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डॉ पुष्पलता का लेख – रज़िया फंस गई गुंडों में…!

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राजा नहुष  के छह पुत्र याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति, कृति  थे। नहुष ने ययाति को राजा बनाया। 
दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी  निर्वस्त्र जल में स्नान कर रही थी। भोले -पार्वती के आने पर लज्जावश वस्त्र पहनकर भागी तो शर्मिष्ठा ने  जल्दी में देवयानी के वस्त्र पहन लिए। देवयानी ब्राह्मण  राजपुत्री  थी। उसने शर्मिष्ठा का अपमान किया कि मैं ब्राह्मण हूँ मेरे वस्त्र पहनने की हिम्मत कैसे की। 
शर्मिष्ठा ने देवयानी से वस्त्र छीन उसे कुएं में  गिरा दिया। राजा ययाति पानी के चक्कर में कुएं के पास आये देवयानी को अपने वस्त्र दिए और बाहर निकाला साथ में उसके साथ कुकर्म भी किया। यद्यपि कथा में देवयानी ने प्रेम-पूर्वक मेरा भोग कर लो निवेदन किया लिखा है। लिखा है कि आपने मेरा हाथ पकड़ा मैं आपको पति स्वीकार करती हूँ अगर शादी के बाद कोई हाथ पकड़ ले क्या सब को पति स्वीकार कर  लेना चाहिये।
अंधे को क्या चाहिये दो नैन। व्यभिचारी को नग्न स्त्री मिले वह उसे कैसे छोड़े चाहे राजा ही क्यों न हो। राजाओं के हरम में तो हजारों को कुकर्म करने को रानियों के टैग लगाकर रख  लिया जाता था। देवयानी की बात सुन शुक्राचार्य क्रोधित हुए मगर राजा ने मना लिया। वह बोले मेरी पुत्री को मनाना होगा। राजा ने देवयानी से कहा तुम जो कहो वह तुम्हें प्रदान करूँगा… वह बोली तुम्हारी पुत्री को मेरी  दासी बनना होगा। देवयानी नहुष की पत्नी बनी शर्मिष्ठा दासी। 
कथा में आगे भी यही लिखा कि शर्मिष्ठा भी बोली मेरा भी भोग कर लो उसने कर लिया। यहाँ कहानी गढ़ने वाला स्त्री से कहलवा रहा है। बाद में पोल खुली तो शुक्राचार्य ने नहुष को शाप दिया तुम लंपट व्यभिचारी हो और फिर यह कहने पर कि तुम्हारी पुत्री का और भोग करना हैं इसमें तुम्हारी पुत्री का भला है। शुक्राचार्य बोले जब कोई तुम्हें अपनी जवानी दान करेगा तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे। इसके बाद  नहुष भोग विलास के  लिए अपने पुत्रों से जवानी माँगने लगा। बाकी ने मना कर दिया मगर छोटे ने देकर उसका बुढापा धारण किया एवज में उसने उसे  राजा बनाया और वह भोग में लिप्त हो गया। 
ऐसी   घटिया, गंदी, बेतुकी  कहानियों  उनके भीतर के  इस व्यभिचार पर लिखे उपन्यास पर सब न्यायाधीश लट्टू हुए। चरम सुख  को इसके लिए पुरस्कार का चरम सुख दिया। ये वही चरम सुख  है जिसने हाल ही में स्त्री को घर के बाहर चरम सुख खोजने का हक है पोस्ट लगाई थी। चरम सुख  का विरोध करने वालियों के लेखन को  पुरुष क्यों पसंद करेंगे। 
स्त्रियाँ चरम सुख  घर की इज्ज़त की झंडियाँ लटकवा कर बाहर  खोजो अभियान चलाएंगी  तभी तो उनके लिए उपलब्ध होंगी। खुशवंत ने कहा था वृद्धावस्था में पुरुषों के दिमाग में सेक्स चढ़ जाता है। उन तीन न्यायाधीशों को तो इस गंदे लिजलिजे यौन संबंधों से सिक्त विषय- कहानी पर लिखे उपन्यास में इसलिए मजा आया होगा। मगर महिला ने उसे पसंद क्यों किया उसका भी विशेष कारण बताया जा रहा है कि ये एक राजनीति थी।  चरम सुख  के साथ सुलह होने से उसकी चरम सुख  समर्थक टीम जो विरोध में नगाड़े  बजा रही थी  साथ आ सकती थी। यद्यपि उसका कारण दूसरा था चरम सुख से उनका झगड़ा हुआ था। अतः इस राजनीति के तहत चयन हुआ ऐसा अनेक विश्लेषकों का विश्लेषण है।
