अभी कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी-“थप्पड़” जिसमें पति द्वारा पत्नी को मारा गया थप्पड़ उनके रिश्ते को कोर्ट तक ले जाता है। जब ये फिल्म आई तो दर्शको की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली, कुछ का कहना था कि एक थप्पड़ ही तो मारा था, वह भी आक्रोश  में आकर, और फिर पति ने माफी भी तो मांग ली थी, क्या यह भी कोई वजह हो सकती है कि पत्नी इस बात को इतना तूल दे कि विवाह-विच्छेद (तलाक) के लिए न्यायालय की शरण में चली जाए, वहीं दूसरी ओर एक ऐसा दर्शक वर्ग था जिसका मानना था- किसी भी स्थिति में पति को पत्नी पर हाथ उठाने का हक नहीं होना चहाइए, आखिर पत्नी भी इंसान है, उसका अपना स्व है, उसका स्वाभिमान है, उसका भी समाज में सम्मान है। असल में यह थप्पड़ मात्र गाल पर पड़ा थप्पड़ नहीं होता बल्कि यह किसी के जमीर पर पड़ने वाला थप्पड़ होता है। थप्पड़ फिल्म की नायिका को त्वरित क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम को अमल में लाना चाहिए था।
अक्सर देखते को मिलता है कि समाज में घटने वाली हर घटना पर दो तरह की राय समाने आती हैं, चाहे वह घटना राजनीतिक हो, धार्मिक हो, सामाजिक हो या फिर घरेलू। लेकिन एक बात तो है कि इक्कीसवी शताब्दी के तीसरे दशक में भी घरेलू हिंसा के मामले आना हमाँरे पढे-लिखे होने पर सवालिया निशान अवश्य उठाता है।
 हाल ही में घरेलू हिंसा को जायज ठहराते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट के जज जस्टिस के. भक्तवत्सल ने कहा कि विवाह में महिलाओं को परेशानी उठानी पड़ती है। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की सही देखभाल करता है तो हिंसा में कोई बुराई नहीं है। यह बयान बेशक जस्टिस के. भक्तवत्सल की नजर में बेहद आम और न्यायसंगत हो लेकिन इस फैसले का जो संदेश जनता में गया वह बेहद गंभीर है। सोचा जा सकता है- जब समाज का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति घरेलू हिंसा को समर्थन देने जैसे बयान दे तो इससे समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण के सभी प्रयासों पर कितना बुरा प्रभाव पड़ना पड़ेगा। जस्टिस के. भक्तवत्सल के  बयान में एक पुरुषवादी समाज की सोच नजर आती है जो पत्नियों को पैर की जूती समझता है।
भारतीय समाज में एक लंबे अर्से से शादीशुदा महिलाओं के साथ मारपीट और हिंसा होती रही है। इस तरह की घटनाओं से समाज का कोई भी वर्ग, आयु इत्यादि अछूता नहीं है। अभी कुछ समय पहले एक रिश्ते की दादी का घर आना हुआ, बातचीत में उन्होने बताया कि उनके पति उनको बहुत मारते हैं और अपशब्द बोलते हैं।  मैंने उनसे सीधा सवाल किया-“आपने उनको छोड़ा क्यों नहीं?” उन्होंने जवाब में कहा-“मेरे माँ-पिताजी ने शादी के समय मुझे बोला था कि लड़कियों की मायके से डोली उठती है और ससुराल से अर्थी। बिना अर्थी के ससुराल से जाना संबंध खत्म करना, पति से तलाक लेना हमारे समाज में बहुत गलत माना जाता है इसलिए मैंने तुम्हारे दादा जी को तलाक नहीं दिया।“
