Friday, June 21, 2024
होमलेखविद्या सिंह का लेख - स्वातंत्र्योत्तर महिला लेखन

विद्या सिंह का लेख – स्वातंत्र्योत्तर महिला लेखन

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में, नारी की सर्जक के रूप में भागीदारी प्रारंभ से ही रही है, यह और बात है कि साहित्येतिहास में पुरुष वर्चस्व के कारण उसे निर्वासन झेलना पड़ा। अब स्थितियां बदल रही हैं। महिला साहित्यकारों की उपस्थिति अत्यंत मुखर रूप में दिखने लगी है। यह मुखरता पुरुष प्रधान साहित्यिक परिदृश्य को न केवल चुनौती दे रही है, अपितु वास्तविक अर्थ में उसे पूर्णता भी प्रदान कर रही है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद साहित्य सृजन में महिलाओं की भागीदारी तीव्र गति से बढ़ती गई। नारी में विकसित नवीन चेतना व जागरुकता के चलते नारीवादी दृष्टिकोण विकसित हुआ। स्त्री ने परिवेश, परिस्थिति, व्यक्ति से प्रभावित, अनुभूत जीवनानुभव को शब्दबद्ध किया। मन्नू भंडारी, शिवानी, कृष्णा सोबती, मंजुल भगत, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा, ममता कालिया, शशिप्रभा शास्त्री, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्गल, कृष्णा अग्निहोत्री, सिम्मी हर्षिता, मृदुला सिन्हा आदि ने नारी मन की गहराइयों का सूक्ष्म अंकन करने का सद्प्रयास किया है।
महिला साहित्यकारों का साहित्य महिला विषय पर केंद्रित होने के कारण, उन पर सीमित दायरे में बंधे होने का आरोप भी लगाया जाता है, तथापि आज की जागरूक महिला साहित्यकार इस आरोप को झुठलाते हुए,उन अनछुए विषयों को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान कर रही हैं,जो अब तक साहित्यकारों की दृष्टि से ओझल थे। कृष्णा सोबती ने ‘ऐ लड़की’ व ‘मित्रो मरजानी’ के द्वारा स्त्री के स्वतंत्र मन की वकालत की। इस संबंध में मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं, “हमारा मन जो कहता है,पांव जहां ले चलते हैं, इंद्रियां जिस सुख की आकांक्षा करती हैं, मनुष्य होने के नाते वे हमारे कुविचार कुचेष्टाएं नहीं जन्म सिद्ध अधिकार है।”
लोकतंत्र के प्रसार ने दुनिया में समानता के सिद्धांत को बुनियादी और सैद्धांतिक स्तर पर बढ़ाया है। कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की बराबरी से बड़ी कोई बराबरी नहीं हो सकती। टेक्नोलॉजी का बढ़ता प्रसार, मानवता के मुद्दों पर ज़ोर तथा विश्व भर में लोकतांत्रिक संस्थाओं के आ जाने के कारण स्त्रियों की अभिव्यक्ति के अवसर बढ़े हैं। भारत के संदर्भ में मध्यमवर्गीय समाज व दलित समाज की स्त्रियां भी अब बोलने लगी हैं।शिक्षा के चलते लिखने भी लगी हैं। ममता कालिया कहती हैं,”पिछले दो दशकों में महिला लेखन का अतिरेक एक विस्फोट की शक्ल में सामने आया है। उनके लेखन में विषय के कोष्ठक टूटते जा रहे हैं। सेक्स, सेंसेक्स, राजनीति, धर्म नीति, ये सब उनके लेखन क्षेत्र में आते हैं। विषय व विधा के चयन में उन्होंने सदियों से जंग लगे ताले तोड़े हैं।”
एक सर्जक के रूप में नारी की सहभागिता इतनी बढ़ चुकी है कि आज उनके साहित्य हेतु नारीवादी साहित्य, महिला लेखन, स्त्री विमर्श जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा है। लेखिकाओं ने स्त्री की क्षमताओं को अत्यंत विश्वसनीय ढंग से उकेरा है। ‘आपका बंटी’ उपन्यास में मन्नू भंडारी ने शकुन के रूप में एक ऐसा स्त्री पात्र गढ़ा है, जो समाज की परवाह न करते हुए पति से तलाक लेकर, दूसरा विवाह करती है और अपने बच्चे को अपने पास रखती है। ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ में उषा प्रियंवदा की नायिका अविवाहित रहकर अपने परिवार की सहायता करती है। मंजुल भगत ने अनारो के रूप में निम्न वर्गीय मजदूरिन के जीवन संघर्ष को चित्रित किया। चित्रा मुद्गल ने नमिता (आवां), मैत्रेयी पुष्पा ने मंदाकिनी(इदन्नमम), तथा मृदुला गर्ग ने स्मिता(कठगुलाब) के माध्यम से यौन उत्पीड़न का दंश भोगती नारी को वाणी दी। प्रभा खेतान ने छिन्नमस्ता की प्रिया, जया जादवानी ने तत्त्वमसि की मानसी तथा नासिरा शर्मा ने शाल्मली द्वारा पुरुष प्रधान समाज को टक्कर देते हुए अपने अस्तित्व का निर्माण करती नारी का चित्रण किया। मैत्रेयी पुष्पा ने बेतवा बहती रही (उर्वशी),झूलानट(शीलो), नासिरा शर्मा ने ठीकरे ‌की मंगनी की महरुख तथा ममता कालिया ने बेघर में प्राचीन रूढ़िगत मान्यताओं व परंपराओं से त्रस्त होकर, उनके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करती नारी का वर्णन किया है।
सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष में कहीं-कहीं नारी अधिक स्वच्छंदतावादी हो जाती है; परिणाम स्वरूप समाज के स्वस्थ मूल्यों के विघटन का भी कारण बन जाती है। ऐसी ही एक नारी है प्रभा खेतान के उपन्यास ‘अपने- अपने चेहरे’ की नीना, जो रात- रात तक होटलों में घूमती है। स्वयं विवाहित होते हुए रीतू के पति कुणाल की ओर अनुरक्त होती है। रीतू के सामने उसके पति के साथ कांटेसा में बैठकर घूमने जाती है। इतना ही नहीं अपना घर छोड़कर कुणाल के साथ रहने उसके घर आ जाती है। गीतांजलि श्री द्वारा लिखित उपन्यास ‘तिरोहित’ की ललना अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तत्पर है। चाहे वह किसी विवाहित पुरुष के साथ संबंध हो या जाली हस्ताक्षर कर पैसा हड़पना, उसकी नज़र में कुछ भी अनैतिक नहीं है। आधुनिक युग में समाज व्यवस्था तथा नैतिक मूल्य दोनों ही तीव्र गति से बदल रहे हैं। महिला लेखन में ये सभी बदलाव देखे जा सकते हैं।
हमारे प्रायः साहित्यकार स्त्री के उस विवश मन का ही अलंकरण करते रहे हैं, जिसे वे अपनी आंखों से देखते हैं। वे उस सच्चाई का बयान करते हैं, जो सामाजिक व्यवस्था की क्रूरता से लबरेज़ है। यह एक मान्य तथ्य है कि आज की स्त्री ‘आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ वाली छवि से बहुत आगे निकल आई है, किंतु हमारे साहित्यकारों को स्त्री को परंपरावादी चौखट से बाहर चित्रित करने का अभ्यास कम है।
यथास्थितिवादी सोच स्त्रियों को कहीं नहीं पहुंचाएगी। यह एक सुखद सत्य है कि आज पूरी दुनिया में चाहे पूरब या पश्चिम ‘स्त्री सशक्तिकरण’ का मुद्दा एक ज्वलंत विषय बन चुका है। समानता के इस युग में स्त्री-पुरुष की साझा संस्कृति का निर्माण आवश्यक है। ‘उपनिवेश‌ में स्त्री’ में प्रभा खेतान ने स्त्रियों की पीड़ा को समझा है तथा स्त्री मुक्ति के उपायों को खोजने की कोशिश की है। अपनी आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या में’ अपने जीवन संघर्ष को बिना किसी संकोच के उन्होंने पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया है। स्त्री- जीवन का संघर्ष समझे बिना उस पर टिप्पणी कर देना बहुत आसान है।
‘स्त्री पर्व’ के अंतर्गत महाश्वेता देवी ने वेश्या जीवन का चित्रण करते हुए नारकीय जीवन जी रही उन यौन कर्मियों के ऊपर सहानुभूति जताई है, जो पूरी जिंदगी रोशनी के इंतज़ार में गुज़ार देती।
विद्या सिंह
विद्या सिंह
कविता, कहानी, समीक्षा स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।'चंद्रिका बाबू की गुमटी' कहानी संग्रह तथा नरेश मेहता का साहित्य एक अनुशीलन समीक्षात्मक पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न संकलन में सहयोगी लेखन। पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एमकेपी कॉलेज देहरादून।
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. आदरणीय विद्या जी!
    आपका स्वातंत्र्योत्तर महिला लेख पढ़ा।
    यह बात सही है कि वह एक वक्त था जब स्त्रियां इतनी अधिक मुखरित नहीं हुई थीं।लेखन के क्षेत्र में कम ही महिलाएँ चर्चा में थीं।लेकिन अब लेखन के क्षेत्र में महिलाओं की सक्रियता बढ़ रही है।
    आपके द्वारा संदर्भित लेखिकाओं के विषयों से अवगत हुए।
    सारे विषय आज के समय में लगभग कॉमन हो गए हैं।
    बस यह है कि हर स्त्री की अपनी एक कहानी है। और जिसमें रचनात्मक सर्जन की क्षमता है वही उसे कहानी का रूपक देकर सब तक पहुँचा सकता है।
    अच्छा लिखा आपने।
    बधाई आपको।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest