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उर्वी वानिया सिंह का लेख – समलैंगिकता अपराध नहीं

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आज मैंने कुछ क्रिमिनल केस पढ़े जिनमें मैंने पढ़ा- कुछ लड़के समलैंगिक (gay) और कुछ उभयलिंगी (bisexual) थे फ़िर भी उन्होंने लड़कियों से ही शादी की और जब उन लड़कियों को पता चला तो उन लड़कियों की हत्या करा दी गयी, और कुछ ने खुद ही अपनी पत्नियों को मार दिया।  मैं हैरान हूँ कि इसमें उन लड़कियों की क्या गलती थी? क्या उन्होने सब कुछ जानते हुए शादी की थी या फिर उन्हें रोमांच (असल में दलदल) से भरपूर जीवन की चाह थी?  ऐसे पुरुष (?) उन लड़कियों को तलाक दे कर छोड़ भी तो सकते थे, अलबत्ता शादी ही नही करनी चाहिए थी। इंसान को जो वह हैं वही सबके सामने दिखाना चाहिए, क्यों छुपाना किसी से? समाज का भय ऐसे लोगो पर हावी रहता है, मैं पूछना चाहती हूँ-  लोग  प्रमाण पत्र देंगे क्या? जिसमे ख़ुशी मिले वही करना भी चाहिए, “लोग क्या कहेंगे” जैसे सवालों पर सोचकर स्वयं की ज़िंदगी से खिलवाड़ किसलिए करना।
आंकड़े देखें तो पाते हैं कि इन हत्यारों में से कुछ हत्यारों को जेल हुई तो कुछ को सबुत न मिलने पर छोड़ दिया गया। सवाल ये खड़ा होता है कि जिन्हें छोड़ दिया गया क्या वाकई उनकी न्यायिक सही से हो पाई? फिर मानव अधिकारों का तकाजा है सबों जीने का समान अधिकार है। क्या ऐसी स्त्रियॉं को मरने के लिए छोड़ देना चाहिए जिनके पति समलैंगिक थे? क्या उन्हें जीने का अधिकार नहीं? मानव अधिकार आयोग इस विषय पर क्या रुख रखता है ये भी समझने की जरूरत है।  भारतीय संस्कृति तो ‘जियो और जीने दो’ है।
आज कल मैं देखती हूँ- लोगो के खाने के दाँत कुछ और होते हैं और दिखाने के कुछ और, ऐसे लोगो से तो क्या ही डरना।
आख़िर कब तक समलैंगिक (gay), उभयलिंगी (bisexual), ट्रांसजेंडर transgender, क्वीयर (Queer) लैंगिकता को बहुत बड़ा मुद्दा बनाते रहेंगे ,क्यूँ नहीं खुलकर इस मुद्दे पर बात नहीं कि जा सकती?  हम डरते रहेंगे सिर्फ इसलिए कि समाज क्या सोचेगा? लोग क्या सोचेंगे? तो फ़िर जिया ही न जाये? अपनी ज़िंदगी नहीं जीनी क्या, नहीं, इस ज्निदगी को भरपूर जीना है। अगर हमेशा यही सोचोगे कि लोग क्या सोचेंगे तो बस सोचते-सोचते ही मर जाओगे और अपनी ज़िंदगी नहीं जी पाओगे। जो भी तुम हो खुल कर सामने आओ, तुम्हें खुश होना चाहिए कि जो तुम हो वशी दुनीसी के सामने भी हो। तुम्हे लोगो से, उनकी दक़ियानूसी सोच से अधिक मतलब नहीं होना चाहिए।
मैं अपनी ज़िंदगी से जुड़ा एक किस्सा आपसे साझा करना चाहूँगी-  ये किस्सा तब का है जब मैं सातवी कक्षा में पढ़ती थी तब मैं सर्दियों की छुटियों में ऋषिकेश गयी हुई थी, वहाँ मेरे दादा जी का साइबर कैफ़े था, मैं वहाँ अक्सर नेट चलाने चली जाया करती थी, कभी गाने सुनना कभी कार्टून देखना, कभी अपने पसंदीदा लोगो के बारे में पढ़ना, एक दिन मैं मेरे एक पसंदीदा गायक के बारे में पढ़ रही थी, उनके बारे में लिखा था कि वे bisexual है, उस समय बच्चो का समझ का