सोचा जा सकता है कि महिलाओं के लिए उन माँ-बाप की नजरों में क्या ही इज्जत, प्यार और समान होता है जो अपनी बेटियों पर हुए अत्याचार मात्र इसलिए सह लेते हैं कि बेटी की एक बार शादी कर दी तो उसका जीना-मारना, दुख-दर्द सब उनके ससुराल के जिम्मे। यानि शादी का अर्थ हर बात की इतिश्री होना है। जिन दादी का जिक्र मैंने अभी किया उनको दादा जी ने शादी के दो दिन बाद से ही पीटना शुरू कर दिया था। डोली-अर्थी जैसी बातें सुनने में ही  अच्छी लगती हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जिन्हें शादी के बाद से ही छोड़ देना चाहिए, महिलाएं उनके लिए पूरा जीवन स्वाह कर देती हैं।
समझ नहीं आता- कब तक हमारा समाज इन बेकार की बातों मे उलझा रहेगा , कब तक हम अपनी लड़कियों को यही सिखायेंगे- “लड़कियों की डोली उठती है उनके घर से और ससुराल से अर्थी।”
हमारे समाज में आज भी लड़कियों को शादी के बाद अपना उपनाम (सरनेम) बदलना पड़ता है, पासपोर्ट से लेकर तमाम सरकारी कागजों में अपना नाम बदलना पड़ता है, और यह सब सरकारी देख-रेख में होता है। पुरुष-प्रधान समाज को समझना चाहिए कि कोई लड़की तुम्हारे लिए अपना घर, अपना परिवार, अपना उपनाम तक छोड़ कर आती हैं, बदले में वह तुमसे क्या चाहती है, मात्र एक सम्मान, स्नेह और परिपक्व साथी, तो तुम्हारा कर्तव्य हैं उसे खुश रखना। क्या अपनी पत्नी पर हाथ उठाना, उसे गालियाँ देना, उसके काम करने के तरीके पर उसे ताने देना तुम्हें शोभा देता है?
एक बड़े लेखक ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया कि बचपन में वह अपने पिता द्वारा माँ को प्रताड़ित होते देखते थे तो उनका हृदय पिता के प्रति घृणा से भर जाता था, वे अपने शिक्षक पिता के प्रति चाह कर भी सम्मान पैदा नहीं कर पाये। कम उम्र और पिता पर आश्रित होने के चलते वे माँ के प्रति हुई शारीरिक हिंसा का मुखर होकर विरोध नहीं कर पाये, वे कहते हैं- “आज भी उन घटनाओं को याद कर मैं ग्लानि से भर उठता हूँ।“ एक लेखिका से बातचीत के दौरान पता चला कि उनके पति पचास वर्ष की आयु में भी उनके साथ गाली-गलौच करते हैं, और अक्सर गुस्से से हिंसा पर उतार आते हैं, उक्त लेखिका के पति घरेलू खर्च का बोझ भी वहन नहीं करते, जबकि उक्त लेखिका नौकरी करके घर का आर्थिक बोझ स्वयं वहन करती हैं। अगर हम समाज में नजर उठाकर देखें तो इस तरह के अनगिनत केस पाते हैं, कितनी ही घरेलू कामकाज करने वाली महिलाएं जिन्हें बाई, माई इत्यादि नाम से पुकारा जाता है, उनसे बात करें तो पता चलता है कि उनके पति कोई काम नहीं करते, उल्टा पत्नी की कमाई छीनकर उससे शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं। उन पत्नियों के हिस्से सिर्फ शोषण और हिंसा आती है। और ये सब आधुनिक उन्नत और सक्षम समाज में हो रहा है, एक तरफ हम विश्वगुरु भारत का डंका पीटते हैं, तकनीकी युग की बात करते हैं, दूसरी तरह महिलाओं की स्थिति देखते हैं जो आज भी नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं।
अभी कुछ समय पहले एक मामला सामने आया था- पीयूष और प्रीति की शादी को दो साल हो चुके थे, इन दो सालों में दोनों ने अपने वैवाहिक जीवन की कठिनाइयों से हार मानते हुए तलाक का फैसला किया, वजह थी पीयूष का गुस्सैल रवैया और दो चार बार प्रीति पर हाथ उठाना। जब प्रीति ने सिर्फ एक थप्पड़ पर पीयूष से तलाक लेने का फैसला किया तो प्रीति की मां ने उससे पूछा कि पीयूष तुम्हारा इतना ख्याल रखता है, तुम्हारा खर्चा उठाता है और इसके बदले उसने तुम पर हाथ उठाया तो क्या गलत किया? सवाल उठता है कि क्या मात्र खर्च उठाने से किसी को शारीरिक हिंसा का अधिकार मिल जाना चाहिए? और इस तरह के माता-पिताओं को क्या कहा जाए जो खुद ही अपनी बेटियों को अंधकार में धकेलने का काम करते हैं।
