्य संग्रह २०१३ में हिन्द युग्म से प्रकाशित …नारी विमर्श के अर्थ .साझा संग्रह ..आने वाले संग्रह …पांखुरी ..आगमन
दैनिक जागरण ,अमर उजाला ,नवभारत टाइम्स ऑनलाइन भाटिया प्रकाश मासिक पत्रिका, हरी भूमि ,जन्संदेश लखनऊ आदि में लेख कविताओं का प्रकाशन, हिंदी मिडिया ऑनलाइन ब्लॉग समीक्षा कुछ मेरी कलम से बहुत लोकप्रिय है.
इस ब्लॉग को अहमदाबाद टाइम्स और इकनोमिक टाइम्स ने विशेष रूप से कवर किया है| दीदी की पाती बाल उद्यान में बहुत लोकप्रिय रहा है|
सम्मान …..
उपलब्धियां :
2007 तरकश स्वर्ण कलम विजेता
२००९ में वर्ष की सर्व श्रेष्ठ ब्लागर
२००९ में बेस्ट साइंस ब्लागर एसोसेशन अवार्ड
२०११ में हिंद युग्म शमशेर अहमद खान बाल साहित्यकार सम्मान
२०१२ में तस्लीम परिकल्पना सम्मान चर्चित महिला ब्लागर

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