स्तर अधिक नहीं होता, मैं सोचती रही कि ये bisexual क्या होता है फिर मैंने नेट पर ही इसका मतलब खोजा तब मुझे इसका अर्थ पता चला लेकिन मुझे उसमे कुछ बुरा नहीं लगा। मुझे लगा- सबकी अपनी भावनाएं होती हैं, उसमें कुछ भी गलत नहीं है फिर मैंने इसके बारे में अपने एक दोस्त को बताया तो उसने बोला- तुम्हारे विचार अच्छे हैं, तुम लोगो को ठीक से समझती हो, तब मैंने उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, आखिर उस समय मैं भी तो बच्ची ही, जब मैंने बारहवीं  कक्षा की पढाई पूरी कर ली तब एक दिन उसका फोन आया। उसने बताया कि वह समलैंगिक हैं। मैंने उस पर गुस्सा किया कि तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? उसने कहा- “मैं बताने वाला था”। मुझे याद आया- उसने एक बार ऐसा ही मुझे कुछ बताने कि कोशिश भी की थी लेकिन मैंने ही ध्यान नहीं दिया था। उसने यह भी बताया कि उसका एक प्रेमी है, और हम दोनोँ बहुत खुश हैं, फ़िर कुछ महिनो बाद उसका फोन आया। वह बहुत रो रहा था। मैंने पूछा-“क्या हुआ, क्यों रो रहे हो?” उसने मुझे बताया-“उसके प्रेमी की माँ को सब पता चल गया और उसकी माँ ने मेरी माँ को भी बता, माँ बोल रहीं है- तुम्हें ये बीमारी है, हम अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाएंगे और तेरा इलाज़ कराएंगे।“
पर सवाल यह खड़ा होता है कि क्या समलैंगिकता वास्तव में कोई बीमारी हैं? नहीं, यौन चिकित्सकों और मनोरोग चिकित्सकों का कहना है कि समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है, यह आँय किसी भी तरह के आवह-स्ंगेव कि टीआरएच ही एक संवेग है। भावनात्मक संबंध किसी का किसी से भी हो सकता है, इसमें किसी लिंग-धर्म या किसी अन्य कारक का कोई संबंध नहीं होता।
समलैंगिकता कोई नयी अवधारणा नहीं है, इस तरह के संबंध बहुत पहले से चले आ रहे हैं।  समलैंगिकता दुनिया की ज्यादातर संस्कृतियों में रही है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री मार्गरेट मीड के अनुसार-“आदिम समाजों में समलैंगिकता प्रचलन में थी. रोमन सभ्यता में भी इसे बुरा नहीं माना गया, वहीं प्राचीन यूनान में तो इसे मान्यता ही मिली हुई थी. मानवीय सभ्यता के शुरुआती दौर में समलैंगिकता न कोई अप्राकृतिक काम था न ही कोई अपराध।“ ऋग्वेद की एक ऋचा में भी कहा गया है- “विकृतिः एव प्रकृति”, यानी जो अप्राकृतिक दीखता है वह भी प्राकृतिक है। अतः यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्राचीन भारत समलैंगिकता के प्रति सहिष्णु रहा है। रामायण, महाभारत से लेकर विशाखदत्त के मुद्राराक्षस, वात्स्यायन के कामसूत्र तक में भी  समलैंगिकता और किन्नरों का उल्लेख है। बारहवीं सदी में बराहमिहिर ने अपने ग्रंथ वृहत जातक में कहा था-“समलैंगिकता पैदाइशी होती है, इस आदत को बदला नहीं जा सकता है।“ वात्स्यायन ने भी कामसूत्र में लिखा कि किस तरह से उनके मालिक, सेठ और ताकतवर लोग नौकरों, मालिश करने वाले नाइयों के साथ शारीरिक संबंध बना लेते थे।  