सवाल उठता है कि पुरुष ऐसा व्यवहार क्यों करता है? महिला को चोट पहुंचाने के लिए एक पुरुष अनके बहाने दे सकता है जैसे कि- वह शराब के नशे में था; वह अपना आपा खो बैठा या फिर वह महिला इसी लायक है। परंतु वास्तविकता यह है कि वह हिंसा का रास्ता केवल इसलिए अपनाता है क्योंकि वह केवल इसी के माध्यम से वह सब प्राप्त कर सकता है जिन्हें वह एक मर्द होने के कारण अपना हक समझता है। इसमें समाज की भी अहम भूमिका है, पुरुष-सत्तात्मक समाज की परवरिश ही इतनी गयी गुजरी है कि हम स्त्री को एक ओवजेक्ट में तब्दील कर देते हैं, एक ऐसा ऑब्जेक्ट कि वह हर अन्य वस्तु की तरह ही मात्र एक वस्तु है और पुरुष उसका स्वामी, यह स्वामित्व का अधिकार ही पुरुष को इस तरह की मनोवृति की तरफ ले जाता है कि वह स्त्री को बराबर का नागरिक न समझे।
जब हम किसी पुरुष के हाथों एक महिला के उत्पीडन व हिंसा के बारे में सुनते हैं तो हमारा पहला प्रश्न अक्सर यह होता है, वह तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देती? अनेक ऐसे कारण हो सकते हैं जो महिला को इस प्रकार के घुटनकारी व उत्पीडन युक्त जीवन संबंधों को जारी रखने के लिए मजबूर कर देते हैं।
पुरुष कई बार यह धमकी देते हैं, “अगर तुम यहां से गई तो मैं तुम्हें, बच्चों और तुम्हारी मां को जान से खत्म कर दूंगा – “। ऐसे में महिला सोचती है कि वह वहाँ रहकर वह सब कर रही है जिससे उसकी व अन्य लोगों की जान की रक्षा हो सके। यदि महिला के पास न तो पैसा ही हो और न ही कहीं जाने का ठिकाना तो वह हिंसा सहने के लिए अभिशप्त होती है। शिक्षा व दक्षता की कमी के कारण भी महिला कोई रोजगार पाने में असमर्थ होती है, जिससे वह स्वयं अपना व बच्चों का पालन-पोषण नहीं कर पाती। महिला के पास पुरुष की हिंसा और चोटों व मौत से बचने की कोई सुरक्षा न हो तो भी उसे हिंसा को सहना पड़ता है। कितनी ही महिलाएं ऐसी भी देखने को मिलती हैं जो मानसिक रूप से इतनी कमजोर हो चुकी होती हैं कि उन्हें लगने लगता है कि उसके साथ जो हिंसा हो रही है, उसकी स्वयं की वजह से हो रही है और वह इसी लायक है। अनेक महिलाओं का ऐसा विश्वास होता है कि चाहे कुछ भी हो, शादी को बचाना उसका कर्त्तव्य है। महिलाओं को ऐसा भी लगता है कि वह उस पुरुष से प्यार करती है और उस रिश्ते को जारी रखना चाहती है। उसे आशा रहती है कि किसी न किसी तरह से हिंसा रुक जाएगी। बच्चों को बिना बाप के कर देने के अपराधबोध से भी वह स्वयं को बचाए रखना चाहती है। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के एक उपन्यास और उनकी आत्मकथा को पढ़कर पता चला कि पिता की मृत्यु के बाद उनकी माँ ने अपने पति के ज्येष्ठ भाई और अपने ससुर की यौन हिंसा से बचने के लिए पुनर्विवाह किया तो उक्त लेखक ने माँ को अपना दोषी माना और उनसे सदा के लिए नाता तोड़ दिया, सोचा जा सकता है कि दूसरों की समस्या को समाज के सामने रखने वाला लेखक भी पुरुषवादी सोच के चलते विधवा माँ के पुनर्विवाह के कारण उसके प्रति कितना निष्ठुर हो सकता है?
