पारिजात को हरसिंगार भी कहते हैं। उत्तर भारत में भी कई जगह हरसिंगार के पेड़ पाये जाते हैं। मेरे मायके और ननिहाल दोनो जगह यह पेड़ हुआ करते थे। नारंगी डंडी पर सफेद कोमल फूल आज फिर यादों में खुशबू भरने लगे हैं। घर के पिछवाड़े एक कुआँ, नीम, छोटे-छोटे लाल रंग के फूलों की छुईमुई की बेल जो एक दीवाल पर चढ़कर लिपटी रहती थी, कटैया के फूलों के झाड़, पपीते के पेड़ और एक हरसिंगार का पेड़ भी था। कुछ जंगली फूल भी वहाँ उगे हुये थे। किंतु हरसिंगार की बात ही कुछ और थी। उसके फूलों को तोड़ना नहीं पड़ता था।
सुबह तड़के उठने पर हवा के झोंकों से गिरे जमीन पर बिछे उसके सुकोमल फूलों को हम झोली में भर लेते थे। उन्हें पूजा के लिये भी एकत्र किया जाता था। और कभी-कभी सुई-धागा से उनकी माला बनाकर बच्चे गले में भी पहना करते थे। गर्मी की दोपहर में कटैया के पीले फूल भी, जिन पर आकर तितलियाँ उड़ती रहती थीं, अपनी झोली में भरकर हम सभी बच्चे एक दूसरे पर फेंका करते थे। इसके फूल इतने नाजुक होते हैं कि तोड़ने पर उनकी पंखुड़ियाँ अलग हो जाती हैं। नीम के पेड़ पर पड़े झूले पर बैठने के लिये भी अकुलाहट रहती थी। एक दूसरे को धक्का देकर झूले को झपट लेने में भी एक तरह का आनंद आता था। पैरों से चप्पलों को झटककर नंगे पाँव पैंगें भरना और पैरों के तलवों से कुचल गई निमकौरियों की गिजगिजाहट आज भी याद आती है।
जेठ की गर्म हवा और तपती दोपहरी में जब अम्मा ठंडे फर्श पर चटाई बिछा कर सो जाती थीं तो हम लोग सोने का बहाना करते थे। और उन्हें गहरी नींद में देखकर मौके का फायदा उठाकर कमरे से खिसक जाते थे। एक छोटी बाल्टी और रस्सी उठाकर कुयें पर जाकर पानी खींचकर ठंडे पानी से नहाते हुये ‘हर-हर गंगा’ कहकर शोर मचाते थे। घर की आँगन की क्यारी में गुलाबास, बेला-चमेली, गुलाब और रातरानी महका करते थे। गर्मी के मौसम में बड़े से आँगन में चारपाइयों पर सब लोग सोते थे। और भोर की बेला में क्यारी में लगे उस रातरानी के पेड़ के फूलों की खुशबू पूरे आँगन में बिखर जाती थी। मदहोश हवा के झोंके जब साँसों में समाते थे तो बिस्तर से उठने को मन नहीं होता था।
बेला के सफेद फूलों को बालों में सजाना मन को बड़ा लुभाता था। और हाँ, जंगल जलेबी और जामुन का पेड़ तो भूले ही जा रही हूँ। जंगल-जलेबी के पेड़ के फल का गूदा मीठा और हल्के हरे और सफेद रंग का होता है। जंगल-जलेबी और जामुन के फल संभल-संभल कर पैर रखते हुये कभी दीवाल पर चढ़कर या कभी किसी के कंधे पर चढ़ कर हाथों से लपक-लपक कर तोड़ा करते थे। जिनके घर में जामुन का पेड़ था वह दादी जब देख लेती थीं हमें फल तोड़ते हुये तो बहुत चिल्लाया करती थीं। और माँ से आकर शिकायत करती थीं। घूँसे और चाँटे खाने के कुछ दिनों बाद हम फिर वैसे के वैसे।
हम मार खाने के इतने आदी हो चुके थे कि माँ के हाथ की मार प्रसाद की तरह लगने लगी थी। चुराकर फल तोड़ कर खाने में जो आनंद होता है उसका वर्णन करना बहुत कठिन है। लेकिन हमारी  समझ में यह कभी नहीं आया कि पकने के बाद जमीन पर ढेर सारे जामुन जब अपने आप टूट कर गिरते रहते थे तब दादी कुछ नहीं कर पाती थीं। और पेड़ पर भी बैठे चिड़ियाँ-कौवे उन जामुनों को खाते रहते थे। उस पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं था। फिर हम ही दोषी क्यों?
उनके बड़े से ऊबड़-खाबड़ आँगन में दो-तीन बकरियाँ मिमियाते हुये घूमती रहती थीं। जो जमीन पर पड़े जामुनों पर मुँह मारा करती थीं। लेकिन अगर उन्हीं जामुनों को हम बच्चों की टोली बिना शोर मचाये भी पेड़ से तोड़ना चाहे तो दादी को पता नहीं कैसे मालूम हो जाता था। वह झट से अपनी कुठरिया से बाहर निकल आती थीं जैसे एक गिलहरी अपनी खोह से ताक-झाँक के लिये निकल आती है। और हमें देखकर आफत मचाने लगती थीं। जैसे वह हमारी टोह में रहती थीं। वैसे ऐसी घटनाओं को छोड़कर वह बच्चों से बहुत प्यार से पेश आती थीं। उन्हें हम सब ‘पीपरा वाली दादी’ के नाम से जानते थे। क्यों कि उनके घर के आगे एक बड़ा सा पीपल का पेड़ लगा हुआ था। और तमाम औरतें उस पेड़ की पूजा भी करने आती थीं।
घर के पीछे की गली में खेलना भी उस सीधे-साधे बचपन का एक हिस्सा हुआ करता था। और भी न जाने क्या-क्या छुपा है उस बचपन के खजाने में। आह! आज वह यादें फिर से महकने लगी हैं।
मेरी यादों में है बचपन का खजाना
शहतूत, जामुन और अमरूदों का खाना
आंवले तोड़े थे पेड़ों पर चढ़कर और सीखा
आम की गुठलियों से सीटी बनाना
जिसने न खाये आम उसकी जिंदगी बेकार
जो भी इसको खाता हो जाता इसका दीवाना।
हमने अपना बचपन भरपूर जिया है। उसकी मनमोहक यादें आज भी सजीव हो उठती हैं। आज के मोबाइल, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप्प की दुनिया में रहने वाले बच्चे क्या जानें उस तरह के बचपन का आनंद। उनके लिये यह कोई परियों की कहानी की तरह लगेगा।

1 टिप्पणी

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.