मध्य काल और उसके बाद भारत में तमाम राजवंशों में इससे जुड़े किस्से खूब प्रचलन में रहे हैं। भारतीय संस्कृति में ही महादेव शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर वाला भी है। विष्णु के मोहिनी स्त्री रूप धारण कर शिव को रिझाने का भी प्रसंग है, इससे उन्हें पुत्र अयप्पा की प्राप्ति होती है। महाभारत में अर्जुन पुरुष से बृहन्नला बन जाते हैं। “कामसूत्र” के “पुरुषायिता” अध्याय में किताब एक ऐसी समलैंगिक स्त्रियों का जिक्र करती है, जिन्हें स्वर्णिनिस कहा जाता था। ये महिलाएं अक्सर दूसरी स्त्रियों से शादी कर लेती थीं और बच्चा पालती थीं। खजुराहों के मंदिरों की दीवारों पर बनी तमाम मुद्राओं की मूर्तियों में  समलैंगिक पुरुषों और महिलाओं का चित्रण खूब हुआ है। अतः कहना न होगा कि भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में समलैंगिकता चलन में थी।
प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यता में भी ऐसे कई उदाहरण पेश हैं जो समलैंगिकता की स्वीकृति को दर्शाते हैं। आज भी विश्व की बहुत सी आदिवासी जनजातियों में समलिंगीय संबंध बिना किसी रोकटोक के अपनाए जाते हैं। प्राचीन यूनान में समलैंगिकता को एक कला, बौद्धिकता और नैतिक गुण के तौर पर देखा जाता था। यहां तक की प्राचीन यूनान के देवताओं, होरेस और सेठ को भी ‘गे’ कहा जाता था। इसके अलावा रोम में भी इसे किसी भी तरह से बुरा नहीं माना जाता था। प्रसिद्ध शिल्पकार माइकल एंजेलो भी खुद को गे कहता था। शायद यही वजह है कि उनकी रचनाओं में भी अधिकतर गे और लेस्बियन संबंध ही दर्शाए जाते थे।
समलैंगिकता पर बात करें तो दुनियाँ में 10 तरह की लैंगिकता होती हैं-
1) Heterosexual(satraight) :– दुनिया के तमाम समाजों में इस सेक्सुअल ओरिएंटेशन को समान्य माना जाता है. इस ओरिएंटेशन में एक इंसान अपने से विपरित लिंग वाले इंसान को पसंद करता है
2) Homosexual या Gay lesbian:- आज कल ये भी काफी सामने आ रहा है इसमे लोग अपने समान लिंग वाले व्यक्ति को अपना साथी बनाना चाहते है
3) Bisexual:- इस में इंसान दोनों लिंगों के प्रति आकर्षित होता है. जो उसे ज़्यादा अच्छा लगता है उसे अपना साथी बनाता है
4) Pansexual :- ये bisexual से अलग होता हैं इसमे लिंग मायने नहीं रखता
5) Asexual:- ऐसा ज़रूरी नहीं है की हर इंसान किसी न किसी लिंग के प्रति आकर्षित होता है क्योंकि asexual इंसान किसी लिंग के प्रति आकर्षित नहीं होता
6) Demisexual:- इंसान जब किसी के साथ भावनात्कम रूप से जुड़ता है तब ही वह अपना साथी बनाता है और साइंस से मानता है ये रिश्तें लंबे समय तक चलने के लिए बनाते है
7) Sapiosexual:- इस स्थिति में इंसान किसी दूसरे के दिमाग से प्रभावित होकर उससे लगाव महसूस करने लगता है. इसमें महिला या पुरुष कोई भी हो सकता है. इसमें लिंग मायने नहीं रखता क्योंकि इसमें व्यक्ति सामने वाले के दिमाग से प्रभावित होता है
8) Polysexual:- इसमें वे कई तरह के लिंगों से आकर्षित होते हैं. यानी वे ट्रांसजेंडर्स, थर्ड जेंडर्स या इंटरसेक्स लोगों से भी आकर्षित हो सकते हैं.