लेकिन शायद एक बेहतर प्रश्न हो सकता है यह पूछना कि “ वह क्यों नहीं घर छोड़कर जाती?” जब हम यह पूछते हैं कि “वह उसे छोड़ कर क्यों नहीं जाती” तो इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि हमारे विचार में यह उसकी व्यक्तिगत समस्या है। लेकिन ऐसा सोचना सरासर गलत है कि हिंसा केवल उसकी समस्या है। यह पूरे समाज का यह उत्तरदायित्व है कि समाज का हर व्यक्ति स्वस्थ व कुशलतापूर्वक रहे। अगर पुरुष या परिवार का कोई अन्य सदस्य महिला के स्वस्तंत्र रूप से रहने के अधिकार का हनन करके या उसे चोट पहुंचा अथवा मारकर कोई अपराध कर रहा है तो इसके इन कुकर्मों को चुनौती देना व रोकना आवश्यक है। दहेज प्रताड़ना के एक मामले में पति की अग्रिम ज़मानत की याचिका को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ससुराल में पत्नी को पहुँचाई गई चोटों के लिए प्राथमिक तौर पर पति ज़िम्मेदार होता है, भले ही चोटें रिश्तेदारों की वजह से आई हों।
भारत में महिलाओं की सुरक्षा – घरों के अंदर और बाहर – दोनों एक प्रमुख चिंता का विषय है। भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध एक विशेष रूप से गंभीर समस्या है। 2012 में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में भारत को जी-20 देशों में महिलाओं के लिए सबसे खराब देश के रूप में दर्जा दिया गया है। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि 2012 के दौरान महिलाओं के खिलाफ 2,44,270 अपराध हुए (प्रति 1,00,000 महिलाओं पर 41 अपराधों की दर)। इन अपराधों में 24,923 बलात्कार (4 प्रति 1,00,000 महिलाएं), 8,233 दहेज-संबंधी हत्याएं (प्रति 1,00,000 महिलाएं) और 1,06,527 पति या उनके रिश्तेदारों (प्रति 1,00,000 महिलाएं) द्वारा दुर्व्यवहार जैसी घटनाएं शामिल हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के अनुसार 36% विवाहित महिलाओं ने अपने जीवन-साथी द्वारा धक्का दिया जाना, थप्पड़ मारा जाना, मारना, गला घोंटना, जला देना या हथियार से डराना जैसे शारीरिक शोषण के कुछ प्रकारों का अनुभव किया है। इसके अलावा लगभग तीन चौथाई महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने खिलाफ हिंसा का अनुभव किया है परंतु उन्होंने कभी मदद नहीं मांगी है। इससे पता चलता है कि एनसीआरबी डेटाबेस गंभीर अंडर-रिपोर्टिंग से ग्रस्त है और जितना एनसीआरबी ने रिपोर्ट किया है, उससे कहीं अधिक महिलाओं के खिलाफ हिंसा की समस्या विद्यमान है।
सवाल कहड़ा हो सकता है कि क्या महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और घरेलू हिंसा के बीच कोई संबंध है? इसका जवाब ये हो सकता है कि एक ओर महिलाओं की आय और धन का उच्च स्तर उनके प्रति घरेलू हिंसा को कम कर सकता है क्योंकि वे घर में महिलाओं की बातचीत करने की स्थिति में सुधार करती हैं। दूसरी ओर, पति अपनी अधिक सशक्त पत्नियों को अपनी स्थिति के लिए खतरा के रूप में देख सकते हैं, जिससे अधिक प्रतिशोधी हिंसा को बल मिल सकता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 जो हिंदू, बौद्ध, जैन और सिखों पर लागू होता है – और जो पारिवारिक संपत्ति की विरासत के संबंध में बेटों की तुलना में बेटियों के लिए अधिक हितकारी नहीं है। इस अधिनियम के तहत बेटियों को अपने पिता की स्वतंत्र संपत्ति के साथ-साथ परिवार की पैतृक संपत्ति में से पिता के “काल्पनिक” हिस्से को प्राप्त करने के लिए बेटों के समान अधिकार था। हालांकि बेटे परिवार की पैतृक संपत्ति में से अपने लिए स्वतंत्र हिस्से के हकदार थे। बेटों को यह अनुरोध करने की भी अनुमति दी गई थी कि पैतृक संपत्ति को विभाजित किया जाए, जबकि बेटियों को ऐसा कोई अधिकार नहीं था। 