Sunday, July 21, 2024
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हरिप्रकाश राठी की कहानी – लैम्पपोस्ट

मैं जब भी घर से निकलता वे मुझे इस तरह देखते मानो कच्चा खा जाएंगे। देखते हुए उनका चेहरा हिदायतों का इश्तिहार बन जाता। अनेक बार उनकी बड़ी-बड़ी आंखों से गोलियां बरसती।
जब कभी मैं उनकी तरफ नहीं देखता तो वे काले प्लास्टिक के फ्रेम का चश्मा नीचे कर इस तरह देखते कि मैं उनकी ओर ध्यान देने को मजबूर हो जाता। अरे यार ! पैदा कर दिया तो प्राण पी जाओगे क्या ? मैं मन ही मन कुढ़ता ‘ पापा ! अब मैं बच्चा नहीं रहा , बड़ा हो गया हूँ , अपना भला-बुरा समझता हूँ पर मजाल वे मेरी बात सुनते। हर बार कोई न कोई राय इस तरह टांग देते जैसे मैं कोई खूंटी हूँ एवं वे अपनी कमीज टांक रहे हों। कई बार तो मेरा चेहरा उनकी कमीज की तरह लटक जाता ।
वर्षों पहले फिर भी वे मेरी सुनते , राय मिलाते पर अब तो सपाट दादागिरी करते हैं। इससे अच्छा है सूली पर लटका दो। खैर ! मैंने लंबे अनुभव से जान लिया है इन पैंतरों से उन पर कोई फरक नहीं पड़ने वाला। उन्हें जो कहना है वे कहेंगे चाहे मैं सुनना चाहूं या न चाहूं। यही नहीं कभी-कभी यूं कुढ़ता हूँ तो ऊपर के होठ से नीचे का होठ काटकर यूं दबी मुस्कुराहट बिखेरते हैं जैसे कोई जले पर नमक छिड़कता है। मुझे आश्चर्य इस बात का है कि हर बार वे मुझसे अपनी बात मनवा लेते हैं। आप मुझे कितना ही पिता विरोधी कह दो पर मैं कहकर रहूंगा बाप किसी बला से कम नहीं होता। शब्द विशेषज्ञों को जो कहना है कहें मैं तो आश्वस्त हूँ कि बाप शब्द के मूल में ताप रहा होगा। वे यूं तपते हैं जैसे तपना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। तपो , मुझे क्या !
आज सुबह मैं जल्दी उठ गया हूं , उठ क्या गया हूँ नित्य जल्दी ही उठता हूँ। चार बजते ही मेरी आँख खुल जाती है। मुर्गा मुझे देखकर बांग देता है।  सच कहूं मुझे तो उसकी बांग से भी एक ही स्वर सुनाई देता है- बाप से डरते रहो।
मेरे सभी मित्र सुबह आठ बजे उठते हैं एवं मेरी भी यही इच्छा होती है पर पापा की हिदायतें मेरी आत्मा में इस कदर पैठ गई है कि मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। वे सांस तक नहीं लेने देते। जाने कितनी तो लोकोक्तियां उनकी जुबान पर चढ़ी हैं। कभी कहते हैं ‘ जागै सो पावे ‘ कभी ‘ अरली बर्ड केचेज द वर्म्स ‘ तो कभी पुरानी फ़िल्म का गाना गुनगुनाते हैं ‘ अब जाग मुसाफिर  भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है ‘ । अब ऐसी तानों को सुनकर कोई बिस्तर में रह सकता है ?
बचपन से सुबह चार बजे उठने की कठोर हिदायत थी। उनके निर्देश लक्ष्य उन्मुख मिसाइल की तरह मेरे पीछे लगे होते। जल्दी उठो ,वर्ज़िश करो फिर नहा-धोकर स्टडी टेबल पर बैठ जाओ। मैं उस-मुस करता तो वही पुराना जुमला , ‘ सुबह पढ़ाई सीधा दिमाग में उतरती है। दुनिया के महान शख्सियतों में जो खास गुण था वह यह कि सभी जल्दी उठकर  अधिकांश कार्य निपटा लेते थे। इससे वे बाकी दिन तनावमुक्त होकर कार्य करते।’ मुझे चिढ़ होती , ‘ अरे बाबा ! मुझे कोई महान व्यक्ति थोड़े बनना है।’ खैर ! उन्हें क्या , पापा की नजरों का प्रभाव हर बात मनवा लेता।
अभी  कुछ देर पहले मॉर्निंग वॉक करके आया हूँ। शहर की फिजाओं में इन दिनों फागुन की तरबीयत घुली हुई है। शाम ढलने से देर रात तक डफ बजते हैं एवं सुबह यहां-वहां मंदिरों से आती होली के गीतों की आवाज़ें कानों में रस घोलती है..होरी खेलत है गिरधारी।
आज वॉक करते हुए चांद सामने था। वह भी किसी नाज़नीं की तरह श्वेत कुर्ता पहने होरी खेलने को उत्सुक था। सूरज अभी उगा नहीं था पर उसके छिपे हाथों में गुलाल की भनक उसे लग गई थी। इस रहस्य को जानते ही चांद शर्म से लाल हो गया। प्रकृति भी क्या खूब होली खेलती है। आसमान में हर रंग के तारे हैं। बृहस्पति पीला तो शनि नीला , मंगल लाल तो सूरज नारंगी एवं न जाने कितने-कितने रंग। अकेले हों तो अपने-अपने रंग , मिल जाए तो इंद्रधनुष। पापा एक बार बता रहे थे कि मनुष्य ने आसमान से होली खेलना सीखा है। ओह , पापा का ध्यान आते ही उनका एक और जुमला याद हो आया है ‘ समय की कद्र करो ताकि समय एक दिन तुम्हारी कद्र करे।’ जी पापा ! कहकर मैं घर लौट आया हूँ। अपन बहस नहीं करते। वर्षों पहले एक बार बहस हुई थी तब चित हुए पहलवान की तरह मुझे ही धूल चाटनी पड़ी। बार-बार धूल कौन चाटे ?