9)  Graysexual:- Graysexual लोग asexual नहीं होते. वे किसी खास समय पर किसी खास व्यक्ति के प्रति आकर्षित हो सकते हैं.
10) Androgynsexual:-
इसमे ऐसे इंसान होते हैं जिनकों पुरुष और महिला दोनों आकर्षक लगते हैं. ऐसे लोगों में लड़की (feminine) और लड़का (masculine) दोनों लक्षण होते हैं।
आश्चर्जनक ये है कि एक रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार 45 देशों में महिलाओं के बीच के यौन संबंधों को गैर कानूनी करार दिया गया है।इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन (आईएलजीए) ने कहा है- ‘आठ देश हैं जहां समलैंगिकता की सजा मौत है. ईरान, सूडान, सऊदी अरब, यमन, सोमालिया, नाइजीरिया, इराक और सीरिया शामिल हैं. इसके अलावा दर्जनों अन्य देश हैं जहां समलैंगिक गतिविधियों पर जेल की सजा हो सकती है। द गार्जियन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, समलैंगिकता को लिए दक्षिणी और पूर्वी अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया सबसे कठोर दृष्टिकोण रखता है. जबकि पश्चिमी यूरोप और पश्चिमी गोलार्ध इसे लेकर सबसे सहिष्णु हैं. समान लिंग संबंधों को अभी भी 71 देशों में ‘प्रकृति के खिलाफ’ माना जाता है और वहां कानून के तहत जेल की सजा हो सकती है.
इसके साथ ही 120 से ज्यादा देशों ने समलैंगिगकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया है. आईएलजीए रिपोर्ट की सहलेखिका एनगुस कैरोल का कहना है, ‘दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) लोगों को भेदभाव, कलंक या हिंसा से सुरक्षा मिली हो.’  हलाकि भारत में सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर बड़ा फैसला सुनाते हुए अपराध बताने वाली धारा को खत्म कर दिया है। जिसके बाद अब भारत में समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जाएगा। लेकिन फिर भी मुद्दा ये है कि उन देशो पर विश्व मानवाधिकार आयोग का क्या रुख है जहां आज भी समलैंगिकता एक अपराध है और समलैंगिक संबंध रखने वालो के लिए सजा का प्रावधान है? कब तक इन बातों की वजह से मासुम लोगोँ की जान जाती रहेगी? अगर सब लोग खुल के सामने आएँ तो समाज में कुछ सुधार हो सकता है। अभी कुछ समय पहले समलैंगिक समुदाय ने हाई कोर्ट में हिन्दू विवाह अधिनियम में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए याचिका दाखिल की थी, कोर्ट का फैसला क्या होता है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि समाज इस मसले पर कब संवेदनशील होगा, और देश के कानून में कब और कितना बदलाव होगा?
मेरे विचार से हमें वह काम करना चाहिए जिसमें हमें ख़ुशी मिल रही है। मुझे मालूम है- समाज के तथाकथित ठेकेदार आएंगे, मुझे भी समझाने की कोशिश होगी और मेरी तरह की सोच रखने वाले तमाम विचारशील लोगो को आलोचना भी होगी, ऐसे लोगो से, ऐसे समाज से मेरा निवेदन है कि वे कृपा करके अपने घर का पता रखे, ध्यान दें कि उनके घर में क्या चल रहा है? और हाँ, समाज को खूबसूरत बनाने में योगदान दें, ध्यान रहे समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है।

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