1956 अधिनियम के बाद कुछ राज्यों ने अधिनियम में संशोधन करने के लिए कानून बनाया और संपत्ति विरासत कानूनों को स्त्री-पुरुषों के लिए अधिक तटस्थ बनाया। इन राज्यों में केरल (1976), आंध्र प्रदेश (1986), तमिलनाडु (1989), महाराष्ट्र (1994), और कर्नाटक (1994) शामिल हैं। इन संशोधनों ने महिलाओं को परिवार की पैतृक संपत्ति में दावा करने का अधिकार दिया। हालांकि संशोधन केवल उन महिलाओं पर लागू थे, जिनका इस कानून के पारित होने के समय विवाह नहीं हुआ था। संपत्ति विरासत कानून की पड़ताल करने पर पता चलता है कि ये कानून भी बहुत ही भ्रामक हैं। इनमें अपेक्षित सुधार की जरूरत है, क्योंकि भारत में धन के एक बड़े हिस्से में भूमि शामिल है।
महिलाओं से यदि पूछा जाए कि अपने पति को बताए बिना घर से बाहर जाना, दहेज का भुगतान करने में विफल होना, घरेलू जिम्मेदारियों की उपेक्षा करना, अच्छा खाना नहीं बनाना और विवाहेतर संबंध रखना जैसे संभावित कारणों में से किसी के लिए “क्या आपके समुदाय में, पति के लिए अपनी पत्नियों को पीटना सामान्य है”। महिलाओं की ओर से मिलने वाले जवाबों से पता चलेगा कि ‘पिटाई’ का कामकाजी होने से कोई सम्बन्ध नहीं है, हालांकि अधिक कमाई वाली महिलाओं द्वारा इस विषय पर ईमानदार जवाब मिलने की संभावना भी कम है।
साल 2019 की Oxfam इक्ववैलिटी और इनइक्वैलिटी रिपोर्ट के तहत भारत के प्रमुख राज्यों के करीब 1000 परिवारों से घर की महिलाओं की स्थिति के बारे में बात की गई। जिसमें घर के मर्दों ने छोटी-छोटी बातों पर महिलाओं को मारने, पीटने और फटकारने की बात स्वीकारी। इस रिपोर्ट के तहत भारत में हावी पितृसत्तात्मक सोच का खुलासा हुआ। इस दौरान कई घरों के मर्दों ने ये माना कि छोटी-छोटी बात पर घर की महिलाओं पर हाथ उठाना उनके लिए कोई गलत बात नहीं है. दरअसल, पित्रसतात्मक समाज इस बात को मान चुका है कि वो घर से बाहर कमाने के लिए और औरत की घर की चारदीवारी में रोटियां सेंकने, घर का काम करने और बच्चा पैदा करने की मशीन भर है। महिलाओं के हाथ में केवल उतने ही पैसे होने चाहिए जितने में वो घर खर्च चला सकें। सर्वे में शामिल करीब 53% मर्दों ने माना कि अगर महिला बच्चे की परवरिश ठीक ढंग से नहीं कर रही है तो उसे फटकारना गलत नहीं है। महिला द्वारा किचन की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने पर 41% मर्दों ने उसे मारने-पीटने तक की वकालत की है। वहीं 42% मर्दों ने माना कि अगर महिला पीने का पानी न भरे और खाना बनाने के लिए ईंधन न लाए तो उसे मारना वाजिब है। 54% मर्दों ने माना कि अगर औरत उनकी गैर जानकारी में अपनी मर्जी से कहीं बाहर घूमने-फिरने जाती है तो उसे फटकारना उनका हक़ है। वहीँ कुछ इसके लिए औरत पर हाथ उठाने की बात करते मिले। अगर स्थिति यह है तो सोचा जा सकता है कि अभी महिलाओं के हित में समाज का क्या रवैया है? जबकि कई भारतीय धर्म ग्रन्थ ऐसे भी हैं जिसमें महिलाओं को देवी का दर्जा देते हुए उन्हें पूज्यनीय बताया गया है। मनु स्मृति का ही एक श्लोक है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवत:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।