अब तैयार होकर डाइनिंग टेबल पर बैठा हूँ। लता अभी-अभी मुझे ‘ स्मार्ट ‘ बोलकर गई है। लगता है आज डिश अच्छी बनेगी एवं दिन भी अच्छा निकलेगा। लता ठीक कहती है चालीस की उम्र में आज भी मैं युवा दिखता हूँ। आज भी नित्य बैडमिंटन खेलता हूँ। लता की तरह मेरी कद-काठी-नक्श भी अच्छे हैं। कार्यालय में स्टाफ सदस्य बहुधा कहते हैं व्यासजी स्मार्ट , चुस्त बन्दे हैं। लेकिन पापा भी तो कहें। अभी कहेंगे , कहेंगे क्या कहना शुरु कर दिया है , ‘ बहू ! मनीष को नाश्ते में ज्यादा मीठा न दिया करो। इसके पेट के टायर्स बढ़ते जा रहे हैं। ‘ एक बार पापा ने कह दिया लता वैसा ही करेगी। मैं प्रतिकार करता हूँ तो कहती है  पापा से अनुमति दिलवा दो। सब को बाज की तरह पंजों में पकड़ रखा है। एक बार मैंने लता को कहा भी पापा से बगावत करनी पड़ेगी तो वह उल्टे मुझ पर बिफर पड़ी, ‘ इतनी फूंक है क्या आप में ? ‘ मैं अपना-सा मुंह लेकर रह गया।
बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी पापा कम हिदायतें नहीं देते , ‘ अरे ! इन्हें महज तोता रटन्त मत बनाना , कुछ संस्कार भी देना। कुछ कम पढ़ गए तो इतनी हानि नहीं होगी जितनी गलत संस्कारों से होगी। इन्हें खेल-कूद , वाद-विवाद , साहित्य एवं इतर गतिविधियों में भी पारंगत बना। बच्चों को घर का हर काम आना चाहिए जाने कब जरूरत पड़ जाए। इन्हें रसोई , साफ-सफाई ही नहीं दैनन्दिनी अन्य कार्य भी आने चाहिए। कभी थैला देकर शाक-तरकारी-किराना भी मंगवाया कर।  यह प्रायोगिक गणित किताबी गणित से कहीं ऊपर एवं अधिक उपयोगी है। पढ़ाई तो कम-ज्यादा सभी कर लेते हैं पर जनता के दुलारे वही बनते हैं जिनमें कोई खास हुनर हो , जो मेहनती हों। इसके लिए बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा पहचाननी होगी।
पापा की जिद पर ही मैंने दोनों बच्चों रवीश एवं आयशा को क्लासिकल गायन का प्रशिक्षण दिलवाया। आज रवीश चौबीस पार है , इस वर्ष अहमदाबाद से एमबीए किया है। कॉलेज का ख्यात गायक है। फेयरवेल पार्टी में उसके गाए गीत ‘ अभी अलविदा मत कहो दोस्तो…’ को सुनकर प्राचार्य इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने स्वयं मंच पर आकर उसका कंधा थपथपाया। आयशा अठारह की है , अब सीए फाइनल में है। गायन के साथ उसका वक्तृत्व भी देखते बनता है। आयशा में नेतृत्व के अद्भुत गुण हैं। बच्चों को पापा कुछ नहीं कहते पर उनकी किसी प्रकार की बेजा हरकत देखकर मुझे ऐसे देखते हैं मानो कह रहे हों ,’ कुछ अकल तो तुझमें भी होगी।’ यह सुनते ही मैं झेंप उठता हूँ। ओह पिताश्री ! कभी तो सीधे मुंह बात कर लिया करो।
अभी कुछ दिन पूर्व आयशा देर रात पिक्चर देखकर आई तो मुझे हैरत हुई। मैंने पापा की ओर देखा। उन्हें देखकर मैं समझ गया ऐसा इस घर में नहीं चलेगा। वे मानो चिल्ला रहे थे , ‘ बच्चों पर , उनकी संगति पर नजर रख ! अच्छे बनो पर अंधे मत बनो।’
पापा के उपदेशों से मुझे क्रोध तो आया पर सावधान भी मैं इसी वजह से हुआ। मैंने आयशा को आड़े हाथों लिया। उसके बाद आयशा देरी से नहीं आई । बाद में जानकारी करने पर पता चला कि वह जिस लड़के के साथ पिक्चर देखने गई वह एक अय्याश, लफाड़ी किस्म का लड़का था। लता ने आयशा को समझाया, बच्ची समय रहते चेत गई अन्यथा आफत बन जाती।
