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सुव्रत दे की दो कविताएँ

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1 – उदित मेरे वियोग का सितारा
कुछ देर पहले जहाँ थी प्यार की लाली,
रह गई वहाँ अब बस विभावरी काली ;
डूब गया जाने कब प्यार का वह  उजला सूरज प्यारा ,
उदित मेरे आँगन में वियोग का सितारा ।

शून्यता ने जी भर शोर मचाया ,
कसक सारे मानो त्योहार मनाया ;
तुम्हारी दूरी नहीं सुहाता , चारों ओर है एकाकीपन भरा,
उदित मेरे आँगन में वियोग का सितारा ।

तुम्हारी कमी मिटे न मिटता दिनभर,
आँखों में नींद न आती कभी रातभर ;
अकेले में कई बार टूटा आँखों में दरिया का कगारा ,
उदित मेरे आँगन में वियोग का सितारा ।

2 – एकाकीपन की पीड़ा
मिटता कहाँ वियोग-मिलन का अंतर ,
शून्यता की चादर मेरे नग्न देह पर ;
मेरी बूढ़ी आँखें तुम्हारी राह-राह यूँ ही बिछ जाती है ,
एकाकीपन की पीड़ा बढ़ जाती है ।

दिखलाई नहीं देता कोई अपना ,
आँखों से रूठा एक-एक सपना ;
मीलों की खामोशी में तुम्हारी यादें बारबार सताती है ,
एकाकीपन की पीड़ा बढ़ जाती है ।

सुनसान गली, सड़क और शहर ,
तुम्हारे बिन अकेला होने का डर ;
विलग हो तुमसे मेरी व्याकुल कामनाएं मुरझा जाती हैं ,
एकाकीपन की पीड़ा बढ़ जाती है ।

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