आज जिस तरह के समाज में हम जी रहे हैं उसकी छवि को 66 वर्ष पूर्व ही गुरुदत्त ने प्यासा में दिखा दिया था। खुदगर्ज, मतलबी, स्वार्थी और सिर्फ पैसे को वरीयता देता समाज। अपने शौक के लिए प्यार करने वाले और अपने आराम और सुखों के लिए प्यार का सौदा करने वालों से भरे हुए इस समाज का आईना बना कर उन्होंने प्यासा को प्रस्तुत कर दिया था। प्यासा में शायर है, प्रेम से उपजे गीत है, रोमांस भी है लेकिन धन के अभाव में दहलीज पर दम तोड़ती हताशा भी है जो परित्याग से जन्मी है। यह परित्याग परिवार से है, प्यार से है, समाज से है।
भूख से बेहाल हो पढ़ा-लिखा नायक मजदूरी करता है और हथेली पर धरी चवन्नी से अपना पेट भरना चाहता है कि खाने का कौर मुंह में जाते ही पता चलता है कि चवन्नी खोटी है। यह चवन्नी खोटी है या वह मोटे पेट वाला सेठ जो मन भर समान अपनी मोटर में लदवा कर ले जाता है और बदले में हथेली पर खोटी चवन्नी छोड़ देता है। बेकार भाई को जब माँ अपनी ममता में डूब कर घर लाकर कुछ पकवानों को पल्लू से ढक कर अपने बेटे को खिला कर तृप्त होना चाहती है तो दूसरे भाई अपनी ही मां को अपने निकम्मे भाई का ताना देते हुए कहते हैं कि किसने तुम्हें और इसके बाप से कहा था कि निखट्टू पैदा करो। अपनी ही मां से इतने घिनोने शब्द।
धक्के देकर बार-बार भाई को घर से निकाल देना, जिस प्रेमिका के लिए शायर ने दिल चीर कर गीत निकालें वह अपने जीवन के सुखों के लिए पैसे वाले की गोद में बैठ गई। दिल चीर कर निकाले इन प्रेम गीतों को समझा एक पारंपरिक सड़क छाप वेश्या ने। इस वेश्या की मौलिकता को जो समाज रोज छिन्न-भिन्न कर रहा था, उसकी देर से उसको नोच रहा था, उस मौलिकता की आत्मा की गंध में गुलाबो उन प्रेम में नहाई नज़्मों को पढ़कर शायर की मौलिकता को समझकर अपने जिस्म से कमाया सब कुछ दाँव पर लगाकर शायर के वजूद को, उसके दिल को, उसकी तड़प को, उसके प्रेम को सबके सामने पूरे जमाने के सामने परछाइयों के रूप में लेकर आती है।
खुद नेपथ्य में खड़ी गुलाबो उस शायर को समाज के सामने जिंदा कर देती है जो समाज की निगाह में मर गया है और उस शायर के अजीज़ जो यह जानते हैं कि वह नहीं मरा वो उसे जिंदा ही मार देने पर उतारू हैं क्योंकि अब उस शायर के नाम से उन्हें पैसे की कमाई हो रही है। एक जिंदा वजूद के लिए रिश्तो, संबंधों और पैसे की कब्र बन रही है और उस कब्र पर गुलपोशी के लिए पूरा समाज अपने हाथों में अपनी पसंद के फूल लिए खड़ा है।
लेकिन समाज के छल और कपट से आक्रोशित नायक द्वारा अपने मौलिक अस्तित्व को ही अस्वीकार कर देना इस चरम सीमा की हताशा को प्रस्तुत करना ही प्यासा होना है। जिसे गुरुदत्त ने इतनी खूबसूरती से निभाया है कि देखते ही बनता है। गुरुदत्त के चेहरे के क्लोजअप को सिनेमैटोग्राफर वी के मूर्ति ने पूरी फिल्म में इतने एंगेल्स से पेश किया है कि हर बार किरदार का नया रंग उसकी पीड़ाओं में,विवशताओं में,टूटन में और हताशा में अपने पूरे उरूज़ के साथ दिखता है।

प्यासा सन 1957 में सिल्वर स्क्रीन पर आई थी। विश्व प्रसिद्ध पत्रिका टाइम ने प्यासा को दस सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक फिल्मों की श्रेणी में शीर्ष पाँच में रखा है। सन 2005 में भी टाइम पत्रिका ने प्यासा को सर्वश्रेष्ठ सौ फिल्मों में शामिल किया था। टाइम पत्रिका का कहना है कि भारतीय फिल्मों में अब भी परिवार के प्रति निष्ठा और सभी का दिल प्यार से जीतने की भावना देखने को मिलती है।टाइम की सूची में पहले स्थान पर सन ऑफ द शेख (1926) दूसरे पर डोड्सवर्थ (1939)तीसरे पर कैमिली (1939) चौथे पर एन अफेयर टू रिमेंबर (1957) पांचवे स्थान पर प्यासा (1957) को रखा गया है।
प्यासा की कहानी को अबरार अल्वी ने लिखा है। दरअसल प्यासा फिल्म अबरार अल्वी की निजी जिंदगी से जुड़ी एक घटना को आधार बनाकर लिखी गई कहानी है जिसमें वैश्या गुलाबो का महत्वपूर्ण दखल है। अबरार अल्वी ने अपनी किताब टेन इयर्स विद गुरुदत्त में इसका जिक्र किया है। बड़े विस्तार और भावनात्मक तरीके से अबरार अल्वी गुलाबो नाम की एक सड़कछाप वैश्या से मुंबई के समुद्र किनारे मिलने की कहानी बताते हैं। अपने दोस्तों के साथ घूमने निकले अबरार अल्वी को दोस्तों द्वारा तीन लड़कियां पेश की जाती हैं। जिसमें दो पंद्रह सोलह साल की और तीसरी अठाइस साल की होती है।इन मामलों में अनाड़ी अबरार को मजबूरी में एक लड़की चुननी पड़ती है तो वह अठाइस साल की औरत को चुनते हैं और रात भर एक कुटीर में उस औरत से बातें करते रहते हैं। उसका नाम गुलाबो होता है।