मैं बैंक में कार्य करता हूँ। एक बार स्टाफ से पंगा हो गया , वे अपनी जायज ही नहीं नाजायज मांगों पर भी अड़ गए। दूसरे दिन बैंक जा रहा था तो पापा जाने कैसे समस्या ताड़ गए। उन्होंने तरेरा तो इस बार मैं बरस पड़ा, ‘ यही कहना चाह रहे हो न कि स्टाफ के अंतिम व्यक्ति से प्रेमपूर्वक सम्बन्ध रखा कर। उन्हें समझोगे तो वे भी तुम्हें समझेंगे। ऐसा करने पर वे तुम्हें सहयोग तो करेंगे ही, आदर भी देंगे।’ मैंने अधीनस्थ स्टाफ से रिश्ते बेहतर बनाए। आश्चर्य ! पापा यहां भी सही सिद्ध हुए। कुछ दिनों में ही यूनियन की समस्या समाप्त हो गई।
एक  बार मैंने मित्रों के उकसाने पर पार्टी में क्षमता से अधिक ड्रिंक करली। उस रात समझ पर पत्थर पड़ गए। घर आया तो पापा ऐसे देख रहे थे मानो कह रहे हों, ‘ बरखुरदार ! अब मुंह पर स्याही भी पोत दे। कम से कम मेरी पगड़ी का तो ख्याल किया कर।’ मेरा सिर नीचे हो गया। मैं चुपचाप बैडरूम में चला आया। लता इस बात को लेकर कई दिन उखड़ी रही। मैंने ठोड़ी में हाथ डालने की कोशिश की तो हाथ झटक दिए। मेरी फूंक निकल गई। इसके कुछ दिन बाद रविश देर रात ड्रिंक करके आया तो मुझे समझ आया कि पापा ठीक कहते हैं , ‘ हर गलती कीमत मांगती है। हम जैसा करेंगे वही संस्कार बनकर बच्चों में प्रतिफलित होगा।’
याद करूं तो ऐसे एक नहीं अनेक कार्य हैं जो मैंने महज इसलिए किए चूंकि पापा ऐसा चाहते थे। बात बचत करने की हो, बच्चों को कैरियर में सैटल करने की , पापा की समझाइश एवं उनके अप्रत्यक्ष भय ने ही मेरी राह सुगम की। मुझे समाजसेवा एवं सबसे मित्रवत व्यवहार करने के गुण भी पापा से मिले। यह उन्हीं का अनुशासन था कि जीवन की प्रतिकूलतम स्थितियों में भी मैं संयत रहा।
यकायक मेरी आँखें डबडबा आई है।
आज ‘ फादर्स डे ‘ पर मैंने उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण किया है।
उन्हें गुजरे बीस वर्ष होने को आए।
घर के मुख्यद्वार के आगे बैठक की मुख्य दीवार पर लगी यह तस्वीर मुझे आज भी देखती है , बातें करती है। उनकी आंखों में वही सम्मोहन है जो उनके जीते जी था।
मैंने ही उनका दाह-संस्कार किया है , मैंने ही उनके फूल चुने हैं , मैने ही उनकी अस्थियों को गंगा में प्रवाहित  किया है।
इस पर भी वे मरे कहां हैं ?
वे मरकर मुझमें जीवित हैं।
घर में आते-जाते मैं नित्य उनके दर्शन करता हूँ। वे आज भी मुझे आगाह करते हैं , ‘ बेटा ! यह करना , वह न करना।’
वे अब भी मुझे वैसे ही प्रेम करते हैं , वैसे ही समझाते हैं  जैसे जीते-जी समझाते थे। उनसे रूबरू होते ही मुझे समाधान मिल जाते हैं।
उनकी निगाहें लैम्पपोस्ट की तरह आज भी मेरी अंधेरी राहों को रोशन करती हैं।
हरिप्रकाश राठी
हरिप्रकाश राठी
दस कथा-संग्रह, तीन निबंध-संग्रह प्रकाशित. प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में सौ से अधिक कहानियाँ और अखबारों में पांच सौ से अधिक लेख प्रकाशित. आकाशवाणी में तीस से ऊपर कहानियाँ प्रसारित. संपर्क - [email protected]
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