कानूनी रूप से देखे तो पाते हैं कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 भारत की संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाना है और पीड़ित महिलाऔं को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है। यह अधिनियम 26 अक्टूबर 2006 को लागू हुआ। इस काननों के अनुसार- “शारीरिक दुर्व्यवहार अर्थात शारीरिक पीड़ा, अपहानि या जीवन या अंग या स्वास्थ्य को खतरा या लैगिंग दुर्व्यवहार अर्थात महिला की गरिमा का उल्लंघन, अपमान या तिरस्कार करना या अतिक्रमण करना या मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार अर्थात अपमान, उपहास, गाली देना या आर्थिक दुर्व्यवहार अर्थात आर्थिक या वित्तीय संसाधनों, जिसकी वह हकदार है, से वंचित करना, मानसिक रूप से परेशान करना ये सभी घरेलू हिंसा कहलाते हैं। इस क़ानून के तहत घरेलू हिंसा के दायरे में अनेक प्रकार की हिंसा और दुर्व्यवहार आते हैं। किसी भी घरेलू सम्बंध या नातेदारी में किसी प्रकार का व्यवहार, आचरण या बर्ताव जिससे (१) आपके स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, या किसी अंग को कोई क्षति पहुँचती है, या (२) मानसिक या शारीरिक हानि होती है, घरेलू हिंसा है।
पीड़ित के रूप में महिलाएं इस कानून के तहत ‘संरक्षण अधिकारी’ या ‘सेवा प्रदाता’ से संपर्क कर सकती हैं। पीड़ित सेवा प्रदाता से, उसकी शिकायत दर्ज कराने अथवा चिकित्सा सहायता प्राप्त कराने अथवा रहने के लिए एक सुरक्षित स्थान प्राप्त कराने हेतु संपर्क कर सकती है। सीधे पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट से भी संपर्क किया जा सकता है। वे मजिस्ट्रेट – फर्स्ट क्लास या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट से भी संपर्क कर सकती हैं। यदि महिलाएं अपनी समस्याओं का स्थायी समाधान चाहते हैं, तो अदालत में जा सकती हैं। इस अधिनियम के तहत ज़िम्मेदार न्यायाधीशों को’ मजिस्ट्रेट्स’ कहा जाता है। पीड़ित को स्वयं आवेदन करने की ज़रुरत नहीं है, संरक्षण अधिकारी या सेवा प्रदाता के माध्यम से ऐसा किया जा सकता है। ज़रूरी है कि मजिस्ट्रेट संरक्षण अधिकारी या सेवा प्रदाता द्वारा दर्ज की गयी पहली शिकायत के तथ्यों को ध्यान में रखें। इस अधिनियम के तहत शिकायत के अलावा पीड़ित अदालत में सिविल केस भी दाखिल कर सकती है। यदि पीड़ित सिविल केस भी दाखिल करती है और उसे घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कोई राशि दी गयी है तो मजिस्ट्रेट यह राशि सिविल केस में तय राशि से घटा देगा। मजिस्ट्रेट के ऊपर आवेदन मिलने के तीन दिन के अन्दर केस पर कार्यवाही शुरू करने की ज़िम्मेदारी है। केस शुरू होने के पश्चात, मजिस्ट्रेट को अधिकतम ६० दिन के भीतर केस का निवारण करने की कोशिश करनी है।
भारत में कानून बनना अलग बात है और उनका क्रियान्वयन करना दूसरी बात है।  महिलाओं पर हिंसा को रोकने के लिए समय-समय पर कानून तो बने लेकिन उनका पालन न के बराबर ही हुआ। साल 2006 में घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 लागू होने के बाद घरेलू हिंसा पर थोड़ी लगाम लगी जरूर है लेकिन महिलाओं के उत्थान में अभी भी बहुत दिक्कत रही हैं।    हमें ऐसे समाज का बहिष्कार करना चाहिए जो किसी को प्रताड़ित करे या फिर मरने पर मजबूर करे। हमें “जियो और जीने दो” की नीति पर अमल करने की जरूरत है। आओ मिलकर हाथ बढ़ाएँ और समाज को खुशनुमा बनाने में सहयोग करें।

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