फिल्म प्यासा में गुलाबों की पहली झलक पीठ पीछे से है एक महीन पारदर्शी साड़ी में लिपटी।फ़िल्म के साथ ही गुलाब का चरित्र भी खुलकर सामने आता है। वह एक पारंपरिक सड़क छाप वेश्या है लेकिन उसके अंदर एक धड़कता दिल और वज़ूद की गरिमा भी है। वह दिल के नाज़ुक तारों का सम्मान करना जानती है।विजय एक ग्राहक के रूप में उसके लिए कुछ भी नहीं लेकिन एक शायर के रूप में वह अपना सब कुछ उस पर निछावर कर देती है। शायर के लिए एक प्रेम और सम्मान उसके भीतर है। अबरार और गुलाबों के बीच पनपे रिश्ते की ये असल कहानी है। अबरार चूँकि एक लेखक हैं तो वह गुलाबों के किरदार को अंदर तक टोहते हैं। प्यासा में गुलाबों के कुछ डायलॉग तो हूबहू वही है जो उस ओरिजिनल गुलाबों ने अबरार अल्वी से कहे थे। अबरार अल्वी अपनी व्यस्तताओं के चलते उस गुलाबो पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाए।तब वो मिस्टर एन्ड मिसेज 55 में व्यस्त हो गए थे।
अबरार दो-चार बार उससे मिले भी लेकिन वह गुलाबो टी बी का शिकार हो गई थी और एक बार जब भी उससे मिलने गए तब उसकी शवयात्रा गुजर रही थी और उसके चेहरे को ढका नहीं गया था। इस कहानी को जब अबरार अल्वी ने गुरुदत्त को सुनाया तो गुरुदत्त कहानी पर सम्मोहित हो गए।आवश्यकतानुसार जोड़ घटाव किए गए लेकिन प्यासा की मूल कहानी यहीं से उपजी है।पहले इस फ़िल्म का नाम प्यास रखा गया था जिसे बाद में प्यासा किया गया।फिल्मी हलकों में यह कहानी भी चलती है कि प्यासा की मूल कहानी हिमाचल के एक असफल कवि चंद्रशेखर प्रेम की कहानी है जिसको अपनी रचनाओं को मुंबई जाकर बेचना पड़ा था। उसने उर्दू और हिंदी में बहुत सी किताबें लिखी परंतु उनके लिए वह कभी प्रसिद्ध ना हो सका।
फिल्म का अंत जब विजय अपने वजूद को ही नकार देता है फिल्म का क्लाइमेक्स तो है ही लेकिन यह इस दुनिया के चेहरे पर एक नकाब हटाने जैसा भी है जिसके नीचे समाज का वीभत्स चेहरा नजर आता है। फिल्म का अंत परिस्थितियों से समझौता कर लिया जाए या नहीं इस पर भी बहुत विचार विमर्श हुआ था लेकिन अंत में फिल्म का अंत गुरुदत्त ने अपनी पसंद से ही किया। एक धीमी शुरुआत के बाद प्यासा सफल रही। विडंबना ही कही जाएगी गुरुदत्त के जीवन काल में तो नहीं परंतु उनके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फिल्म को बहुत सराहना मिली। फ्रांस जर्मनी में फिल्म बहुत पसंद की गई। फ्रेंच प्रीमियर में इसका शो हुआ।नोवें अंतरराष्ट्रीय एशियन फिल्म फेस्टिवल में भी इस को प्रदर्शित किया गया। भारत के फिल्म इंस्टिट्यूट में तो सिलेबस में इस फिल्म को भगवान का दर्जा मिला हुआ था। गुरुदत्त दरअसल बहुत पैशनेट फिल्म डायरेक्टर थे।
वहीदा रहमान बताती हैं कि जब लोग उनके आसपास बात कर रहे होते थे तो वह किसी की को भी नहीं सुन रहे होते थे। वह सिर्फ अपने विचारों में ही खोए रहते थे।फिल्में बनाना उनके अंदर एक जुनून था।एक अभिनेता के रूप में गुरुदत्त हमेशा खुद को कम आँकते थे।अपनी खुद की फिल्मों में वह हमेशा अपनी दूसरी या तीसरी पसंद होते थे। सत्या सरन ने अपनी किताब टेन ईयर्स विद गुरुदत्त में सिनेमैटोग्राफर वीके मूर्ति के हवाले से लिखा भी है कि गुरु दत्त अभिनेता के तौर पर कैमरे का सामना करने में झिझकते थे। वह अपने अभिनय की पर्याप्त रूप में समीक्षा नहीं कर पाते थे। प्यासा के लिए भी उन्होंने ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार से बात कर रखी थी। दिलीप साहब ने पटकथा सुनने के बाद हाँ भी कह दी थी लेकिन फिर वह सेट पर नहीं आए। बाद में एक इंटरव्यू में दिलीप साहब ने इसकी सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने प्यासा फिल्म इसलिए नहीं की क्योंकि उसका किरदार उनकी फिल्म देवदास से बहुत मिलता हुआ था।