कुछ का कयास है, ये भी हो सकता है महिला की कुछ खास चली न हो उन्होंने चढ़ती छान पर हाथ लगाकर क्रेडिट लेने में ही भलाई समझी हो। चरम सुख  को  तो पुरस्कार का चरम सुख  मिला  मगर चरम सुख  समर्थकों को क्या मिला? बाबाजी का ठुल्लू?  बाकी  को क्या मिला यह तो वही जाने। बहरहाल सारी लेखिकाओं को  देह ज्ञान, देह दान, देह भोग  पर  लिखने पर मजबूर किया जा रहा है। देह ज्ञान-बखान वालियों को शीर्ष पर रखकर ये  असफल या सफल  प्रयास किया जा रहा है। 
अभी कुछ दिन पहले हंस ने  देह पर नया -नया उत्पन्न  घटिया ज्ञान कहानी के नाम पर  लिखा हुआ छापा था। जिसमें स्त्री बीस हजार देकर पुरुष के साथ ‘सिर्फ’ सोती है… ‘सिर्फ’ का मतलब ‘सिर्फ’ ही है । कहानी का अंत फिर से उसे बुलाने पर किया है। ये कौन से ग्रह की औरतें लिख रहे हैं। गढ़ रहे हैं यही जानें। साहित्य के ठेकेदारों द्वारा लेखक  औरतों को किस तरफ धकेला जा रहा है। ये समाज के अच्छे स्वस्थ लेखन प्रिय लोगों को संज्ञान लेने की आवश्यकता है मगर वे चुप हैं। कोई भी इन बिल्लों-बिल्लियों के गले में घंटी नहीं बांधना चाहता। हंस तो कहने को हँस रहा था… 
सवाल सिर्फ लेखन का नहीं ये हर क्षेत्र में हो रहा है। वैदेहियों, उर्मिलाओं, अहल्याओं पर ये रँभाएँ, मेनकाएँ, उर्वशियाँ, गणिकाएँ भारी पड़ रही हैं। ये गणिका युग हो गया है।
शीर्ष पर चढ़ गए लोगों ने सारे उड़ते पेटिकोट, उतरने को आतुर जीन्स-स्कर्ट, शॉर्ट्स  कल्पनाओं में  निकालकर  उस क्षेत्र के  टेंट  पर ऊपर  टँगा दिए हैं। स्वस्थ लेखन को डस्टबिन में ठूसने का सामूहिक प्रयास चल रहा है। साहित्य की रज़िया गुंडों  में फंस गई है। हम सब  वैदेहियों की आत्महत्याएँ, स्त्री का त्याग, समर्पण, तपस्या, चरित्र, महानता, अधिकार चेतना जागरूकता, जिजीविषा, आज़ादी आत्मनिर्भरता  लिखते, उसके लिए लड़ते रह गए। 
अहल्याओं की शिलाएँ, उर्मिलाओं का वनवास, यशोधराओं का बुद्धत्व, राहुल का सन्यास, द्रौपदियों की यंत्रणाएँ उकेरते रह गए।  वे भोग-संभोग लिखकर, रंभाओं मेनकाओं, उर्वशियों के  गुप्त-अंग दृश्य दिखाकर-देखकर  लिख-पढ़कर  चरम सुख देते-पाते रहे। इसी में स्त्री की आजादी बताते रहे।
इसके लिए वे अतीत से ऐसे कामुक स्त्री पुरुष  नायक- नायिकाएँ उठाते रहे हैं । उसके माध्यम से अपनी और उनकी  लिजलिजी  काम वासना परोसते रहे  हैं। जिसे पढ़कर चरम सुख की तलाश में भटकते काम पिपासु पिस्सू साहित्य का लहू पीकर  उन्हें  चरम सुख देकर चरम सुख पाते रहे हैं । ऐसे लोग  साहित्य के जिस्म पर चिपट कर जोंकों की तरह  उसका लहू पी गए हैं  । इन पिस्सुओं-जोंकों और इनके वरद-हस्त देने वाले मगरमच्छों  से इनके मरने के बाद भी पिंड नहीं छूटने वाला क्योंकि इन्होंने साहित्य के समंदर में अनेक अपने जैसे मगरमच्छ और जोंकें तैयार कर दी हैं।

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